अपने पिछले सत्र में हमने अन्यभाषा में बात करने के अलौकिक छाप के साथ पवित्र आत्मा के बपतिस्मा के बारे में बात किया था। मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर के उद्देश्यों में पवित्र आत्मा में बपतिस्मा का उद्देश्य केवल एक प्रवेश द्वार बनना है। पिछले वर्षों में पिन्तेकुस्त आन्दोलन में इस बात पर चर्चा की गई है कि यह लक्ष्य है या प्रवेश द्वार है। और ऐसा समय रहा है जब कुछ पिन्तेकुस्त लोगों ने यह कहा, ‘‘मैं तो बचाया गया हूँ, मैंने जल में बपतिस्मा ले लिया है, मैंने पवित्र आत्मा में बपतिस्मा पाया है, मैं अन्य भाषाओं में बात करता हूँ, मैं पहुँच गया हूँ।’’ दुर्भाग्यवश यह गलत है और लोग जो सोचते हैं कि वे पहुँच गए हैं, वे तो केवल छोड़ दिए गए हैं, बस। बपतिस्मा लक्ष्य नहीं है, यह एक द्वार है। यह समाप्ति नहीं है, यह एक ऐसे जीवन की शुरुवात है जो अलौकिक सामर्थ्य में जीया जाता है। मैं विश्वास करता हूँ कि सामान्यतः अधिकांश लोगों के अनुभव में पवित्र आत्मा में बपतिस्मा आत्मा के अलौकिक वरदानों के लिये और अलौकिक अनुभवों के बहुत से अन्य प्रकारों के लिये द्वार है। मैं मानता हूँ कि स्वाभाविकता के स्तर पर अपनी संपूर्णता तक मसीही जीवन जीना असंभव होता है। प्रेरितों के काम की पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में - उसमें 28 अध्याय हैं - ऐसी घटनाओं का वर्णन है जो पूरी तरह अलौकिक हैं। हमारे पास प्रेरितों के काम के रूप में एक मात्र अधिकृत पुस्तक है जो बताता है कि वास्तव में प्रभु कलीसिया को किस रूप में देखना चाहता है।

तो बपतिस्मा के प्रकार पर बात करते हुए मैं इस सत्र में और अगले सत्र में पवित्र आत्मा के अलौकिक वरदानों पर बात करना चाहता हूँ। मैं सोचता हूँ, मैं उस सूची को पढ़ते हुए प्रारंभ करूँगा जो 1 कुरिन्थियों 12ः8-10 में पाया जाता है। यदि आप ध्यान दें, तो आपको नौ वरदान मिलेंगे।

‘‘क्योंकि एक को आत्मा के द्वारा बुद्धि की बातें दी जाती है और दूसरे को उसी आत्मा के अनुसार ज्ञान की बातें और किसी को उसी आत्मा से विश्वास, और किसी को उसी एक आत्मा से चँगा करने का वरदान दिया जाता है। फिर किसी को सामर्थ्य के काम करने की शक्ति और किसी को भविष्यद्वाणी की। और किसी को अनेक प्रकार की भाषा, और किसी को भाषाओं का अर्थ बताना।’’

इन नौ वरदानों को तीन-तीन वाले तीन समूहों में बाँटना बाइबल शिक्षकों के मध्य सामान्य चलन रहा है। यह सिद्धान्त नहीं है, यह सुविधा मात्र है। इससे पहले कि हम वरदान विशेष पर ध्यान केन्द्रित करें संक्षिप्त रूप में मैं यह करूँगा जिस पर मैं इस सत्र में चर्चा करना चाहता हूँ।

प्रकाशन के तीन वरदान हैं। बुद्धि का वचन, ज्ञान का वचन और तीसरा कौन सा है? आत्माओं को परखना। ये तीन प्रकाशन के वरदान हैं।

तीन वरदान हैं, जिन्हें हम सामर्थ्य के वरदान कह सकते हैं। विश्वास, आश्चर्यकर्म, तीसरा क्या है? चँगाई। हाँ, यह सही है।

और ये तीन वे हैं जिन्हें प्रायः शाब्दिक वरदान कहा जाता है, क्योंकि वे उच्चारित करनेवाले मानवीय अँगों के द्वारा काम करते हैं। रोचक बात यह है कि जो वरदान हमेशा समस्या उत्पन्न करते हैं वे शाब्दिक वरदान हैं। क्योंकि जीभ देह में समस्या उत्पन्न करनेवाला अँग है। शाब्दिक वरदान कौन कौन से हैं? अन्य भाषायें, व्याख्या और भविष्यद्वाणी।

इस सत्र में हम केवल उन्हीं तीन शाब्दिक वरदानों पर चर्चा करने जा रहे हैं। हमने पहले ही पवित्र आत्मा में बपतिस्मा की छाप के बारे में बात कर लिया है: अन्यभाषा या नई भाषा में बात करना। यह वास्तव में अन्य भाषाओं का वरदान नहीं है। भाषाओं का वरदान यहाँ पर या और कहीं पर ‘‘भाषाओं के प्रकार या विभिन्न भाषाओं’’ को कहा गया है। दूसरे शब्दों में, यह केवल दूसरी भाषा में बात करने से बढ़कर है। मैं मानता हूँ कि प्रत्येक विश्वासी जिसने पवित्र आत्मा में बपतिस्मा पाया है को किसी भी समय किसी अन्य भाषा में प्रभु से व्यक्तिगत रूप से बात करने का ईश्वरीय अधिकार और वरदान है। 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय में पौलुस इसके विषय में बात करता है। ‘‘वह जो अनजाने भाषा में बात करता है, वह मुझसे नहीं परन्तु परमेश्वर से बात करता है।’’ तो इसके तीन कार्य होते हैं, अन्य भाषा में बोलने के तीन कारण। पहला, आप परमेश्वर से बात कर रहे हैं। यह एक सौभाग्य है। आपमें से कितने लोग सहमत होंगे कि यह सौभाग्य है? जीवित परमेश्वर के आत्मा के साथ प्रत्यक्ष सँवाद करना। दूसरा, आप रहस्य या भेद की बातें बोलते हैं जिसे आपका अभिमानी छोटा मन समझ नहीं पाता है। और तीसरा, इसमें स्वयं को उन्नत बनाना शामिल है। बहुत से लोग आपसे पूछेंगे, ‘‘अन्य भाषाओं में बात करने का लाभ क्या है?’’ ठीक है? इसके तीन संक्षिप्त उत्तर हैं। अन्य भाषाओं में बात करना सीधे परमेश्वर से बात करना है, भेद की बातें बोलना है और स्वयं को बनाना है। यदि और कोई कारण न हो तो ये पर्याप्त होंगे।

मैं मानता हूँ कि भाषाओं के प्रकारों का पूर्ण वरदान इससे परे है। भाषाओं के प्रकार भाषाओं के उपयोग से भिन्न हैं। एक और प्रकार की भाषा किसी सभा में व्याख्या के साथ जोर से एक अनजानी भाषा बोलना है। भाषा का एक और उपयोग अविश्वासियों के लिये एक चिन्ह है। यह विरले ही होता है। अधिकांश करिस्माई लोग इस विषय में नहीं सोचते हैं। परन्तु जब परमेश्वर के लोग इकट्ठे होते हैं, या परमेश्वर के लोग सेवा कर रहे हैं, तो यह होता है, एक विश्वासी एक ऐसी भाषा बोलेगा जिसे वह नहीं जानता, परन्तु वहाँ उपस्थित अविश्वासी उस भाषा को जानता होगा। यह अविश्वासियों के लिये चिन्ह है।

मुझे एक युवक का मामला याद आता है जो अब मेरा दामाद है, जिसे बहुत वर्षों पूर्व लन्दन में गली में प्रचार के दौरान पाया था। वह वेल्स का था। जैसा कि आप जानते हैं, वेल्स की लोगों की अपनी भाषा होती है। इसके विषय में वे बहुत गर्व करते हैं। एक सुसमाचार सभा का मौका था और मैं कोई भी सुसमाचार सन्देश सुनाया और मैं सुसमाचार की पुकार देनेवाला ही था। वहाँ उपस्थित एक बुजुर्ग सज्जन ने एक अनजानी भाषा में बात किया। यह क्रोधपूर्ण थाः मैंने सोचा, कुल मिला कर यह क्रमविहीन था, उसने मेरी पुकार को बर्बाद कर दिया था। मुझे याद नहीं कि उसके बाद क्या हुआ, परन्तु मेरी एक बेटी सभा में इस युवक को लेकर आई थी और उसने उसे धकेला और कहा, ‘‘वह बुजुर्ग व्यक्ति सबके सामने मेरे पापों के बारे में क्यों बोल रहे हैं?’’ उसे यह समझाने में दस मिनट लग गए कि उस व्यक्ति को वेल्स भाषा नहीं आती है, परन्तु वे वेल्स में बोल रहे हैं।

अब से कुछ वर्षों पूर्व सीटल वाशिंग्टन में सेंट लूक एपिस्कॉपल कलीसिया से एक स्त्री थी जो अस्पताल में बिमारों की देखभाल किया करती थी। और वह एक व्यक्ति के पास आई और उसने अंग्रेजी भाषा में उससे बात किया, परन्तु उस व्यक्ति ने उत्तर नहीं दिया, उसने नहीं समझा। वह बीमारी के बिस्तर पर था इसलिये उन पागल करिस्माईयों में से एक होने के कारण उसने उससे अन्य भाषाओं में बात किया। उसने उसे चौंका दिया, उसने उसे उत्तर दिया, उस स्त्री ने पलट कर जबाव दिया और उनके बीच में थोड़ी बातचीत हुई। वह व्यक्ति बहुत ही प्रोत्साहित हुआ। उसे नहीं मालूम था कि वह कौन सी भाषा बोल रही है। बाद में उसने जाना कि वह कैनरी द्वीप की स्पेनिस भाषा थी, वह उस व्यक्ति की भाषा थी।

बहुत दिन नहीं हुए रशिया में हमारी एक मित्र, एक स्त्री रहती थी। और वह भूमिगत मार्ग में एक रशियन व्यक्ति के बगल में बैठी हुई थी और वह व्यक्ति बहुत दुःखी और निराश दिखाई दे रहे थे, कि उसने सोचा, उसके लिये कुछ करने में मुझे खुशी होगी। तो उसने प्रभु पर भरोसा किया और अपना मुँह खोला और उससे रशियन भाषा में बात करना प्रारंभ किया।

ये अपवाद हैं, ये सामान्य नहीं हैं परन्तु ये इनमें से एक है।

और तब मैं सोचता हूँ कि भाषाओं या अन्य भाषाओं में बात करने के विभिन्न रूप होते हैं, जैसे आप में से कितनों ने कभी सचमुच में क्रोधित दिखने का अनुभव किया जब कि आप अन्य भाषाओं में बात कर रहे हैं? क्या आप जानते हैं? मेरा मतलब आप नहीं मान सकते। यह एक प्रवाह के समान आता है। मैं मानता हूँ ऐसा तब होता है जब आप दुष्ट शक्तियों का सामना कर रहे हैं। आप नहीं जानते कि कैसे प्रार्थना करना है, आप नहीं जानते क्या कहना है, परन्तु उनमें से होकर पवित्र आत्मा आता है।

और तब ऐसी भाषायें होती हैं जो केवल आराधना के लिये हैं। यह परमेश्वर के साथ संवाद करता है। दूसरे शब्दों में, यह एक बहुत समृद्ध क्षेत्र है।

हम इस पर अभी आगे और अधिक बात नहीं करेंगे परन्तु हम बाकी दो शाब्दिक वरदानों को देखेंगेः व्याख्या और भविष्यद्वाणी करना। हमें परिभाषा से शुरु करने की आवश्यकता है। व्याख्या के वरदान का भाषाओं के वरदान के भिन्न कोई और वरदान नहीं है, परन्तु यदि किसी ने पवित्र आत्मा के द्वारा किसी अनजानी भाषा में बात किया है, तो व्याख्या करने का वरदान या तो उस व्यक्ति को या दूसरे को पवित्र आत्मा की प्रेरणा के द्वारा इस योग्य करता है, न कि बौद्धिक समझ के द्वारा कि एक ज्ञात भाषा में बात करे कि अनजानी भाषा में क्या कहा गया है। अब यह व्याख्या है, यह ठीक-ठीक अनुवाद नहीं है। यह रोचक बात है क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि आपमें से कितने लोगों ने अनुवादक की सहायता से बात किया है। मैंने बहुत बार ऐसा किया है। हम पाते हैं कि हर एक अनुवादक अलग होता है। हर कोई कुछ निश्चित शब्दों का उपयोग करते हैं, कुछ अधिक शब्दों का उपयोग करते हैं, कुछ कम शब्दों का उपयोग करते हैं। मुझे याद आता है जब मैं केन्या में था तो वहाँ मेरे पास कनाड़ा का एक व्यक्ति आया, वह देश में उपलब्ध श्रेष्ठत्तम अनुवादकों में से एक की सहायता से बात कर रहे थे। उसने एक संक्षिप्त बात कही और व्याख्या करने वाला लगभग दो मिनट तक बोलता रहा। तो कनाड़ा का व्यक्ति अपनी व्याख्या करने वाले की ओर मुड़ा और कहा, ‘‘क्या मैंने इतना सब कुछ कहा था?’’ तो व्याख्या करनेवाले ने कहा, ‘‘नहीं, लेकिन जो कुछ आपने कहा वह सब उन्हें समझाने के लिये मुझे इतना सब कहना पड़ा।’’ यह व्याख्या है, यह वाक्य को बताना है।

ब्रिटेन से एक भाई जिसे मैं अच्छी तरह जानता हूँ जो अब अमेरिका में हैं, ने मुझसे कहा कि बीते दिनों में जब वे लंदन के केन्द्र में पिन्तेकुस्त की रैलियाँ किया करते थे, वहाँ एक स्थिति हुई जिसमें किसी ने अन्यभाषा में बात किया और उन्होंने व्याख्या का इन्तजार किया और जब वह आया, तो ऐसे व्यक्ति से आया जो एक कोक्ने था। आप में से कितने लोग जानते हैं कि कोक्ने क्या होता है? वह जो सैद्धान्तिक रूप से बांका की घंटी के आवाज में लन्दन में पैदा हुआ है। मैं कोक्ने का नकल नहीं करता हूँ। यह मेरी योग्यता के बाहर है, परन्तु व्याख्या यह थी - और मैं नहीं सोचता कि आप अमेरिकी उस बात को समझेंगे: ‘‘आधा क्षण, मेरे लोगों आधा क्षण।’’ दूसरे शब्दों में, क्षण भर के लिये ठहरिए। बहुत शीघ्रता मत कीजिए। आप देखें, यह एक व्याख्या थी। यह कोक्ने अनुवाद के रूप में विशेष है। तो व्याख्या के इस क्षेत्र में काफी कुछ लचीलापन पाया जाता है।

हाँलाकि, यह पहले अनजानी भाषा में कही गई बातों को परिचित भाषा में बताना है।

भविष्यद्वाणी करना इससे एक कदम आगे होता है। भविष्यद्वाणी करना एक ऐसी भाषा में बात करना है जिसके शब्द ज्ञात है और पवित्र आत्मा के द्वारा दिये गए हैं। वे मानवीय समझ से नहीं निकलती हैं, वे अलौकिक रूप से पवित्र आत्मा के द्वारा दिये जाते हैं। व्याख्या करने और भविष्यद्वाणी करने के मध्य अन्तर यह है कि व्याख्या करना एक अनजानी भाषा में बात करने के बाद आता है और उस बात से संबन्धित होता है; भविष्यद्वाणी करना एक ज्ञात भाषा में प्रारंभ होता है। मैं मानता हूँ कि बहुधा ऐसे स्थानों पर जहाँ परमेश्वर के लोग समूह में एकत्रित होते हैं वहाँ एक ऐसी भाषा में बात की जाएगी जिसके बाद व्याख्या नहीं भविष्यद्वाणी होगी है। अन्यभाषा में बात करना परमेश्वर के लोगों के ध्यान को खींचता है और आनेवाली भविष्यद्वाणी के लिये मार्ग तैयार करता है।

यदि आप अगुवाई पसन्द करें तो अब मैं आप लोगों को अगले 30/40 मिनट तक व्याख्या और भविष्यद्वाणी के अभ्यास में अगुवाई करना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि यह किया जा सकता है, क्योंकि मैंने हजारों की बड़ी भीड़ में यह किया है। इससे कुछ नहीं होता कि भीड़ बड़ी है या छोटी। महत्वपूर्ण बात यह है कि लोग परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते हैं और उस पर अमल करने के इच्छुक हैं। यदि आप इस अनुभव में आते हैं और आप इसमें चलते हैं तो यह आपको परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संवाद के एक नए आयाम में लिये चलेगा।

कल मैंने आपसे अपना स्थान पाने के विषय में बात किया था। मैं सोचता हूँ कि मैंने आपमें से कुछ लोगों को अपनी बुलाहट के विषय में परमेश्वर को खोजने की चुनौती दी है। यह उन तरीकों में से एक है जिसमें परमेश्वर आपको आपके स्थान तक पहुँचाने में दिशा देना प्रारंभ कर सकता है। मैंने लोगों की अश्रुपूरित आँखों को देखा है, जब परमेश्वर ने उन्हें उनके जीवन के लिये व्याख्या के द्वारा दिशा निर्देश के वचन दिए जिसे उन्होंने प्राप्त किया। यह एक प्रकार से उनके लिये परमेश्वर को और अधिक वास्तविक बना दिया। यह सारे आत्मिक जीवन को कहीं अधिक वास्तविक बना दिया।

मैं आपको सामान्यतः वरदान का अभ्यास करने के लिये कुछ आत्मिक प्रोत्साहन देने के द्वारा प्रारंभ करना चाहता हूँ। यह पहला कदम है। पहला संदर्भ 1 कुरिन्थियों 12ः7,11। इन नौ आत्मिक वरदानों की सूची बताते हुए पौलुस कहता है:

‘‘क्योंकि सबके लाभ पहुँचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है।’’

ध्यान दें कि वरदान आत्मा की अभिव्यक्तियाँ है। आप में रहने वाला आत्मा दृश्य नहीं है, मानवीय इन्द्रीयों द्वारा पाया नहीं जा सकता, परन्तु उससे निकलनेवाले वरदान मानवीय इन्द्रीयों को प्रभावित करती हैं। यह आपके भीतर रहनेवाले आत्मा का संबन्ध मानवीय इन्द्रीयों से कराता है। यद्यपि यह एक व्यक्ति को दिया जाता है, ध्यान दें कि यह सबके लाभ के लिये दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, मान लें यदि परमेश्वर आपको एक भविष्यद्वाणी देता है और आप दूसरों को इसे देने में बहुत ही डरपोक हैं, तो न केवल आपने स्वयं को धोखा दिया है, परन्तु आपने मसीह की देह के अन्य सदस्यों को भी धोखा दिया है। आप देखते हैं? यह भण्डारीपन है। यह कुछ ऐसा नहीं है जो आपको पसन्द आने पर आप अपने लिये इस्तेमाल कर लेते हैं। आप उत्तरदायी हैं। हो सकता है परमेश्वर आपके पड़ोसी से आपके द्वारा बात करना चाहता हो। हो सकता है वह सारी सभा से बात करना चाहता हो, हो सकता है, वह प्रचारक से बात करना चाहता हो। इसलिये यह मनोवृत्ति त्याग दें, यदि मुझे पसन्द नहीं है तो मैं नहीं सोचता कि मैं यह नहीं करूँगा, क्योंकि यह उत्तरदायी नहीं है। यह सबके लाभ के लिये दिया गया है।

और यह हर एक है। पुनः अन्त में इसी अध्याय का 11 पद:

‘‘परन्तु ये सब प्रभावशाली कार्य वही एक आत्मा करवाता है और जिसे जो चाहता है, वह बाँट देता है।’’

ठीक है? ध्यान दें कि यह प्रत्येक के साथ प्रारंभ और अन्त होता है। पौलुस का मानना यह है कि प्रत्येक विश्वासी आत्मा के अपने प्रगटीकरण के लिये हकदार है। परन्तु आत्मा निर्णय करता है कि हममें से हर एक के पास कौन सा प्रगटीकरण होना है।

और तब उस अध्याय के अन्त में पद 31;

‘‘तुम बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो। परन्तु मैं तुम्हें और भी सबसे उत्तम मार्ग बताता हूँ।’’

जो कि निश्चय ही अगले अध्याय में वर्णित प्रेम का मार्ग है। बहुत से लोग धर्मशास्त्र का उपयोग पेन्टीकोस्टल लोगों को मारने के लिये छड़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ‘‘हाँ, प्रेम सबसे उत्तम मार्ग है।’’ परन्तु यह उस तथ्य को अनदेखा करता जो पौलुस हमसे कहता है कि उत्तम वरदानों के धुन में लगे रहो। प्रेम एक वरदान नहीं है, प्रेम एक मार्ग है। प्रेम फल है। तो यदि हम उत्तम वरदानों की धुन में नहीं लगे रहते हैं तो हम क्या कर रहे हैं? हम धर्मशास्त्र को नहीं मान रहे हैं। धर्मशास्त्र हमसे करने के लिये कहता है।

कल जो बात मैंने कही उसे मुझे बताने दीजिए। वरदान खिलौने नहीं हैं, वे उपकरण हैं। काम करने के लिये आपको उनकी आवश्यकता है और यदि आप परमेश्वर के उपकरण का तिरस्कार करते हैं और काम नहीं कर सकते, तो आप परमेश्वर को उस कार्य के लिये उत्तर देने जा रहे हैं जो आपने नहीं किया।

तब अध्याय 14 पद 1 में:

‘‘प्रेम का अनुकरण करो....।’’

बहुत से लोग यहाँ रुक जाते हैं, परन्तु यह यहाँ नहीं रुकता है।

‘‘प्रेम का अनुकरण करो और आत्मिक वरदानों की भी धुन में रहो, विशेष करके यह कि भविष्यद्वाणी करो।’’

यह नहीं कहता है कि प्रेम का पीछा करो या आत्मिक वरदानों की इच्छा करो। वे विकल्प नहीं हैं। यह प्रेम का पीछा करना और आत्मिक वरदानों की अभिलाषा करना है, परन्तु विशेष कर यह कि आप भविष्यद्वाणी कर सकें। इस सुबह क्या आप विशेष करके भविष्यद्वाणी करने की अभिलाषा कर रहे हैं? यदि नहीं तो आप धर्मशास्त्र की आज्ञा का पालन नहीं कर रहे हैं।

और तब पद 26 कहता है:

‘‘इसलिये हे भाइयों, क्या करना चाहिए? जब तुम इकट्ठे होते हो, तो हर एक के हृदय में भजन या उपदेश या अन्य भाषा या प्रकाश या अन्य भाषा का अर्थ बताना रहता है।’’

जब परमेश्वर के लोग इकट्ठे होते हैं, तो हममें से हर एक को केवल प्राप्त करने के लिये नहीं आना चाहिए, हम प्रत्येक को कुछ देने के लिये आना चाहिए। एक मुख्य तरीका जिसमें हम दे सकते हैं वह आत्मा के वरदान से बाहर है। यह परमेश्वर का तुल्य कारक है। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से वरदान प्राप्त होते हैं, वे बुद्धिमान होते हैं, वे शिक्षित होते हैं, वे स्पष्ट होते हैं, वे परेशान नहीं होते हैं, वे खड़े हो सकते हैं और अक्सर लम्बा बोल सकते हैं! परन्तु बहुत से ऐसे हैं जो एक प्रकार से डरपोक होते हैं और उनके पास कहने के लिये बहुत कुछ नहीं होता है। ‘‘मैं क्या कर सकता हूँ?’’ ठीक है। यदि यह आपकी स्वाभाविक योग्यता पर निर्भर है तो वह ऐसा ही हो। इस विषय की सत्यता यह है कि परमेश्वर आपको अलौकिक योग्यता देता है। पौलुस कहता है कि वह उस भाग को यह देता है जिसे उसकी सबसे अधिक जरूरत है। एक कलीसिया में दो लोग होते हैं, एक डॉक्टर है और दूसरा वह है जिसे हम ब्रिटेन में नौकरानी कहते हैं। हम नहीं जानते कि यह क्या है परन्तु साफ सफाई करनेवाली स्त्री। औसत अनात्मिक कलीसिया में डॉक्टर डीकन बनता है और साफ सफाई करनेवाली स्त्री आसन पर बैठती है। हर कोई जानता है कि वह उसका स्थान है परन्तु जब पवित्र आत्मा काम करता है तो डॉक्टर अभी भी डीकन है, परन्तु साफ सफाई करने वाली स्त्री भविष्यद्वक्तीन बन जाती है। यह परमेश्वर की बुद्धि है, यह परमेश्वर का न्याय है। यदि हम अलौकिक को इन्कार करते हैं, तो हम अपने आपको अपनी स्वयं की सीमाओं में बान्ध लेते हैं।

अब यह बात मन में रखते हुए कि ये दोनों बातें गलत क्रम में होती हैं, मैंने कहा, कि ‘‘यह आपको सचेत करने के लिये है,’’ हम रूपरेखा में तीसरे पर जाते हैं जो कि मेरे लिये दूसरा है। विशेष करके व्याख्या करना। ठीक है? अब हम उस बिन्दु पर आते हैं जहाँ मैं आपको व्याख्या के वरदान का उपयोग करने पर ले चलूँगा। क्या आप इस अगुवाई के लिये तैयार हैं? यह आपका निर्णय है, मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि बाइबल हमें व्याख्या करने के लिये प्रोत्साहित करती है। 1 कुरिन्थियों 14ः5:

‘‘मैं चाहता हूँ कि तुम सब अन्य भाषाओं में बात करो।’’

कितनी बाप्टिस्ट कलीसियायें इस बात को मानती हैं? ‘‘परन्तु अधिकतर यह चाहता हूँ कि भविष्यद्वाणी करो।’’ अधिकतर कितने हैं? अधिकतर अर्थात अधिकतर, है न? परन्तु यह अधिकतर नहीं है, यह केवल पहला भाग है।

‘‘मैं चाहता हूँ कि तुम सब अन्य भाषाओं में बातें करो परन्तु इससे अधिक यह चाहता हूँ कि भविष्यद्वाणी करो: क्योंकि यदि अन्य भाषाएं बोलनेवाला कलीसिया की उन्नति के लिये अनुवाद न करे तो भविष्यद्वाणी करनेवाला उससे बढ़कर है।’’

इस अध्याय में मुख्य शब्द उन्नति और उन्नति करना है। हर बात का उद्देश्य व्यक्ति को और कलीसिया को बनाना है। पौलुस कहता है, कि अन्य भाषाओं में बात करना अच्छी बात है, परन्तु आप केवल अपनी ही उन्नति कर रहे हैं। यदि आप भविष्यद्वाणी करते हैं, तो आप कलीसिया की, पूरे झूण्ड की उन्नति कर रहे हैं। परन्तु उसने कहा, कि यदि आप अन्य भाषा में बात करें और उसकी व्याख्या करें तो यह भविष्यद्वाणी करने के समान ही अच्छा है।

और तब वह उसी अध्याय में पद 12 और 13 पर जाता है:

‘‘इसलिये तुम भी जब आत्मिक वरदानों की धुन में हो...’’

क्या आप आत्मिक वरदानों के धुन में हो? ठीक है। यदि हैं तो यह लागू होता है।

‘‘....तो ऐसा प्रयत्न करो कि तुम्हारे वरदानों की उन्नति से कलीसिया की उन्नति हो।’’

अब मैं यह विश्वास करने में अनुभवहीन हूँ कि यदि बाइबल किसी बात के लिये हमसे प्रार्थना करने के लिये कहता है, तो बाइबल चाहती है कि हमारे पास वह हो। मैं यह नहीं मानता कि बाइबल किसी बात के लिये प्रार्थना करने के लिये कहती है परन्तु वह परमेश्वर की इच्छा न हो। यह मुझे अविश्वसनीय लगता है, पूरी तरह तर्क विरुद्ध। तो बाइबल कहती है कि जो अन्य भाषा में बात करता है वह क्या करे? अनुवाद करने के लिये प्रार्थना करे। तो यदि आप अन्य भाषाओं में बात करें तो अगली बात जो आपको करना है वह क्या है? व्याख्या के लिये प्रार्थना कीजिए।

अब क्षण भर के लिये आपको प्रोत्साहित करने हेतु रूपरेखा के नीचले हिस्से पर चलें। बिनती के दो सिद्धान्त। सबसे पहले, 1 यूहन्ना 5ः14-15 में:

‘‘और हमें जो उसके सामने हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।’’

मुद्दा यह है, कि क्या हम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना कर रहे हैं? यदि हाँ, तो हम जानते हैं कि वह हमारी सुनता है, तो हम जो कुछ माँगते हैं, तो हम जानते हैं कि जो कुछ हमने उससे माँगा, वह पाया है। तो मुद्दा यह है, कि क्या हम परमेश्वर की इच्छा में प्रार्थना कर रहे हैं? यदि हाँ, तो हम जानते हैं कि वह हमारी सुनता है, यदि हम जानते हैं कि वह हमारी सुनता है तो हम जानते हैं जो कुछ हमने उससे माँगा, वह पाया है।

अब यदि परमेश्वर कहता है कि अन्य भाषा में बात करनेवाला अनुवाद के लिये प्रार्थना करे, तो मेरे लिये यह इस बात को सूचित करता है कि आपके लिये यह परमेश्वर की इच्छा है कि आप अनुवाद करें। अन्यथा, परमेश्वर यह करने के लिये आपसे नहीं कहता।

तब प्राप्त करने के समय के बारे में यह बहुत महत्वपूर्ण है।

‘‘इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ (यीशु कह रहा है) कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया है और तुम्हारे लिये हो जाएगा।’’

यह पूरी तरह सटीक अनुवाद नहीं है। काल गलत है। यूनानी में यह वचन इस प्रकार है, ‘‘विश्वास करो कि तुम्हें वह मिलता है और तुम्हें वह मिल जाएगा।’’ तो आप जो कुछ माँगे, जब आप प्रार्थना करें, तो आप विश्वास करें कि आप उन्हें प्राप्त करते हैं और आपको वह मिल जाएगा। तो आपने कब पाया? जब आपने प्रार्थना किया। हाँ, यह सही है और यदि आप परमेश्वर की इच्छा में प्रार्थना कर रहे हैं, आप जानते हैं कि वह आपकी सुनता है और आप जानते हैं कि जिस बात के लिये आप प्रार्थना कर रहे हैं वह आपको मिलता है।

ठीक है? तो हम बहुत सरल रीति से क्या करने जा रहे हैं - ठीक है, सामान्य निश्चयता को देखें। हमने पिछली बार इसे देखा था। पिछली बार हमने उसे वहाँ देखा था, अब हमें वहाँ जाने की जरूरत नहीं है। यीशु ने कहा, ‘‘यदि तुम रोटी माँगोगे, तो तुम्हें कभी भी पत्थर नहीं मिलेगा। यदि तुम मछली माँगोगे, तो तुम्हें कभी भी सांप नहीं मिलेगा। यदि तुम अण्डा माँगोगे, तो तुम्हें कभी भी बिच्छु नहीं मिलेगा। यदि तुम कुछ भला माँगोगे, तो तुम्हें कभी भी कुछ बुरा नहीं मिलेगा।’’ अपने पड़ोसी की ओर मुड़िए और यह कहिए, ‘‘यदि तुम कुछ अच्छा माँगोगे, तो तुम्हें कभी भी कुछ बुरा नहीं मिलेगा।’’ ठीक है?

अब हमें जो करना है वह इस पर अमल करना है। क्या आप सब तैयार हैं? हम इसे इस प्रकार करने जा 

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