रदानों और फलों के बीच अन्तर होता हैं। यह तुलनात्मक रूप से देखा जा सकता है एक क्रिसमस के पेड़ और एक सेब के पेड़ से।

सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि क्रिसमस का पेड़ मुफ्त में तोहफे (वरदान) देता है। उपहार प्राप्त करने वाले व्यक्ति को कोई समय या मेहनत नहीं करनी पड़ती। परन्तु एक सेब को उसके पेड़ से प्राप्त करने के लिए समय और मेहनत की आवश्यकता होती है। पहले, बीज को जमीन में बोया जाता है। इस बीज में से एक जड़ भूमि के अन्दर जाती है और दूसरी तरफ भूमि के ऊपर अंकुर फूटते हैं। और कुछ ही वर्षों में यह अंकुर बढ़कर एक पेड़ बन जाता है। और फिर होती है कली, जो एक फल में विकसित हो जाती है।

अगर पेड़ को मजबूत बनाना है, तो पहले वर्ष के कलियों को तोड़ देना चाहिये ताकि उस पेड़ की जड़ें और मज़बूत बन जाये, जिससे वह पेड़ को एक अच्छा सहारा देने में सक्ष्म हो सके।

उपहार बनाम फल

वरदाने रदानों और फलों के बीच अन्तर होता हैं। यह तुलनात्मक रूप से देखा जा सकता है एक क्रिसमस के पेड़ और एक सेब के पेड़ से। सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि क्रिसमस का पेड़ मुफ्त में तोहफे (वरदान) देता है। उपहार प्राप्त करने वाले व्यक्ति को कोई समय या मेहनत नहीं करनी पड़ती।

परन्तु एक सेब को उसके पेड़ से प्राप्त करने के लिए समय और मेहनत की आवश्यकता होती है।

पहले, बीज को जमीन में बोया जाता है। इस बीज में से एक जड़ भूमि के अन्दर जाती है और दूसरी तरफ भूमि के ऊपर अंकुर फूटते हैं। और कुछ ही वर्षों में यह अंकुर बढ़कर एक पेड़ बन जाता है। और फिर होती है कली, जो एक फल में विकसित हो जाती है।

अगर पेड़ को मजबूत बनाना है, तो पहले वर्ष के कलियों को तोड़ देना चाहिये ताकि उस पेड़ की जड़ें और मज़बूत बन जाये, जिससे वह पेड़ को एक अच्छा सहारा देने में सक्ष्म हो सके। कई वर्ष लग जाते हैं एक अच्छे सेब लगने में। (मूसा की व्यवस्था में कम से कम चार वर्ष की जरूरत होती है। देखें लैव्यव्यवस्था १६:२३-२५) सेब का पेड़ जब बढ़ता है तब वह बहुत ही कमजोर होता है।

Character Development

छोटे पेड़ को एक अच्छी तेज हवा जड़ से निकाल देती है या ओस उसके कली या फल को नष्ट कर देती है।

इस प्रक्रिया में बीज और फल एक संबंध में बंध जाते हैं। फल बीज के अन्दर से खिलती है परन्तु फल से अनेक बीज उत्पन्न होते है। सृष्टि के शुरूआत में परमेश्वर ने यह आज्ञा दी कि हर फल वाले पेड़ फल उत्पन्न करें "पेड़ जिन में अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है" (उत्पत्ति १:१२)। आत्मिक वरदानों के विषय में नया नियम बहुवचन के रूप में बताती है। जैसे हमने पिछले अध्याय में नौ वरदानों के बारे में १ कुरिन्थियों १२:८-१० में देखा।

नया नियम आत्मिक फल के विषय में एक वचन के रूप में कहा है। आत्मिक फल के नौ प्रकार गलातियों ५:२२-२३ में लिखित है जो हैः

प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज,कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम ।

प्रेम जिसे पहले प्रकार का फल बताया गया है क्रम में भीपहला है। अन्य प्रकार जो इसकेबाद आता है वे प्रेम केही प्रकटीकरण है जो अलग तरीकों में समझा जाता है :

  • आनन्द है जब प्रेम आनन्दित होता है।
  • मेल है जब प्रेम स्थिर रहता है।
  • धीरज है जब प्रेम सहनशील होता है।
  • कृपा है जब प्रेम दूसरों की सेवा करता है।
  • भलाई है जब प्रेम दूसरों के बारे में उत्तम करने की खोज करता है।
  • विश्वास है जब प्रेम अपने वायदों का पालन करता है।
  • नम्रता है जब प्रेम दूसरों के चोट पर सेवकाई करता है।
  • संयम है जब प्रेम पूरे नियंत्रण में है।

हम आत्मा के फल को ऐसे अन्य तरिके से भी व्यक्त कर सकते हैं जिस प्रकार यीशु का चरित्र उसके वास करने वालों के द्वारा प्रकट होता है। जब सारे फल का विकास होता है तो वह इस प्रकार होता है मानो यीशु ने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने चेलों में अवतरण किया हो। एक सेब के पेड़ की तरह यह क्रमों में बढ़ता रहता है।

यह वही क्रम है जहाँ मैं हम सब के ध्यान को केन्द्रित करना चाहूंगा।

विकास के सात कम

पतरस इन क्रमों को बताते हैं, परन्तु एक चेतावनी से शुरू करते है कि इस प्रक्रिया में सफलता पूर्वक जाने के लिए कर्मठता की मांग होती है। पौलुस इसी बात को दूसरे तरीके से कह कर व्यक्त करते हैं, "जो गृहस्थ परिश्रम करता है फल का अंश पहले उसे मिलना चाहिए"। मसीही व्यक्तित्व का विकास करने के लिए जरूरी है कर्मठता या कठिन परिश्रम। जब परमेश्वर के वचन का बीज हृदय में बोया जाता है, तो विश्वास बढ़ने लगता है। यही इस प्रक्रिया की अत्यावश्यक पहली बात है। और फिर विश्वास विकास के सात क्रम का अनुसरण करती है तब तक जब तक मसीही व्यक्तित्व पूर्ण रूप से एक तैयार मसीही व्यक्तित्व न बन जाए। पतरस सफलतापूर्वक क्रमों की एक सूची देते हैं। पतरस १:५-७ मेंः

और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्न करके, अपने विश्वास पर "सदगुण" और सदगुण पर "समझ" और समझ पर "संयम और संयम पर "धीरज" और धीरज पर "भक्ति" और भक्ति पर "भाईचारे की प्रीति" और भाईचारे के प्रीति पर "प्रेम" बढ़ाते जाओ" पहला कम कहा गया है "सदगुण"।

परन्तु मैं समझता हूं कि नये नियम में इसका अर्थ सिर्फ नैतिक व्यक्तित्व के लिये ही प्रयोग किया गया है। यह हमारे जीवन के हर जगह के लिये है। ग्रीक भाषा में इस शब्द का अर्थ है किसी कार्य को विशिष्ठ रूप में करना जैसे एक मिट्टी के बर्तन को बनाने में, नाव चलाने में, या बांसुरी बजाने में।

एक शिक्षक जो मसीह को अपनाता है वह एक 'विशिष्ठ शिक्षक' बन जाता है। एक मसीही व्यापारी अपने कार्य क्षेत्र में विशिष्टता प्राप्त करता है। मसीही जीवन में आलस्य या सुस्ती के लिये कोई जगह नहीं है।

आत्मिक विकास का दूसरा कम है 'समझ'। यथार्थ रूप में कई अलग प्रकार के समझ देखने को मिलता है। जिस समझ के बारे में पवित्रशास्त्र में कहा गया है वह व्यावहारिक है, न कि सैद्धांतिक । यह समझ ही है जो "कार्य करती" है। मैं मसीह में आने से पहले एक सैद्धांतिक तत्व ज्ञानी था, इसलिये इस विषय ने मुझे बाईबल के बारे में और प्रभावित किया। यह कितना अधिक व्यवहारिक है? इसके लिये पवित्रशास्त्र के उदाहरण के रूप में स्वयं यीशु के वचन व उपदेश हैं। यह किसी आध्यात्मविद्या के श्रेणी में नहीं आता है। उसने कभी विषय को उलझाया नहीं। उसके उपदेश जाने पहचाने और व्यवहारिक बातों से या घटनाओं पर आधारित है जैसेः बीज बोना, मछली पकड़ना, भेड़ चराना, आदि।

मसीही जीवन में समझ की जो महत्वपूर्ण बात है वह है परमेश्वर की इच्छा की समझ जो पवित्रशास्त्र में प्रकट किया गया है। यह भी व्यवहारिक है। यह बाईबल का निरंतर यथाक्रम अध्ययन की मांग करता है। " बहुत ही कम लोगों को, या शायद ही किसी ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर बुलाता है जो लौकिक सेवा में रहा हो। ऐसे लोगों को परमेश्वर कभी आत्मिक सफलता नही देता। ""जो थोड़े से थोड़े में सच्चा है, वह बहुत में भी सच्चा है और जो थोड़े से थोड़े में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है"" (देखें लूका १६:१०)।"

"हर एक पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिए लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाएं" (२ तिमुथियुस ३:१६-१७) ।

मैं यह देख कर हैरान था कि जो अपने आपको अच्छे मसीही बताते हैं उन्होंने कभी पूरे बाईबल को एक बार भी नहीं पढ़ा हैं। ऐसे लोग स्वयं की आत्मिक उन्नति को अपने ढंग से करते हैं।

समझ के बाद तीसरे क्रम में है: संयम या कह सकते हैं स्वःअनुशासन (देखें २ तिमुथियुस १:७)। यही वह क्रम है जहां एक मसीही को यह साबित करना अनिवार्य हो जाता है कि अब वह एक अनुशासित शिष्य है और न केवल एक कलीसिया का सदस्य।

इस प्रकार के अनुशासन को हमारे व्यक्तित्व के हर प्रमुख स्थानों में प्रयोग करना चाहिए। जैसे, हमारे मनोभाव, हमारे स्वभाव, हमारी भूख और हमारे विचार। यह हमारे क्रिया को ही नहीं परन्तु हमारे प्रतिक्रिया को भी नियंत्रित करती है।

जब तक हम इस प्रकार का एक अनुशासन का विकास नहीं करते तब तक हम चौथे क्रम में प्रवेश नहीं कर सकते, जो हैं, धीरज । जो ऐसा एक गुण है जिससे हम परीक्षाओं और कसौटियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। वह परीक्षाऐं जो हमारे व्यक्तित्व के कमजोर और अनुशासन रहित जगहों को आपत्ति में डालते हैं। यही वह जगह है जहां कई मसीही अपने आत्मिक विकसन में कमजोर पड़ जाते हैं। वे कभी इन दो जरूरतों को पूरी नहीं कर पाते जो है, संयम और सहनशीलता। एक दूसरा उदाहरण लेते हैं सेब के पेड़ का। उनकी कलियाँ जोर के हवा चलने से टूट जाती हैं। या उसके छोटे फल ओस के कारण नष्ट हो जाते हैं।

तीन अंतिम चरण

बचे हुए तीन विकास के क्रमों में सबसे सौम्य मसीही व्यक्तित्व का खुलासा है। भक्ति, जो कि पांचवा कम है यह उस व्यक्ति का चिन्ह है जिसका जीवन परमेश्वर पर केन्द्रित है और वह व्यक्ति परमेश्वर की उपस्थिति का एक जरिया बन जाता है। जब भी ऐसा एक व्यक्ति कही जाता है तो वातावरण कमजोर पड़ जाता है परन्तु एक विशेष सुगन्ध फैल जाता है। भले वहां कोई प्रचार या कोई गार्मिकता फैल जाता हो। फिर भी लोग, अनोखे रूप से अनन्तता के बारे में जान जाते हैं।

स्मिथ विगलस्वर्थ ने एक ऐसे घटना का विवरण किया जहां एक धार्मिक वातावरण के न होते हुए भी वहां परमेश्वर की उपस्थिति देखी गयी। कुछ समय के प्रार्थना के बाद स्मिथ एक रेलगाड़ी में बैठा। उसके ठीक आगे बैठे हुए व्यक्ति जो अनजान था, वह कह उठा "आपकी उपस्थिति मुझे मेरे पापों को दिखलाती है।" उस वक्त स्मिथ उससे मसीह के बारे में वचन बांटे। आखिरी दो क्रमों में दो प्रकार के प्रेम को बताया गया है। पहला 'भाईचारे की प्रीति' यह बताती है कि किस प्रकार एक मसीही दूसरे मसीही से संबंध रखता है जैसे मसीह में उन्हें एक भाई और बहन बनकर रहना है।

जब मैं इन विकास के क्रमों को एक सूची में बना रहा था तब 'भाईचारे की प्रीति' ने मुझे हैरान किया। जिस प्रकार का प्रेम एक मसीही को दूसरे मसीह से होना चाहिए वह जरूर इस क्रम में होना चाहिए। मैं विश्वास करता हूं कि बाईबल एक यथार्थ है। और जो कोई भावुक चित्र नहीं दिखलाता, या कोई धार्मिक चित्र नहीं दिखाता जिससे हम मसीही एक दूसरे से संबंध रख सकें। आप चौंक जायेंगे जब मैं यह कहूंगा किः "यह मसीही के लिए आसान नहीं है कि वह एक दूसरे से प्रेम रख सकें।"

कलीसिया के इतिहास के द्वारा यह कही गई बात साबित होती है। कुछ शताब्दी पहले से मसीही गुटों के बीच कड़वापन और विवाद शुरू हुए और हैरानी की बात यह है कि यही सब दावा करते हैं कि वह "सच्ची कलीसिया" है। यह तथ्य कि एक व्यक्ति द्वारा अपने पापों से पश्चाताप करने और मसीह के उद्धार को स्वीकार करने से जरूरी नहीं कि उसका पूरा चरित्र ही रूपांतरित हो जाए। निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है परन्तु यह उस व्यक्ति के हर व्यक्तित्व में कार्य करने में कई वर्ष लग जाते हैं।

जब दाऊद को चिकने पत्थरों की आवश्यकता पड़ी जो उसके गोफन में सही बैठे, ताकि वह गोलियात को मार सके तो वह उन पत्थरों को चुनने के लिए नाले में गया जो है दीनता का एक निचला स्थान। उसने नाले में से पांच चिकने पत्थर चुन लिए जिसकी उसे आवश्यकता थी (देखें १ शमुएल १७:४०)। किसने उन्हें इतना चिकना बनाया? दो दबाव के कारणः पहला, उनके ऊपर से निरंतर बहता पानी; दूसरा, एक दूसरे से निरंतर टकराने से।

यह एक चित्र था मसीही व्यक्तित्व के बनने का। पहला, वहां एक निरंतर "वचन के द्वारा जल के स्थान से शुद्ध करके पवित्र बनाए" (इफिसियों ५:२६)। दूसरा जैसे ही पत्थर एक दूसरे से टकराते हैं एक व्यक्तित्व संबंधों में और धीरे-धीरे उनके नुकीले कोने टूटने लगते है। और वह 'चिकने' बन जाते हैं।

कोष्ठक चिन्हों द्वारा मैं यह बताना चाहूंगा कि जब यीशु को अपने गोफन के लिये "जीवित पत्थरों" की आवश्यकता पड़ती है, तो वह भी नाले में जाता है जो है दीनता का एक निचला स्थान। फिर वह उन "चिकने" पत्थरों को चुनता है जो परमेश्वर के वचन और निरंतर दूसरे विश्वासियों से टकराने से बने है। यह एक परिपक्वता का चिन्ह है कि हम दूसरे मसीही से एक निष्कपट प्रेम रख सकें, उनके स्वयं के कारण नहीं, परन्तु जो वे यीशु के लिये है जिसने अपना लोहू उन के लिए बहाया।

आखिरी क्रम विकास का ह अगापे प्रेम जो दर्शाता है मसीही व्यक्तित्व के पूर्ण और पके हुए फल को। अब यह सिर्फ हमारे जान पहचान के मसीही के साथ बर्ताव का नहीं, परन्तु परमेश्वर का स्वयं का प्रेम जो अपवित्र और बिना धन्यवाद के हृदय वालों के लिए है। यह वह प्रेम है जो हमें यह करने को कहता है, "परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं कि अपने बैरियो से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो " (मती ५:४४)।

यह वह प्रेम है जो मसीह ने क्रूस पर दिखाया जब उसने उन लोगों के लिए प्रार्थना की जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया "सो पीलातुस ने आज्ञा दी कि उन की विनती के अनुसार किया जाए" (लूका २३:२४)। यह वही प्रेम था जिसने स्तिफनूस को प्रेरित किया कि वह अपने ऊपर पथराव करने वालों के लिए प्रार्थना करें (प्रेरित ७:६०)।

यह वही प्रेम था जिसने सतावट करने वाले शाउल को मसीह का सेवक पौलुस बना दिया और कहां, "मैं सब मनुष्यों के लिये सब कुछ बना हूं, कि किसी न किसी रीति से कई एक का उद्धार कराऊं" (१ कुरिन्थियों ६:२२)।

जब मैंने बाईबल में पवित्र आत्मा का पूर्ण निर्मित फल के चित्र के बारे में मनन किया, तो मैं नम्र और उत्तेजित हुआ। नम्र इसलिए कि, मुझे और बहुत कुछ जानना है। उत्तेजित इसलिए कि मैने ऐसे एक चीज़ की झलक देखी जो यह संसार मुझे किसी भी कीमत में नहीं दे सकती।

यही वह चित्र है जो मुझे आगे बढ़ने के लिए सहायता करती है, और पौलुस के वाक्यों में ऐसा कहा गया है "आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ।" निश्चित रूप से दिन आसान नहीं होगा; लेकिन जो प्रतिफल, जो ईनाम है वह है "परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु के ऊपर बुलाया है" (फिलिपियों ३:१३:१४)।

क्या आप मेरे साथ है? आईये, आगे बढ़ें ।
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