जब मैं सेवा करता हूँ, रूत और मैं, हम अक्सर इस प्रकार प्रारंभ करते हैं। परमेश्वर ने हमें यह सिखाया और हमने पाया है कि किसी सभा के प्रारंभ में विश्वास में होकर वचन की घोषणा करना सभा में, वातावरण में भारी अन्तर लाता है और वक्ता पर अभिषेक लाता है। हम यशायाह 55ः10-11 की घोषणा करने जा रहे हैं जो कि हमारी पसन्दीदा घोषणाओं में से एक है। हम अपनी रेडियो सेवकाई और पृथ्वी भर में इसकी पहुँच के संबन्ध में अक्सर इसका उपयोग करते हैं। अतः हम यह कहते हैं:

‘‘जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहाँ यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोनेवाले को बीज और खानेवाले को रोटी मिलती है, उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैंने उसको भेजा है उसे वह सुफल करेगा।’’

अब मुझे घोषणा शब्द या घोषणा करना के बारे में थोड़ा बहुत बताने दीजिए। यह वास्तव में एक लातीनी भाषा से आता है जिसका अर्थ है ‘‘चिल्लाना’’। यह एक मजबूत शब्द है। नया नियम की भाषा में इससे संबन्धित दो शब्द पाए जाते हैं। ‘‘अंगीकार या अंगीकार करना’’ और ‘‘घोषणा या घोषणा करना’’। अब अंगीकार करना या अंगीकार का अर्थ होता है ‘‘जैसा है वैसा ही कहना’’। और बाइबल में विश्वासियों के रूप में हमारे लिये अंगीकार का अर्थ होता है, कि हम अपने मुँह से उसी प्रकार कहते हैं जैसा कि परमेश्वर ने अपने वचन में पहले से कहा है। हम अपने मुँह के शब्दों को परमेश्वर के वचन के साथ सहमत करते हैं और इस प्रकार हम यीशु के पूरे अधिकार और समर्पण को प्राप्त करने के लिये स्वयं को उपलब्ध कराते हैं। इब्रानियों 3ः1 में लेखक कहते हैं कि:

यीशु हमारे अंगीकार का महायाजक है।

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण कथन है। यदि आपके पास अंगीकार नहीं है तो आपके पास महायाजक भी नहीं है। जो कुछ हम अंगीकार करते हैं उसी के आधार पर वह हमारा महायाजक है। दूसरे शब्दों में, जब कभी हम अपने मुँह से उस बात को कहते हैं जो यीशु में विश्वासियों के रूप में बाइबल हमारे विषय में कहता है, तो हमारे लिये स्वर्ग में यीशु अपनी अधिकार और अपनी आशीषें देते हुए हमारे महायाजक के रूप में है। परन्तु यदि हम शान्त रहते हैं, एक निश्चित भाव में तो हम महायाजक के रूप में उसकी सेवा को रोक देते हैं। और यदि हम गलत अंगीकार करते हैं तो हम और भी बुरा करते हैं। एक निश्चित भाव में, हम नकारात्मक ताकतों को हमें घेरने और हम पर हावी होने देते हैं।

अब, अंगीकार ने घोषणा को, जैसा कि वह था आक्रामक बना दिया है। एक तरह से, घोषणा आत्मिक युद्ध का एक शब्द है। यह स्थिति में परमेश्वर के वचन के अधिकार को लेकर आता है: हमारे अपने जीवनों में, कलीसिया के जीवन में, राजनैतिक स्थिति में, या और भी कुछ। कई ऐसी असंख्य स्थितियाँ हैं जिसमें परमेश्वर की सामर्थ्य की प्रवाहित होने की आवश्यकता है। और एक स्थिति में चाहे वह आपका स्वयं का जीवन हो या आपके परिवार, कलीसिया, या देश का हो या और कुछ, घोषणा से बढ़कर परमेश्वर की सामर्थ्य को प्रवाहित करने का अधिक प्रभावशाली तरीका नहीं होता है। वास्तव में, घोषणा करना सन्देशवाहक का कार्य होता है। सन्देशवाहक एक ऐसा शब्द है जिसका हम आज अधिक प्रयोग नहीं करते हैं, परन्तु सन्देशवाहक किसी राजा या ड्यूक या किसी संभ्रान्त व्यक्ति की ओर से अधिकार सहित सन्देशवाहक होता था जो किसी संबन्धित क्षेत्र में जाता था और उस विशिष्ट स्थान के शासक के परमेश्वर के निर्णय और इच्छा की घोषणा किया करता था।

पुराने दिनों में - मुझे नहीं मालूम कि आपने यह सुना है कि नहीं - वे कहा करते थे, ‘‘ओए ओए’’ और तब वे घोषणा करते। जब वे ओए ओए कहते तो हर कोई सावधान हो जाते और जान जाते कि यह अधिकार की आवाज है जो हमसे बात कर रहा है।

और नया नियम में, यद्यपि यह अधिकांश अनुवादों में नहीं आता है। प्रचार करना के लिये सन्देशवाहक शब्द आया है। यह एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ है घोषणा करना। हमारे पसन्दीदा पदों में से एक मत्ती 24ः14 है:

‘‘और राज्य का यह सुसमाचार प्रचार किया जाएगा...।’’

परन्तु हम कहना चाहते हैं:

‘‘राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा कि सब जातियों पर गवाही हो तब अन्त आ जाएगा।’’

मैं लगभग 50 वर्षों तक एक बाइबल शिक्षक रहा हूँ और मैंने हमेशा महसूस किया है कि मेरा कार्य बाइबल को समझाने और उसकी व्याख्या करना और उसे समझने में लोगों की सहायता करना है। परन्तु लगभग 12 वर्षों पूर्व परमेश्वर ने मुझ पर घोषणा शब्द का प्रभाव डालना प्रारंभ किया। मैंने महसूस किया कि वह मुझे सिखाने से परे जाने और घोषणा करने की चुनौती दे रहा था। और इसका परिणाम मेरी रेडियो बाइबल शिक्षण की सेवा रही जिसका प्रारंभ 1979 में संयुक्त राज्य में आठ केन्द्रों पर हुआ और अब यह दस भाषाओं में होता है और संसार के अधिकांश हिस्से तक पहुँचता है। और यह सचमुच एक घोषणा की सेवा है। मुझे लगता है कि मूल वचन जिसने मुझे झकझोरा वह मत्ती 24ः14 था।

‘‘और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा।’’

मैंने यह देखा कि जब तक हम यीशु मसीह की कलीसिया अर्थात् पृथ्वी पर उसकी गवाह के रूप में अपना कार्य पूरा नहीं कर लेते हैं तब तक युग समाप्त नहीं होगा जो कि सारे राष्ट्रों में गवाह के रूप में सारे संसार में सुसमाचार की घोषणा करना है। और मैंने अनुभव से जाना है कि परमेश्वर के वचन की अद्भुत सामर्थ्य की घोषणा विश्वास के द्वारा की जाती है, यह अद्भुत काम करती है।

संयुक्त राज्य में एक स्त्री थी जिसमें वे सारी बातें थीं जो एक मसीही स्तर के अनुसार नहीं होना चाहिए। वह एक मार्क्सवादी थी। वह एक लेसबियन थी। वह एक स्त्रीवादी थी और वह इसे गंभीरतापूर्वक लेती थी। मेरा मतलब है वह पुरुषों को गोली मारने के लिये रिवाल्वर खरीदती थी। और किसी न किसी प्रकार उसने स्वयं को चीन के सागर में एक छोटे से जहाज में अपने कुछ साथियों के साथ पाया और वे कुछ बुरा करने के लिये कहीं जा रहे थे। और ऐसा प्रतीत हुआ कि एक तूफान उठ रहा है और इसलिये अन्य लोगों ने कहा, ‘‘नीचे जाओ और रेडियो चालू करो और देखो कि मौसम के विषय में क्या जानकारी मिल सकती है।’’ उसने रेडियो चालू किया और ऐसा हुआ कि उसे फिलीपींस स्थित मनीला से प्रसारित मेरे कार्यक्रम की बाइबल शिक्षा सुनाई दी और वह जहाज में ही बचाई गई! मेरा मतलब है इसमें 15 मिनट से अधिक समय नहीं लगा होगा क्योंकि यह कार्यक्रम 15 मिनट का ही था। अब वह पूर्ण रीति से उतनी ही भिन्न और कट्टर है जितनी वह बुरे मार्ग पर रहते हुए थी।

तो वह केवल एक मात्र उदाहरण है। वह शिक्षा नहीं थी। मैंने बहुत अधिक व्याख्या नहीं किया। जिस वचन की घोषणा हुई उसने काम किया।

मैं अब मूसा से एक उदाहरण लेना चाहता हूँ। जब परमेश्वर ने उसे वापस जाने और इस्राएलियों को मिस्र से वापस लाने के लिये बचानेवाला बनने के लिये बुलाया था। आपको स्मरण है जब परमेश्वर ने जलती हुई झाड़ी में उसे दर्शन दिया। निर्गमन 4 अध्याय में जब परमेश्वर ने उससे कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें इस्राएल को छुड़ाने के लिये वापस भेजता हूँ।’’ और मूसा ने अपने उस आत्म-विश्वास को खो दिया था जो चालीस वर्ष की उम्र में उसमें थी। 80 वर्ष की उम्र में उसमें स्वयं में आत्म-विश्वास नहीं रह गया था। उसने कहा, ‘‘हे प्रभु, मैं ही क्यों? मैं यह नहीं कर सकता। मुझमें कोई योग्यता नहीं। मैं इसके साथ क्या कर सकता हूँ?’’ और प्रभु ने उससे कहा, जैसा कि वह हमेशा बहुत व्यावहारिक होता है, ‘‘तुम्हारे हाथ में क्या है?’’ और मूसा ने देखा और कहा, ‘‘एक लाठी।’’ जैसे मध्यपूर्व में हर चरवाहे के हाथों में होती है। वह नहीं सोच सका कि इस छड़ी के विषय में कुछ महत्वपूर्ण बात है। परन्तु प्रभु ने कहा, ‘‘इसे भूमि पर डाल दो।’’ और जब उसने ऐसा किया तो वह एक साँप बन गया और मूसा अपनी लाठी के पास से भाग गया। दूसरे शब्दों में, जो छड़ी वह लिये फिरता था उसमें ऐसी सामर्थ्य थी जिसकी न तो उसने कभी आशा की थी और न ही कल्पना।

तब प्रभु ने कहा, ‘‘पूँछ को पकड़कर उसे उठा लो।’’ और साँपों के विषय में जानकारी रखनेवाले जानते हैं कि आप कभी साँप को पूँछ से पकड़कर नहीं उठाते हैं परन्तु मूसा ने किया। मैं सोचता हूँ यह करते हुए वह काँप रहा होगा और वह उसके हाथ में लाठी बन गया। और परमेश्वर ने उससे कहा, ‘‘अब अपनी लाठी लेकर जाओ, तुम्हें इसी की जरूरत होगी। तुम पूरा कार्य इस एक लाठी के साथ कर सकते हो।’’ और यदि आप निर्गमन के पुस्तक के उस भाग के शेष हिस्से का विश्लेषण करें तो मिस्र से इस्राएल का संपूर्ण छुटकारा उस लाठी के द्वारा संपन्न हुआ। प्रत्येक बार जब मूसा परमेश्वर का हस्तक्षेप चाहता तो वह इसी लाठी को बढ़ाता और परमेश्वर हस्तक्षेप करता था। और परिणाम यह हुआ कि एक प्रकार से, मूसा ने फिरौन के हाथ से मिस्र का शासन छीन लिया और उसे अपने हाथ में अपनी छड़ी में ले लिया।

और अन्तिम दृश्य लाल सागर पार करने का था। जब पानी को विभाजित करने की आवश्यकता पड़ती और मूसा अपनी छड़ी को बढ़ाता और पानी विभाजित हो जाता। और जब उनका पीछा करते हुए मिस्री जल में पहुँचे तो मूसा ने अपनी लाठी बढ़ाई; पानी वापस आ गया और मिस्रियों का नाश कर दिया। तो उस संपूर्ण कार्य को करने के लिये एक मात्र हथियार वह चरवाहे की लाठी थी जिसके लिये परमेश्वर ने उसे बुलाया था जिसे पहली बार हाथ में लेने पर उसने नहीं सोचा था कि वह कोई महत्वपूर्ण वस्तु है।

अब मैं आपको सलाह देता हूँ यदि आप एक बाइबल विश्वासी, समर्पित मसीही हैं तो आपके हाथ में एक लाठी है। क्या आप जानते हैं कि वह क्या है? यह आपकी बाइबल है। यदि यहाँ आपके पास बाइबल है तो मैं चाहता हूँ कि आप उसे ऊपर उठाएँ। और मैं चाहता हूँ कि आप कहें, ‘‘यह मेरी लाठी है।’’ क्या आप यह कहेंगे? ‘‘मेरी बाइबल मेरी लाठी है। इससे मैं हर वह कार्य कर सकता हूँ जो परमेश्वर मुझसे करने के लिये कहता है।’’ ठीक है, आप अपनी बाइबल नीचे कर सकते हैं।

अब पहली बात जो हमें धर्मशास्त्र से समझने की जरूरत है वह परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य है। हमें यह जानने की जरूरत है कि यह एक अलौकिक पुस्तक है। मूसा की लाठी के समान ही इसमें सामर्थ्य पाई जाती है जो कि तब नहीं दिखती है जब आप प्रथम बार इसे देखते हैं। लेकिन जब आप इसे समझना प्रारंभ करते हैं तो वास्तव में इसकी सामर्थ्य असीमित है। मैं आपको धर्मशास्त्र में से परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य को प्रगट करनेवाले कुछ संदर्भ बताऊँगा। भजनसंहिता 33 पद 6:

आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुँह ही के श्वास से बने।

परन्तु इब्रानी शब्द जिसका अनुवाद श्वास किया गया है वह आत्मा के लिये प्रयुक्त सामान्य शब्द ‘रूआह्’ है। तो सारी सृष्टि की उत्पत्ति दो कारकों से हुई: परमेश्वर का वचन और परमेश्वर की आत्मा। सब कुछ जिसका अस्तित्व है या कभी अस्तित्व रहा है या कभी अस्तित्व होगा उनकी उत्पत्ति दो बलों से हुई है: परमेश्वर का वचन और परमेश्वर की आत्मा के एक साथ कार्य करने के द्वारा।

आप देखें, वचन को अवश्य ही आत्मा के साथ मिलकर कार्य करना है। मुझे लगता है कि इसलिये भजनकार ने इसे श्वास कहा और आत्मा नहीं कहा। क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि क्या आपने कभी इसका अध्ययन किया है। किन्तु जब मैं अफ्रीकी छात्रों को द्वितीय भाषा के रूप में अंग्रेजी सिखा रहा था तो मुझे प्रारंभिक शब्दाबलियों को सीखना पड़ा था और मैंने शब्दों के विषय में कुछ रोचक बात पाया। यदि आप सोचते हैं कि शब्दों की कैसी जबरदस्त शक्ति है फिर भी वे कितने सरल हैं। आप कैसे बोलते हैं? आप अपने फेफड़ों से हवा बाहर निकालते हैं। यह आपके मुँह से होकर गुजरता है या आपकी नाक से, और बहुत सी बातें जो यह आपके मुँह और नाक के अधीन है वह उस शब्द को निर्धारित करता है जो बाहर आता है। परन्तु मूल सत्य यह है कि आप बिना साँस लिए बात नहीं कर सकते हैं। और यह परमेश्वर की तस्वीर है। प्रत्येक बार जब परमेश्वर बात करता है तो उसके शब्द के साथ उसकी साँस निकलती है। उसकी श्वास आत्मा है। तो वचन और परमेश्वर की आत्मा हमेशा साथ साथ चलती है। वचन और परमेश्वर की आत्मा ने जगत की उत्पत्ति की है और वे जगत को बनाए रखते हैं। 2 पतरस अध्याय 3 में एक बहुत ही शक्तिशाली पद है जो हमें तीन बातें बताती है: यह कि वचन सृष्टिकर्ता है, वचन संभालता है, वचन नाश करता है। 2 पतरस 3 अध्याय 5 पद से प्रारंभ करते हुए:

वे तो जान बूझकर यह भूल गए, कि परमेश्वर के वचन के द्वारा से आकाश प्राचीन काल से वर्तमान है और पृथ्वी भी जल में से बनी और जल में स्थिर है। इन्हीं के द्वारा उस युग का जगत जल में डूब कर नाश हो गया। पर वर्तमान काल के आकाश और पृथ्वी उसी वचन के द्वारा इसलिये रखे हैं, कि जलाए जाएँ; और वह भक्तिहीन मनुष्यों के न्याय और नाश होने के दिन तक ऐसे ही रखे रहेंगे।

तो परमेश्वर के वचन के द्वारा आकाश और पृथ्वी अस्तित्व में लाए गए। परमेश्वर के वचन के द्वारा वे संभाले जाते हैं और परमेश्वर के वचन के द्वारा, जब परमेश्वर का समय आता है तो वे नाश हो जाएँगे। तो परमेश्वर का वचन सृष्टिकर्ता है, संभालता है, नाश करता है।

मुझे लगता है, कि जब मैं उन गड़बड़ियों को देखता हूँ जो मनुष्य इस धरती पर कर रहा है तो मुझे आनन्द होता है कि एक दिन परमेश्वर का वचन उस गड़बड़ी को दूर कर सकता है। परमेश्वर के वचन ने इसे अस्तित्व में ले आया, परमेश्वर का वचन इसे संभालता है और परमेश्वर का वचन इसे नाश भी करेगा। परमेश्वर यह सब कुछ अपने वचन के द्वारा करता है।

अब एक पद जिसे रूत और मैंने प्रारंभ में बताया, हम इसे पुनः देखेंगे। यशायाह 55ः10-11 इस बात को बताता है जिसे मैंने अभी अभी समझाया है - कि अवश्य है कि वचन परमेश्वर के मुँह से निकले अन्यथा यह प्रभावी नहीं होगा। तो अब हमारी बारी है। हम कैसे प्रारंभ करते हैं?

जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहाँ यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिससे बोनेवाले को बीज और खानेवाले को रोटी मिलती है, उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैंने उसको भेजा है उसे वह सुफल करेगा।

अब ध्यान दें कि परमेश्वर कहता है, ‘‘मेरे मुँह से निकला मेरा वचन।’’ दूसरे शब्दों में, ‘‘जब कि वह मेरे श्वास के द्वारा कहा जाता है।’’ 2 कुरिन्थियों 3 अध्याय 6 पद में पौलुस कहता है:

‘‘शब्द मारता है।’’

दूसरे शब्दों में, बिना श्वास के केवल शब्द जीवन नहीं लाता है। वचन और आत्मा को एक साथ होना है। तो आप कुछ सूखे सन्देश सुनते हैं जिसमें वचन तो होता है परन्तु श्वास नहीं होता है और यह जीवन नहीं देता है, यह मृत्यु लाता है। देखा? दोनों को एक साथ होना है। शब्द और आत्मा।

अब मैं मूसा के अनुभव के समानान्तर आना चाहता हूँ कि किस प्रकार हम परमेश्वर के वचन को उसकी घोषणा करने के द्वारा प्रभावशाली बना सकते हैं। उसकी घोषणा करना किसी स्थिति में उसे लागू करना है। इसमें आत्म-विश्वास चाहिए, इसमें साहस चाहिए। यह डरपोक के लिये नहीं है। आपको अपना मन बनाना होगा, ‘‘मैं इस पर विश्वास करता हूँ, यह परमेश्वर का वचन है और जब मैं यह कहता हूँ, यदि मैं विश्वास करनेवाले हृदय और विश्वास करनेवाले होठों के साथ यह कहता हूँ, तो यह उतना ही प्रभावशाली होता है मानो परमेश्वर ने स्वयं इसे कहा है जबकि उसका आत्मा मेरे द्वारा यह कह रहा है।’’ क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं? क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं? इसमें आवश्यक नहीं कि परमेश्वर कह रहा है। यदि परमेश्वर का आत्मा आपके मुँह के द्वारा परमेश्वर के वचन को प्रेरित करता है, तो यह उतना ही प्रभावशाली होता है जितना परमेश्वर के द्वारा जगत की उत्पत्ति के समय कहते समय था।

अब पहली बात जो मूसा के साथ हुई यह था कि वह भयभीत हो गया। उसने अपनी लाठी नीचे भूमि पर फेंक दी और वह साँप बन गया और वह उससे दूर हट गया। और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि इससे पहले कि हम घोषणा करने में प्रभावशाली हों हमें परमेश्वर के वचन से भयभीत होना सीखना है। हमें परमेश्वर के वचन पर काँपना सीखना है। यशायाह यह कहता है या परमेश्वर यशायाह के द्वारा यह कहता है, यशायाह 66 अध्याय में, पुस्तक का अन्तिम अध्याय। यशायाह 66 के प्रथम दो पद:

यहोवा यों कहता है, आकाश मेरा सिंहासन और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है; तुम मेरे लिये कैसा भवन बनाओगे, और मेरे विश्राम का कौन सा स्थान होगा? यहोवा की यह वाणी है, ये सब वस्तुएँ मेरे ही हाथ की बनाई हुई हैं, सो ये सब मेरी ही हैं। परन्तु मैं उसी की ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो।

दूसरे शब्दों में, प्रभु कहता है ‘‘तू कोई ऐसा भवन या मन्दिर नहीं बना सकता है जो मुझे प्रभावित करता हो क्योंकि मैंने सारे संसार को बनाया।’’ परन्तु वह कहता है, ‘‘एक बात है जो मुझे आकर्षित करता है, केवल एक बात।’’ वह कहता है:

‘‘परन्तु मैं केवल इसे देखूँगा।’’

एक और अनुवाद कहता है, ‘‘क्या मैं आदर पाऊँगा।’’ परमेश्वर किसका आदर करेगा, किसे वह आदर के योग्य समझेगा?

‘‘वह जो दीन है और खेदित मन का है और जो मेरा वचन सुनकर थरथराता है।’’

आप देखें, मूसा के समान हमारी पहली प्रतिक्रिया परमेश्वर के वचन के प्रति भय और डर होना चाहिए। वर्तमान कलीसिया में परमेश्वर के वचन के प्रति बहुत कम भय पाया जाता है। हम इससे बहुत ही परिचित हैं। हम इस पर सविस्तार देखते हैं और हम इसका संदर्भ भी देते हैं परन्तु हम इसके लिये वास्तविक आदर नहीं दिखाते हैं और हमें यह मनोवृत्ति बदलनी होगी।

अब मुझे आपको यूहन्ना रचित सुसमाचार में पाये जानेवाले दो कारण बताने दीजिए कि हमें परमेश्वर के वचन के सामने क्यों काँपना चाहिए। यूहन्ना 12 अध्याय 47 से 48 पद में पहला कारण दिया गया है। यीशु कह रहा है, वह कहता है:

‘‘यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता, क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक हैः अर्थात् जो वचन मैंने कहा है, वह पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।’’

तब वह कहता है, ‘‘मैं तुम्हें नहीं जाँचनेवाला हूँ। तुम परमेश्वर के वचन के द्वारा जाँचे जानेवाले हो।’’ कल्पना कीजिए कि आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने अपने जीवन का हिसाब देने के लिये खड़े हैं जो कि मुझे लगता है कि हम सबको एक दिन करना पड़ेगा। आप काँपेंगे, आप बहुत चिन्तित होंगे। यीशु यह कहता है कि आपको परमेश्वर के वचन के प्रति यही मनोवृत्ति रखना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर का वचन ही है जो आपका न्यायी होगा। प्रत्येक बार जब आप इस वचन के पन्ने खोलते हैं और पढ़ते हैं तो यदि हम इसे समझ सकते हैं, हम उन बातों को देख रहे हैं जो एक दिन हमारा न्याय करेंगे। इसमें आश्चर्य नहीं कि हम इस पर काँपेंगे।

और तब यूहन्ना 14 अध्याय 23 पद में यीशु एक और अद्भुत कथन कहता है। वह कहता है:

यीशु ने उसको उत्तर दिया, यदि कोई मुझसे प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उससे प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएँगे, और उसके साथ वास करेंगे।

यह बाइबल में के कुछ एक भागों में से एक है जहाँ पर परमेश्वर के विषय में बहुवचन संज्ञा का उपयोग किया गया है। हम, पिता और पुत्र उसके पास आएँगे। हम कैसे आएँगे? किसके द्वारा? उसके वचन के द्वारा। दूसरे शब्दों में, जब हम परमेश्वर के वचन के प्रति खुलते हैं, यदि हम उस पर विश्वास कर सकते हैं तो स्वयं परमेश्वर, पिता और पुत्र हमारे साथ अपना घर बनाने की इच्छा से हमारे जीवनों में आते हैं। यदि कभी ऐसा हो, भले ही एक दर्शन में, आप देखेंगे कि प्रभु यीशु आपके घर में आ रहा है तो आप आनन्दित होंगे। आप आश्चर्य का अनुभव करेंगे। आप उसके कदमों पर गिरना चाहेंगे। यीशु कहता है, न केवल मैं आऊँगा बल्कि पिता भी आएगा, हम आएँगे। किसके द्वारा? किसके द्वारा? परमेश्वर के वचन के द्वारा। ठीक है?

मुझे कहना है कि समकालीन कलीसिया में आज हममें से अधिकांश लोगों को परमेश्वर के वचन के प्रति अपनी मनोवृत्ति बदलने की आवश्यकता है। हमें आदर, डर और भय दिखाने की जरूरत है। जब तक हम परमेश्वर के वचन का आदर करना नहीं सीखते हैं तब तक जिस प्रकार मैं बात कर रहा हूँ वह आपके जीवन में प्रभावशाली नहीं होगा।

अब यह परमेश्वर के वचन पर काँपना है। यह पहली बात है जो मूसा के साथ हुई। उसने तुरन्त ही उस सामर्थ्य को पहचान लिया जो उस छड़ी में थी और वह उससे भाग गया। वह बहुत अधिक डर गया था।

दूसरी बात जो उसने की वह छड़ी को उठाना था। विश्वास के द्वारा उसने उसे पकड़ा और वह उसके हाथ में पुनः छड़ी बन गई। तो जब हम काँपते हैं तब हमें परमेश्वर के वचन को थामने की आवश्यकता होती है। हमें दृढ़ता के साथ परमेश्वर के वचन को थामने की आवश्यकता है। और भजन की पुस्तक के अन्तिम भाग में एक पद है जो मेरे लिये बहुत ही प्रभावशाली है। भजन 149, अन्तिम कुछ पद। भजन 149 पाँचवें पद से प्रारंभ करते हुए।

भक्त लोग महिमा के कारण प्रफुल्लित हों; और अपने बिछौनों पर भी पड़े पड़े जयजयकार करें।

मैं मानता हूँ कि पवित्र लोग सच्चे समर्पित विश्वासी होते हैं। इब्रानी भाषा में आपमें से कितने लोगों ने कभी हसीदिक यहूदीवाद के विषय में सुना है जो कि बहुत ही कट्टर होते हैं। अर्थात् ऐसे लोग जो परमेश्वर के वचन पर काँपते हैं, जो पूरी तरह उसके प्रति समर्पित हैं।

भक्त लोग महिमा के कारण प्रफुल्लित हों; और अपने बिछौनों पर भी पड़े पड़े जयजयकार करें। उनके कण्ठ से ईश्वर की प्रशंसा हो, और उनके हाथों में दोधारी तलवारें रहें, कि वे अन्यजातियों से पलटा ले सकें; और राज्य राज्य के लोगों को ताड़ना दें, और उनके राजाओं को साँकलों से, और उनके प्रतिष्ठित पुरुषों को लोहे की बेड़ियों से जकड़ रखें, और उनको ठहराया हुआ दण्ड दें! उसके सब भक्तों की ऐसी ही प्रतिष्ठा होगी।

यदि आप स्वयं को सन्तों के साथ समझ सकते हैं तो यह कथनों की एक अद्भुत श्रृंखला है। वचन कहता है, कि हमारे पास, हमारे हाथों में दोधारी तलवार होना चाहिए जो कि परमेश्वर का वचन है, हमारे कण्ठ में परमेश्वर की प्रशंसा होनी चाहिए; और इसके द्वारा हम राष्ट्रों से बदला ले सकते हैं, लोगों पर दण्ड ला सकते हैं - क्या आप इस परिदृश्य में स्वयं को देख रहे हैं? क्या आप समझते हैं कि यह कुछ ऐसी बात है जो परमेश्वर ने आपके लिये रखा है? ‘‘राजाओं को साँकलों से और उनके प्रतिष्ठित पुरुषों को लोहे की बेड़ियों से जकड़ना।’’ मैं मानता हूँ कि इसका अर्थ है कि आंशिक रूप से शैतानी सिद्धान्त जो राष्ट्रों पर शासन करती हैं, परन्तु पूरी तरह से नहीं।

और तब वचन अन्तिम पद में कहता है कि लिखित न्याय देशों पर लागू किया जाएगा। और वचन कहता है, कि उसका आदर और उसका सौभाग्य सभी सन्तों को प्राप्त होगा। क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? परमेश्वर ने हमें राज्यों पर न्याय लागू करने का अवसर दिया है। आप देखें, यदि हम स्वयं को इस प्रकाश में देखना प्रारंभ करते हैं तो हममें से अधिकांश लोगों का प्रार्थना जीवन भिन्न होगा। अब वचन कहता है कि लिखित न्याय को लागू करो। न्याय कहाँ लिखा हुआ है, हम लिखित न्याय कहाँ पाते हैं? हाँ, यह सही है। इसे ऊपर उठाकर पकड़िए। हाँ, ठीक है, यह यहाँ है। न्याय करनेवाले हम नहीं हैं, परमेश्वर ने न्याय किया है। परन्तु राज्यों पर, उसके शासकों पर न्याय लागू करने का सौभाग्य हमारा है। दूसरे शब्दों में, हमें इतिहास में एक अनोखी और निर्णायक भूमिका अदा करना है। देखें कि यह कितना महत्वपूर्ण है। और मुझे कहना है कि बहुत से मसीही इस बात की समझ से कितने ही दूर हैं कि जो कुछ परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है वह हमारे लिये उपलब्ध कराया है।

परन्तु मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि हम न्याय नहीं करते हैं। परमेश्वर के लिखित वचन में हम न्याय पाते हैं परन्तु हम उन्हें लागू करते हैं। परमेश्वर के न्याय को हम कैसे लागू करते हैं? किस एक शब्द के द्वारा? घोषणा। हाँ, यह सही है। हम परमेश्वर के न्याय को लागू करते हैं जो कि पहले से ही धर्मशास्त्र में लिखा हुआ है। हम उनकी घोषणा करते हैं। हम अग्रदूत हैं। हम बाजार में खड़े हैं और हम कहते हैं ‘‘ओए, ओए।’’ और तब हम परमेश्वर के न्याय की घोषणा करते हैं।

अब मुझे लगता है कि मैं बहुत ही व्यावहारिक होने और नीचे उतरने का प्रयास करने जा रहा हूँ। हम उसके द्वारा छड़ी को पकड़ने के बाद के अगले चरण में आते हैं। मिस्र वापस जाने के बाद अगला कार्य उसने क्या किया? उसने लाठी को बढ़ाया। लाठी में जो अधिकार था उसका उसने अभ्यास किया। अब मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ कि हमें यही करने की आवश्यकता है। हमें परमेश्वर के लिखित वचन को लेने की जरूरत है और जहाँ कहीं परमेश्वर के अधिकार के आवश्यकता है उस स्थिति में इसे बढ़ाने की जरूरत है। और एक मार्ग - मैं नहीं कहता हूँ कि एक ही मार्ग है परन्तु मुझे लगता है कि बहुत से मार्गों में से एक स्थिति में परमेश्वर के अधिकार को लागू करने का सबसे प्रभावशाली मार्ग - पवित्र आत्मा के अभिषेक के अधीन होकर विश्वास में घोषणा करना है। क्योंकि याद रखें, अवश्य है कि श्वास के साथ शब्द भी जाए। परन्तु जब वे दोनों एक साथ जाते हैं, जब परमेश्वर का श्वास परमेश्वर की आत्मा हमारे मुँह से परमेश्वर के वचन की घोषणा करता है। तो हम उसे किसी स्थिति में लागू कर सकते हैं और उसके पास उस स्थिति में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का सारा अधिकार पाया जाता है।

देखिए, परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया कि वह सिंहासन से उतरा, मूसा के हाथ से उसकी लाठी लिया और कहा, ‘‘मूसा, मैं यह करूँगा।’’ मुझे लगता है कि हममें से अधिकांश लोग ऐसा ही होने की अपेक्षा करते हैं। परमेश्वर कहता है, ‘‘तुम्हारे पास छड़ी है, तुम उसे करो।’’ परन्तु निर्गमन की पुस्तक में यह परमेश्वर की लाठी कही गई है। यह परमेश्वर की लाठी थी, परन्तु मूसा ने उसे उठा लिया। मूसा ने उसे आगे की ओर बढ़ाया। मूसा और हारून एक साथ। इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह मूसा था या हारून, लाठी ने ही सारा कार्य किया।

अतः, अब मैं संभावित स्थितियों पर विचार करने जा रहा हूँ और वहाँ से शुरू करता हूँ जो शुद्ध रूप से व्यक्तिगत है और वहाँ तक जा रहा हूँ जो राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय हैं और मैं आपको उन विभिन्न मार्गों को दिखाने जा रहा हूँ जिसमें हम लाठी को बढ़ा सकते हैं। अब मैं रूत से कहने जा रहा हूँ कि यहाँ आए और मेरे पास खड़ी हो और सारी घोषणायें जो हम यहाँ करने जा रहे हैं, ऐसी हैं जिन्हें हम नियमित रूप से अपनी व्यक्तिगत मननों में करते हैं। मैं आपसे कहता हूँ, हमारे व्यक्तिगत मनन अक्सर शान्ति के समय नहीं होते हैं। कभी कभी हम चिल्लाते हैं, वैसे भी घोषणा करना चिल्लाना ही होता है। मैं नहीं कहता कि चिल्लाने में अधिक सामर्थ्य है, यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि पवित्र आत्मा कैसे आपको उभारता है। हम शायद, कहीं पर एक और दो सौ घोषणाओं के बीच में हैं जो हम नियमित रूप से करते हैं। और जब रूत अपने जीवन के लिये संघर्ष कर रही थी तो यह हमारा सबसे पहला हथियार था। उनमें से कुछ घोषणायें हमने हजारों बार की हैं।

आप देखें, यदि आपने अपने पिछले दिनों में काफी नकारात्मक विचार किए हैं और काफी नकारात्मक प्रभाव ग्रस्त रहे हैं, तो इसे एक बार कहने से बहुत अन्तर नहीं होता है। हो सकता है आपको इसे तब तक कहते रहना पड़ेगा जब तक आपके विचार में यह बैठ न जाए। जब तक कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं होती है, तब तक आपको इसी प्रकार प्रतिक्रिया देना है।

जैसा कि आपमें से अधिकांश लोग जानते हैं, मैं पृष्ठभूमि के हिसाब से ब्रिटिश हूँ और मैं अपने ब्रिटिश लोगों से कहता हूँ। अतः मैं अमेरिकियों से यह कहने में डरता नहीं हूँ। ब्रिटिश लोग बहुत अधिक नकारात्मक होने के आदी होते हैं। वे स्वभाव से निराशावादी होते हैं और मैं निराशावादियों का निराशावादी था। परमेश्वर मुझे क्रमशः परिवर्तित कर रहा था; इसमें उसे बहुत समय लगा। परन्तु मेरी एक अजीब सी मानसिक आदत, मुझे लगता है कि इसके लिये बचपन तक जाना पड़ेगा, जब मैं किसी ऐसी स्थिति में होता हूँ तो मैं स्वतः ही उन सारी कठिनाइयों के बारे में सोचने लगता हूँ जो हो सकती हैं, उन सारी समस्याओं के विषय में सोचने लगता हूँ जो आ सकती हैं। मैं कार में सवार होता और सोचने लगता कि अभी यदि दुर्घटना हो जाए। हो सकता है आपमें से कुछ लोगों को यह समस्या हो और मैं कई विभिन्न तरीकों से वचनरूपी हथियार का उपयोग करता रहा हूँ परन्तु एक पद है जिसका मैं सटीक संदर्भ नहीं दे सकता हूँ। वह यिर्मयाह 29 अध्याय में है।

‘‘जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन कुशल ही की हैं,...।’’

एक और अनुवाद कहता है कि समृद्धि की योजनायें और विपत्ति की नहीं।

‘‘.... और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा।’’

अतः, प्रत्येक बार जब मैं स्वयं को किसी विपत्ति के नकारात्मक चित्र पर विचार करते हुए पाता हूँ, तो मैं कहता हूँ, ‘‘प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं तेरी उन योजनाओं को जानता हूँ जो तूने मेरे लिये रखी हैं।’’ कुशल की योजनायें और हानि की नहीं, समृद्धि की योजनायें, विपत्ति की नहीं, मुझे एक भविष्य और एक आशा देने के लिये। और मुझे हो सकता है इसे कई बार कहना पड़े परन्तु उसके अन्त में नकारात्मकता दूर हो जाती थी। और मेरे पास एक दृढ़ आत्म-विश्वास से परिपूर्ण सकारात्मक मनोवृत्ति है। मुझे नहीं लगता कि रूत ने इस बात को सीखा है। क्या आपने सीखा है? नहीं। अतः, मैं यह कहूँगा। यह हमारे खजानों में से एक नहीं है, परन्तु यह शायद हो सकता है। परन्तु खैर, प्रभु कहता है:

‘‘क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा।’’

प्रत्येक बार जब आप अपनी कार में पैर रखते हैं, तो यह कहना शुरू करें, आप एक अच्छी यात्रा करने जा रहे हैं। आपको जो कार्य करने हैं, उसे आप पूरा करने जा रहे हैं। आपकी मनोवृत्ति बहुत मायने रखती है। जिस प्रकार लोग आपसे व्यवहार करते हैं वह मायने रखती है। आप एक दुकान पर जाते हैं और आप उस सकारात्मक मनोवृत्ति के साथ भीतर प्रवेश करते हैं और वे आपके लिये कुछ करेंगे। यदि आप कुछ कठिनाई या खराब व्यवहार की उम्मीद करते हुए भीतर जाते हैं तो संभवतः आप वही पाएँगे।

ठीक है। यह ऐसा ही है परन्तु मैं लोगों से कहता हूँ कि इसके लिये कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं है।

अब हम घोषणाओं के कुछ स्वरूप को देखने जा रहे हैं। सबसे पहले याद रखिए कि यह अवश्य ही वचन के साथ श्वास होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उसमें पवित्र आत्मा होना चाहिए। और दूसरा, हम क्या करते हैं - और मुझे लगता है कि करने के लिये यह बहुत अच्छा कार्य है - इसे व्यक्तिगत बनाते हैं। तो जहाँ बाइबल तुम कहती है हम हम कहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम कहना अभी और यहाँ हम पर लागू होता है। अब, हम आत्म-रक्षा के साथ प्रारंभ करने जा रहे हैं। क्या होता है जब हम पर आक्रमण किया जाता है? और शेष पूरे समय तक मैं इस पर बना रह सकता हूँ परन्तु आवश्यकताओं के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए मैं थक गया हूँ। बहुत से मसीही कभी भी अपनी स्वयं की आवश्यकता से परे नहीं जा पाते हैं तो मैं इस क्षेत्र के द्वारा संक्षिप्त रूप से आगे जाने जा रहा हूँ। और उस क्षेत्र की ओर जा रहा हूँ जिसे मैं आक्रमण का क्षेत्र कहता हूँ। जहाँ आप बचाव नहीं कर रहे हैं परन्तु आप आक्रमण कर रहे हैं।

तो मान लीजिए कि आपमें कई सारे नकारात्मक पूर्वाभास है और आप लगातार यह सोच रहे हैं कि यदि आप मरेंगे तो क्या होगा। मेरा मतलब है, इस विचार के साथ बहुत सारे लोग पाये जाते हैं; उनमें से कुछ लोग आज रात यहाँ पर हैं। और आपसे चिकित्सक के द्वारा कहा गया है जैसा कि रूत थी, ‘‘खैर, हम इस बात की ग्यारन्टी नहीं दे सकते हैं कि आप इसमें से गुजरेंगे। हम अपना श्रेष्ठ कार्य करेंगे।’’ यहाँ एक पद है जिसे हमने अवश्य ही हजारों बार उपयोग किया है। मेरा मतलब है, कभी कभी रूत बिस्तर पर लेटे-लेटे इसे कहती है। यह भजन 118ः17 है:

मैं न मरूँगा वरन जीवित रहूँगा, और परमेश्वर के कामों का वर्णन करता रहूँगा।

क्या आप इसे कहना चाहेंगे? इसमें बहुत याद करने की जरूरत नहीं है। ठीक है? ‘‘मैं न मरूँगा वरन जीवित रहूँगा, और परमेश्वर के कामों का वर्णन करता रहूँगा।’’ पुनः कहें। ‘‘मैं न मरूँगा वरन जीवित रहूँगा, और परमेश्वर के कामों का वर्णन करता रहूँगा।’’

अब, इस बात का निश्चय पाने के लिये आप सच में साहसी हैं, एक काम जो आप कर सकते हैं, वह है मुड़ें और किसी के सामने खड़े हों, ठीक उनके चेहरे की ओर देखें और उनसे कहें, ‘‘मैं न मरूँगा, परन्तु जीवित रहूँगा।’’ अभी आपको अच्छा लग रहा है, है न?

अब, मान लीजिए, जैसा कि होता है वह आपके साथ होना चाहिए, मेरा मतलब है, विशेष रूप से प्रचारक लोग इसके निशाने पर रहते हैं। बहुत सारे लोग आपकी आलोचना कर रहे हैं, आपके विरुद्ध बात कर रहे हैं और कुछ लोग आपके विरुद्ध प्रार्थना कर रहे हैं। तो आप क्या करते हैं? हमारा इलाज यशायाह 54ः17 है। यदि आप अपने बाइबल में इसे पाना चाहते हैं, हम इसे कहेंगे। अब हम अपनी खास रीति से इसे कहते हैं। परन्तु यह इस बात पर निर्भर है।

जितने हथियार तेरी हानि के लिये बनाए जाएँ, उन में से कोई सफल न होगा, और, जितने लोग मुद्दई होकर तुझ पर नालिश करें उन सभों से तू जीत जाएगा। यहोवा के दासों का यही भाग होगा, और वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे, यहोवा की यही वाणी है।

क्या आपको यह पद मिल गया है? आप देखते हैं कि हम किस प्रकार इसे व्यक्तिगत बनाते हैं। हम इसे एक बार और करेंगे। मेरा मतलब है, मैं आपको एक भेद बताऊँगा जो अब भेद नहीं रहा है - संसार में हर कोई जल्द या देर से इसे जानने जा रहा है - प्रत्येक रात सोने जाने से पहले हम इसे कहते हैं। ठीक है।

जितने हथियार तेरी हानि के लिये बनाए जाएँ, उन में से कोई सफल न होगा, और, जितने लोग मुद्दई होकर तुझ पर नालिश करें उन सभों से तू जीत जाएगा। यहोवा के दासों का यही भाग होगा, और वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे, यहोवा की यही वाणी है।

इसलिये हम उन जीभों की निन्दा कर सकते हैं जो हम पर आरोप लगाते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता पर आरोप लगा रहे हैं। देखा? और यह हमेशा पराजय होता है।

मैं केवल विवरण को स्पष्ट करने के लिये कहना चाहता हूँ, उसके पश्चात् हम कहते हैं, यदि ऐसे लोग हैं जो हमारे विरुद्ध प्रार्थना करते रहे हैं या हमारी हानि चाहते रहे हैं, हम उन्हें क्षमा करते हैं और उन्हें क्षमा करके प्रभु के नाम से हम उन्हें आशीष देते हैं। अब देखें, हम नकारात्मक को सकारात्मक से बदल देते हैं क्योंकि बाइबल कहती है, ‘‘यदि लोग तुम्हें श्राप देते हैं, तो उन्हें श्राप मत दो, उन्हें आशीष दो।’’ पौलुस ने कहा, ‘‘बुराई से न हारो; पर भलाई से बुराई को जीत लो।’’ बुराई पर विजय पाने के लिये एकमात्र सक्षम सामर्थ्य भलाई ही है। अतः आपको नकारात्मक का सामना करना और सकारात्मक के द्वारा उस पर विजय पाना सीखना होगा। परन्तु यह वचन पर आधारित होना चाहिए।

ठीक है। अब मान लीजिए, आइए कहें, हमारी सेवा की सराहना होती है। या यह हमारा घर या हमारा परिवार हो सकता है। हमारे पास एक बात है जिसके लिये हम व्यवस्थाविवरण 33ः25-27 में बहुत प्रसिद्ध हैं। हम एन्आईवी अनुवाद में इसे पढ़ते हैं जो कि इसे बहुत ही सामर्थी बनाता है। व्यवस्थाविवरण 33ः25-27ः

तेरे जूते लोहे और पीतल के होंगे, और जैसे तेरे दिन वैसी ही तेरी शक्ति हो। हे यशूरून, ईश्वर के तुल्य और कोई नहीं है, वह तेरी सहायता करने को आकाश पर, और अपना प्रताप दिखाता हुआ आकाशमण्डल पर सवार होकर चलता है। अनादि परमेश्वर तेरा गृहधाम है, और नीचे सनातन भुजाएँ हैं। वह शत्रुओं को तेरे साम्हने से निकाल देता, और कहता है, उनको सत्यानाश कर दे।

आमीन! यह सचमुच शैतान को डराता है, मैं आपको यह बताऊँगा। हमने सीखा कि आपको उसका विनाश करना है। परमेश्वर उसका निकालेगा। आपको उसे नाश करना है। आपको अपने पाँव शत्रु की गर्दन पर रखना है। मैं इसमें विस्तारपूर्वक नहीं जाऊँगा, वे बहुत ही खून के प्यासे हैं।

आइए, देखें कि हम मनुष्यों के बारे में बात नहीं कर रहे हैं; जब हम अपने शत्रुओं के बारे में बात कर रहे हैं, तब हम आकाश में आत्मिक बलों के बारे में बात कर रहे हैं। हमारे शत्रु मांस और लहू नहीं हैं। आपका पास्टर आपका शत्रु नहीं है; आपका पति आपका शत्रु नहीं है। कभी कभी आप ऐसा सोच सकते हैं परन्तु यह ऐसा नहीं है! आपको सीखना है कि हम लड़नेवाले मनुष्य नहीं हैं। यह हथियार बहुत ही ताकतवर हैं परन्तु इनका उपयोग सही संदर्भ में किया जाना है।

ठीक है? अब मान लीजिए आपकी किसी प्रकार की जरूरत है। मुझे निश्चय है, कि आपमें से कोई नहीं करता है परन्तु मान लीजिए ऐसा होता है, आर्थिक, शारीरिक या चंगाई। प्रत्येक के लिये हमारे पास एक घोषणा है। सबसे पहले आर्थिक (2 कुरिन्थियों 9ः8) - और हम शब्दों को थोड़ा सा बदल देते हैं, परन्तु वे मूल रूप से किंग जेम्स अनुवाद है।

और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिससे हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

देखिए, यह तीन सामान्य शब्दों से प्रारंभ होता है। परमेश्वर सामर्थी है। क्या आप विश्वास करते हैं कि वह सामर्थी है? यह महत्वपूर्ण है। तब वचन कहता है कि वह क्या करने के लिये सामर्थी है? और यह एक अति बृहद वचन है। सब शब्द पाँच बार आता है और बहुतायत शब्द दो बार आता है। इस एक पद में पौलुस जितनी बहुतायत की बात कहता है उससे अधिक करना संभव नहीं है और यह अनुग्रह है। ध्यान दें, कि कैसे अनुग्रह प्राप्त किया जाता है, किस तरह? विश्वास के द्वारा। विश्वास के द्वारा अनुग्रह से आप बचाए जाते हैं। ठीक? यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे हम कमाते हैं; यह हमारी सेलेरी पर निर्भर नहीं है। यद्यपि यह संबंधित हो सकता है। परन्तु हम इसे परमेश्वर के अनुग्रह में विश्वास के द्वारा प्राप्त करते हैं। हम एक बार और यह करेंगे। इसे मैं अपनी सेवकाई का आर्थिक आधार कहता हूँ। जब कभी हम आर्थिक बातों के लिये प्रार्थना करते हैं हम इस आधार पर शुरु करते हैं। देखें, तब हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक होती है। तो हम इसे पुनः करेंगे।

और परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिससे हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।

और तब मान लीजिए, कि आपको किसी ऐसी बात से चुनौती मिली है जिसे आप नहीं कर सकते हैं। यह बहुत अधिक है। आप इसमें सक्षम नहीं हैं, आपकी शैक्षणिक योग्यता नहीं है, आपमें शारीरिक बल नहीं है; यह इस बात पर निर्भर है कि वह क्या है। और फिर भी परमेश्वर ने इससे आपको चुनौती दी है। खैर, हम फिलिप्पियों 4ः13 का सहारा लेते हैं। लेकिन यह प्रिन्स अनुवाद है। मुझे यूनानी मालूम है और मुझे लगता है कि प्रभु ने मुझे यूनानी भाषा का अच्छा ज्ञान दिया जिससे उन सभी अनुवादों की तुलना में अच्छा अर्थ निकाल सकता हूँ जो मैंने अब तक सुना है। परन्तु मुझे बताने दें कि यह छपा हुआ नहीं है। मेरे पास ऐसे लोग आते हैं और कहते हैं, ‘‘हम इसे कहाँ से खरीद सकते हैं?’’ ‘‘आप इसे नहीं खरीद सकते हैं।’’

जो मुझमें सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

मैं इसे पुनः कहूँगा।

जो मुझमें सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

मैं सामर्थ्य देना शब्द का उपयोग करता हूँ क्योंकि यूनानी शब्द डुनामिस शब्द से आया है जिसका अनुवाद सामान्य रूप से सामर्थ्य किया जाता है। तो आप में भीतर ही एक सामर्थ्य का स्रोत है जो आपकी घोषणा के द्वारा बाहर आता है। ‘‘जो मुझमें सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।’’ मेरे पास शिक्षा नहीं है, मेरे पास सामर्थ्य नहीं है; लेकिन जब परमेश्वर की इच्छा की बात है, जब यह परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया कार्य है, तो मुझमें एक है जो मुझे भीतर से सामर्थ्य देता है।

और तब मान लीजिए कि समस्या बीमारी है। हमारे पसन्दीदा पदों में से एक 1 पतरस 2ः24 है:

वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया जिससे हम पापों के लिये मर करके धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँः उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए।

देखें, यह भूतकाल में कहा गया है। यदि आप ध्यान दें, जब यह प्रायश्चित में चंगाई के बारे में बात करता है तो यह कभी भी भविष्यकाल का उपयोग नहीं करता है। यीशु के आने से 700 वर्ष पूर्व यशायाह ने कहा, ‘‘उसके कोड़े खाने से हम चंगे हुए।’’ प्रायश्चित के पश्चात् पीछे मुड़ते हुए पतरस ने कहा, ‘‘तुम किसके घाव से चंगे हुए?’’ यह आपको पूरी तरह नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि आप स्वतः ही बीमार होना बन्द हो जाते हैं। परन्तु यह आपको एक भिन्न आधार प्रदान करता है जिस पर आप बीमारी का सामना कर सकते हैं और उसे चुनौती दे सकते हैं और कई बार आपको यह लम्बे समय तक कहना पड़ सकता है। आपको बस यह निर्णय लेना है कि कौन सी बात अधिक भरोसेमन्द है, परमेश्वर का वचन या आपके लक्षण।

अब हम अधिक आक्रामक क्षेत्र में आते हैं। हम राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के हस्तक्षेप पर बात करने जा रहे हैं। मैं और रूत काफी सारा समय हमारी व्यक्तिगत आवश्यकताओं से बाहर की बातों के लिये प्रार्थना करते हुए गुजारते हैं, बहुत सी परिस्थितियों के लिये प्रार्थना करते हुए, राष्ट्रों की नियति के बारे में। यहाँ कुछ पद हैं जो आपको प्रोत्साहित करेंगे और आपकी सहायता करेंगे। हमारा एक पसन्दीदा पद जिस पर हम हमेशा समाप्त करते हैं वह दानिय्येल 2 अध्याय 20 से 22 पद और 4 अध्याय 34 से 35 पद है। पहले शब्द दानिय्येल के द्वारा कहे गये थे, दूसरे शब्द नबूकदनेस्सर के द्वारा परन्तु सन्देश एक समान है। मैं पुनः संदर्भ बताऊँगा। दानिय्येल 2ः20-22 और दानिय्येल 4ः34-35:

परमेश्वर का नाम युगानुयुग धन्य है; क्योंकि बुद्धि और पराक्रम उसी के हैं। समयों और ऋतुओं को वही पलटता है; राजाओं का अस्त और उदय भी वही करता है; बुद्धिमानों को बुद्धि और समझवालों को समझ भी वही देता है; वही गूढ़ और गुप्त बातों को प्रगट करता है; वह जानता है कि अन्धियारे में क्या है, और उसके संग सदा प्रकाश बना रहता है। उन दिनों के बीतने पर, मुझ नबूकदनेस्सर ने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; तब मैंने परमप्रधान को धन्य कहा, और जो सदा जीवित है उसकी स्तुति और महिमा यह कहकर करने लगाः उसकी प्रभुता सदा की है और उसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहनेवाला है। पृथ्वी के सब रहनेवाले उसके साम्हने तुच्छ गिने जाते हैं, और वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहनेवालों के बीच अपनी इच्छा के अनुसार काम करता है; और कोई उसको रोककर उस से नहीं कह सकता है, तूने यह क्या किया है?

इस बात पर विचार करें कि ये शब्द एक अविश्वासी शासक नबूकदनेस्सर की ओर से आए। मैं सोचता हूँ कि उस समय तक वह विश्वासी बन चुका था। परन्तु नबूकदनेस्सर के जीवन में परमेश्वर के अति वृहद कार्य के विषय में सोचिए। यह बात हमें प्रोत्साहित करना चाहिए कि यदि हम सीख जाते हैं कि किस प्रकार प्रार्थना करनी है तो परमेश्वर अभक्त और दुष्ट शासक को बदल सकता है।

और तब 2 इतिहास में से दो परिच्छेद हैं दोनों में एक एक पद हैं। हम एन्आईवी अनुवाद में से इसे पढ़ेंगे और वे दोनों प्रार्थनायें हैं। अतः यदि हम प्रार्थना करने जा रहे हैं तो कहें मध्यपूर्व में स्थित या अमूक जगह पर स्थिति, उस खास विषय के लिये प्रार्थना करने से पूर्व हमें इन प्रार्थनाओं को करना चाहिए क्योंकि यह हमें आगे बढ़ाती रहती है। ठीक है? हम कहाँ पर हैं? 2 इतिहास 14ः11:

तब आसा ने अपने परमेश्वर यहोवा की यों दोहाई दी, कि हे यहोवा ! जैसे तू सामर्थी की सहायता कर सकता है, वैसे ही शक्तिहीन की भी; हे हमारे परमेश्वर यहोवा ! हमारी सहायता कर, क्योंकि हमारा भरोसा तुझी पर है और तेरे नाम का भरोसा करके हम इस भीड़ के विरुद्ध आए हैं। हे यहोवा, तू हमारा परमेश्वर है...।

ठीक है। अब हमने इसे कर लिया है। अब यह समय है.... ओह, हमने यह नहीं किया - यह मेरी गलती है। मैंने अन्तिम भाग नहीं बोला। आइए, इसे फिर से कहें:

तब आसा ने अपने परमेश्वर यहोवा की यों दोहाई दी, कि हे यहोवा ! जैसे तू सामर्थी की सहायता कर सकता है, वैसे ही शक्तिहीन की भी; हे हमारे परमेश्वर यहोवा ! हमारी सहायता कर, क्योंकि हमारा भरोसा तुझी पर है और तेरे नाम का भरोसा करके हम इस भीड़ के विरुद्ध आए हैं। हे यहोवा, तू हमारा परमेश्वर है; मनुष्य तुझ पर प्रबल न होने पाएगा।

और तब 2 इतिहास 20ः6:

यह कहने लगा, कि हे हमारे पितरों के परमेश्वर यहोवा ! क्या तू स्वर्ग में परमेश्वर नहीं है? और क्या तू जाति जाति के सब राज्यों के ऊपर प्रभुता नहीं करता? और क्या तेरे हाथ में ऐसा बल और पराक्रम नहीं है कि तेरा साम्हना कोई नहीं कर सकता। (रूत कहती है, ‘‘प्रतिरोध नहीं कर सकता’’)।

आमीन। रूत सही है और मैं गलत परन्तु खैर, मैं प्रिन्स अनुवाद बता रहा हूँ। अब हम भजन 33 पद 8-12 निकालेंगे। अब हमें थोड़ा जल्दी जाना होगा। यह बहुत ही सामर्थी कथन है जब कि आप संसार की स्थितियों पर व्यवहार कर रहे हैं।

सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें! क्योंकि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया। यहोवा अन्यजातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है; वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है। यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी। क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है, और वह समाज जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिये चुन लिया हो!

दूसरे शब्दों में हम इन सब में से एक विजयी के रूप में निकलनेवाले हैं। वह देश जिसका परमेश्वर प्रभु है। यदि सभी राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र और सरकारों की योजनायें परमेश्वर की योजना के विरुद्ध हैं। तो यह बिल्कुल ही मूर्खता है।

ठीक है। अब हम समाप्ति पर कुछ ऐसी बातों को देखने जा रहे हैं जो मध्यपूर्व से संबन्धित है, जो ऐसे क्षेत्रों में से एक जिसके विषय में हम सबसे अधिक प्रार्थना करते हैं या हो सकता है आपको ठीक यही बोझ न हो परन्तु आप इन सिद्धान्तों को ले सकते हैं और अपनी स्थिति में उन्हें लागू कर सकते हैं। सबसे पहले मैं यह बताना चाहता हूँ कि सुसमाचार ग्रहण करने की दृष्टि से निःसन्देह मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका पृथ्वी पर के एक मात्र कठिनतम स्थान हैं। और एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारण हैं और यह ऐसा कारण हैं जो घोषणा की सामर्थ्य ले आती हैं। शायद, आप जानते हैं कि प्रत्येक मुस्लिम मस्जिद से हर 24 घण्टे में पाँच बार यह घोषणा की जाती है, ‘‘अल्लाह को छोड़कर और कोई ईश्वर नहीं, और मोहम्मद उसका नबी है। और निश्चय ही अल्लाह बाइबल का परमेश्वर नहीं है।’’

अब, मुस्लिम कैलेण्डर का प्रारंभ सन् 627 में हुआ तो यह 1300 से अधिक पुराना है। और 1300 से अधिक वर्षों से प्रत्येक मस्जिद में दिन में पाँच बार यह घोषणा की गई है। मुझे आपको एक छोटा सा गणित बताने दीजिए। यदि 1300 या उससे अधिक वर्षों से प्रतिदिन यह किया जा रहा है तो यह 474,500 दिन होते हैं। इसे मोटे हिसाब में आधा मिलियन दिन कह सकते हैं और यह दिन में पाँच बार किया जाता है। तो प्रत्येक मस्जिद से 2.5 मिलियन बार यह घोषणा की गई है। और यदि आप मस्जिदों की गणना करें तो मुझे लगता है कि उत्तरी अफ्रीका में और मध्यपूर्व में कम से कम आधा मिलियन मस्जिद हैं। आपको कई बिलियन बार का हिसाब मिलता है। उस क्षेत्र में पृथ्वी पर के और किसी क्षेत्र से बढ़कर ऐसा भयानक, सामर्थी मसीही विरोधी शक्ति क्यों है? इसका कारण क्या है? यह इसी घोषणा के कारण है। आप देखें। घोषणा की सामर्थ्य - नकारात्मक या सकारात्मक। हम उन नकारात्मक घोषणाओं पर विजय कैसे पा सकते हैं? हमें क्या करना है? सकारात्मक घोषणा करें।

तो हम आपको एक उदाहरण देने जा रहे हैं और याद रखें यदि आप कहें ‘‘यह एक बेकार का कार्य है’’, जब मूसा का सामना मिस्री जादूगरों से हुआ और उन सभों ने भूमि पर अपनी लाठी फेंक दी तो वे साँप बन गए, आप जानते हैं क्या हुआ? मूसा के साँप ने मिस्रियों के साँपों को खा लिया। अतः दूसरे शब्दों में, हमारी घोषणा सभी नकारात्मक घोषणाओं पर विजय पाती है, बशर्ते कि हम जानें कि इसे कैसे करना है। अतः हम इस्राएल और उनकी भूमि के संबन्ध में दो विशिष्ट बातें करने जा रहे हैं जो कि बाइबल सम्मत हैं। पहला, भजन 25ः3 से है, एन्आईवी अनुवाद से।

धर्मी के लिये ठहराई गई भूमि पर दुष्टों का शासन बना नहीं रहेगा।

ठीक है। इस संदर्भ में दुष्ट का सोंटा क्या है? इस्लाम। धर्मी के लिये ठहराई गई भूमि क्या है? परमेश्वर के लोगों के लिये ठहराई गई भूमि। बाइबल कहती है, राजनैतिक लोग चाहे कुछ भी कहें, वे चाहे कुछ भी करें, दुष्टों का सोंटा धर्मी के लिये बनाई गई भूमि पर बना नहीं रहेगा।

अब आपको विश्वास में यह कहना है। जब सब कुछ ठीक विपरीत दिखाई देता है, तो यही यह कहने का समय है। आप उस दण्ड को आगे बढ़ा रहे हैं और आपका साँप जादूगरों के साँपों को खा जानेवाले हैं।

और तब भजन 129 पद 5-6:

जितने सिय्योन से बैर रखते हैं, उन सभों की आशा टूटे, और उनको पीछे हटना पड़े! वे छत पर की घास के समान हों, जो बढ़ने से पहिले सूख जाती है;

और मैं उन सभों को चेतावनी देता हूँ जो सिय्योन से घृणा करते हैं, वे कभी परिपक्व नहीं होंगे। वे कभी परिपूर्णता तक नहीं बढ़ेंगे; पूर्ण परिपक्वता तक पहुँचने से पहले ही वे मुरझा जाएँगे। यह परमेश्वर का वचन है और यह पूर्ण होने जा रहा है।

और अन्त में मुझे आपको यिर्मयाह 31 अध्याय में से इस्राएल की पुनःस्थापना के विषय में एक और संदर्भ बताने दीजिए। यदि हमारे पास समय है तो हम इस पर अभिनय करने जा रहे हैं; हम इसे पढ़ने जा रहे हैं। हम कम से कम अपना श्रेष्ठतम करेंगे। यिर्मयाह 31 पद 7 में वचन कहता है:

क्योंकि यहोवा यों कहता है, याकूब के कारण आनन्द से जयजयकार करो जातियों में जो श्रेष्ठ है उसके लिये ऊँचे शब्द से स्तुति करो, और कहो, हे यहोवा, अपनी प्रजा इस्राएल के बचे हुए लोगों का भी उद्धार कर।

यदि आप उन शब्दों पर ध्यान दें तो यह कहता है, ‘‘गाओ, जयजयकार करो, घोषणा करो, स्तुति और प्रार्थना करो।’’ ये पाँच बातें हैं। गाओ, जयजयकार करो, घोषणा करो, स्तुति और प्रार्थना करो। घोषणा करना उनमें से एक है। और तब 10 पद कहता है:

और खोजों के प्रधान ने दानिय्येल से कहा, मैं अपने स्वामी राजा से डरता हूँ, क्योंकि तुम्हारा खाना-पीना उसी ने ठहराया है, कहीं ऐसा न हो कि वह तेरा मुँह तेरे संगी के जवानों से उतरा हुआ और उदास देखे और तुम मेरा सिर राजा के साम्हने जोखिम में डालो।

इस वर्तमान स्थिति में हम मध्य पूर्व में यह कहते हैं। वही परमेश्वर जिसने इस्राएल को छितरा दिया वही उसे बटोर रहा है और उसे उस प्रकार रखेगा जैसे चरवाहा अपने भेड़ों को रखता है। आइए, इसे कहें। ठीक है?

जिसने इस्राएल को बिखरा दिया वही उसे इकट्ठा कर रहा है और उसे उस प्रकार रखेगा जैसे चरवाहा अपनी भेड़ों को रखता है।

अब हम वैसा क्यों नहीं करते हैं जैसा बाइबल कहता है। हम सन्देश के अन्त पर पहुँच गए हैं। हम खड़े क्यों नहीं होते हैं, घोषणा क्यों नहीं करते हैं, स्तुति क्यों नहीं करते, जयजयकार क्यों नहीं करते और स्वयं को आनन्दित क्यों नहीं दिखाते। कार्ल, यहाँ आओ और कुछ स्तुति करने में कुछ घोषणा और कुछ जयजयकार करने में हमारी सहायता करो।

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