"क्योंकि परमेश्वर की वह अनुग्रह जो उद्धार लाती है, सब मनुष्यों पर प्रकट हुई है, और हमें यह सिखाती है कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं का इनकार करके इस वर्तमान युग में संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीवन बिताएं, उस धन्य आशा और हमारे महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता, यीशु मसीह की महिमामय प्रकटता की प्रतीक्षा करते हुए, जिसने हमारे लिए अपने आप को दे दिया कि वह हमें हर अधर्म के कार्य से छुड़ाए और अपने लिए एक विशेष लोग शुद्ध करे, जो अच्छे कार्यों के लिए उत्सुक हों।"

और यदि आप आश्चर्य करेंगे कि परमेश्वर को इतिहास से क्या मिलने वाला है, क्यों वह दुष्टता, और अन्याय और पीड़ाओं को इतना अधिक होने देता है, तो उत्तर यह है कि परमेश्वर को अपने लिये लोग मिलने वाले हैं। वर्तमान युग में यह परमेश्वर का अंतिम लक्ष्य है।

अब हम नींव डालने के तीसरे भाग पर जा रहे हैं और इस संदेश का शीर्षक "पश्चाताप से विश्वास तक" है। प्रारंभ में ही मैं कहना चाहता हूं कि पश्चाताप के अलावा विश्वास तक पहुंचने का और कोई मार्ग नहीं है। वहां तक पहुंचने के किसी और मार्ग का दावा एक धोखा है। बिना पश्चाताप के सच्चा विश्वास असंभव है।

अब मुझे वापस जाने दीजिये और आपको संक्षिप्त रूप से याद दिलाने दीजिये कि हम साथ साथ क्या अध्ययन कर रहे थे। पहली बात है कि मसीही विश्वास, व्यक्तिगत विश्वास का आधार यीशु मसीह है। और प्रत्येक जिसे एक सच्चा मसीही होना है उसे इस नींव पर अपना जीवन निर्माण करना है। मैंने आपको बताया कि यीशु और पतरस के मध्य जो सामना हुआ, जबकि पतरस ने घोषणा की कि "तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है" यह घोषणा एक नमूना है जो हम में से प्रत्येक के जीवन में विशिष्ट रीति से घटने की आवश्यकता है। मैंने कहा कि उस सामने में चार तत्व थे।

प्रथम, यीशु और पतरस आमने सामने खड़े हुए, उनके बीच कोई मध्यस्थ, कोई याजक, कोई तीसरा व्यक्ति नहीं था।

दूसरा, परमेश्वर की आत्मा द्वारा यीशु की अनंत पहचान के बारे में दिया गया एक प्रकाशन था - कि यीशु बढ़ई के बेटे नहीं लेकिन परमेश्वर के पुत्र हैं।

तीसरा, पतरस ने उस प्रकाशन को स्वीकार किया। उसने इसे नकारा नहीं परन्तु इसे गले लगा लिया।

और चौथा, उसने अपने विश्वास की सार्वजनिक घोषणा की।

और मैं विश्वास करता हूं कि हर सचमुच सफल मसीही जीवन इसी आधार पर होना चाहिए। आमना सामना, प्रकाशन, मानना और अंगीकार।

और फिर हमने बहुत ही महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रश्न को देखा कि एक बार जब आपने इसकी नींव रखी है, तो आप कैसे उस पर निर्माण करते हैं? और बुद्धिमान और मूर्ख आदमी के दृष्टान्त से, जो कि यीशु ने कहा, हमने देखा कि इस नींव पर मकान बनाना तो सबसे पहले बाइबल को परमेश्वर के लिखित वचन के रूप में और यीशु को जीवित वचन के रूप में मानना और जो कुछ यीशु ने कहा उसे सुनना और करना है। अतः नींव पर बनाना जो कुछ यीशु ने कहा उसे सुनना और करना है।

तो फिर हमने परमेश्वर के वचन के अधिकार और शक्ति को देखा। मैंने बताया कि अधिकार शब्द लेखक शब्द से आता है। तो, किसी भी किताब का अधिकार लेखक पर निर्भर करता है। बाइबल का अधिकार उसके लेखक पर निर्भर करता है और लेखक पवित्र आत्मा, परमेश्वर की आत्मा है। तो परमेश्वर का अधिकार बाइबल में है।

फिर मैंने बताया कि वचन दो रूपों में हैः लिखित वचन और व्यक्तिगत वचन। यीशु, परमेश्वर का वचन देहधारी हुआ। और मैंने इसे बाइबल के साथ आपके निजी संबंधों के साथ जोड़ दिया। मैंने कहा, और मैं फिर से कहूंगा कि जितना आप परमेश्वर के वचन से प्यार करते हैं उससे अधिक आप उससे प्यार नहीं कर सकते हैं। आप जितना उसके वचन का पालन करते हैं उससे अधिक परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं कर सकते हैं। यदि आप देखना चाहते हैं कि आपके जीवन में परमेश्वर की क्या जगह है तो देखिये कि बाइबल की जगह क्या है क्योंकि दोनों समान हैं। बाइबल लिखित वचन है, यीशु व्यक्तिगत वचन है। लिखित वचन के माध्यम से व्यक्तिगत वचन हमारे जीवनों में आता है।

अब आज मैं सैद्धांतिक नींव पर करते हुए आगे जाना चाहता हूं। हमने व्यक्तिगत नींव देख ली है जो कि यीशु मसीह है परन्तु नया नियम यह भी प्रगट करता है कि एक सैद्धांतिक नींव भी है। यह ऐसा प्रकाशन है जिस पर लाखों मसीहियों का ध्यान जाने से रह गया है परन्तु इब्रानियों 6:1-3 में बहुत स्पष्ट रीति से यह बताया गया है। अब हम उस भाग को निकालेंगे। इब्रानियों 6:1-3 बताता हैः

इसलिये आओ मसीह की शिक्षा की आरम्भ की बातों को छोड़कर, हम सिद्धता की ओर बढ़ते जायें और मरे हुए कामों से मन फिराने, और परमेश्वर पर विश्वास करने। और बपतिस्मों और हाथ रखने, और मरे हुओं के जी उठने, और अन्तिम न्याय की शिक्षा रूपी नेव, फिर से न डालें। और यदि परमेश्वर चाहे, तो हम यही करेंगे।

अब यहां दो विचार हैं जिनका आपको गठबंधन करना है। सबसे पहले, नींव रखना आवश्यक है। यदि आपने नींव नहीं रखी है, तो आप कभी निर्माण नहीं कर सकते हैं। लेकिन यदि एक बार आपने सच में नींव रख ली है तो फिर बार बार नींव नहीं डालते हैं लेकिन एक पूरी इमारत बनाने लग जाते हैं। वे दो संयुक्त विचार हैं। लेकिन आप इब्रानियों 6:1 में देखेंगे कि यह नींव कहता है। यह मसीही विश्वास का सैद्धांतिक आधार है और यह छः सिद्धांतों को सूचीबद्ध करता है जिस पर मैं पुनः विचार करूंगा।

नंबर एक, मरे हुए कामों से पश्चाताप।

नंबर दो, परमेश्वर के प्रति विश्वास।

नंबर तीन, बपतिस्मों के सिद्धांत, बहुवचन।

नंबर चार, हाथ रखना।

नंबर पांच, मृतकों का जी उठना।

और नंबर छह, अनन्त न्याय।

और अगर आप उसका पालन करें तो आप देखेंगे कि यह हमें मसीही विश्वास के शुरुआती बिंदु से अनंत में उसकी अंतिम पूर्ति तक ले जाती है। यह देखना बहुत महत्वपूर्ण है, कि मसीही विश्वास समय में समाप्त नहीं होता है, यह इस जीवन में या इस संसार में समाप्त नहीं होता है। यह हमें इस दुनिया से परे, समय से परे अनंत काल में ले जाता है। मुझे भय है कि बहुत सारे मसीही आज शायद ही अनंत काल का कोई दर्शन रखते हैं। वे इस प्रकार व्यवहार करते और सोचते हैं मानो उन्हें जो कुछ भी मायने रखता है वह सब समय में होने जा रहा है। और वास्तव में, पौलुस कहता है यदि केवल इस जीवन में ही हम मसीह में विश्वास रखते हैं तो हम सब मनुष्यों में अधिक दुखी और दयनीय हैं। यदि आपके पास ऐसा एक दर्शन नहीं है जो आपको समय से परे और अनंत काल में ले जाता है तो आपकी हालत दयनीय है और आपको कई निराशाओं को भुगतना होगा क्योंकि पूर्ति समय में नहीं है। पूर्ति अनंत काल में आती है।

और हां, तो ये छह सिद्धांत हमें पुनरुत्थान और न्याय से होकर प्रारंभिक बिंदु से आगे ले जाते हैं।

अब मैं पहले नींव के सिद्धांत के बारे में बात करना प्रारंभ करना चाहता हूं जो कि मरे हुए कामों से पश्चाताप है। लेकिन मैं सबसे पहले आपको कुछ दिखाना चाहता हूं, कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण, जो इब्रानियों 6:3 में है। लेखक कहते हैंः

यदि परमेश्वर अनुमति दे तो हम ऐसा करेंगे।

यदि परमेश्वर अनुमति दे तो हम समाप्ति और पूर्ति तक जायेंगे। अब आप पूछेंगे कि, "परमेश्वर क्यों अनुमति नहीं देता?" निश्चित रूप से वह चाहता है कि हम सब आगे बढ़ें। मैं आपको निर्माण के एक छोटे से, सरल उदाहरण से जवाब दूंगा। सभ्य दुनिया के किसी भी बड़े शहर में आज, आपको एक इमारत का निर्माण करने के लिए, आपको एक योजना चाहिये, अधिकारियों से अनुमति प्राप्त करनी है और उनसे अपनी योजना की स्वीकृति चाहिये। पहली बात जिसका वे वास्तव में निरीक्षण करेंगे वह नींव है क्योंकि वे जानते हैं कि यदि नींव सुरक्षित नहीं है तो भवन सुरक्षित नहीं होगा। और यदि आपकी नींव ठोस नहीं है तो वे भवन निर्माण जारी रखने के लिए अनुमति नहीं देंगे।

और परमेश्वर मुझसे और आपसे ठीक उसी तरह से व्यवहार करता है। वह कहता है, "मुझे तुम्हारी नींव का निरीक्षण करने की जरूरत है।" यदि यह मेरी जरूरतों के हिसाब से डाली नहीं गई है तो मैं तुम्हें आगे बढ़ने देने की अनुमति नहीं देने जा रहा हूं। तो आप देखें कि यह कितना महत्वपूर्ण है कि उन छः सिद्धांतों के गुरु हों जो मसीही विश्वास की नींव हैं।

और अब हम प्रथम, अर्थात् मरे हुए कामों से पश्चाताप पर नजर डालेंगे। सबसे पहले, मरे हुए काम क्या हैं? अधिकांश आधुनिक अनुवाद कहते हैं कि काम या कार्य जो मृत्यु तक पहुंचाते हैं। मुझे नहीं लगता है कि यह सही है। मैं विश्वास करता हूं कि मरे हुए काम कुछ भी हो सकते हैं जो बिना परमेश्वर पर विश्वास के किया जाता है। कोई भी काम जो परमेश्वर में बिना विश्वास के किया जाता है वह मृत होता है। एकमात्र बात जो हमारे काम में जीवन लाती है वह विश्वास है। अतः हो सकता है कि आप एक अच्छे चर्च जाने वाले मसीही हों, आपने गरीबों को पैसा दिया हो, आपने प्रार्थनायें की हों, लेकिन यदि यह विश्वास में नहीं किया गया था, तो यह सब मरे हुए काम थे। हमें प्रत्येक ऐसी बात से दूर होना है जो विश्वास में नहीं की जाती है। जो कुछ हम मानते और करते हैं उसे केवल विश्वास ही जीवन देता है।

इसका तात्पर्य यह नहीं कि आप निश्चय ही एक पापी जीवन जी रहे हैं, बल्कि आप परमेश्वर के लिये जीवित नहीं हैं क्योंकि आपके हृदय में विश्वास नहीं आया है और परमेश्वर का जीवन नहीं लाया है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप केवल परमेश्वर के लिए जिंदा नहीं किये गये हैं।

अब, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम समझें कि पश्चाताप क्या है? पश्चाताप एक भावना नहीं है। मैंने कई बार देखा है कि प्रचारकगण लोगों को एक भावनात्मक दृष्टिकोण में लाना चाहते हैं और तब उन्हें मसीह में विश्वास करने की पुकार देते हैं। और बहुत, बहुत बार वह पतन की ओर ले जाता है क्योंकि भावना बाहर निकल जाती है और कुछ भी शेष नहीं छोड़ती है। अतः मन में समझ लें कि जैसा कि बाइबल में बताया गया है, पश्चाताप एक भावना नहीं है, यह एक निर्णय है। यह भावनाओं के साथ उछलता नहीं है, यह इच्छा से उभरता है। यदि हम लोगों की इच्छा तक पहुंचें और उनकी मर्जी को मोड़ सकते हैं, तो हम स्थायी रूपांतरण देखेंगे। आज कलीसियाओं में होने वाले बहुत से तथाकथित रूपांतरण अस्थायी होते हैं क्योंकि वास्तव में इससे व्यक्ति की इच्छा कभी नहीं बदली है। उन्हें एक भावनात्मक अनुभव हुआ, वे उत्तेजित हुए, हो सकता है कि कुछ हफ्तों तक या महीनों तक या वर्षों तक। परन्तु अंत में कुछ नहीं रह जाता है जिनमें से वे होकर गुजरते हैं क्योंकि उनकी मर्जी छुई नहीं जाती है।

अब, आप जानें कि बाइबल की दो मुख्य भाषायें हैं, नये नियम का यूनानी और पुराने नियम का इब्रानी। और उन भाषाओं में से प्रत्येक में पश्चाताप के लिए एक विशिष्ट शब्द है। लेकिन केवल जब हम दोनों भाषाओं को एक साथ मिलायेंगे तब ही हमें पश्चाताप का पूरा अर्थ मिलता है। धर्मनिरपेक्ष भाषा में यूनानी शब्द का अनुवाद हमेशा 'अपना मन बदलना', सोचने का तरीका बदलना किया जाता है। अतः सबसे पहले पश्चाताप अपने जीने के तरीके के विषय में अपना मन बदलना है। मैं अपने आपको खुश करने के लिए, अपना खुद का काम करने के लिए जीता रहा हूं। अब से मैं यीशु को, अपने उद्धारकर्ता को खुश करने के लिए जीने जा रहा हूं। यह एक निर्णय है। जैसा कि मैंने पहले कहा, यह एक भावना नहीं है। किसी भी स्पष्ट भावना के बिना आप पश्चाताप कर सकते हैं, लेकिन अपनी इच्छा में बदलाव के बिना आप पश्चाताप नहीं कर सकते हैं।

और तब इब्रानी शब्द - और यह यहूदी लोगों के लिये बहुत ही खास है क्योंकि वे बहुत ही व्यावहारिक लोग रहे हैं। वे जानना चाहते हैं कि यह किस रूप में काम करता है? और पश्चाताप के लिए इब्रानी शब्द का शाब्दिक अर्थ है "वापस मुड़ना।" एक प्रकार से आप परमेश्वर की ओर पीठ दिखाकर गलत तरीका अपनाते रहे हैं, अब आप 180 अंश घूमकर परमेश्वर की ओर फिरें और कहें, "परमेश्वर मैं यहां हूं। मुझे बताईये कि क्या करना है और मैं यह करूंगा।"

तो आप दोनों को एक साथ डाल दें और आपको पश्चाताप की एक पूरी तस्वीर मिलेगी। विश्वास पश्चाताप के बाद ही आता है। बाइबल का पूरा संदेश इसी क्रम में है: पश्चाताप करो और विश्वास करो। बहुत सारे ऐसे हैं, और उनमें से कुछ यहां आज सुबह हैं जो विश्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि आप विश्वास के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं, आपने कभी पश्चाताप की शर्तों को पूरा नहीं किया है। आप देखें, यह छः मूल सिद्धांतों में पहला है। और यदि आपका यह नींव का पत्थर जगह पर नहीं है तो आपका मकान हमेशा डगमगाता रहेगा।

मैंने वर्षों तक सैकड़ों लोगों को, सैकड़ों मसीहियों को परामर्श दिया है जो अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को लेकर आये थे। काफी अनुभवों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गवाही देने वाले - या वास्तविक मसीहियों की कम से कम पचास प्रतिशत समस्यायें एक तथ्य के कारण होती हैं, कि उन्होंने कभी सच्चा पश्चाताप नहीं किया है। उन्होंने कभी भी अपना मन सचमुच नहीं बदला है। उन्होंने कभी भी सचमुच निर्णय नहीं लिया है, उन्होंने अपने जीवन में कभी भी यीशु की प्रभुता के सामने समर्पण नहीं किया है। वे अब भी इस दृष्टिकोण से निर्णय के बारे में सोच रहे हैं, "अब, यदि मैं यह करूं तो यह मेरे लिये क्या करेगा? यदि मैं वह करूं तो यह मेरे लिये क्या करेगा?" जब आपने पश्चाताप कर लिया है तो आपको इस रीति से नहीं सोचना है। आप सोचते हैं, "यदि मैं यह करूं तो क्या यह यीशु को महिमा देगी? यदि मैं वह करूं तो क्या वह यीशु को महिमा देगी?" इसलिये लाखों लोग ऐसे हैं - मैं सोचता हूं कि विशेषकर युवा लोग परन्तु केवल युवा लोग ही नहीं - जो दुचित्ते हैं। बाइबल कहती है कि दुचित्त व्यक्ति अपने सारे मार्ग में अस्थिर होता है। उसका एक ठोस नींव नहीं होती, वह एक स्थायी निर्माण नहीं दे सकता है।

तो जहां आप हैं वहां मैं आपको बस चुपचाप कुछ क्षणों के लिए प्रतिबिंबित करने के लिए आमंत्रित करता हूं और अपने आप से पूछिये, "क्या मैंने कभी वास्तव में सही मायने में पश्चाताप किया है? या, मैं अभी भी दोहरे विचार में हूं? सोमवार को मेरा उद्देश्य यीशु को प्रसन्न करना है, मंगल को मैं स्वयं को प्रसन्न करना चाहता हूं।" आप देखें, आपने वास्तव में दोनों संसार के सबसे बुरे भाग को पाया है। आप दुनिया में, बस बेहतर जी सकते जो केवल खुद के लिए जीते हैं, क्योंकि आप एक दुहरे चित्त के व्यक्ति हैं, आप एक विभाजित व्यक्तित्व के हैं।

अब हम पश्चाताप की प्रकृति पर आगे जायेंगे। एक दृष्टान्त है जो यीशु ने कहा था जो सच्चे पश्चाताप का सबसे चमकीला और एकदम सही चित्रण है। यह एक दृष्टान्त है जिसे हम खोये हुए पुत्र का दृष्टान्त कहते हैं। किसी और ने कहा है कि इसे देखभाल करने वाला पिता कहा जाना चाहिए। आपको लूका 15 में की कहानी याद है, यह आप में से अधिकांश को पता है। एक धनी परिवार के दूसरे बेटे ने अपने पिता से अपनी विरासत में मिलने वाली संपत्ति लेने का फैसला किया और एक दूर देश के लिए रवाना हो गया और वहां जाकर बस गया। उसने सभी प्रकार के पापकर्म किये। और तब, जब वह अपनी पूरी विरासत खर्च कर चुका, तो एक अकाल आया और उसे एक ही नौकरी मिल सकती थी और वह सूअरों को खिलाने का काम था। और आपको याद रखना है, वह यहूदी था तो उसके लिये सूअरों को खिलाने का काम करना सबसे निचले स्तर का काम था। हम उनके खिलाफ कुछ भी नहीं कह रहे हैं लेकिन सिर्फ इतना कि यहूदी लोगों के लिए, यह ग्रहणयोग्य नहीं है।

और यहां है, सुअरों के बाड़े में, सूअरों को खिलाते हुए, भूखा, चाहता है वह सूअरों की फली से ही अपना पेट भरे। और फिर यह होता है। लूका 15 का 17वां पद।

जब वह अपने आपे में आया तो उसने कहा,....

यही वह बिंदु है जहां आपको आना है। आपको खुद आना है जिसे मैं सच्चाई का क्षण कहता हूं। आप वास्तव में जैसे हैं वैसे ही आपको अपने आपको देखना है। आपको अपने आपको वैसे देखना है जैसे परमेश्वर आपको देखता है।

जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं। मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उससे कहूंगा कि पिता जी मैंने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।

अब आप दो तत्वों को देखते हैं? क्योंकि यह आगे कहता हैः

तब वह उठा और अपने पिता के पास चला...

उसने एक फैसला किया, और वह वापस मुड़ा। यही मन फिराव है। एक निर्णय लेना और अपने निर्णय पर अमल करना। यह कहते हुए वापस पिता के पास जाना जिसे तुमने दुख पहुंचाया था, परमेश्वर के पास जो तुमसे प्यार करता है, "मैंने अपने जीवन में एक गड़बड़ कर दी है, मैं स्वयं अपना जीवन नहीं चला सकता हूं। मुझे आपकी जरूरत है। क्या आप मुझे वापस ले लेंगे?" अद्भुत बात यह है कि उसने पिता से कहने की योजना बनाई कि "मुझे अपने काम पर रखे सेवकों में से एक के रूप में बना लो।" लेकिन जब उसने शुरू किया, तो उसके पिता उसका इंतजार कर रहे थे। मुझे लगता है कि यह बहुत सुंदर है। परमेश्वर ऐसा ही है। जब हम वापस जाना प्रारंभ करते हैं तो वह हमें देख रहा है और हमारा इंतजार कर रहा है।

पिता ने उसे दूर ही देख लिया और उसकी ओर दौड़ा...

परमेश्वर ऐसा ही है। इसी प्रकार वह हमसे मिलता है।

उसने उसे चूमा...

और उसने उसे कभी भी वे अंतिम शब्द बोलने नहीं दिये। "मुझे अपने दासों में से एक के समान ही रख ले।" उसने कहा,

झट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ। और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खायें और आनन्द मनावें।

सच्चे पश्चाताप का यही परिणाम है। उस तरह का पश्चाताप स्वागत योग्य है जिसका परमेश्वर द्वारा इस प्रकार स्वागत किया जाये। यही तस्वीर है। आईये, एक पल के लिये इस बारे में स्वयं सोचें। वह खुद आया था। उसने कहा, "मैंने अपना जीवन बर्बाद कर दिया है। मेरे पिता ने जो कुछ मुझे दिया वह सब मैंने बेकार कर दिया है। परन्तु मैं एक निर्णय लेने जा रहा हूं। मैं वापस उठूंगा, मैं अपने पिता के पास वापस जाऊंगा, और कहूंगा, मुझे क्षमा कीजिये।" वह उठा और चल पड़ा। इस विषय में सोचिये। यह सच्चा पश्चाताप है। कार्य रूप में पश्चाताप।

अब, वहां एक झूठा पश्चाताप हो सकता है जिसे हम अंग्रेजी में आज रिमॉर्स या पछतावा कहते हैं। यहूदा ने यह अनुभव किया जिसका वर्णन मत्ती 27:3 और आगे किया गया हैः

जब उसके पकड़वानेवाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया। और कहा, मैंने निर्दोषी को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान। तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आपको फांसी दी।

यहूदा को दुख था परन्तु वह कभी नहीं बदला। वास्तव में, मुझे विश्वास है कि उसने वह बिंदु पार कर दिया था जहां वह बदल सकता था। और मेरे लिए यह एक गंभीर सोच है। इस जीवन में लोग उस बिंदु को पार कर सकते हैं जहां उनके लिये बदलना संभव है। मुझे लगता है कि किसी भी मानव जीवन में सबसे महत्वपूर्ण पल वह पल है जब परमेश्वर पश्चाताप के बारे में आपके साथ व्यवहार करने लगता है। यदि आप अपने कंधे उचकाते और कहते हैं, "ठीक है, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है, बाद में देखेंगे।" तो इस बात की कोई उम्मीद नहीं है कि परमेश्वर फिर कभी आपसे बात करे। किसी भी मानव जीवन में सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह है जब परमेश्वर कहते हैं, "मन फिराओ। मैं तुम्हें वापस लेने को तैयार हूं। मैं तुमसे प्यार करता हूं, मैं तुम्हें चाहता हूं।"

लोगों के जीवन में और बाइबिल में जो बातें मैंने देखी हैं उन पर मैंने विचार किया है। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि एक बात है जो परमेश्वर को सचमुच क्रोधित करती है और यह उसकी कृपा को तुच्छ जानना है। वह स्वेच्छा से हमें अपनी कृपा प्रदान करता है, लेकिन अगर हम इसे तुच्छ समझते हैं तो वह क्रोधित हो जाता है। एक व्यक्ति है जिसने परमेश्वर की कृपा को तुच्छ जाना। क्या आपको उसका नाम मालूम है? एसाव। और इब्रानियों 12 में उसका वर्णन किया गया है। मैं चाहता हूं कि एक पल के लिए उस भाग को देखें क्योंकि आप और मेरे जैसे लोगों में एसाव के जैसे बहुत से लोग हैं। हम सावधान रहना चाहते हैं कि एसाव हमारे निर्णय न बनाये। इब्रानियों 12 के 14वें पद के प्रारंभ में यही कहा गया है।

सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।

ध्यान दें कि बिना पवित्रता के कोई प्रभु को कदापि नहीं देखेगा।

और ध्यान से देखते रहो, ऐसा न हो, कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाये, या कोई कड़वी जड़ फूटकर कष्ट दे, और उसके द्वारा बहुत से लोग अशुद्ध हो जायें। ऐसा न हो, कि कोई जन व्यभिचारी, या एसाव की नाई अधर्मी हो, जिसने एक बार के भोजन के बदले अपने पहलौठे होने का पद बेच डाला।

अब, हमारे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है कि एसाव ने कभी व्यभिचार किया था लेकिन उसका रवैया परमेश्वर की आंखों में व्यभिचार के जैसा ही बुरा था। उसका रवैया क्या था? सूप की एक छोटी कटोरी के लिए उसने अपने पहलौठे के अधिकार को तुच्छ जाना। बड़े बेटे के रूप में यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार था। सारी विरासत उसे मिल सकती थी। लेकिन सिर्फ इसलिए कि उसे शारीरिक रूप से भूख लगी थी और उसे उस स्वादिष्ट सूप की गंध मिल गई जिसे याकूब ने तैयार किया था - यह मेरे लिए बहुत ही स्पष्ट है क्योंकि मैं कुछ समय के लिए अरबों के बीच रहा हूं और वे बिल्कुल वैसा ही बनाते हैं जैसा याकूब ने बनाया। वे इसे अरबी भाषा में सुराबिट अद्दिस (फोनेटिक) कहते हैं। यह सबसे स्वादिष्ट खुशबू वाला होता है, यह घर भर को सराबोर कर देता है। और याकूब, जो अच्छा मोलभाव करने वाला था, कहता है, "देखो तुम मुझे अपना पहलौठे का अधिकार बेच दो। मैं तुम्हें सूप दूंगा।" और मैं मानता हूं कि एसाव ने सोचा था, मेरे जन्मसिद्ध अधिकार से मेरा क्या अच्छा होगा, अभी तो मैं भूखा हूं। जो कुछ मुझे पेशकश किया गया है, उसे मैं ले लूंगा। और वचन कहता है, कि एसाव ने पहलौठे के अधिकार को तुच्छ जाना और उस परमेश्वर को बेहद नाराज कर दिया। और फिर बाद में मलाकी नबी के माध्यम से परमेश्वर ने कहा, "याकूब से मैंने प्यार किया, एसाव से नफरत की।" यह एक बहुत ही गंभीर सोच है। अगर आप जान-बूझकर परमेश्वर के अनुग्रह को, और जो विरासत वह हमें यीशु मसीह में देता है, उसे तुच्छ जानेंगे और इस दुनिया के कुछ सस्ते, अस्थायी सुख के पीछे जायेंगे तो आप परमेश्वर को बहुत क्रोधित करते हैं।

और तब उस कहानी में आगे वचन कहता हैः

तुम जानते तो हो, कि बाद को जब उसने आशीष पानी चाही, तो अयोग्य गिना गया, और आंसू बहा बहाकर खोजने पर भी मन फिराव का अवसर उसे न मिला।

अब यूनानी यह स्पष्ट करता है। वह पश्चाताप की जगह की तलाश नहीं कर रहा था, उसे आशीर्वाद की तलाश थी। लेकिन उसे अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि उसने कोई जगह, पश्चाताप करने के लिए कोई तरीका नहीं पाया। और मुझे विश्वास है कि इस जीवन में एक व्यक्ति पश्चाताप का अवसर खो दे तो फिर कभी उसे वापस पाने में सक्षम नहीं हो सकता है। मैं आपसे आग्रह करना चाहता हूं कि यह एक बहुत, बहुत गंभीर सोच है। आजकल कई सभाओं और कलीसियाओं में पश्चाताप की आवश्यकता के बारे में बहुत कम कहा जाता है। लेकिन सच्चे पश्चाताप के बिना सच्चा विश्वास कभी नहीं हो सकता। आपको हमेशा एक दिन या अगले दिन वाला उथला उथला सा अनुभव होगा क्योंकि आपने पहली आधारशिला नहीं डाली है जो कि पश्चाताप है, स्वयं को प्रसन्न करने और स्वयं के काम करने से परमेश्वर की ओर वापस फिरने के लिये इच्छापूर्वक लिया गया एक निर्णय और परमेश्वर की ओर फिरकर यह कहना, "परमेश्वर मैं यहां हूं। मुझे बताईये कि क्या करना है और मैं करूंगा।" यही पश्चाताप है।

आज यहां आप में से कुछ लोग हैं जिन्होंने कभी सही मायने में पश्चाताप नहीं किया है। मैं सुझाव देना चाहता हूं कि आपकी कई समस्याओं का स्रोत यही है। आपके ऊपर और नीचे के अनुभव। आपको एक दिन अच्छा लगता है, कलीसिया में एक अच्छी आराधना होती है, आप उसे अद्भुत समझते हैं। अगली सुबह कुछ और होता है और आप निराशा में डूब जाते हैं। आपने सचमुच कभी पहली आधारशिला नहीं रखी है। आपके पास केवल एक डगमगाता ढांचा है जो एक दिन गिर जायेगा।

अब मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि पश्चाताप विश्वास से पहले आना चाहिए। पश्चाताप के बिना कोई सच्चा विश्वास नहीं होता है। यह संपूर्ण नये नियम में बताया गया है। मत्ती अध्याय 3 में हम यूहन्ना बपतिस्मादाता की सेवा के बारे में पढ़ते हैं जिसे यीशु मसीह के लिये मार्ग तैयार करने हेतु भेजा गया था। और एक शब्द में यह संदेश क्या था? पश्चाताप। दूसरे शब्दों में, मसीह के आने से पहले पश्चाताप आवश्यक था। पश्चाताप ने मसीह के आने के लिए रास्ता तैयार किया। बिना पश्चाताप के इस अनुभव से गुजरे परमेश्वर के लोग, इस्राएल अपने मसीह के स्वागत के लिये तैयार नहीं हो सकते थे। मत्ती 3:1-3 में वचन कहता हैः

उन दिनों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला आकर यहूदिया के जंगल में यह प्रचार करने लगा। कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। यह वही है जिसकी चर्चा यशायाह भविष्यवक्ता के द्वारा की गई कि जंगल में एक पुकारनेवाले का शब्द हो रहा है, कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, उसकी सड़कें सीधी करो।

कैसे उन्होंने प्रभु का रास्ता तैयार किया था? परमेश्वर के लोगों को पश्चाताप करने के लिये बुलाहट देकर। और पश्चाताप ही एकमात्र रास्ता है जिससे हम अपने दिल और जीवन में आने के लिए प्रभु के लिए तैयार कर सकते हैं।

और जब यूहन्ना ने अपनी सेवा समाप्त की तब यीशु स्वयं यूहन्ना की भविष्यवाणी की पूर्ति के रूप में सुसमाचार की सेवा को जारी रखने के लिये आया। और मरकुस 1:14-15 में वचन कहता हैः

यूहन्ना के पकड़वाये जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है, मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।

पश्चाताप करो और विश्वास करो। जब तक आपने पहले पश्चाताप नहीं किया है, आप सचमुच विश्वास नहीं कर सकते हैं। यीशु के होठों से पहला जो आदेश आया, वह विश्वास नहीं पर मन फिराव था।

मुझे याद है, मैं दक्षिण पूर्व एशिया में एक सभा में होने के नाते, मुझे कहना है, जहां एक अमुक उपदेशक ने चंगाई पर एक संदेश का प्रचार किया था। उसने बहुत ही वाकचातुर्य के साथ चंगा करने के बारे में परमेश्वर की इच्छा और योजना पर बात की थी और चंगाई के बारे में कुछ पदों को उद्धृत किया था। लेकिन उसने पश्चाताप के बारे में एक भी शब्द नहीं कहा था। फिर उन्होंने लोगों को आगे बुलाया और उनमें से अधिकांश मूर्तिपूजा की पृष्ठभूमि से आये थे और बिल्कुल भी पता नहीं था कि जो कुछ परमेश्वर दे रहा है उसे कैसे प्राप्त करना है। मैं जानता हूं क्योंकि मैं उनके परामर्श में शामिल हुआ। रूथ और मैं एक साथ शामिल हुए। यह मेरे लिये एक सबक था। अपने सभी अच्छे इरादों और अपनी मीठी भाषा के साथ उन्होंने पूरी तरह से उन लोगों को उलझन में डाल दिया था क्योंकि उन्होंने लोगों को ऐसा संदेश दिया कि वे बिना पश्चाताप किये परमेश्वर के पास आ सकते थे। उन्होंने उस संदेश में एक बार भी पश्चाताप शब्द का उपयोग नहीं किया। किसी प्रचारक की आलोचना करने के लिये मैं यह नहीं कह रहा हूं, मैं यह केवल इसलिये कह रहा हूं, क्योंकि मैंने एक सबक सीखा है, और मुझे भय है कि बहुत सी कलीसियायें हैं, बहुत से लोग हैं जो भ्रम में हैं क्योंकि उन्हें केवल यही बताया जाता है कि परमेश्वर उनके लिये क्या करेगा और उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि परमेश्वर आपसे क्या अपेक्षा करता है। पहली बात जिसकी वह अपेक्षा करता है वह पश्चाताप है। अपना मन बदलिये, वापस मुड़िये। 180 अंश में घूम जाईये और परमेश्वर की ओर मुड़ कर कहिये, "परमेश्वर, मुझे बता कि क्या करना है और मैं वह करूंगा।" यही पश्चाताप है।

अब अगर हम यीशु की सेवा के अंत की ओर देखें, तो उसका संदेश कभी नहीं बदला। लूका 24 में, यीशु ने अपने जी उठने के बाद अपने चेलों को निर्देश दिया था। लूका 24:46-47। याद रखें, यह पुनरुत्थान के बाद है, ठीक संसार छोड़ने से पहले।

और उनसे कहा, यों लिखा है कि मसीह दुःख उठायेगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा। और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जायेगा।

संदेश पर ध्यान दें, पश्चाताप और फिर मुक्ति या पापों की क्षमा है। लेकिन पश्चाताप के बिना कोई माफी नहीं है। यही वह संदेश है जिसका प्रचार यरूशलेम में शुरू होकर सभी राष्ट्रों के लिए प्रचार किया जाना था।

और फिर जब कलीसिया पिन्तेकुस्त के दिन सार्वजनिक रूप से अस्तित्व में आई, पवित्र आत्मा के महान अभिषेक के दिन, और यहूदियों की बड़ी भीड़ एकत्र हुई और पता करना चाहती थी कि क्या हो रहा था, और पतरस खड़ा हुआ और प्रेरितों के काम अध्याय 2 का वह प्रसिद्ध संदेश प्रचार किया। और फिर अंत में वे कायल हुए और उन्होंने पतरस से कहा "हम क्या करें?" यह पहली बार है जब कलीसिया से पापियों द्वारा ऐसा प्रश्न पूछा गया कि हम क्या करें। मुझे प्रेरितों 2:37 पढ़ने दें:

तब सुननेवालों के हृदय छिद गये और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?

और मैं आपको बताना चाहता हूं कि अगर आप कभी उस जगह आते हैं जहां आप ईमानदारी से जानना चाहते हैं कि परमेश्वर चाहता है कि आप क्या करें और आप इसे करने के लिए तैयार हैं, तो परमेश्वर आपको किसी भी शक में नहीं रहने देगा कि वह क्या चाहता है। उसकी कठिनाई आपको बताना नहीं है, उसकी कठिनाई आपको उस जगह पर लाना है जहां आप जानना और यह करना चाहते हैं। और जैसे ही इन लोगों ने पाप के प्रति वास्तव में कायल हुए, उन्होंने प्रेरितों से कहा, "हे भाईयों हम क्या करें।" परमेश्वर और कलीसिया के प्रवक्ता के रूप में पतरस ने उन्हें एक स्पष्ट, सटीक और व्यावहारिक उत्तर दिया।

तब पतरस ने उनसे कहा, "पश्चाताप करो"

पहले क्या आता है? पश्चाताप....

पतरस ने उनसे कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।

यह एक त्रिस्तरीय प्रतिज्ञा है।

पहला, पश्चाताप।

दूसरा, जल में बपतिस्मा लो।

और तीसरा, पवित्रात्मा पाओ।

मैं विश्वास नहीं करता कि परमेश्वर का कार्यक्रम कभी भी बदला है। मुझे विश्वास है कि वास्तव में यही आज परमेश्वर पापियों के लिये चाहता है। मुझे विश्वास है कि कलीसिया द्वारा इसी संदेश का प्रचार होना चाहिए। पश्चाताप करो, पानी में बपतिस्मा लो, और पवित्रात्मा का दान पाओ।

और जहां कहीं उस संदेश का प्रचार किया जाता है, वहां बिल्कुल उसी तरह होता है जैसा पिन्तेकुस्त के दिन हुआ था। लोग पश्चाताप करते हैं, वे बपतिस्मा ले रहे हैं और वे पवित्र आत्मा प्राप्त कर रहे हैं। मैंने यह कई बार होते देखा है जब लोगों ने बपतिस्मा लिया और पानी से ऊपर आने पर वे पवित्रात्मा से परिपूर्ण हुए। क्यों हमें यह संदेश पानी में डाल देना चाहिए? हमें ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। हमारे पास केवल नये नियम के संदेश का प्रचार करने की ही अनुमति हैः पश्चाताप करो, पानी में बपतिस्मा लो, पवित्र आत्मा प्राप्त करो। जब हम संदेश देते हैं तो परमेश्वर जवाब देता है। परमेश्वर नहीं है जो बदल गया है, यह संदेश नहीं है जो बदल गया है, लेकिन कई मामलों में यह कलीसिया है जो बदल गई है।

और मुझे कुछ कहने दें जो आपको झटका दे सकता है लेकिन नये नियम में मैं किसी भी व्यक्ति को नहीं पाता जो बिना पानी में बपतिस्मा के यीशु द्वारा मुक्ति का दावा करता हो। देखें कि क्या आपको मिल सकता है। क्योंकि यीशु ने कहा, "जो विश्वास करता है और बपतिस्मा लेता है, वह उद्धार पायेगा।" आपको या मुझे "बपतिस्मा ले" शब्द को बाहर करने का क्या अधिकार है? उद्धार विश्वास करना और बपतिस्मा लेना है। और जब आपने यह कर लिया है तो आप पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए एक उम्मीदवार हैं। यही कलीसिया का संदेश है, जहां तक परमेश्वर का संबंध है यह कभी नहीं बदला गया है।

और फिर हम अन्यजातियों के महान प्रेरित पौलुस की सेवा को देखते हैं। जैसा प्रेरितों के काम की पुस्तक में दर्ज की गई है वैसा ही हम उसे देखेंगे। सबसे पहले, पौलुस ने खुद को अथेने में पाया जो एक बहुत ही बौद्धिक तथा व्यभिचार से भरा शहर था। अंततः उसे प्रचार करने के लिये वह वहां जा पहुंचा। मैं नहीं सोचता कि उसका ऐसा कोई इरादा था परन्तु वह ऐसे मुकाम पर जा पहुंचा जहां लोग जानना चाहते थे कि वह क्या विश्वास करता है और उसने उन्हें बताया। प्रेरितों 17:30 के आगे वह यह कहते हुए अपना संदेश समाप्त करता है कि वे व्यभिचार में और परमेश्वर के प्रति अज्ञानता में जी रहे थेः

इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में अनदेखा करके, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।

यह बहुत स्पष्ट कहता है, परमेश्वर अब सभी लोगों को हर जगह पश्चाताप करने के लिए आज्ञा देता है। कोई जगह और कोई व्यक्ति इससे छूटा नहीं है। यही मानवता से परमेश्वर की सार्वभौमिक मांग है। अगर हम फिरते हैं तो वह अतीत को नजरअंदाज करने को तैयार है।

और तब वचन कहता हैः

क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिसमें वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रामाणित कर दी है।

और प्रेरितों के प्रचार की एक और विशेषता को देखें जिसे अकसर नजरअंदाज किया जाता है, यीशु उद्धारकर्ता मात्र नहीं है वह न्यायी भी है। और वह उद्धार करने में जितना सक्षम है उतना ही न्याय करने में भी कुशल है। पुनः इसे बहुत से प्रचार में से बाहर कर दिया जाता है। लोग उद्धारकर्ता के बारे में बात करते हैं परन्तु कभी भी न्यायी की बात नहीं करते हैं। वास्तव में अथेने के लोगों को दिये गये इस संदेश में पौलुस ने कभी उद्धारकर्ता की बात नहीं की। उसने केवल न्यायी की बात की।

और मैं आपको बताता हूं कि यदि लोगों को पता न हो कि उन्हें यीशु के न्याय का सामना करना है तो वे बिल्कुल भिन्न जीवन जियेंगे। वर्तमान मसीहियत में बहुत अधिक लापरवाही और फिसलाहट पायी जाती है क्योंकि हमने इस तथ्य का सामना नहीं किया है कि यीशु केवल उद्धारकर्ता ही नहीं बल्कि न्यायी भी है। "उसने एक दिन ठहराया है, जिसमें वह धर्म से जगत का न्याय करेगा।" न्याय का मुद्दा क्या है? यह धार्मिकता है। वह कैसे जिया, हम कैसे लोग रहे हैं? यह हमारे विभाग, हमारी राष्ट्रीयता, हमारे सामाजिक स्तर का सवाल नहीं है...न्याय में केवल एक ही मुद्दा है, वह धार्मिकता है। और यूहन्ना ने अपनी पहली पत्री में कहा, सब प्रकार की अधार्मिकता पाप है। यह ऐसा है मानो हम जानना चाहते हैं कि कुटिलता क्या है। मैं रेखागणितज्ञ नहीं हूं परन्तु मैं आपको सीधी रेखा दिखाऊंगा जो टेढ़ी रेखा से बिल्कुल भिन्न है। यह एक अंश या 90 अंश मुड़ा हुआ हो सकता है परन्तु यह टेढ़ा है। और सब अधार्मिकता पाप है। जो कुछ धार्मिकता नहीं है वह पाप है। कोई तीसरा विभाग नहीं है।

मैंने आज के बहुत सारे विश्वासियों में देखा है कि वे मानो एक तीसरी श्रेणी की तरह हैं। खैर, यह धर्मी नहीं है, लेकिन यह पापमय भी नहीं है। यह श्रेणी परमेश्वर की सोच में मौजूद नहीं है। कुछ भी जो धर्मी नहीं है वह पापमय है।

और फिर हम प्रेरितों के काम 20 में इफिसुस में पौलुस की सेवा का विवरण पढ़ते हैं, जहां उसकी पूरी सेवा के कुछ महानतम परिणाम मिले थे। वह अब इफिसुस में कलीसिया के प्राचीनों से बात कर रहा है क्योंकि वह उनसे दूर जाने पर है और वह कहता है, "तुम मुझे इस संसार में फिर कभी नहीं देखोगे।" उनके लिये यह उसके प्यार और परवाह का संदेश है। पद 20-21 में वह कहता हैः

जो बातें तुम्हारे लाभ की थीं, उनको बताने ....और .... सिखाने से कभी न झिझका।

मैंने अकसर इस पद पर विचार किया है, "कभी न झिझका।" यह बताता है कि कुछ ऐसा दबाव रहा होगा कि सत्य का प्रचार न किया जाये क्योंकि इससे आपको अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा दांव पर लगानी पड़ सकती है। यदि आप किसी कलीसिया में पास्टर हैं तो इससे आपकी कलीसिया में आपकी स्थिति दांव पर लग सकती है। यदि आप एक लोकप्रिय सामाजिक व्यक्तित्व हैं तो इससे आपको अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगानी पड़ सकती है। अतः पौलुस कहते हैं, "मैंने इस बारे में सोचा और निर्णय लिया कि कुछ भी मुझे सुसमाचार सुनाने से न रोक सके।"

"जो बातें तुम्हारे लाभ की थीं, उनको बताने....और....सिखाने से कभी न झिझका।"

इसी प्रकार उसका संदेश नहीं बदला, चाहे बड़ी सभा में प्रचार किया गया या घरेलू सभा में। उसका संदेश समान था। वह क्या था?

... यहूदियों और यूनानियों के सामने गवाही देता रहा, कि परमेश्वर की ओर मन फिराना, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना चाहिये।

पहले क्या आता है। विश्वास या पश्चाताप? पश्चाताप। परमेश्वर के प्रति पश्चाताप। "परमेश्वर मुझे दुख है। मैं एक पापी रहा हूं। मैंने अपने तरीके से जीवन बिताया है।" तब यीशु के प्रति विश्वास। "यीशु, मैं विश्वास करता हूं कि तूने मेरा स्थान लिया। मेरे लिये तू क्रूस पर मरा। तूने मेरे पाप ले लिये।" परन्तु जब तक परमेश्वर के प्रति सच्चा पश्चाताप न हो तब तक आप यीशु में सच्चा विश्वास नहीं रख सकते हैं।

देखें, नया नियम बहुत तर्कसंगत है। मैं सोचता हूं कि यह कुछ ऐसा है जिस पर कलीसिया को पश्चाताप करने की जरूरत है कि हमने अकसर संदेश की गंभीरता को कम किया है, लोगों को धोखा दिया है, उन्हें भ्रमित किया है कि एक मसीही होने का क्या अर्थ है। पश्चाताप के बिना आप एक सच्चे मसीही नहीं बन सकते। बिना पश्चाताप के विश्वास नहीं होता है।

बाइबल कहती है कि हर कहीं सभी को पश्चाताप करना है। शायद आप कहेंगे कि हर कहीं सब क्यों? यशायाह से मुझे आपको उत्तर देने दीजिये। यशायाह 53:6 कहता हैः

हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गये थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया।

आप देखें, यही हमारी समस्या है। आवश्यक नहीं कि हमने हत्या या व्यभिचार किया हो, या कुछ चुराया हो, या झूठ भी न बोला हो। परन्तु हम सबने एक काम किया है, हम सबने अपना अपना मार्ग लिया।

तब वह कहता हैः

हम सभों के अधर्म का बोझ उसी (यीशु) पर लाद दिया।

अधर्म, यह एक बहुत मजबूत शब्द है। अपने अपने रास्ते चलना क्या है? यह है अधर्म, विद्रोह, क्या है, यह अपने आपको परमेश्वर से पहले रखना है। और यही कारण है कि परमेश्वर हर जगह सभी से पश्चाताप करने के लिए कहता है। क्योंकि हम सबने अपना अपना मार्ग लिया हुआ है। हम सब अपना अपना काम करते रहे हैं, परमेश्वर को दृश्य से बाहर कर हम सब स्वयं को प्रसन्न करते रहे हैं। परमेश्वर कहता है, "जो कुछ यीशु ने किया उसके कारण यदि तू पश्चाताप करे तो मैं तुम्हें ग्रहण करूंगा, तुम्हें क्षमा करूंगा।" यही गहराई से किया गया पश्चाताप है।

अब मैं कहना चाहता हूं कि पश्चाताप परमेश्वर के साथ शुरू होता है। अच्छा सब कुछ परमेश्वर के साथ शुरू होता है; हम हमेशा परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर रहते हैं। परमेश्वर की कृपा के बिना, उसकी आत्मा के चलन के बिना, हम पश्चाताप नहीं कर सकते हैं। भजन 80 में यह स्पष्ट रीति से बताया गया है। इस भजन में एक ही वाक्यांश 3 बार आया है। जो अनुवाद मैं पढ़ रहा हूं उसमें पद 3 कहता हैः

हे परमेश्वर, हम को ज्यों के त्यों कर दे और अपने मुख का प्रकाश चमका, तब हमारा उद्धार हो जायेगा।

परन्तु जबकि यह अनुवाद कहता है कि "ज्यों का त्यों कर दे" इब्रानी अनुवाद कहता है कि "हमें वापस मोड़ दे।" दूसरे शब्दों में, हमें पश्चाताप करने दे। यह तीन बार आता है। पद 3 मेंः

ज्यों के त्यों कर दे ...... तब हमारा उद्धार हो जायेगा।

पद 7ः

ज्यों के त्यों कर दे ..... तब हमारा उद्धार हो जायेगा।

पद 19ः

ज्यों के त्यों कर दे ..... तब हमारा उद्धार हो जायेगा।

आपने समझा? जब तक परमेश्वर आपको वापस न मोड़े आप पश्चाताप नहीं कर सकते हैं। मुड़ना परमेश्वर से प्रारंभ होता है। इसलिये यह हमारे जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण क्षण होता है कि जब परमेश्वर हमें वापस लाना प्रारंभ करता है, क्योंकि यदि हम कंधे उचका दें और चले जायें तो हममें पश्चाताप शेष नहीं रह जाता है। हम पश्चाताप के लिये पहल हेतु परमेश्वर पर निर्भर हैं।

और तब विलापगीत की पुस्तक 5 अध्याय 21 पद में देखें, विलापगीत परमेश्वर के प्रति यरूशलेम के लगातार विद्रोह के कारण उसके विनाश पर यिर्मयाह का विलाप है। इस अनुवाद में विलापगीत 5:21 कहता है, "हे यहोवा, हम को....बदलकर ज्यों के त्यों कर दे!" यह भजन 80 में वर्णित शब्द के समान ही है।

हे यहोवा, हम को अपनी ओर फेर, तब हम फिर सुधर जायेंगे।.....हमारे दिन बदलकर ज्यों के त्यों कर दे!

या वापस आये। हमें पहले जैसा कर और हम हो जायेंगे। यह एक बहुत, बहुत गंभीर सोच है। परमेश्वर जब तक आपको पहले जैसा न करे आप नहीं हो सकते हैं। यही कारण है कि यह हर जीवन में एक संवेदनशील पल है।

मैं एक जवान को जानता हूं जो सेना में मेरा साथी था। जब मैंने उद्धार पाया तब वह एकलौता गवाह था। वह मेरे जीवन में परिवर्तन को जानता था। और बाद में उसी इकाई में मैंने एक बाइबल कक्षा शुरू कर दी। मैंने सोचा, मुझे कुछ करना है। मुझे नहीं पता था कि बाइबल कक्षा कैसे चलानी है, मुझे नहीं पता था कि कहां से प्रारंभ करना है। मैंने सोचा कि नये नियम से प्रारंभ करता हूं। मैं कहां से प्रारंभ करता? अध्याय 1। अतः मैंने यीशु की वंशावली से प्रारंभ किया। मैं आगे बढ़ता रहा और मेरे चार पांच साथी सैनिक भाग लेते रहे। यह उत्तरी अफ्रीका के मरुस्थल की बात है। और तब मेरा यह मित्र - वह सच में अच्छा मित्र था - मेरे पास आया और उसने कहा, "मित्र, मुझे खेद है परन्तु अब मैं तुम्हारी बाइबल कक्षा में नहीं आऊंगा।" मैंने पूछा, "क्यों?" उसने कहा, "क्योंकि मुझे पता है, अगर मैं आऊंगा तो मैं कनवर्ट हो जाऊंगा।" सालों बाद मैं उससे पूरी तरह से अलग परिस्थितियों में मिला। मेरे जानकारों में वह सबसे दयनीय व्यक्ति था। उसने मुझसे उसकी मदद के लिए निवेदन किया। मैंने सब कुछ किया जो मैं कर सकता था। मैं लोगों को प्रभु में लाने में अनुभवी था और मैं उसकी मदद नहीं कर सका। मैंने उसकी पत्नी की मदद की, वह बचायी गई। मैं नहीं जानता कि उसका अंत कैसे हुआ लेकिन ओह, मेरे लिये कैसी चेतावनी। आपको लगता है कि जब आपकी मर्जी होगी तो आप मुड़ सकते हैं। आप कह सकते हैं, "हे परमेश्वर, अभी मैं व्यस्त हूं, लेकिन बाद में वापस आऊंगा।" मैं नहीं कहता कि वह पश्चाताप की रेखा पार कर चुका है, मैं नहीं जानता उसका अंत कैसा था। लेकिन मेरे लिये कैसा सबक! जब परमेश्वर उसे मोक्ष स्वीकार करने के लिए बुला रहा था तो उसे यह अच्छा नहीं लग रहा था। जब उसे उद्धार चाहिये था तो परमेश्वर ने उससे बात नहीं की। कौन जानता है कि उसका अंत क्या था।

अब बाइबल कहती है कि पश्चाताप का एक ही विकल्प है और यह लूका 13 के कुछ प्रारंभिक पदों में यीशु की सेवा में बताया गया है।

उस समय कुछ लोग आ पहुंचे, और उससे उन गलीलियों की चर्चा करने लगे, जिनका लहू पीलातुस ने उन्हीं के बलिदानों के साथ मिलाया था।

वास्तव में जब वे कुछ बलिदान कर रहे थे तो पीलातुस ने उन्हें मार डाला था। आपको लगता होगा कि यह उनके अच्छे के लिए होगा, लेकिन यीशु ने उत्तर दिया और कहाः

क्या तुम समझते हो, कि वे अठारह जन जिन पर शीलोह का गुम्मट गिरा, और वे दबकर मर गये, यरूशलेम के और सब रहनेवालों से अधिक अपराधी थे? मैं तुमसे कहता हूं, कि नहीं परन्तु यदि तुम मन न फिराओगे तो तुम भी सब इसी रीति से नाश होगे।

केवल दो ही विकल्प हैं, पश्चाताप करो या नाश हो। ये स्वयं यीशु के शब्द हैं।

अब, हमने कहा कि पश्चाताप विश्वास का मार्ग है। आईये, विश्वास की प्रकृति के बारे में थोड़ा सा विचार करना शुरू करते हैं और फिर हम अपने अगले सत्र में जायेंगे। रोमियों 10:17 जो मैंने आपको पहले उद्धृत किया था, कहता है, "विश्वास सुनने से और सुनना परमेश्वर के वचन से होता है।" यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत है। विश्वास, जैसा बाइबल में प्रयोग किया गया है, का अर्थ हमेशा परमेश्वर के वचन में विश्वास रखना है। यह केवल एक स्रोत से, परमेश्वर के वचन से आ सकता है। इसका केवल एक फोकस, अर्थात परमेश्वर का वचन है। आप देखें, हम समकालीन अंग्रेजी में कह सकते हैं, मुझे अपने डॉक्टर में बड़ा विश्वास है। या, मुझे एक राजनीतिक पार्टी में आस्था है या मुझे किसी खास दवा या आहार में विश्वास है। वह वैध है, उन शब्दों का उपयोग करने में कुछ भी गलत नहीं है परन्तु धर्मशास्त्र में विश्वास का प्रयोग ऐसा नहीं हुआ है। बाइबल में विश्वास हमेशा परमेश्वर के वचन पर आधारित होता है। जो कुछ भी परमेश्वर के वचन पर आधारित नहीं है वह बाइबल का विश्वास नहीं है।

और फिर इब्रानियों 11 में हम विश्वास की एक परिभाषा पाते हैं। मुझे लगता है कि यही केवल एक शब्द है जिसे वास्तव में बाइबल परिभाषित करती है। मैं किसी और शब्द के बारे में सोच नहीं सकता जिसे बाइबल में परिभाषित किया गया है। इब्रानियों 11:1 मेंः

अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।

अतः विश्वास और आशा के मध्य एक संबंध है। मैंने पाया है कि बहुत से लोगों को बड़ी आशा होती है जब उन्हें लगता है कि उनमें विश्वास है। विश्वास यहां और अभी है, आशा भविष्य के लिए है। विश्वास एक बहुत वास्तविक तत्व कहलाता है। यह हमारे हृदय में होता है। विश्वास के आधार पर हम भविष्य के लिये एक वैध आशा रख सकते हैं। लेकिन, कोई भी उम्मीद जो वैध विश्वास पर आधारित नहीं है वह बस इच्छाधारी सोच होती है। लेकिन मन में ठान लें, विश्वास हमारे हृदय का तत्व है। यह अभी ठीक यहां है।

रोमियों 10:10 कहता हैः

क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है।

ध्यान दें कि विश्वास मन में नहीं है, यह हृदय में है। और तब पौलुस आगे कहता हैः

क्योंकि उद्धार के लिये मनुष्य मन से विश्वास करता है।

नये नियम में, विश्वास गति का एक शब्द है। यह एक स्थिर बात नहीं है। यह बौद्धिक स्थिति लेना नहीं है। यह आपके भीतर का कुछ है जो आपको कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता है। विश्वास गति की क्रिया है। विश्वास के द्वारा हम उद्धार के लिये विश्वास करते हैं। आपको बौद्धिक विश्वास हो सकता है, हो सकता है कि वह कभी न बदले। आप बौद्धिक रीति से बाइबल के सारे सिद्धांतों को गले लगा लें और पूरी तरह पहले जैसा ही बने रहें। परन्तु जब आपके हृदय में विश्वास होता है तो यह आपको उद्धार तक पहुंचाता है।

विश्वास वर्तमान में है, आशा भविष्य में है। विश्वास दिल में है, आशा मन में है। 1 थिस्सलुनीकियों 5:8 में पौलुस दोनों के बारे में बोलता है। यह एक बहुत ही दिलचस्प तस्वीर है जिसका वह उपयोग करता हैः

पर हम तो दिन के हैं, विश्वास और प्रेम की झिलम पहिनकर और उद्धार की आशा की टोप पहिनकर सावधान रहें।

आप देखेंगे कि दो प्रकार के कवच हैं। विश्वास झिलम है। यह किसकी रक्षा करता है? हृदय की, हां, सही है। लेकिन आशा एक टोप है। टोप किसकी रक्षा करता है? सिर की, है न? विश्वास हृदय में है, आशा मन में है।

अब, आशा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हर सच्चे मसीही को आशावादी होना चाहिए। यदि आप निराशावादी हैं, तो वास्तव में यह आपकी आस्था का इंकार है। मैं इस रूप में आशा को परिभाषित करता हूं। और हम में से हर एक को, जो एक सच्चा विश्वासी है, अच्छाई की एक विश्वासपूर्ण उम्मीद है। क्योंकि, जीवन में चाहे कुछ भी हो, हम हमेशा के लिये यीशु के साथ रहने जा रहे हैं। यदि यह हमारी आशा है तो चाहे आप निराश हों, चाहे आप हताश हों, परन्तु आप कभी हार न मानें क्योंकि आपको एक आशा है, ऐसी आशा जो विश्वास पर आधारित है।

तब हम विश्वास के बारे में कुछ और बातों के लिए वापस इब्रानियों 11 पर जायेंगे। इब्रानियों का यह अद्भुत 11वां अध्याय, विश्वास का महान अध्याय। इब्रानियों 11:3 में लिखा हैः

विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।

यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है, विश्वास आपको अदृश्य से संबंधित करता है। विश्वास इस बात पर आधारित नहीं है कि हम क्या देखते हैं। विश्वास हमें इंद्रियों के दायरे से परे अदृश्य के दायरे में ले जाता है।

और 2 कुरिन्थियों 5:7 में पौलुस कहता हैः

हम देखकर नहीं पर विश्वास के द्वारा चलते हैं।

ध्यान दें, ये विकल्प हैं। जब आप देखते हैं, आपको विश्वास करने की जरूरत नहीं है। आपको केवल तभी विश्वास करने की जरूरत है जब आप नहीं देखते हैं। अतः पौलुस कहता है कि हम विश्वास से चलते हैं। जो कुछ हम देख रहे हैं उसके द्वारा नहीं चल रहे हैं, जो कुछ हम विश्वास करते हैं उसके द्वारा चल रहे हैं।

और लाजर की कब्र के बाहर यीशु ने मार्था से कहाः

यीशु ने उससे कहा, क्या मैंने तुझ से न कहा कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।

तो पहले क्या आता है? विश्वास करना या देखना? विश्वास करना, हां, सही है। बहुत सारे लोगों का कहना है, "ठीक है, जब मैं देखूंगा तो मैं विश्वास करूंगा।" नहीं, यह सच नहीं है क्योंकि जब आप देखते हैं तो आपको विश्वास करने की जरूरत नहीं है। हम विश्वास से चलते हैं, देखकर नहीं। मैं बहुत से लोगों से मिला हूं जो कहते हैं, "ओह् यदि मैं देख भर लेता तो विश्वास कर लेता।" परन्तु यह सच नहीं है। आपको विश्वास करने की जरूरत नहीं होती जब आप देख सकते हैं। जब आप देख नहीं सकते तब आपको विश्वास करने की जरूरत है। हम देखकर नहीं पर विश्वास से चलते हैं।

और फिर मैं दोनों मूल भाषाओं यूनानी और इब्रानी में कहना चाहता हूं, विश्वास मुख्य रूप से एक सैद्धांतिक मुद्दा नहीं है, यह चरित्र की बात है। हमने अपनी सुसमाचारीय सोच में इसे गलत रूप में ले लिया है। हम विश्वास के बारे में कुछ निश्चित सिद्धांतों की एक बौद्धिक आलिंगन के रूप में बात करने के आदी होते हैं। मुख्य रूप से, विश्वास चरित्र की बात होती है। यह इब्रानी एमानाउ (फोनेटिक) और यूनानी पिस्तोस (फोनेटिक) के मामले में सही है। दोनों ही के प्राथमिक अर्थ विश्वस्तता, वफादारी, समर्पण होते हैं।

यीशु ने अपने चेलों से कहा, "तुम लोग मेरी परीक्षाओं में साथ रहे हो।" यही विश्वास है। यह एक व्यक्ति के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता है।

जब हम अंगीकार करते हैं, तो विश्वास हमें यीशु से एक महायाजक के तौर पर जोड़ता है। इब्रानियों 3:1 कहता हैः

उस प्रेरित और महायाजक यीशु पर जिसे हम अंगीकार करते हैं, ध्यान करो।

यह याद रखें। यह बहुत, बहुत महत्वपूर्ण है। यीशु हमारे अंगीकार का महायाजक है। यदि आप यह कहते हैं, तो वह आपका महायाजक है। इसीलिये अपने विश्वास का अंगीकार करना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

और तब इब्रानियों 4:14 कहता हैः

सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्वर का पुत्र यीशु तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।

हम कबूल करते हैं, हम परखे जाते हैं परन्तु हम दृढ़ता से पकड़ रहे हैं। और जब तक हम दृढ़ता से थामे रहते हैं, यीशु हमारा महायाजक है।

लेकिन इब्रानियों 10 में यह हमें एक सीढ़ी और आगे ले जाता है। इब्रानियों 10:21 कहता हैंः

और इसलिये कि हमारा ऐसा महान याजक है, जो परमेश्वर के घर का अधिकारी है। और अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की है, वह सच्चा है।

ध्यान दें कि हम विश्वास से आशा तक बढ़ गये हैं। हमें एक आशा है जो कि हमारे विश्वास पर आधारित है। हम अपने विश्वास को स्वीकार करते हैं और अब हम अपनी आशा को कबूल करते हैं। यह कहता है कि बिना डगमगाये। आपको क्या लगता है कि यह ऐसा क्यों कहता है? क्यों वह कहता है कि बिना डगमगाये? उसे क्यों कहना चाहिये कि अपने विश्वास को दृढ़ता से थामे रहो? कारण यह है कि बहुत सी ऐसी ताकतें होंगी जो हमारा विरोध करेंगी, बहुत से दबाव होंगे जो हमारे विरुद्ध आयेंगी, बहुत सी बातें हैं जो हमें निराश करने और हमारे विश्वास को कमजोर करने का प्रयास करेंगी। यह दृढ़ संकल्प की लड़ाई है। यह सहनशक्ति की लड़ाई है।

अंत में, अनिच्छा से, मुझे आपसे कहना है कि, विश्वास का परीक्षण किया जायेगा। न परखा हुआ विश्वास परमेश्वर की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं रखता है। यीशु ने इफिसुस की कलीसिया से कहा,ः

मैं तुम्हें आग में ताया हुआ सोना मोल लेने की सलाह देता हूं।

यह असली विश्वास है जो कसौटी पर खरा उतरा है। प्राचीन समय में जो सोना आग में ताया नहीं जाता था उसे कुछ भी लायक नहीं माना जाता था। जिस विश्वास का परीक्षण नहीं किया गया है वह परमेश्वर द्वारा मूल्यवान नहीं माना जाता है।

समाप्त करते हुए मुझे याकूब 1:2-4 उद्धृत करने देंः

...जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसे पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे।

क्या आप सिद्ध और पूरा होना चाहते हैं? आपको धीरज को अपना सही काम करने देना है। यही परख है जिसमें से आपको जाना है। और कहीं पतरस कहता हैः

और यह इसलिये है कि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास, जो आग से ताया हुआ, नाशमान सोने से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है, यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा, और महिमा, और आदर का कारण ठहरे।

और मुझे आपसे एक अंतिम शब्द कहना है, जिसके बारे में चाहूंगा कि काश कि मैंने न बोला होता, धीरज सीखने के लिए एक ही तरीका है। क्या आप जानते हैं कि वह क्या है? धीरज रखना। हां, सही है।

परमेश्वर आपको आशीष दे।

39
साझा करें