प्रथम भाग में मैं कुछ सबसे सामान्य तरीकों का वर्णन करने को प्रयास किया कि किस प्रकार लोगों के जीवनों में श्राप कार्य करता है और मैं ने आपको श्राप के कुछ मूल कारण भी बतायें हैं। प्रत्येक श्राप का प्राथमिक कारण परमेश्वर की आवाज को नहीं सुनना और जो कुछ वह कहता है उसे नहीं करना है। और तब कई तरीके हैं जिसमें परमेश्वर की आवाज को नहीं सुनने और जो कुछ वह कहता है उसे नहीं करने के दोषी हो सकते हैं। हमने कई श्रापों को देखा है जिनकी घोषणा स्वयं परमेश्वर के द्वारा अनाज्ञाकारिता के विभिन्न रूपों और परमेश्वर को प्रसन्न न करने वाले व्यवहारों पर की गई है। हमने देखा कि सभी श्रापों का एकमात्र सबसे बड़ा कारण झूठे ईश्वर, मूर्तिपूजा और मनोगत हैं। तब हमने कई विशिष्ट बातों को देखा जिन पर परमेश्वर ने अपने श्राप की घोषणा की है।

अब मैं शाप के कई अन्य स्रोतों को देखने जा रहा हूँ, शायद आधा दर्जन, जिस पर मैं अनुचित देरी के बिना जाना चाहूँगा, ताकि हम वास्तविक समाप्ति पर आ सकें जो कि ‘किस प्रकार श्राप से मुक्ति पायें’ हैं। मेरा अनुभव है कि बहुत से मामलों में लोग तब तक मुक्त होने की अपनी आवश्यकता को नहीं देखते हैं जब तक वे उस तरीके को नहीे समझ पाते हैं कि श्राप पहले कैसे आया था।

श्रापों के एक अन्य विशिष्ट स्रोत मनुष्य है जो परमेश्वर के वक्ता के रूप में परमेश्वर की आेर से बोलते हैं। बाइबिल में इस के कई उदाहरण हैं। हम केवल कुछ ही देख लेंगे। पहला यहोशू 6ः26 में इस्राएल द्वारा यरीहो पर कब्जा करने और उसे नष्ट करने के बाद पाया जाता है। परमेश्वर के लोगों का नेता, और परमेश्वर का प्रवक्ता यहोशू ने, बाद में उस साइट पर शहर के पुनर्निर्माण करने वाले किसी भी व्यक्ति पर एक श्राप सुनाया। यहोशू 6ः26 मेंः

फिर उसी समय यहोशू ने इस्राएलियों के सम्मुख शपथ रखी, और कहा, कि जो मनुष्य उठकर इस नगर यरीहो को फिर से बनाए वह यहोवा की आेर से शापित हो। जब वह उसकी नेव डालेगा तब तो उसका जेठा पुत्र मरेगा, और जब वह उसके फाटक लगावाएगा तब उसका छोटा पुत्र मर जाएगा।

यह एक बहुत ही सामान्य अभिशाप नहीं, एक विशिष्ट अभिशाप है। लेकिन अभिशाप जो रूप लेगा, वह यह है कि यरीहो का पुनर्निर्माण करने वाले व्यक्ति को अपने बेटों में से दो के प्राण देने होंगे। मुझे यकीन है कि अधिकांश इस्राएली उस अभिशाप को भूल गये, यह सिर्फ इतिहास में सिकुड़कर रह गया। लेकिन लगभग पांच सौ साल बाद इस्राएल के राजा अहाब के शासनकाल में, एक व्यक्ति ने वही काम किया जिस पर यहोशू ने श्राप सुनाया था। और यह अहाब के शासनकाल में 1 राजा 16 अध्याय में अंतिम पद में, पद 34 में, दर्ज की गई है।

उसके दिनों में बेतेलवासी हीएल ने यरीहो को फिर बसाया, जब उस ने उसकी नेव डाली तब उसका जेठा पुत्र अबीराम मर गया, और जब उस ने उसके फाटक खड़े कि, तब उसका लहुरा पुत्र सगूब मर गया, यह यहोवा के उस वचन के अनुसार हुआ, जो उस ने नून के पुत्र यहोशू के द्वारा कहलवाया था।

सीमांत अनुवाद कहता है, ‘‘अपने बेटे के जीवन की कीमत पर।’’ अधिकांश आधुनिक अनुवाद यही कहते हैं। तो, वह व्यक्ति जो उस अभिशाप के खिलाफ चला गया जिसे पांच सौ साल पहले यहोशू ने सुनाया था उसे अपने बेटों में से दो के जीवन से मूल्य चुकाना पड़ा।

मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब उन दिनों के चिकित्सकों से इन दो युवकों की मौत का कारण देने के लिए कहा गया तब उन्होंने क्या कहा होगा? क्या उन्होंने समझा कि इसका कारण पांच सौ साल पहले परमेश्वर के सेवक द्वारा कहे गये वचन के कारण हुआ है? एक बात जो इससे समझ में आती है वह यह है कि मूल रूप से श्राप तब तक जारी रहता है जब तक कि उन्हें काटने के लिए कुछ किया नहीं जाता हैं।

और तब एक और उल्लेखनीय उदाहरण 2 शमुएल 1 में पाया जाता है, जो कि गिल्बो पर्वत पर पलिश्तियों के द्वारा शाऊल और उसके पुत्र योनातान की मृत्यु के पश्चात दाऊद द्वारा कही गई भविष्यवाणी है। 2 शमुएल 1ः21 में-अब आपको दाऊद के गहन दुःख का कारण समझने की जरूरत है। यह केवल इसलिए नहीं था कि योनातान उसका प्रिय मित्र था या इसलिए भी नहीे कि शाऊल मार डाला गया था। परन्तु यह सच्चे परमेश्वर के लोगों पर मूर्तिपूजकों के विजय के कारण था। चूँकि पलिश्ती मूर्तिपूजक थे अतः जब उन्हें शाऊल और योनातान के पार्थि व देह प्राप्त हुए, तब उन्होंने उनके सिर काट डाले, और उन्हें बेतशान की शहरपनाह में जड़ दिया और अपने सभी मंदिरों में इस बात की घोषणा करवा दी। आपको समझना है कि उन दिनों जब दो देश लड़ाई करते थे, तो आमतौर पर, उनके देश ही लड़ाई नहीं करते थे बल्कि उनके देवता भी एक दूसरे से लड़ते थे। और जब एक देश विजयी होता तो वह उस देश के देवता का विजय होता। और इस प्रकार प्रभु के सेवक के रूप में जिस बात ने दाऊद को बहुत अधिक दुःखी किया वह यह था कि एक प्रकार से देवताआें ने सच्चे परमेश्वर पर विजय पा लिया था। और इस प्रकार उसने इस विलाप की घोषणा की। और मुझे निश्चय है कि वह यह सोचने के लिए नहीं रुका कि वह क्या कहने जा रहा है परन्तु परन्तु यह गिल्बो के पर्वतों के बारे में एक उल्लेखनीय विलाप है, क्योंकि गिल्बो पर्वत पर ही शाऊल और योनातान मार डाले गए थे।

‘‘हे गिलबो पहाड़ो, तुम पर न आेस पड़े, और न वर्षा हो, और न भेंट के योग्य उपजवाले खेत पाए जाएं! क्योंकि वहां शूरवीरों की ढालें अशुð हो गई। और शाऊल की ढाल बिना तेल लगाए रह गई।’’

अतः दाऊद ने कहा कि न तो आेस पड़े, और न वर्षा हो, और न भेंट के योग्य उपजवाले खेत पाए जाएँ। ये वचन तीन हजार वर्षों पूर्व कहे गए थे। और इस सदी में, यहूदियों के अपने देश लौटने के बार उन्होंने पेड़ लगाने औश्र हर क्षेत्र में फसल उगाना प्रारंभ किए। और वे अपने पहाड़ों पर पेड़ उगाने में आश्चर्यजनक रूप से सफल रहे हैं। परन्तु जब वे गिल्बो पर्वत पर आए, तो वहाँ पर पेड़ उत्पन्न करने में ऐसी समम्यायें थीं जो पूरी तरह अनपेक्षित थी। तो तीन हजार वर्षों पूर्व दाऊद द्वारा कहे गए शब्द अब भी वहाँ पर प्रभावी थे।

और फिर 2 राजा 5 में एक और उदाहरण है, हमें वहाँ निकालने की जरूरत नहीं है। लेकिन नामान असीरियाई का उपचार करने के लिए परमेश्वर द्वारा नबी एलीशा का इस्तेमाल किया गया था। उसने नामान से किसी भी उपहार को स्वीकार करने से इंकार किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि नामान सोचे कि वह अपने उपचार के लिए भुगतान कर सकता है। लेकिन नामान के सेवक गेहजी ने सोचा था कि इस प्रस्ताव को न मानना एक शर्म की बात है अतः वह एलीश के जाने बिना नामान के पीछे दौड़ा और पैसे और कपड़ों के लिए कहा। वापस आया और उसे छिपा दिया, और यह सोच कर एलीशा की उपस्थिति में आ खड़ा हुआ कि एलीशा को नहीं पता, और एलीशा ने कहा, ‘‘जब तू उस मनुष्य के पीछे दौड़ा तो क्या मेरी आत्मा तेरे साथ न था?’’ और फिर उसने उस पर यह अभिशाप सुनाया। उसने कहा, ‘‘नामान का कोढ़ (जो चंगा किया गया था), तुम पर और तुम्हारे वंश पर हमेशा के लिए पड़े।’’ और ध्यान दें कि उस पर और उसके वंश पर यह श्राप हमेशा के लिए आ पड़ा।

देखें, क्या इन सभी उदाहरणों में से क्या बाहर आता है वह एक अभिशाप का स्थायीकरण है जब तक कि कोई यह न जाने कि उसे रद्द करने के लिए क्या करना है। आप कह सकते हैं कि क्या आज परमेश्वर के सेवक इस प्रकार अभिशाप दे सकते हैं? खैर, नया नियम में, यीशु, ने एक अंजीर के पेड़, को श्राप दिया, आपको याद है। और अगले दिन, वह जड़ों से सूख गया था, सिर्फ चैबीस घंटों की अवधि में। और जब शिष्यगण चकित हुए तो उन से कहा, ‘‘जो कुछ मैं ने इस अंजीर के पेड़ से किया, तुम ऐसा और इससे बढ़कर करने में सक्षम होगे।’’ उसने कहा, ‘‘तुम पहाड़ों को हटा दोगे।’’ चलिये, कुछ पल के लिए पहाड़ों को रहने दें। उसने कहा, ‘‘जो कुछ मैं ने अंजीर के पेड़ के साथ किया वह तुम कर सकते हो।’’

अब मैं कुछ घबराहट के साथ इस से संबंधित करता हूँ, लेकिन यह एक व्यक्तिगत अनुभव है। सन् 1965 में मैं शिकागो में भीतरी शहर में एक कलीसिया में एक सेवकाई टीम का हिस्सा था। कलीसिया से लगी हुई, कोने में दीवार से लगी हुई, कुछ ऐसा था जिसे अमेरिकी सैलून कहते थे। मुझे लगता है कि अंग्रेज उसे पब कहते हैं। लेकिन वह एक बहुत ही दुष्ट जगह थी। यह महज शराब ही नहीं बेचता था, यह नशीली दवाईयाँ बेचता था और यह वेश्यावृत्ति का एक केंद्र था। यह एक बहुत ही दुष्ट जगह थी और यह ठीक कलीसिया की दीवार के साथ लगा हुआ था। खैर, कुछ समय अक्टूबर के बारे में हम चर्च में एक प्रार्थना सभा था और मैं टीम के नेतृत्व में से एक के रूप में मंच पर था। और किसी भी पूर्वचिन्तन बिना एक निश्चित बिंदु पर मैं ने इस पब के बारे में सोचा और मुझे लगा कि यह वास्तव में परमेश्वर के लिए एक अपमान है कि यह ठीक उस स्थान पर है जहाँ लोग आराधना में आ रहे हैं। तो मैं उठ खड़ा हुआ और मैंने कहा, ‘‘मैं उस पब पर परमेश्वर के अभिशाप की घोषण करता हूँ।’’ मैं ने फिर उस बारे में नहीं सोचा। लगभग दो महीने बाद सुबह 4 बजे एक फोन आया। ‘‘भाई प्रिंस, चर्च में आग लगी है, क्या आप आना और देखना चाहते हैं?’’ खैर, यह शिकागो में सर्दियों के बीच का समय था।’’ मेरा मतलब है, 20 डिग्री से नीचे का तापमान था।’’ मैं जाना और देखना नहीं करना चाहता था लेकिन मैंने सोचा कि अगर मैं चारों आेर फिरता रहूँ और चर्च जलने दूँ, और कोई रुचि नहीं दिखाऊँ तो यह खराब लगेगा!’’ मेरी पहली पत्नी और मैं, हम कार में सवार हुए, और हम वहाँ गए। बेशक, आप दो ब्लॉक दूर से आग की लपटें और धुआं देख सकते थे। तथापि, जब हम वहाँ पहुँचे, हमें पता चला कि चर्च में आग नहीं लगी थी परन्तु आग पब में लगी थी। लेकिन, आप जानते हैं, शिकागो मिशिगन झील पर स्थित है। हवा झील की परली आेर बह रही थी और चर्च की आग की लपटें आ रही थीं। जब हम वहाँ असहाय खड़े देख रहे थे, पवन 180 डिग्री मुड़ गई, और आग की लपटों को चर्च से दूर उड़ा ले गया। अगली सुबह पब नष्ट हो गया था और चर्च को धुएँ के अलावा कोई क्षति नहीं हुई थी, जिसकी क्षतिपूर्ति बीमा द्वारा कवर की गई थी। और जब मैं वहाँ खड़ा था और देख रहा था तो मैंने सोचा, ‘‘हे परमेश्वर, क्या मैं जिम्मेदार हूँ?’’ मेरा मतलब है, मैं उपहास नहीं कर रहा था। और मैंने सोचा कि वे दो महीने पूर्व उस कलीसिया में मेरे द्वारा कहे गए शब्दों के परिणाम थे। आपको पता है कि मेरी प्रतिक्रिया क्या थी कि मुझे एहसास हुआ कि मुझमें जबरदस्त सामथ्र्य दी गई है। इसलिए नहीं कि मैं अलग हूँ क्योंकि हर मसीही में यह शक्ति है। और मेरी प्रार्थना थी और है, ‘‘परमेश्वर, मेरी सहायता कर कि कभी भी उस सामथ्र्य का दुरुपयोग न करूँ।’’ लेकिन मैं सिर्फ एक उदाहरण देकर साबित करना चाहता हूँ कि जो बात हम कर रहे हैं, वे चलन से बाहर नहीं हैं, वे सभी प्रासंगिक हैं, वे आज भी लागू होते हैं।

अब मैं श्राप के अन्य स्रोतों पर जाना चाहता हूँ। अगला बहुत महत्वपूर्ण है और समकालीन मसीहियों के द्वारा बहुत कम समझा गया है। मैं इसे संबंधित अधिकार कहता हूँ। वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनके पास संबंध के कारण अधिकार है। अब अधिकार कई स्थानों पर तथा विश्व के अनेक भागों में आज भी बहुत अलोकप्रिय है लेकिन तथ्य यह है कि यह अब भी वास्तविकता है। अधिकार मनुष्य द्वारा सृजित नहीं की जाती है, वह ईश्वर से आता है। और कई भिन्न संबंध हैं जिनमें किसी व्यक्ति को अधिकार होता है। आप इसे पसंद करें या न करें, लेकिन निश्चित संदर्भों में पति को अपनी पत्नी पर, अधिकार होता है। माता-पिता को अपने बच्चों पर अधिकार हैं। अध्यापकों को अपने विद्यार्थि यों पर अधिकार है। पास्टर को अपनी कलीसिया पर अधिकार होता है, कुछ उदाहरण देखते हैं।

अब, क्योंकि इस अधिकार संबंध के कारण, उनके द्वारा अपने अधीनस्थों से कही गई बातों में विशेष दैवी शक्ति होती है। चाहे वे आशीष हों या श्राप हों। और यदि आप बाइबल में देखें, आपको दिखेगा कि कि ईश्वर की कृपा के बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण आशीष जो किसी व्यक्ति को मिल सकती है वह उसके पिता की आशीष है। यह आज भी सच है। मैं आप में से किसी से भी यह कहना चाहूंगा जिनके पिता जीवित हैं, अपने पिता की आशीष पाने के लिए यथासामथ्र्य जो कुछ आप कर सकते हैं वह कीजिए। और अपनी माँ के प्रति भी लेकिन मुख्यतः आपके पिता। इससे काफी लाभ होता है।

मैं जब बचाया गया तो मुझे भय था कि अपने माता-पिता के प्रति मेरा रवैया बहुत खराब है। मैंने सोचा, ‘‘वे बचाएए गए नहीं हैं, मैं बचाया गया हूँ; वे नहीं समझते हैं, मैं समझता हूँ।’’ मैं ईश्वर की प्रशंसा करता हूँ कि उसने मुझे इस बात के लिए डाँटा और उसने मुझे दिखाया कि यदि मैं अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर सकता हूँ तो मैं उनकी आशीष की आशा नहीं कर सकता था। और उनकी मृत्यु से पूर्व मैं ने उनका सम्मान किया जो उचित था। मैं नहीं मानता हूँ कि ऐसा न करने पर मैं कभी आपनी जिंदगी और सेवा में ईश्वर की आशीष का अनुभव किया होता।

मैं एक पति का उदाहरण लेना चाहता हूँ जिन्होंने बिना श्राप को और उसके परिणाम को जाने अपनी पत्नी को श्राप दिया। कहानी उत्पत्ति 31.में पाया जाता है। आप, आप में से कुछ याद याकूब अपने मामा लाबान के साथ रहकर उनकी सेवा कर रहा था। उसने लाबान की दोनों पुत्रियों से विवाह किया, वह एक बड़े परिवार का पिता बन गया था। और तब परमेश्वर ने उसे लाबान को मेसोपोटामिया में छोड़कर कनान देश वापस जाने का निर्देश दिया। और उसे भय था कि अगर वह वापस जाने के बारे में लाबान को बताएगा तो वह अपनी दोनों बेटियों को वापस ले लेगा। इसलिए, जब लाबान कहीं और व्यस्त था तो वह गुपचुप तरीके से दूर चला गया। लेकिन लाबान और उनके रिश्तेदारों ने और पहाडी क्षेत्र गिलाद में उसे जा पकड़ा। और फिर टकराव हुआ। लाबान ने कहा, ‘‘तुमने चोरी क्यों की और मुझे अपनी बेटियों से नमस्कार कहने नहीं दिया?’’ याकूब ने कहा, ‘‘मुझे डर था कि तुम उन्हें मुझसे छीन लोगे।’’ ‘‘ठीक है?’’ लाबान ने कहा, मैं इसे मान सकता हँू लेकिन तूने मेरे गृह देवताआें को क्यों चुराया।’’ इब्रानी में वे टेराफीम कहलाते हैं, वे छोटी मूर्तियाँ होती थी जिन्हें लोग अपने घरों में रखते थे कि उन्हें बुराई से बचाए। जो एक बहुत सामान्य प्रथा है।

अब, याकूब टेराफीम के बारे में कुछ नहीं जानता लेकिन उसकी प्रिय पत्नी राहेल ने अपने पिता के देवता की चोरी की थी। अब, यह एक बहुत ही खराब बात है क्योंकि उसे अपने पिता की वस्तु चुरानी नहीं चाहिए थी। दूसरा, हमेशा खतरनाक होता है। उत्पत्ति 31 का पद 30ः

‘‘लाबान ने याकूब से कहा, अब तू अपने पिता के घर जाने की बड़ी लालसा के कारण चला आया है; परन्तु तूने मेरे देवताओं को क्यों चुराया? तब याकूब ने लाबान को उत्तर दिया, क्योंकि मैं डर गया था; मैंने सोचा कि कहीं तू अपनी बेटियों को मुझसे बलपूर्वक न छीन ले। जिसके पास तेरे देवता मिलें, वह जीवित न रहे।’’

किंग जेम्स अनुवाद कहता हैं, ‘‘उसे जीवित नहीं रहने दो।’’ वह क्या है? यह एक अभिशाप है। उसे जीवित नहीं रहने दो। अब, याकूब नहीं जानता था कि वह राहेल के बारे में कह रहा है जो उसकी प्रिय पत्नी है। राहेल देवताआें को दिपाकर रखने में सफल रही, लाबान उन्हें कभी खोज नहीं पाया। यह स्थिति समाप्त हुई। लेकिन, कुछ ही वर्षों के भीतर अगली बार प्रसव में उसका निधन हुआ। ऐसा क्यों है? उसके पति द्वारा कहे गये अभिशाप के कारण। है ना? यह बहुत सही है। हो सकता है आप यह नहीं चाहेंगे, लेकिन ऐसा ही होता है। मैं नहीं हो सकता है, लेकिन यह चाहेगी की इस प्रकार है। मानव जीवन तथा संबंधों में परमेश्वर ने कतिपय सिद्धांतों का निर्माण किया है।

अब हम कुछ अन्य संभव उदाहरणों पर विचार करें। और इनमें से अधिकांश स्थितियों पर निर्मित है जिनपर मैं पहले ही विचार कर लिया है लेकिन थोड़ा सा परिवर्तन किया है अतः मैं लोगों की पहचान व्यक्त नहीं करता हूँ। आइए, हम एक और पति के संभव उदाहरण पर विचार करें। यह व्यक्ति एक व्यापारिक अधिकारी है, वह व्यस्त हैं, वह आर्थिक रूप से सफल हैं, वह इच्छा से पूर्ण व्यक्ति है, वह बहुत निष्ठुर है। वह एक महिला से विवाह करता है जो नहीं जानती कि कैसे खाना पकाना है। बहुत सी अन्य युवतियों के समान उसने कभी अपनी माँ से नहीं सीखा है। लंबे समय तक वह उसकी पाककला को सहता रहा लेकिन अब और नहीं सह सकता था। और वह कहते हैं, ‘‘मैं तुम्हारी रसोई से त्रस्त हूँ। तुम कभी खाना पकाना नहीं सीखोगी।’’ और शायद कई बार ऐसा कहता है। यह क्या है? यह एक अभिशाप है। ठीक है। जो बात वह महसूस नहीं करता है वह यह है कि वह खुद पर भी एक अभिशाप कह रहा है। ‘‘मैं तुम्हारी रसोई से त्रस्त हूँ। तुम कभी खाना पकाना नहीं सीखोगी।’’ तो क्या होता है? उसे अपाचन होता है। उस अपच के लिए चिकित्सकों को कोई इलाज नहीं मिला। मृत्यु तक वह उससे परेशान रहता है। विवाह टूट जाता है, वे तलाक लेते हैं।’’ पत्नी प्रतिभाशाली है, वह पाककला के अलावा सभी क्षेत्र में सफल हो सकती है, हा यह सही है। जब वह रसोई में जाती तो वह काँपने लगती, वह नर्वस हो जाती और वह कभी कुछ नहीं कर पाती। क्यों? पति का श्राप। दोनों मृत्यु तक अपना श्राप भोगते हैं। देखा?

ठीक है। आईए, एक पिता को लें। यह शायद सबसे सामान्य है। पिता के तीन पुत्र हैं। पहला पहलौठा है। निस्संदेह, उसका हमेशा स्वागत है। तीसरा, सबसे छोटा, प्रतिभाशाली है। लेकिन बीच वाला न तो पहलौठा है, न ही प्रतिभाशाली है। उसमें ऐसी बहुत ही विशेषताएँ हैं जो उसके पिता में है। क्या आपने कभी देखा है जब लोग बुरे होते हैं, और वे हमारी तरह बुरे होते हैं, तो स्वयं के बजाय उन पर थोप देते हैं। क्या आपने कभी इस पर ध्यान दिया है। माता पिताआें, यदि आप अपने बच्चों में से एक को चुनें तो शायद उसे चुनें सर्वाधिक आपकी तरह का हो। जिस चीज का आप विरोध कर रहे हैं वह वही है जो आप में है और जिसे आप पसंद नहीं कर रहे हैं।

खैर, कहते हैं, ‘‘पिता अपने दूसरे पुत्र से कहते हैं, तुम कभी सफल नहीं होगे, तुम हमेशा असफल रहोगे।’’ तुम कभी कुछ नहीं कर पाआेगे।’’ यह क्या है? यह एक अभिशाप है। और मैं बहुत से ऐसे लोगों से संबंधित रहा हूँ जो 40-50 के थे और अपने किशोरावस्था में अपने पिता के द्वारा कहे गये वचनों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।

या, आईये मान लें कि पिता की एक पुत्री है, 15 वर्ष की। पंद्रह वर्ष की किशोरियों के समान उसके मुँहासे हैं।’’ और पिता को उसे प्रतिदिन अपनी गाड़ी में स्कूल ले जाना पड़ता है और हर दिन वह वहाँ बेड़रूम में मुँहासों पर कुछ लगाती रहती है। और इसलिए पिता उत्तेजित हो जाते हैं और एक दिन वह कहते हैं, ‘‘तुम्हें मुँहासों से कभी छुटकारा नहीं मिलेगा।’’ 15 वर्षों के बाद वह अपने बच्चों के साथ एक विवाहिता महिला है और अब भी वह अपने मुँहासों के साथ साथ संघर्षरत हैं। ऐसा क्यों है? एक अभिशाप के कारण।

या एक माँ का उदाहरण लें। और यह एक वास्तविक स्थिति है जिससे में निपटता रहा हूँ, अतः पहचान नहीं बताऊँगा। उनकी बेटी हमेशा उन्हंे प्रसन्न रखती थी, वह हमेशा वैसा ही करती थी जो उसकी माँ चाहती थी। वह उन नियंत्रण रखने वाली, शोषण करनेवाली माताआें में से थी। लेकिन तब बेटी किसी मनुष्य के प्रति प्रेम में पड़ गई और विवाह कर लिया जिसका अनुमोदन उसकी माँ ने नहीं किया। और माँ ने कहा, ‘‘कभी तम्हारा भला नहीं होगा, तुम हमेशा जूझते रहोगे, कभी तुम्हारे पास पर्याप्त नहीं होगा।’’ मैं उस मनुष्य को जाना हूँ। वह एक प्रतिभाशाली और सक्षम मनुष्य है। परन्तु कम से कम एक दर्जन वर्षों के लिए यह सच था। यह तभी बदला जब मैं ने उनकी समस्याआें के स्रोत की वास्तविका से उनका सामना कराया। अब उनके सामने एक नया जीवन प्रस्तुत है।

आईए, हम शिक्षकों के बारे में बात करें। एक शिक्षक के पास एक शिष्य है जो बोल नहीं सकता। शायद उसे डिसलेक्सिया नामक बिमारी है। तुम जानते हो, तो तुमने अक्षरों को गलत ढंग से रखा है। ‘‘तुम मूर्ख हो, तुम बेवकूफ हो, तुम मेहनत नहीं करते, तुम कभी सफल नहीं होगे।’’ मैं जानता हूँ कि शिक्षकों को ऐसा नहीं बोलना चाहिए परन्तु कभी-कभी वे ऐसी बात करते हैं। इसका परिणाम क्या है? बच्चा, लड़का या लड़की जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते।

रूत और मेरे एक मित्र हैं, एक शिक्षक, ज बवह किशोरवय में थी तो उन्होंने उससे कहा था, ‘‘तुम उथले हो।’’ अब वह 60 की है या कम से कम 50 के दशक के अंत में है। हमें पता लगा कि वह अपने पूरे भर उस बात के खिलाफ संघर्ष करती रही है। ‘‘तुम उथले हो।’’ और इसके बारे में अजीब सी बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति उस वक्तव्य की हकदार नहीं थी तो वह यह महिला थी। वह उथलेपन से काफी दूर है। लेकिन आप देखें, उन वक्तव्यों के पीछे प्राधिकार है और वह उन्हें शक्तिशाली बनाता है।

आमतौर बोलें तो, एक शैतानी तत्व है। मैं आपको याकूब 3 में सिर्फ एक बात दिखाऊँगा, जो बहु महत्वपूर्ण है। याकूब 3ः14-15ः

‘‘पर यदि तुम्हारे मन में कड़वी डाह और स्वार्थी महत्वाकांक्षा है, तो घमण्ड न करो और सत्य के विरुद्ध झूठ न बोलो। यह ज्ञान वह नहीं जो ऊपर से उतरता है, बल्कि सांसारिक, प्राणिक और शैतानी है।’’

दूसरे शब्दों में, यदि आपके दृष्टिकोण गलत हैं और आपकी प्रतिक्रियाएँ गलत हैं और आप बात करते हैं, और जो बाहर आने वाला है वह शैतानी होगा। मैं इस छोटी सी तस्वीर का प्रयोग किया है। आप में से कितने लोग जानते हैं कि सीटी बजाने वाली केतली क्या है? मुझे विश्वास है कि आप में से अधिकतर जानते हैं। ठीक है। तो, यह केतली स्टोव पर है और पानी गरम होता जा रहा है। और जैसे ही भाप बाहर आता है, क्या बाहर आता है? सीटी, सही है। सीटी श्राप के समान है, ठीक है? जब भाप आता है तो सीटी बजती है। सीटी को रोकने का एक ही तरीका है। वह क्या है? उबलने से पहले केतली को उतार लें। तो तब आईए कहें, एक माता पिता या शिक्षक या पति अधिक से अधिक क्रोध कर रहे हैं, और परेशान, और अधैर्यवान हो रहे हैं, जबकि आप केतली को उतार नहीं रहे हैं, तो भाप बाहर आने वाला है और उसके साथ सीटी बजेगी। आप क्रूर कठोर, अनुचित बातें कहेंगे और उसके साथ श्राप निकलेगा। क्या ऐसा हमारी समकालीन संस्कृति में होता है?

तब हम एक और बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र में आते हैं। शायद सबसे सामान्य, जिसे मैं स्वयं आत्यारोपित श्राप कहता हूँ। लोग स्वयं को कोसते हैं। उत्पत्ति 27 में कहानी है कि किस प्रकार इसहाक एसाव को आशीर्वाद देने जा रहा था और माँ रिबेका जो पहली यिद्दिश यम्मामा है, हो सकता है आप जानते हैं यिद्दिश यम्मामा क्या है, उन्हे बदल दिया और उसने याकूब जैसे अभिनय के लिए और आर्शीवाद माँगने के लिए कहा और पद 11 में उसने यह कहाः

‘‘याकूब ने अपनी माता रिबका से कहा, देख, मेरा भाई एसाव रोएंदार मनुष्य है और मैं चिकनी त्वचा वाला हूँ। संभव है कि मेरा पिता मुझे टटोल ले और मैं उसकी दृष्टि में धोखा देनेवाला ठहरूँ; तब मैं अपने ऊपर आशीष नहीं, श्राप ले आऊँगा। उसकी माता ने उससे कहा, हे मेरे पुत्र, तेरा श्राप मुझ पर पड़े।’’

याकूब पर पड़ने वाले संभावित श्राप को उन्होंने स्वयं पर ले लिया। यह आत्यारोपित अभिशाप है।

यदि आप अध्याय के अंत तक जायें, केवल अंतिम पद, आप रिबका को स्वयं के बारे में अत्यंत नकारात्मक भाषा का उपयोग करते देखेंगे। पद 46 में रिबका ने इसहाक से कहाः

फिर रिबका ने इसहाक से कहा, हित्ती लड़कियों के कारण मैं अपने प्राण से घिन करती हूँ, सो यदि ऐसी हित्ती लड़कियों में से, जैसी इस देश की लड़कियाँ हैं, याकूब भी एक को कहीं ब्याह ले, तो मेरे जीवन में क्या लाभ होगा?

‘‘मैं जीवन से थक गया हूँ। जीने का क्या फायदा?’’ यह श्राप के अधीन एक व्यक्ति द्वारा विशिष्ट बयान है। देखा? कभी भी स्वयं को ऐसा कहने न दें। स्वयं के बारे में कभी भी नकारात्मक बात नहीं कहें। ऐसा कभी नहीं कहें, मैं कभी भी यह कर नहीं पाऊँगा। मैं कभी सफल नहीं होऊँगा। मेरा कोई उपयोग नहीं है। मैं विफल हो गया है। मैं बस यह नहीं सह सकता हूँ। और फिर आप आगे बढ़ते हैं और आप का कहते हैं, काश कि मैं मर जाता। मर जाता तो अच्छा था। क्या आप जानते हैं कि क्या आप क्या कर रहे हैं? आप को मौत की भावना को आमंत्रित कर रहे हैं। और वह कई निमंत्रण स्वीकार नहीं करता है।

रूत और मैं ने अनगिनत लोगों से निपटे हैं जिन्हें मृत्यु की भावना से छूटने की जरूरत थी। क्योंकि उन्होंने उसे आमंत्रित किया था, उन्होंने स्वयं पर एक अभिशाप आरोपित किया। और हमने एक खूबसूरत पद देखा है जिसने सैकडों लोगों की मदद की हैं। मैं आपको यह बताऊँग। भजन 118ः17ः

‘‘मैं न मरूँगा परन्तु जियूँगा, और प्रभु के कामों का प्रचार करूँगा।’’

यदि आपने स्वयं के बारे में एक निषेधात्मक बात कही हो, यदि आपने अपने ऊपर नकारात्मक बातें डाली हो, तो आप उसे सकारात्मक के द्वारा रद्द करने की जरूरत है। आप देखें, एक उल्लेखनीय उदाहरण के रूप में, आप जानते हैं कि पतरस ने तीन बार इस बात का खंडन किया कि वह प्रभु को जानते थे। बाद में पुनरुत्थान के बाद गलील की झील के किनारे यीशु ने पतरस से व्यक्तिगत बात की थी। और तीन बार उसने कहा, ‘‘क्या तुम मुझे प्रेम करते हो?’’ उसने पतरस से तीन बार स्वीकार करवाया कि वह उससे प्रेम करता था। उसने ऐसा क्यों किया? पतरस को उन नकारात्मक वक्तव्यों को रद्द करना था जो उसने क्रूसीकरण से पूर्व कहे थे। देखा? अतः यदि हमने कुछ नकारात्मक कहा है, और हम पर कुछ अंधेरा छाया आया है तो हमें नकारात्मक को रद्द करने सकारात्मक द्वारा उसे प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता है। और पद एक पूर्ण पद है। मुझे नहीं होगा। ‘‘मैं न मरूँगा।’’ इसका यह अर्थ नहीं है, कि आप कभी नहीं मरेंगे। लेकिन इसका अर्थ यह है कि आपके समय से पहले शैतान आपको मारने नहीं पायेगा। ‘‘मैं न मरूँगा परन्तु जियूँगा।, और प्रभु के कामों का प्रचार करूँगा।’’ और मॅँ समण्ण्णता हूँ कि हम सभी के लिए यह कहना अच्छा होगा। पहली बार आप मेरे पीछे इसे कहें। ‘‘मैं न मरूँगा परन्तु जियूँगा।, और प्रभु के कामों का प्रचार करूँगा।’’ अब आईए, हम सब यह कहें। ‘‘मैं न मरूँगा परन्तु जियूँगा।, और प्रभु के कामों का प्रचार करूँगा।’’ अब यह कहना आपके जीवन की नियति को बदल सकता है।

ठीक है। आईए हम एक दूसरे उदाहरण पर चलें, यहूदी इतिहास की महान त्रासदी। मŸाी 27 में यीशु पिलातुस के सामने है और पिलातुस उसे छोड़ने का विचार कर रहा है। हम मŸाी 27ः24-25 में पढ़ते हैंः

‘‘जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूँ; तुम ही जानो। सब लोगों ने उत्तर दिया, कि इस का लोहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो।’’

व्ह क्या है? एक आत्यारोपित अभिशाप है। यहूदियों इतिहास की महान त्रासदी। और उन शब्दों के द्वारा यहूदी इतिहास की त्रासदी का ताना बाना बुना गया। जो कि उन्नीस सदियों तब चलाया गया। कैसा सबक कि स्वयं के बारे में गलत बातें नहीं कहना है।

मैंने पिछले सत्र में आप को बताया कि परमेश्वर अब्राहम को श्रापों के विरुद्ध सुरक्षित रखा था। उसने कहा, ‘‘जो कोई तुझे श्राप दे उसे मैं श्राप दूँगा।’’ केवल एक ही क्षेत्र है जिसमें परमेश्वर यहूदियों का बचा नहीं पाया, उनसे स्वयं से। और हमारे जीवन में कई बार यह सच होता है। जो कुछ हम स्वयं के बारे में कहते हैं, उसे छोड़कर परमेश्वर हमें सब बातों से बचा सकता हैं। जो हम अपने बारे में कहते हैं उसके अलावा परमेश्वर हमें सब से बचा सका है।

तब हम श्राप के अगले सामान्य कारण पर चलते हैं। यह वह है जिसे में गैरधर्मशास्त्रीय वाचा कहा हूँ। निर्गमन 23ः32, उन लोगों के संबंध में जिन्हें इस्राएल को कनान में बाहर निकालना था; अर्थात् उन सब को। मूर्तिपूजक, लोग जो जीवित परमेश्वर के विरुद्ध पूरे विद्रोह में जीते थे। मूसा ने कहा, निर्गमन 23ः32ः

‘‘तू न तो उनके साथ और न उनके देवताओं के साथ कोई वाचा बाँधना।’’

आप ने समझा, यदि लोगों के झूठे ईश्वर हैं और आप उन लोगों के साथ पारस्परिकरप उनके देवाआें के साथ भी वाचा बाँधते हैं। तो अब मैं कुछ ऐसा कहने जा रहा हूँ जो मेरा विश्वास है कि किसी को बुरा नहीं लगेगा और इसलिए ऐसा कहा हूँ कि मैं बस लोगों की सहायता करना चाहता हूँ। पश्चिमी दुनिया में हमारी समकालीन संस्कृति में उसका एक बहुत ही सामान्य उदाहरण मुक्तराजगिरी है। क्योंकि जो व्यक्ति राजमिस्त्री बनता है, वह उन लोगों से एक वाचा बाँधता है जो मिस्त्री हैं। राजमिस्त्री आपको बतायेंगे कि यह भेद है। 1950 के दशक में ब्रिटेन में हन्नाह नामक एक एंग्लिकन पादरी के द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन किया गया जिसका नाम डार्क नेस विजि़बल था जो राजमिस्त्री के सभी प्रमुख अनुष्ठानों का वर्णन करती है और तीस वर्षों के दौरान किसी भी राजमिस्त्री ने कभी उसे चुनौती नहीं दी है। जब आप एक राजमिस्त्री बन जाते हैं, तो आपको भेछ बताने पर अपने ऊपर एक श्राप की घोषणा करनी होती है। और इसमें उसकी जीभ कटवा दी जाएगी, और दाएं बाजू में काट कर और आपके शरीर के बाएं कंधे पर फेंक दिया जाएगा और आपकी देह को ऐसे स्थान पर नग्न किया जाएगा जहां हर चैबीस घण्टे में दो बार ज्वार भाटा हो रहा है, जैसी बातें शामिल हैं। ये सभी स्वयं आरोपित श्राप हैं। यह एक मूर्तिपूजक धर्म है। धर्म की मूर्ति है थ्तममउंेवदतल यह 32वीं डिग्री, राॅयल आर्च डिग्री, में स्पष्ट है, जो जुबुलून नामक किसी व्यक्ति को स्वीकार करता और उसकी पूजा करता है। जो कि यहोवा, बाल और आेसिरिस का मिश्रण है। और इस प्रकार बाइबल के परमेश्वर के साथ दो देवताआें की मूर्ति को मिला दिया गया था जिसकी भत्र्सना परमेश्वर ने पूरी तरह की थी। जब आप उसके साथ वाचा बाँधते हैं, तो तो आप उन देवताआें के साथ वाचा बाँधते हैं।

काफी अनुभव आधार पर मैं यह कह रहा हूँ। मैं सारे अनुभवों को संबंधित करने में समय नहीं लगा सकता हूँ परन्तु मैं केवल एक की बात करूँगा। आस्टंेलिया में लगभग तीन या चार साल पहले एक रविवार की सुबह रूत और मैं एक कलीसिया में सेवा कर रहे थे। लगभग 18 वर्ष की एक युवती अपने छोटे बच्चे को लेकर शिशु के लिए प्रार्थ ना हेतु आगे आई। और आप कह सके थे कि शिशु छः दिन की थी, लेकिन उसने कहा कि 6 सप्ताह की है। हमने कहा कि समस्या क्या है और उसने कहा कि वह कोई भोजन नहीं लेती है। अतः हमने जब प्रार्थना की परमेश्वर की सामथ्र्य उतरी और युवती के फर्श पर गिर गई। रूत ने शिशु को उसके हाथों से ले लिया, और उसे थाम लिया। जब वह फर्श पर लेटी हुई थी तो परमेश्वर ने उन लोगों के लिए रूत को ज्ञान का एक वचन दिया जो उसकी सेवा कर रहे थे। उसने कहा कि उसके पिता एक राज मिस्त्री हैं। उस शक्िपर प्रहार करो। जिस क्षण वे उसके विरुद्ध आए वह युवती उस शक्ति के अधीन चीत्कार करने और ऐंठने लगी। और जब वे सेवा कर रहे थे वह एक लंबी चीख के साथ मुक्त हो गई। किंतु उल्लेखनीय बात यह थी रूत की बाँहों में शिशु भी उस क्षण वैसी ही चीखी। तो केवल माँ ही नहीं, बल्कि बच्ची भी मुक्त हो गई।

उस शाम वे लगभग छः घंटे बाद लौट आये और हमने माँ से पूछा कि बच्ची कैसी है। उसने कहा कि सुबह से तीन पूरा बोतल पी चुकी है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि आप यह तथ देखें कि राजमिस्त्री में पिता की भागीदारी के कारण पुत्री औ पोती पर श्राप आया था। मेरा तात्पर्य है, मेरे पास समय नहीं है, लेकिन मैं आप को आधा दर्जन अन्य विशिष्ट उदाहरण दे सकता हूँ।

इसका परिवार पर असर डालती है, यह वंशजों पर असर डालती है, यह पति या पत्नी पर असर डालती है। यह रिश्तेदारों को प्रभावित करता है। अन्य तरीके हैं जिससे इस प्रकार के श्राप आते हैं। जनजातीय समाजों में, आमतौर पर एक शिशु या एक युवा व्यक्ति को कुछ निश्चित संस्कारों द्वारा कबीले में सम्मिलित किया जाता है। बहुधा चमड़ी पर काटा जाा है या चमड़ी के नीचे पाऊडर डाला जाता है। यह उस व्यक्ति को श्राप के अधीन ले आता है, जो मूर्तिपूजा है जो उस कबीले का केंद्रबिंदु है। फिर से, मैं कर सकता हूँ, लेकिन उदाहरण देने के लिए मेरे पास समय नहीं है।

और फिर शैतान के सेवकों के द्वारा कहे गए श्राप भी हैं। और ऐसे सेवकों के लिए विभिन्न भाषाआें में विभिन्न शब्द भी हैं। मुझे लगता है कि अंग्रेजी हम उन्हें विच डाॅक्टर (डायन) कहते हैं। डायनश् कह डाक्टर हैं। अमेरिका में वे उन्हें चिकित्सा पुरुष कहते हैं। स्वाहिली में यह उम्चावा कहा जाता है। लुआे लोगों की भाषा में जुआेकी कहा जाता है। अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूँ तो मौरीसों के बीच यह तोमांगा कहा जाता है। अनेक भिन्न भिन्न लेबल और शैली में यह समान बात है। मैं आपको स्पष्ट बताना चाहता हूँ कि ऐसे लोगों के पास वास्त्विक अलौकिक सामथ्र्य होती है। उन्हें कम न आँके। यदि आप किसी जनजातीय में मिशनरी बनने जा रहे हैं, तो वहाँ जाकर यह न कहें कि शैतान वास्तविक नहीं है, दुष्ट आत्मायें वास्तविक नहीं हैं क्योंकि आपसे अधिक वे जानते हैं कि वे वास्तविक हैं। आपका संदेश है कि शैतान वास्तविक है लेकिन मसीह अधिक सामर्थी है। विशेष रूप से यदि आप प्रदर्शित कर सकते हैं, तो वे सुनेंगे।

मैं समझता हूँ कि मुझे अवश्य ही एक उदाहरण देना चाहिए। फिर से, यह से जाम्बिया से हैं। यह उस व्यक्ति के द्वारा हमें लिखित में दिया गया जो इस बात का गवाह था। एक अफ्रीकी मसीही कलीसिया में दो प्राचीन एक दूसरे से जूझ पड़े। यह आपको विचित्र प्रतीत हो सकता है लेकिन यह अफ्रीका में एकदम सामान्य बात है। एक प्राचीन, झाड़ फूंक करने वाले के पास गया कि दूसरे पर श्राप बोले। ठीक है? और जब उसने ऐसा किया तो झाड़ फँूक करने वाला बहुत खुश था क्योंकि वह एक मसीही था। और वह एक मसीही था। और उसने यह किया। वह बाहर झाड़ी में गया, एक खास प्रकार की मिट्टी लेकर आया, उसे वापस लाया, एक हाथ-दर्पण पर उसे छिड़का, और फिर उसने प्राचीन से कहा, ‘‘अब मिट्टी साफ करो और मुझे बताआें कि आप क्या देख रहे हैं?’’ और उसने दर्पण में देखा और उसे आईने में उस व्यक्ति का चेहरा दिखा जिसे वह श्राप देना चाहता था।’’ अब झाड़फँूक करने वाले ने कहा, ‘‘एक चाकू लो और उसे दर्पण में काटो।’’ उसने वैसा किया जब उसने ऐसा किया तब आईने में रक्त दिखाई दिया। और जब प्राचीन लौटे तब उन्होंने देखा कि उसरे प्राचीन मर चुके थे। आप इसे क्या कहेंगे? आप इसे हत्या नहीं कह सकते हंै। क्या आप जानते हैं कि क्यों बाइबल जादूकर्म के लिए मना करती है? इस कहानी को पूरे विवरण के साथ एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा दिया गया है जो एक मिशनरी है, वह लगभग 70 वर्ष की आयु के हैं, से ही मिशनरी रहे हैं। मेरा कहना यह है कि उसे कम मत आँकें। इसका मतलब यह नहीं कि आप को डरना है। यीशु ने कहा, ‘‘देखो मैं तुम्हें शत्रु पर सारा अधिकार देता हूँ।’’ उसने नहीं कहा कि शत्रु के पास सामथ्र्य नहीं है। वह कहता है, उस सामथ्र्य पर मैं तुहें अधिकार देता हूँ।’’ यह वास्तविकता का समझना है।

आईए, बाईबल में एक उदाहरण देखें, गिनती 22ः4-6। यह बालाम की कहानी है। मोआब के राज ने बालाम को लाने के लिए भेजा जो कि एक जादू टोना करने वाला था। एक शक्तिशाली और एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति। और 5 पद राजा ने बालाम से कहाः

‘‘मिस्र से एक जाति निकल आई है; देख, वह पृथ्वी के मुख को ढाँपे हुए है और मेरे सामने आ बसी है। इसलिए अब आकर मेरे लिये इस जाति को श्राप दे, क्योंकि वह मुझसे अधिक सामर्थी है। संभव है कि मैं उसे पराजित करके देश से निकाल दूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि जिसे तू आशीष देता है वह आशीष पाता है, और जिसे तू श्राप देता है वह श्रापित होता है।’’

अब यह, एक तरह से नियमित युद्ध अभ्यास था - आज भी आदिवासी समाजों में ऐसा होता है। इतना ही नहीं, कि आप दूसरे कबीले से लड़ रहे हैं बल्कि आपके कबीले का देवता उनके कबीले के देवता से भी लड़ रहा होता है। अगर आप अग्रिम प्राप्त कर सकते हैं तो इस युद्ध को जीत सकते हैं। मध्य पूर्व में कहीं कोई दस्तावेज है जिसमें बताया गया है 77 देशों पर मिस्र के राजा ने श्राप की घोषण की थी। क्योंकि यदि आप अपने दुश्मन पर श्राप कहलवा सकते हैं तो आप अपने दुश्मन को परास्त कर सकते हैं। यही सिद्धांत है।

सिर्फ एक रोचक उदाहरण क्योंकि यह कुछ ऐसा है जो बहुत से पश्चित देशवासियों के लिए अपरिचित है। दाऊद और गोलियत के बीच संघर्ष में, जब दाऊद गोफन लेकर जाता है और उसके पास कोई हथियार नहीं है तो वह क्रोधित हो जाता है। 1 शमुएल 17ः43ः

तब पलिश्ती ने दाऊद से कहा, क्या मैं कुत्ता हूँ कि तू लाठी लेकर मेरे पास आता है? तब पलिश्ती अपने देवताआें के नाम लेकर दाऊद को कोसने लगा।

क्या आपने समझा? युद्ध में उनके शामिल होने से पहले उसने अपने देवताआें को आह्वान किया और दाऊद ने उत्तर दिया, ‘‘मैं अपने नाम से तुम्हारे पास नहीं आता हूँ परन्तु सेनाआें के यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर के नाम से।’’ देखिये, यह देवताआें के बीच की लड़ाई है। और आप जानते हैं कि कौन जीता? परन्तु मैं तो आपको इतना मात्र बताना चाहता हूँ कि शैतान के सेवकों को श्राप देने की सामथ्र्य होती है। पुनः मैं ऐसे लोगों के उदाहरण देकर इसका वर्णन कर सकता हूँ जिनकी हमने व्यक्तिगत रीति से सहायता की है।

एक अंतिम तरीके का वर्णन व्यवस्थाविवरण 7ः26 में किया गया है जिससे श्राप आ सकता है। पिछला पद कनान के रहनेवालों के बारे में कहता हैः

उनके देवताआें की खुदी हुई मूत्र्तियां तुम आग में जला देना; जो चांदी वा सोना उन पर मढ़ा हो उसका लालच करके न ले लेना, नहीं तो तू उसके कारण फन्दे में फंसेगा; क्योंकि ऐसी वस्तुएं तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में घृणित हैं। और कोई घृणित वस्तु अपने घर में न ले आना, नहीं तो तू भी उसके समान नष्ट हो जाने की वस्तु ठहरेगा; उसे सत्यानाश की वस्तु जानकर उस से घृणा करना और उसे कदापि न चाहना; क्योंकि वह अशुद्ध वस्तु है।

तो जब आप अपने घर में कुछ भी ऐसा लाते हैं जो कि मूर्ति पूजा या मनोगत से संबधित है, तो आप अपने घर में एक अभिशाप आने के लिए रास्ता खोल रहे हैं। फिर, से यह कुछ ऐसा है जिससे हम अक्सर सामना करते हैं। मैं इस तरह की एक सेवा के बाद लोगों को बताता हूँ कि अगर आपको लगता है कि आप को एक अभिशाप से मुक्ति की जरूरत है, तो बेहतर है कि आप घर जायें और जाँच करें कि आप ने अपने घर में क्या रखा है। देखिए कि क्या कुछ ऐसा है जो प्रभु यीशु को छोड़कर किसी भी अन्य परमेश्वर का प्रदर्शन करता है। मेरा व्यक्तिगत सिद्धांत है कि मुझे अपने घर में कुछ भी ऐसा नहीं चाहिए जो यीशु मसीह का अपमान करता है। मुझे एक त्वरित उदाहरण देने दें। हम अकसर ऐसे मामले देखते हैं जिसमें माता पिता हमसे कहते हैं कि बच्चे रात को अच्छी तरह नहीं सोते हैं, वे बेचैन रहते हैं, वे रोते हैं, वे डरे हुए हैं। इसका एक सामान्य कारण यह है कि उस घर में कहीं न कहीं कुछ ऐसा है जो शैतान को प्रवेश करने का अधिकार दे रहा है। आप का अपने घर में ऊपर से नीचे तक जाने की, और तंत्र-मंत्र से संबंधित किसी भी बात दूर करने की जरूरत है। किसी भी तरह की अंधविश्वासी बात। यदि आप बुरी किस्मत के लिए घोड़े की नाल आजमाते हैं, तो यह अंधविश्वास है। यह बुरी किस्मत को दूर नहीं करता है, यह शैतान के लिए द्वार खोलता है।

अब हम वास्तव में महत्वपूर्ण चरमभाग पर आ गए हैं, जो कि यह है कि कैसे एक अभिशाप से मुक्ति मिल सकता है। मैं आपको कुछ सरल निर्देश देना चाहता हूँ। एक बुनियादी स्वरूप है जो मैं लोगों सिखाता हूँ जिसमें चार शब्द है, जिनमें से प्रत्येक आर. ई. के साथ शुरू होता है, पहचानना, पश्चाताप करना, त्यागना, विरोध करना। पहचानिए। पहचानिए कि आपकी समस्या क्या है। देखें कि मैं ने इन बातों पर यह समय क्यों खर्च किया है, कारण है कि आपकी समस्या को पहचानने में आपकी मदद करने के लिए। ठीक है। दूसरा, पश्चाताप करना। किसी भी बात से पश्चाताप जो आपने किया है जो कि आप पर अभिशाप लाता है। तीसरा, त्याग करना। घोषणा करें कि आप अब इस बात के अधीन होने नहीं जा रहे हैं। परमेश्वर ने इस्राएल से कहा, उनके देवताआें के साम्हने न झुकें। उनके अधीन न हों। और मसीहियों के रूप में हमें ऐसा करने का अधिकार है। ‘‘मैं किसी भी ऐसी बात के अधीन नहीं होता हूँ, दूसरे श्रोत से है। मैं इसे इंकार करता हूँ। अब से मुझमें इसका कोई स्थान नहीं है।’’ और अंत में, विरोध करना। और यह कुछ ऐसा है जो निरंतर है। विरोध करते रहें। मना करते रहें कि वह बात फिर आप पर कोई नियंत्रण रखे। मुझे उन शब्दों फिर से कहने दें। पहचानना, पश्चाताप करना, त्यागना, विरोध करना। याकूब 4ः7 कहता हैः

इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाआे (शत्रु के अधीन नहीे, दुष्टात्माआें के अधीन नहीं लेकिन परमेश्वर के) और शैतान का साम्हना करो, (और क्या होगा?) तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।

वह क्या करेगा? मुझे आपकी बात सुनाई नहीं दी। (कलीसिया कहती है, मागना।) यह ठीक है। आपने कब शर्तों को पूरा किया, ठीक? परन्तु प्रतिरोध करना कुछ ऐसा है जो चलते रहने वाली प्रक्रिया है। यह ऐसा है मानो, जोर से हवा बह रही हो तो आपको द्वार बंद रखना है। यदि आप द्वार खोलेंगे तो हवा भीतर आएगी।

तब मैं कहता हूँ कि अपनी मुक्ति के लिए एक स्पष्ट धर्मशास्त्र सम्मत आधार स्थापित करें। श्रेष्ठतम गलातियों 3ः13-14 में हैंः

‘‘मसीह ने हमारे लिये श्राप बनकर हमें श्राप से छुड़ा लिया, ताकि हम इब्राहीम की आशीष प्राप्त करें।’’

मैं आपको कुछ अन्य पद भी बताऊँगा। इफिसियों 1ः17ः

‘‘उसी में [यीशु में] हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा मिला है।’’

कुलुस्सियों 1ः12-14ः

‘‘पिता ने हमें ज्योति में पवित्र लोगों की विरासत में सहभागी होने के योग्य बनाया है। उसने हमें अंधकार के अधिकार से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में पहुँचा दिया है; उसी में हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा मिला है।’’

तो क्रूस पर यीशु के कार्य के द्वारा हम अंधकार के अधिकार से - शैतान के अधिकार से - छुड़ाए जाते हैं और यीशु मसीह के परमेश्वर के राज्य में स्थानांतरित किए जाते हैं। यह ऐसा है मानो दो क्षेत्र हों, और उनके बीच में एक खाई है। यह क्षेत्र शैतान का क्षेत्र है, यह क्षेत्र परमेश्वनर का क्षेत्र है। परन्तु उस खाई के बीच में एक ही पुल है और वह यीशु का क्रूस है। यह आप उस पुल पर चलें तो इस राज्य से बाहर निकलकर उस राज्य में जा सकते हैं। यहीं पर परमेश्वर आपको चाहता है।

फिर 1 यूहन्ना 3ः 8, दूसरा हिस्सा:

परमेश्वर का पुत्र इसलिये प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे।

क्या करने के लिए? शैतान के कामों को नष्ट करने के लिए। यही कारण है कि वह आया है।

और फिर लूका 10ः19, मैंने पहले उद्धृत किया है। यीशु ने कहाः

‘‘देखो, मैने तुम्हे सांपों और बिच्छुआें को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ पर अधिकार दिया है।’’

तो वे धर्मशास्त्र के बहुत स्पष्ट आधार हैं।

तो जब आप ने उस आधार की स्थापना की है, मसीह में अपने विश्वास की स्वीकार कीजिए क्योंकि यीशु हमारी स्वीकारोक्ति का महायाजक है। यह आपके अंगीकार के आधार पर है, कि आप उसके बारे में क्या कहते हैं जिससे वह आपके महायाजक के रूप में कार्य करता है।

तीसरा, आज्ञाकारिता के लिए खुद को प्रतिबद्ध करें। आपको याद है, हम आशीर्वाद के लिए कैसे योग्य बनते हंै? हमें क्या करना है? आवाज सुनें, वह क्या कहता हैं, उसे करें। हो जाती है, इसलिए, जब आप अपनी रिहाई प्राप्त किया है, अपने मन को बनाएँ और स्वयं को प्रतिबद्ध करें कि जो कुछ परमेश्वर कह रहा है उसे सुनना और करना है।

अगला कदम किसी भी ज्ञात पापों को स्वीकार करना है। या तो स्वयं आप के द्वारा या आपके पूर्वजों द्वारा क्योंकि कुछ मायनों में आपके पूर्वजों के पाप आप को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन वहाँ एक अंतर है। आप अपने पूर्वजों के पापों के लिए दोषी नहीं हैं, लेकिन आप उनके द्वारा प्रभावित हैं। क्या आप समझे? आप अपने खुद के पापों के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन पूरी तरह से स्पष्ट होने के लिए, अगर आपको पता है कि आपके पूर्वज मूर्ति उपासक थे, क्रिश्चियन साईंटिस्ट थे या मारमोन्स थे या पूरक में बहुत दूर तक न जायें, परन्तु कुछ ऐसा जो पूरी तरह धर्मशास्त्र विरुद्ध है; उससे मुक्त हों।

तो फिर आप अन्य सभी व्यक्तियों को माफ करने की जरूरत है। यीशु ने कहा, जब आप प्रार्थना में खड़े हैं, तो यदि आप के मन में किसी के खिलाफ कुछ भी है, तो उसने क्या करने के लिए कहा था? क्षमा करे, यह सही है। किसी के भी खिलाफ कुछ भी। यही कुछ भी और किसी को भी अलग नहीं रखता है। क्षमा न करना आपके दिल में, आपकी प्रार्थनाआें का जवाब पाने के लिए एक बाधा है। अब, क्षमा करना एक भावना नहीं है, यह एक निर्णय है। मैं लोगों को कहता हूँ कि यह आई आे यू को फाड़ना है। मैं नहीं जानता कि यह बताने के लिए मेरे पास समय है कि नहीं लेकिन मैं एक औरत के बारे में सोच रहा हूँ। मैं इस पर उपदेश दे रहा था, मैं वर्ण न कर रहा था कैसी बहुत पत्नियाँ हैं जो अपने पति से दुव्र्यवहार सहती रही हैं अब भी सह रही हैं क्योंकि उन्होंने अब भी।किया गया है क्योंकि वे कभी माफ नहीं किया था। और मैंने कहा कि यह इसी तरह है। आपके हाथ में अपने पति से मिला आई आे यू का एक पुलिंदा है। मैं तुमसे प्यार, समर्थ न, आदर, देखभाल इत्यादि का हकदार हूँ। वे पूरी तरह से वैध हैं, वे कानूनी रहे हैं। लेकिन स्वर्ग में परमेश्वर के हाथ में आप से उसे दिया गया ज्यादा बड़ा पुलिंदा है। अब, परमेश्वर कहता है, हम एक वाचा बाँधें। तुम अपनी वाचा फाड़ दो, मैं अपनी वाचा फाड़ देता हूँ। परन्तु यदि तुम अपनी वाचा का पकड़े रहोगे, तो मैं अपनी वाचा पकड़े रहूँगा। तो यहद आप क्षमा किया जाना चाहते हैं तो आपको क्षमा करना है। आप के पास कोई भी विकल्प नहीं है। खैर, एक संदेश के अंत में, मैं ने कुछ भी नहीं किया था, सिर्फ उपदेश समाप्त किया था। तीस के आसपास की एक जवान औरत, वास्तव में परिष्कृत, स्मार्ट दिखने वाली स्त्री, गलियारे से पुलपिट तक जाने लगी। मैं सोच रहा था कि वह क्या करने जा रही थी, क्या वह मुझ पर आक्रमण करने या कुछ और करने जा रही थी। उसने ठीक मेरे चेहरे पर देखा और कहा, ‘‘ श्री प्रिंस, मैं बस आपको बताना चाहती हूँ कि जब आप उपदेश दे रहे थे, तो मैं ने 30,000 डालर के आई आे यू से छुटकारा पाया।’’ वह घूमी और बाहर चली गई। मेरा मतलब है, मुझे उससे कुछ कहना नहीं पड़ा, उसने संदेश का पा लिया था।’’ मैं चाहता हूँ कि सबको यह जल्दी मिल जाए! तो आपको अन्य लोगों को माफ करना है।

तब आपको अपने या अपने पूर्वजों के द्वारा तंत्र-मंत्र के साथ हुए हर प्रकार के संपर्क का त्याग करना चाहिए। ठीक है? अपने आप या अपने पूर्वजों द्वारा। फिर से, आप जिम्मेदार नहीं हैं, आपके पूर्वजों ने जो कुछ किया उसके लिए आप दोषी नहीं हैं, लेकिन यह आप को प्रभावित करता है।

तो फिर आप को सब ‘‘संपर्क वस्तुआें’’ से छुटकारा चाहिए, जिनके बारे में मैं बात करता आ रहा हूँ। यदि आप उन्हें अपने घर में लाते हैं तो आप उनके साथ अभिशाप भी लाते हैं।

तब जब आपने दन सभी शर्तों को पूरा कर लिया है तो आपको यीशु के नाम में स्वयं को मुक्त करना चाहिए। तो जब आप उन शर्तों को पूरा कर लिया है आप यीशु के नाम में अपने आप को मुक्त कर सकते हैं। यीशु ने कहा जो कुछ भी आप पृथ्वी पर बाँधेंगे वह स्वर्ग में बाँधा जाएगा और जो कुझ आप पृथ्वी पर खोलोगे वह पथ्वी पर खुलेगा। हम एक पल में, यह करने जा रहे हैं, लेकिन मैं आप को दिखाना चाहता हूँ कि मुक्त होने के बाद आपको यहाँ से कहाँ जाना है।

तब आपको कबूल करना है और इब्राहीम की आशीष की उम्मीद करनी है क्योंकि हम अभिशाप से मुक्त है कि हम इब्राहीम की आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। तो रूत और मैं आप के लिए एक पैटर्न के रूप में हमारे आम बयानों में से एक कहने जा रहे हैं।

क्रूस पर यीशु के बलिदान के माध्यम से हम अभिशाप की अधीनता से बाहर आ गए हैं और इब्राहीम की आशीष के अधीन आ गए हैं जिसे परमेश्वर ने सब बातों में धन्य किया है।

कितनी बातें? सब। क्या आप वे आशीर्वाद चाहते हैं? परमेश्वर ने आप के लिए यह प्रदान किया है। हम शायद फिर ऐसा करेंगे। धन्यवाद जानेमन। याद रखें कि यह पवित्र आत्मा की आशीष है। दूसरे शब्दों में, यह पवित्र आत्मा है जो आशीष लाता है। वह महत्वपूर्ण है। आपको पवित्रात्मा के साथ मित्र बनना है। देखो, अगर आप पवित्र आत्मा को शोकित करते हैं, अगर आप पवित्र आत्मा का सम्मान नहीं करते हैं, वह आशीष को रोक लेता है। उसके पास परमेश्वर के गोदाम की चाभी है। अगर आप खजाना चाहते हैं, तो गोदाम के रखवाले को दोस्त बनाते हैं।

और फिर, जैसा कि मैंने पहले ही कहा है, मन में धारण कर लें, कि यह सब बातों में है। आप यह सब एक रात में नहीं पाते हैं, लेकिन आप एक रात में इसके लिए योग्य बन गए है, आप समझते हैं? मैं इसे इस तरह रख सकता हूँ, आप में से कुछ गलत दिशा में जा रहे हैं। आज रात आप यू-टर्न ले सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप पहुँच गए हैं। आप रास्ते पर हैं। आपको उस दिशा में बने रहना है, अगर आप इब्राहीम के आशीष मेंं जारी रहना चाहते हैं तो आपको वह सब सुनते और करते रहना है जो कुछ परमेश्वर कह रहा है। और आपको सही स्वीकारोक्ति करते रहना है।

मुझे लगता है कि मैं अभी आपसे यह नहीं कहलवाता हूँ, मैं इंतजार करूँगा। यदि आप में से कुछ आज शाम यहाँ हैं जिन्हें लगता है कि आपके जीवन पर एक अभिशाप की छाया है किसी प्रकार मुक्त होना चाहते हैं, तो मैं रिहाई की प्रार्थना में आप का नेतृत्व करना चाहता हूँ। आप को मरियम की कहानी याद है जो मैं ने आप को बताया जिसने प्रार्थना पढी और पूरी तरह से चंगी हो गई? मैं आप उपचार का वादा नहीं कर रहा हूँ, वह परमेश्वर के हाथ में है। लेकिन यदि आपकी बीमारी एक अभिशाप के कारण है, अगर आप अभिशाप से मुक्त हो गए हैं, तो आप अपनी बीमारी से उपचार पाने के लिए योग्य हो गए हैं। अतः, अगर आप में से जो चाहते हैं कि मैं आपकी अगुवाई करूँ, हमारे पास बस कुछ ही क्षण बाकी है। मैं चाहता हूँ कि आप अपने पैरों को खड़े हो जायें और तब मैं एक प्रार्थना में आप का नेतृत्व करने जा रहा हूँ। यदि आपको लगता है कि आपके जीवन, आपके परिवार, आपके घर पर अभिशाप की कोई छाया है। मुझे आपसे कहना है कि आप इसे कहे बिना नहीं रह सकते हैं। मेरा मतलब है, आप के पास किसी भी तरह ज्यादा है, तो क्या यह सच है? शायद। ठीक है।

मुझे बहुत ही शीघ्रता से, आपको उन चरणों को बताने दीजिए जिनमें से मैं आपको ले जाने वाला हूँ। सबसे पहले, हमने एक बहुत ही स्पष्ट धर्मशास्त्र सम्मत आधार तैयार किया है। अब, आपको मसीह में अपने विश्वास का अंगीकार करने, आज्ञाकारिता में स्वयं को समर्पित करने, अपने या पूर्वजों की किसी ज्ञात पाप का अंगीकार करने की जरूरत है। जब आप ऐसा करते हैं तब शांत भाव से उनका अंगीकार करने के लिए मैं आपको कुछ क्षण दूँगा। तब अन्य सभी व्यक्तियों को क्षमा कर दें और थोड़ी क्षमा के लिए मैं आपको कुछ क्षण दूँगा। और तब अपने या पूर्वजों के द्वारा तंत्रमंत्रों के साथ हर प्रकार के संबंध को त्याग दें। सारे संपर्कों से दूर होने के लिए अपने आपको समर्पित करें और तब यीशु के नाम में स्वयं को मुक्त करें। ठीक?

अब, मैं तो बस आपको शब्द देने जा रहा हूँ, आप मुझसे प्रार्थ ना नहीं कर रहे हैं, आप प्रभु यीशु मसीह से प्रार्थना कर रहे हैं। और वही है जो उत्तर देता है, मैं नहीं। मुझमें सामथ्र्य नहीं है, उसके पास है। ठीक। मेरे पीछे इन शब्दों को कहिए।

प्रभु यीशु मसीह, मुझे विश्वास है कि आप परमेश्वर के पुत्र हैं और परमेश्वर तक के लिए एक ही रास्ता है, कि आपने मेरे पापों के लिए क्रूस पर मृत्यु सही, पुनः मृतकों में से जी भी उठे। कि क्रूस पर मेरे हर अभिशाप के लिए आप अभिशाप बनाए गए जो कि मुझ पर था ताकि मेरे द्वारा या मेरे पूर्वजों द्वारा किए गये किसी भी पाप को मान लेता हूँ। मैं आपसे माफी माँगता हूँ। मैं हर उस व्यक्ति को भी क्षमा करता हूँ जिसने मुझे नुकसान पहुँचाया है या मेरे साथ गलत किया है। जैसा परमेश्वर ने मुझे माफ किया है वैसा ही में भी उन्हें माफ करता हूँ। मैं अपने आप को भी माफ करता हूँ। मैं तंत्र मंत्र के साथ किसी संपर्क का त्याग करता हूँ। और अब प्रभु, विश्वास से आपकी क्षमा को प्राप्त करने के बाद, परमेश्वर की संतान के रूप में मेरे पास जो अधिकार है, मैं अब स्वयं को और मेरे अधीन जितने लोग हैं, सबको अपने जीवनों पर श्राप से मुक्त करता हूँ। अभी, यीशु के नाम में, मैं रिर्हाइ की घोषणा करता हूँ। मैं विश्वास से और इस बात का दावा करता हूँ, और इसे प्राप्त करता हूँ। यीशु के नाम में।

अब उसे धन्यवाद देना शुरू करें, यह विश्वास की पक्की अभिव्यक्ति है। धन्यवाद प्रभु, धन्यवाद प्रभु, प्रभु यीशु आपका धन्यवाद। आपका धन्यवाद आपका धन्यवाद आपका धन्यवाद।

अब आईए अपनी अच्छी स्वीकारोक्ति करें। रूत, आईए और पुनः मेरी सहायता कीजिए। अब मैं मानता हँ कि यह कहने के लिए आप पूरी तरह से हकदार हैं। आप जानते हैं कि हम क्या कहने जा रहे हैं? आप तैयार हैं?

क्रूस पर यीशु के बलिदान के माध्यम से हम अभिशाप की अधीनता से बाहर आ गए हैं और इब्राहीम की आशीष के अधीन आ गए हैं जिसे परमेश्वर ने सब बातों में धन्य किया है।

अब यह एक बहुत अच्छा सिद्धांत है जिसे हमने आराधना में कर लिया है कि किसी की आेर मुड़े और खुद के बारे में उनसे यह कहें। ठीक है? तो किसी को खोजें। अगर आप में से सिर्फ दो हैं, तो एक दूसरे का सामना करें। अगर आप में से तीन हैं, तो एक दूसरे का सामना करें और आप एकवचन में यह कहने जा रहे हैं। हम आपको शब्द दे देंगे। क्या आप तैयार हैं? ठीक है। किसी को देखने के लिए चुनें। आप तैयार हैं?

क्रूस पर यीशु के बलिदान के माध्यम से हम अभिशाप की अधीनता से बाहर आ गए हैं और इब्राहीम की आशीष के अधीन आ गए हैं जिसे परमेश्वर ने सब बातों में धन्य किया है।

अब बस परमेश्वर को शुक्रिया अदा करने के लिए थोड़ा समय लें, यह विश्वास की सरलतम अभिव्यक्ति है। धन्यवाद प्रभु यीशु। धन्यवाद प्रभु। याद रखें, आपने यू-टर्न लिया है, अब सही दिशा में चलते रहें। परमेश्वर आपको आशीष दे।

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