पिछले भाग में मैंने विभिन्न प्रभावों के बारे में बात किया जिसे हम लोगों में उत्पन्न करने के लिये परमेश्वर के वचन की रचना की गई है जो उसमें विश्वास करते हैं। मैं संक्षिप्त रूप में दो पर लौटना चाहता हूँ क्योंकि वे संबन्धित हैं और एक दूसरे का वर्णन करने के लिये मैं उनका उपयोग करना चाहता हूँ। सबसे पहले, मैंने कहा कि विश्वास परमेश्वर के वचन को सुनने से आता है। यह एक अद्भुत सत्य है। हम कभी भी इस पर अधिक जो नहीं दे सकते हैं। यदि आपमें विश्वास नहीं है तो आपको बिना विश्वास के रहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि विश्वास आता है। यह परमेश्वर के वचन को सुनने से आता है।

और तब पिछले भाग के अन्त में मैंने वर्णन किया कि कैसे परमेश्वर के वचन की रचना का अभिप्राय हमारे सारे शारीरिक देह के लिये स्वास्थ्य या औषधि देना है। मैं चाहता हूँ कि हम नीतिवचन 4 अध्याय के उस भाग पर जाएँ जिसे हमने देखा। क्योंकि यह इस बात का एक संपूर्ण वर्णन है कि सुनना क्या होता है। तो यदि आप सोच रहे हैं कि परमेश्वर के वचन को सुनने का अर्थ क्या है, तो मैं आपके लिये इसका वर्णन कर सकता हूँ और नीतिवचन 4 से इसे अपने व्यक्तिगत अनुभव का आधार दे सकता हूँ। जब मैं अस्पताल में था और इन पदों को पाया और मैंने देखा कि उन पदों ने मुझे स्वास्थ्य या औषधि दिया था, मैंने स्वयं से कहा मैं यह करने जा रहा हूँ। चिकित्सकों ने जो कुछ किया उसके लिये मैं धन्यवादी हूँ परन्तु वे स्वास्थ्य प्रदान करने योग्य नहीं रहे हैं। अतः मैं औषधि के रूप में परमेश्वर के वचन को लेने जा रहा हूँ। जब मैंने यह कहा तो मुझे ऐसा लगा कि परमेश्वर ने मुझसे मौन भाव से परन्तु स्पष्टतः बात की। और उसने कहा कि जब चिकित्सक किसी व्यक्ति को दवाई देता है तो उन्हें लेने के विषय में निर्देश बोतल पर लिखा होता है। तब उसने कहा कि यह मेरी दवाई का बोतल है और निर्देश उस पर लिखे हुए हैं, उन्हें पढ़ लेना अच्छा होगा। मैं वापस मुड़ा और देखा कि औषधि के रूप में परमेश्वर के वचन को लेने के लिये चार निर्देश हैं। आप देखें, स्वाभाविक रूप से यदि चिकित्सक आपको दवाई देता है परन्तु यदि आप निर्देश के अनुसार उसे न लें तो चिकित्सक आपसे कहेगा कि अब आप इससे किसी प्रकार की अच्र्छाइ की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। तो यदि आपके सामने यह भाग है या यदि आप सुनें तो दर्वाइ के रूप में परमेश्वर का वचन लेने के लिये मैं आपको चार दिशा निर्देश दूँगा। और संभवतः यहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे अपने जीवन में कभी न कभी इन निर्देशों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हममें से बहुत कम लोग बिना किसी बीमारी का सामना किए पूरा जीवन जी पाते हैं। तो, इसे संचित करें और आनेवाली परिस्थितियों के लिये इसे तैयार रखें। यहाँ चार निर्देश दिये गए हैं।

पहला, मेरे शब्दों पर ध्यान दो।

दूसरा, मेरी बातों पर कान लगाओ।

तीसरा, वे तेरी आँखों की ओट होने न पाए।

और चैथा, उन्हें अपने हृदय के बीच रखना।

आइ ए संक्षिप्त रूप में विचार करें कि उन चारों निर्देशों में क्या बातें सम्मिलित हैं। सबसे पहले, ध्यान दो। जब आप बाइबल खोलते हैं और परमेश्वर का वचन आपके सामने होता है तब आपको उस पर अविभाजित ध्यान देने की जरूरत है। ध्यान को भटकने न दें। अपने आपको अन्य सभी आवाजों, प्रभावों, विचारों से विमुख रखने का प्रयास करें। परमेश्वर के वचन पर पूर्ण ध्यान दें। आखिर यह परमेश्वर द्वारा आपसे बात करना है। उसे जो कुछ कहना है उस पर कान लगाना अच्छी बात होगी।

दूसरा निर्देश अपने कानों को नीचे लाना या नीचे झुकाना है। और यह दीनता का भाव है। एक तथ्य के रूप में, मेरा मन अफ्रीका पर है क्योंकि मैं इसे कहता रहा हूँ। परन्तु एक अफ्रीकी प्राथमिक या माध्यमिक विद्यालय में यदि एक बच्चा शिक्षक के पास अपने अभ्यास पुस्तिका लेकर आता है तो वह अपनी अभ्यास पुस्तिका लेकर सिर झुकाकर शिक्षक के सामने खड़ा होगा, अपनी कानों को नीचे लाएगा। दूसरे शब्दों में, वह कह रहा है कि आप शिक्षक हैं, मैं बच्चा हूँ। समझ में आया? तो कानों को लगाने का अर्थ यह है कि मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सिखाएँ। मैं सिखाए जाने का इच्छुक हूँ, मुझे सीखने की जरूरत है।

देखें, मुझमें यह समस्या थी क्योंकि मसीहियत के विषय में मेरा विचार बहुत पहले से यह था कि यदि आप एक मसीही होने जा रहे हैं तो आपको अपेक्षा करनी चाहिए कि शेष सारा जीवन मुसीबतों से भरा हुआ होगा। मुझे निश्चय नहीं कि क्या मेरा विचार यह था कि उसके लिये कष्ट में पड़ना अच्छा था। और नया जन्म पाने के पश्चात् भी मैं यही लिये चलता था। अतः जब मैंने बाइबल को अध्ययन किया तो ऐसा प्रतीत हुआ कि वह मुझ से कह रहा है कि परमेश्वर चाहता है कि तुम सदा स्वस्थ रहो। वह चाहता है कि तुम मजबूत रहो। वह चाहता है कि तुम सफल रहो। और मैं स्वयं से कहता रहा कि सच्चा होना बहुत ही अच्छा है, यह बाइबल का तात्पर्य नहीं हो सकता है। अवश्य ही इसका अर्थ कुछ और होगा। तो जब मैं स्वयं से इस प्रकार से तर्क कर रहा था एक बार फिर प्रभु ने मुझसे मौन भाव से बात किया और अब उसने कहा, शिक्षक कौन है और बच्चा कौन है? मैंने कहा प्रभु, आप शिक्षक हैं और मैं बच्चा हूँ। और तब उसने कहा, क्या तुम चाहोगे कि मैं तुमको सिखाऊँ? और तब आप देखें मैंने जाना कि मैंने अपने कानों को नहीं लगा रहा था। मैं सुनने के लिये तैयार नहीं था। मेरी अपनी पूर्व धारणाएँ थी कि मैंने सोचा कि परमेश्वर क्या कहनेवाला है। और यदि वह कोई भिन्न बात कहता तो मैं सुन नहीं सकता था।

अब, उनके लिये जिनके पास मसीही पृष्ठभूमि नहीं है, शायद आपके लिये यह समस्या न हो। बहुत तरह से आप एक लाभ के साथ शुरू करते हैं, आप एक खुले मन के साथ प्रारंभ करते हैं। परन्तु हममें से उन लोगों के लिये, और यहाँ उपस्थित हममें से बहुत लोगों के लिये जिनके पास मसीहियत में कुछ न कुछ पृष्ठभूमि है, हमने संभवतः कई परम्पराओं को और पूर्वधारणाओं को वीरासत में पा लिया है जो बाइबल सम्मत नहीं है। और हमारे लिये अक्सर यह सुनना बहुत कठिन होता है कि परमेश्वर क्या कह रहा है क्योंकि जिस बात की हम अपेक्षा कर रहे हैं, वह उससे कुछ भिन्न कह रहा है। तो इसके लिये निदान अपने कानों को लगाना है, अपने सिर को झुकाना है, दीन बनना है और सिखाये जाने योग्य बनना है।

मैं विभिन्न परिस्थितियों में शिक्षक रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि ऐसे लोगों को सिखाना असंभव होता है जो नहीं चाहते हैं कि सिखाए जाएँ। आप सारे कार्य कर सकते हैं, आप सारे व्याख्यान सुन सकते हैं, परन्तु कोई परिणाम नहीं होता है। तो सिखाए जाने की इच्छा, सिखाए जाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।

तीसरा निर्देश, उन्हें अपने आँखों की ओट नहीं होने देना है। और मुझे लगता है कि इसका अर्थ ध्यान केन्द्रित करना है। परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करना। आंशिक रूप से बाइबल पर और अन्य बातों पर न देखें क्योंकि वे प्रतिवाद कर सकते हैं जो बाइबल कहती है। वास्तव में, इन सबका अर्थ उन सब बातों में अपने आपको बन्द कर लेना है जो परमेश्वर बाइबल के द्वारा आपसे कह रहा है। विचलित न हों; जो कुछ परमेश्वर आपसे कह रहा है उससे कोई और प्रभाव आपको दूर न करने पाए।

सिखाने के कार्य में - और मुझे निश्चय है कि आपमें से कुछ लोग शिक्षक हैं - हम प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाया करते थे, बच्चों को पढ़ाते थे कि बच्चों के ध्यान लगाने के लिये दो मुख्य दरबाजे हैं। कान दरबाजा और आँख दरबाजा। अच्छी शिक्षा दोनों का उपयोग करती है। इसलिये एक प्रकार से आॅडियो से अधिक वीडियो प्रभावशाली होता है। क्योंकि इसमें आँख दरबाजे के साथ साथ कान दरबाजे का भी उपयोग किया। खैर आप देखें, परमेश्वर सिखानेवाले मनोवैज्ञानिकों से तगभग तीन हजार साल आगे हैं क्योंकि परमेश्वर कान दरबाजा और आँख दरबाजा कहता है।

और तब अन्तिम परिणाम उन्हें अपने हृदय के बीच में रखना है। इन सारे निर्देशों का उद्देश्य परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में ले आना है, जो कि मानवीय व्यक्तित्व का केन्द्र है।

नीतिवचन का अगला पद, पद 23 कहता है:

सब से अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है।

दूसरे शब्दों में जो कुछ आपके हृदय में है वह आपके जीवन की दिशा को तय करेगा। अतः अपने हृदय की चैकसी करें।

मुझे स्मरण आता है अफ्रीकी भाषा के मेरे छात्रों में से एक ने कहा कि अपनी सामथ्र्य भर अपने हृदय की चौकसी कर, क्योंकि जीवन में सब कुछ उसी से आता है। मैं इस पर अधिक जोर नहीं दे सकता हूँ। क्योंकि आप में से जितने लोग यहाँ पर हैं, उन सबके जीवन की दिशा अन्ततः वही बात तय करेगा जो आपके हृदय में है। आप अपने हृदय में गलत बातें रखकर सही जीवन नहीं जी सकते हैं और आप अपने हृदय सही बातें रख कर गलत जीवन नहीं जी सकते हैं। क्योंकि जो जीवन हम जीते हैं उसका स्रोत हृदय होता है। और इन निर्देशों का उद्देश्य यह दर्शाना है कि आप कैसे परमेश्वर के वचन को कान दरबाजा, आँख दरबाजा, ध्यान देने, नम्रता सिखाए जाने योग्य बनने के द्वारा अपने हृदय में आने दे सकते हैं।

और जब आप इन सारी बातों को एक साथ रखते हैं, तो यह सुनना होता है। विश्वास इसी प्रकार से आता है चाहे यह बीमारी हो, या कोई और समस्या हो जिससे आप जूझ रहे हैं, यदि आपको विश्वास की जरूरत है तो नीतिवचन 4 का यह भाग वर्णन करता है कि आप कैसे विश्वास पा सकते हैं।

ठीक है, हम परमेश्वर के वचन के कुछ और प्रभावों को संक्षिप्त रूप में देखेंगे। अगला, पाप पर विजय है। और भजन 119ः11 में दाऊद प्रभु से कहता है:

मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूँ।

जब दाऊद रख छोड़ा है कहता है तो अन्य आधुनिक अनुवाद कहते हैं कि जमा कर रखा है या खजाने के रूप में जमा कर रखा है। तो दाऊद कहता है कि मैंने तेरे वचन को अपने खजाने के रूप में, अपने जीवन के केन्द्र में रखा है। आप पुनः ध्यान दें, कि हृदय कितना महत्वपूर्ण है। यदि आप अपने हृदय में परमेश्वर के वचन को संग्रहित करते हैं तो वह आपके जीवन को निर्देशित करने जा रहा है। और इस प्रकार वह कहता है कि मैं पाप करना नहीं चाहता; पाप के प्रति मेरा बचाव तेरे वचन को अपने हृदय में संग्रहित करना है।

किसी ने कहा, या तो पाप तुम्हें बाइबल से दूर रखेगा या फिर बाइबल तुम्हें पाप से दूर रखेगी। देर सवेर एक या दूसरा जीत जाएगा। यदि बाइबल जीतता है तो यह आपको पाप से दूर रखेगा।

भजन 17ः4 में हम दाऊद की और एक गवाही देखते हैं। दाऊद एक बहुत ही ईमानदार व्यक्ति था। आप उसके भजनों को पढ़ सकते हैं और देख सकते हैं कि पाप के साथ उसके अपने जीवन में बड़ा संघर्ष था। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि वह हमें दिशा निर्देश देने और हमारी सहायता करने के लिये सक्षम है। भजन 17ः4:

मानवी कामों में मैं तेरे मुँह के वचन के द्वारा क्रूरों की सी चाल से अपने को बचाए रहा।

क्रूर शैतान का नाम है। तो शैतान के पास ऐसे तरीके हैं कि वह आपको नीचे गिराए क्योंकि वे विनाश को पहुँचाते हैं और उनमें से कुछ बहुत ही भटकानेवाला मार्गसूचक है। वे सफलता, खुशी और प्रसिद्धि कहते हैं। और आप सोचते हैं कि मैं उस मार्ग पर चलने जा रहा हूँ परन्तु यह ऐसा मार्ग है जो उस ओर नहीं ले जाता है कि जिसका वह दावा करता है क्योंकि वहाँ पर मार्ग सूचक शैतान द्वारा लगाया गया है। और निम्नलिखित इन मार्गों से बचने के लिये जो आपको दूर ले जाएँगी और आपको विनाश तक पहुँचाएगी, आपको परमेश्वर के वचन की ओर कान लगाना है। यही वह बात है जो आपको चेतावनी देता है, चैकन्ना करता है और निर्देशित करता है, जो कि खतरों के विषय में आगाह करता है।

भजन 119 में, कुछ देर के लिये वापस चलें, 9 पद देखें, ठीक दो पद पहले भजनकार कहता हैः

जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से।

युवा लोगों के लिये यह वास्तविक समस्या है। यह न केवल युवा लोगों के लिये परन्तु जीवन के एक विशिष्ट उम्र के लिये है। पुनः मैं अफ्रीका में रहने के बारे में सोचता हूँ। मूल रूप से अफ्रीकियों का विचार है कि युवा पुरुषों या युवा स्त्रियों के लिये एक शुद्ध जीवन जीना संभव नहीं है। यह स्वाभाविक नहीं है। और हमें परमेश्वर के वचन के द्वारा इससे लड़ना पड़ा। और दाऊद यह प्रश्न करता है कि कैसे एक युवा व्यक्ति शुद्ध जीवन जी सकता है। यह बहुत ही वास्तविक प्रश्न है, न? मेरा मतलब है, कोई भी ऐसा नहीं कह सकता है कि यह बहुत आसान है। परन्तु दाऊद ने कहा कि तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से। पुनः या तो परमेश्वर का वचन आपको पाप से दूर रखेगा या फिर पाप आपको परमेश्वर के वचन से दूर रखेगा। यदि आप पाते हैं कि परमेश्वर के वचन में आपकी रुचि कम हो रहा है, तो अच्छा होगा कि आप जाँचे कि आपके जीवन में कौन परमेश्वर के वचन का स्थान ले रहा है। क्योंकि यह कोई विनाशकारी बात हो सकती है।

तब बाइबल न केवल पाप विजय प्रदान करता है परन्तु यह शैतान पर भी विजय प्रदान करता है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। शैतान सभी विश्वासियों का शत्रु है, वह लगातार हमारा विरोध कर रहा है, हमें नाश करना चाह रहा है, हमें परीक्षा में गिराना चाह रहा है। परन्तु उसे नहीं जीतना है। हम उसे पराजित कर सकते हैं। हमारे पास एक हथियार है और यह परमेश्वर का वचन है। इफिसियों 6 अध्याय में पौलुस एक मसीही के आदर के विषय में बात करता है और वह बताता है कि हम सब एक युद्ध में, आत्मिक युद्ध में हैं, शारीरिक युद्ध में नहीं। हम मांस और लहू से नहीं लड़ रहे हैं। जीवित बाइबल कहती है हम देह सहित लोगों से नहीं लड़ रहे हैं, परन्तु हम आत्मिक प्राणिओं से और आत्मिक बलों से लड़ रहे हैं। चूँकि यह एक आत्मिक युद्ध है अतः हमें आत्मिक हथियार चाहिए। और इफिसियों 6 अध्याय में पौलुस हमारे आत्मिक हथियारों की सूची देता है परन्तु मैं केवल पद 17 में वर्णित अन्तिम हथियार पर ध्यान देना चाहता हूँ। वचन कहता है:

उद्धार का टोप पहन लो।

यह आपके सिर को बचाता है। और मुझे यह बताने दीजिए कि यह आशा है। 1 थिस्सलुनीकियों 5ः8 कहता है आशा की टोप। मैं इस पर बोलना नहीं चाहता था परन्तु मुझे लगता है कि परमेश्वर चाहता है कि मैं बोलूँ क्योंकि बहुत से लोग निराशा की समस्या से जूझते हैं। मैं ऐसा नहीं करता हूँ परन्तु यदि आज शाम मैं यहाँ आप से पूछूँ कि आपमें से कितनों ने निराशा, दुःखी मन, निराशावाद के साथ संघर्ष किया है, तो आपमें से बहुत से लोग अपने हाथ उठाएँगे। मैं पहला होऊँगा। मेरी सेवकाई के प्रारंभिक वर्षों में निराशा से मेरा बड़ा संघर्ष रहा है। मैं बचाया गया था, पवित्र आत्मा में बपतिस्मा पाया था और प्रभु के लिये लोगों को जीत रहा था। परन्तु यह अन्धेरा बादल मेरे ऊपर छा जाता, मुझे कैद कर लेता और मुझे नीचे दबाता। और मैंने इसके साथ संघर्ष किया, मैं इससे लड़ा, जो कुछ मैं जानता था वह सब मैंने किया और कुछ काम नहीं आया। वास्तव में, जितना कठिन प्रयास मैंने किया वह उतना ही बुरा होता गया। और मैं वास्तविक निराशा में था जब मैंने यशायाह 61 अध्याय 3 पद पढ़ा जिसमें परमेश्वर ने कहा, कि वह हमें उदासी हटाकर यश का ओढ़ना ओढ़ाएगा। यह पुराना किंग जेम्स अनुवाद है। और जब मैंने उन शब्दों को पढ़ा तो पवित्र आत्मा ने मुझ से कहा, यह तुम्हारी समस्या है। यह एक आत्मा है, एक बुरी आत्मा है जो तुम्हें यातना दे रही है। यह तुम नहीं हो, यह तुम्हारा मन है। यह तुम्हारे मन में दूसरा व्यक्ति कार्य कर रहा है।

खैर, तब मुझे केवल एक और पद की जरूरत थी जो योएल 2ः32 था:

उस समय जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा; और यहोवा के वचन के अनुसार सियोन पर्वत पर, और यरूशलेम में जिन बचे हुओं को यहोवा बुलाएगा, वे उद्वार पाएँगे।

तो मैंने प्रार्थना किया और मैंने परमेश्वर से कहा, ‘‘परमेश्वर मुझे इस उदासी, निराशा की बुरी आत्मा से छुड़ा, यीशु के नाम से।’’ और परमेश्वर ने मुझे छुटकारा दिया। तब परमेश्वर ने मुझे दिखाया, कि मुझे अपने मन को सुरक्षित रखना था। और मैंने हथियार के बारे में सोचा और मैंने कहा अवश्य ही यह सिर का टोप है। खैर, इब्रानियों 6ः17 इसे उद्धार की टोप कहता है। मैंने अपने आप में सोचा, मैं बचाया गया हूँ। क्या मेरे पास उद्धार की टोप है? परन्तु पौलुस बचाए गए मसीहियों से कहता है कि उद्धार का टोप ले लें। और मैं नहीं जानता था कि वह क्या था। परन्तु मैंने 1 थिस्सलुनीकियों 5ः8 में एक समान भाग में देखा जो कहता हैः

पर हम तो दिन के हैं, विश्वास और प्रेम की झिलम पहिनकर और उद्धार की टोप पहिनकर सावधान रहें।

तो मैंने स्वयं से कहा, मेरा टोप आशा है। यह मेरे मन की रक्षा करेगा। और तब मैंने अध्ययन किया और मैंने देखा कि बाइबल में आशा दृढ़ता के साथ भलाई की अपेक्षा करनी है। और परमेश्वर ने मुझे दिखाया कि मुझे अपने सोचने के तरीके को पूरा-पूरा बदलना है। स्वाभाव से मैं एक निराशावादी था। वास्तव में, निराशवाद में जन्म लेने के अलावा निराशावादी के रूप में मेरा पालन-पोषण भी हुआ था। यदि आप चिन्ता नहीं कर रहे हैं तो आपको इस बात पर चिन्ता करना चाहिए कि आप चिन्ता नहीं कर रहे हैं! तो मैंने जाना कि मुझे संपूर्ण पृष्ठभूमि को बदलना था। मुझे एक आशा, भलाई की अपेक्षा का टोप पहिन लेना था।

जिस प्रकार मैंने यह किया, हर समय मुझमें एक अन्धकारपूर्ण नकारात्मक विचार आता तो मैं जान-बूझकर उसे धर्मशास्त्र की किसी बात से बदल देता जो सकारात्मक होता। और क्रमशः यह स्वतः ही होने लगा। तो आज परमेश्वर का धन्यवाद हो कि मुझमें वह समस्या नहीं है। मेरा मतलब है, हम सब पर कभी न कभी नकारात्मक विचारों का आक्रमण हो सकता है परन्तु संपूर्णत्व में निराशा मेरी समस्या नहीं है यह भूतकाल की बात है। तो मुझे उस आत्मा से छुटकारा चाहिए था, तब मुझे अपने मन को सुरक्षित रखना सीखना था। मैं यह कहना नहीं चाहता था परन्तु शायद यह यहाँ उपस्थित लोगों के लिये है। एक टोप है। यह आशा है। यदि आप बाइबल पढ़ें तो कोई कारण नहीं कि एक मसीही के रूप में आपके पास आशा न हो। हमेशा आशा होने का एक धर्मशास्त्र सम्मत कारण होता है। परन्तु आपको कारणों को खोजना है और उन्हें लागू करना है।

मैं अगले कथन पर जाना चाहता हूँ, जिसकी ओर मैं बढ़ रहा था:

.... आत्मा की तलवार ले लो जो परमेश्वर का वचन है।

तो शैतान के विरुद्ध आक्रमण करने के लिये यह हमारा हथियार है। यह परमेश्वर का वचन है। शायद आपमें से कुछ एक ने सुना है क्योंकि इसके विषय में आज बहुत सी शिक्षाएँ र्पाइ जाती है कि वचन के लिये दो विभिन्न यूनानी शब्द हैं। लोगोस और रेमा। लोगोस परमेश्वर का संपूर्ण वचन, परमेश्वर का संपूर्ण परामर्श, अनन्त परमेश्वर, परमेश्वर का वचन है। रेमा परमेश्वर द्वारा कहा गया वचन है। और जिस शब्द का उपयोग किया गया है वह रेमा है। आत्मा की तलवार ले लो जो कि परमेश्वर का वचन रेमा है। दूसरे शब्दों में, यह आपके पलंग के बगल में रखा हुआ या आलमारी में रखा हुआ बाइबल नहीं है जो आपकी रक्षा करेगा। यह वह बाइबल है जहाँ आप विश्वास के द्वारा इसे बोलते हैं और इसका संदर्भ देते हैं। यह आत्मा की तलवार है और यह बहुत तेज है और प्रत्येक बार जब आप शैतान पर इसका प्रयोग करते हैं तो वह पीठ दिखाता है।

वह आत्मा की तलवार से भागता है और इसके लिये हमारा सिद्ध आदर्श यीशु है। मत्ती 4 अध्याय में जब शैतान उसकी परीक्षा करने आया, तो यीशु ने कैसे उत्तर दिया? तीन बार उसने क्या कहा? लिखा है। वह क्या है? यह आत्मा की तलवार है। और शैतान ने उसे छोड़ दिया। आत्मा की तलवार के लिये उसके पास कोई उत्तर नहीं था। आप उसे हर प्रकार का मनोवैज्ञानिक कारण बता सकते हैं और वह प्रभावित नहीं होता है। और जब आप धर्मशास्त्र को उद्धृत करते हैं और उसे व्यक्तिगत रूप से लागू करते हैं तो आप उसे अपने पास से दूर कर सकते हैं।

तो आत्मा की तलवार, परमेश्वर का वचन शैतान के विरुद्ध हमारा हथियार है। मुझे आपको दो भाग बताने दीजिए। 1 यूहन्ना 2ः14, पद का दूसरा भाग। यूहन्ना कहता है:

हे जवानो, मैं ने तुम्हें इसलिये लिखा है, कि बलवन्त हो, और परमेश्वर का वचन तुम में बना रहता है, और तुम ने उस दुष्ट पर जय र्पाइ है।

दुष्ट कौन है? शैतान। उन जवानों के विषय में यूहन्ना तीन बातें कहता है। वे बलवन्त हैं और उन्होंने दुष्ट पर जय र्पाइ है और इन सबका कारण तीसरा कारण है, परमेश्वर का वचन तुममें बना रहता है। यदि आपमें परमेश्वर का वचन बना रहता है तो यह आपको आत्मिक सामथ्र्य और शैतान पर विजय प्रदान करेगा।

प्रकाशितवाक्य 2ः11 में इसका एक उदाहरण पाया जाता है। यह एक तस्वीर है, मैं मानता हूँ कि अन्तिम समय में परमेश्वर के लोगों और शैतान के लोगों के बीच अत्यधिक टकराव होगा। और शैतान व्यक्तिगत रूप से स्वयं शामिल होगा, परन्तु प्रकाशितवाक्य 12 अध्याय 11 पद हमें विजय की कुन्जी प्रदान करता है। यह कहता है:

और वे (परमेश्वर के लोग) मेम्ने के लोहू के कारण, और अपनी गवाही के वचन के कारण, उस (शैतान) पर जयवन्त हुए, और उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहां तक कि मृत्यु भी सह ली।

तो आप कैसे शैतान पर विजय पाते हैं? मेम्ने के लहे के द्वारा और अपनी गवाही के वचन के द्वारा।

अब इसकी व्याख्या करने का एक तरीका मेरे पास है जिसका वर्णन मैंने हजारों लोगों से किया है। मैं लोगों से कहता हूँ कि यदि आप मुझे भुगतान करें तो कोई धनराशि नहीं है जो मूल्य को व्यक्त करे परन्तु मैं भुगतान नहीं मांग रहा हूँ। आप समझे? यह सत्य अमूल्य है। मेम्ने के लहू और हमारी गवाही के वचन के द्वारा हम कैसे शैतान पर विजय पाते हैं? मेरी व्याख्या इस प्रकार है। जब हम व्यक्तिगत रूप से इस बात की गवाही देते हैं कि परमेश्वर का वचन क्या कहता है कि यीशु का लहू हमारे लिये क्या करता है, तब हम शैतान पर विजय पाते हैं। मुझे पुनः यह कहने दीजिए, जब हम व्यक्तिगत रूप से इस बात की गवाही देते हैं कि परमेश्वर का वचन क्या कहता है कि यीशु का लहू हमारे लिये क्या करता है, तब हम शैतान पर विजय पाते हैं। आपने उस बात को समझा कि इस बात की कुन्जी यह जानना है कि परमेश्वर का वचन क्या कहता है। तब उसे व्यक्तिगत बनाना और अपने स्वयं के जीवन में उसे लागू करना है।

रूत और मेरा गवाही का एक तरीका है जिसे हम नियमित रूप से उपयोग करते हैं जो इन पदों को लागू करते हैं। अतः प्रचार करने के बजाय हम इसका प्रदर्शन करेंगे। ठीक है?

मेरी देह पवित्र आत्मा के लिये एक मन्दिर है: मसीह के लहू के द्वारा छुटकारा पाया हुआ, शुद्ध किया हुआ, और पवित्र किया हुआ। मेरे अंग, मेरी देह के अंग धार्मिकता के हथियार हैं जो परमेश्वर की सेवा और उसकी महिमा के लिये हैं। दुष्टता मुझमें कोई स्थान नहीं है, मुझ पर कोई अधिकार नहीं है। मेरे विरुद्ध कोई अपूर्ण दावा नहीं है। मैं मेम्ने के लहू के द्वारा और मेरी गवाही के वचन के द्वारा शैतान पर विजय पाता हूँ और मैं अपने जीवन से और मैं मृत्यु पर्यन्त अपने जीवन से प्यार नहीं करता हूँ। मेरी देह प्रभु के लिये है और प्रभु मेरी देह के लिये है।

अब देखें, इनमें से सभी कथन बाइबल से लिये गए हैं।

मुझे नहीं मालूम कि हमारे पास सारे आशीषें क्यों होनी चाहिए और आप केवल बैठे रहें और उन्हें पाने की कामना करते रहें। तो हम पुनः इसे एक एक वाक्य कहने और आपको कहने का अवसरद देने जा रहे हैं। यह आपका अंगीकार है। आप यह नहीं कह रहे हैं क्योंकि हम कह रहे हैं; आप यह कह रहे हैं क्योंकि बाइबल यह कह रही है। क्या आप समझे? यदि आप बाइबल में विश्वास करते हैं तो आप इन वचनों पर विश्वास करते हैं। तो हम इसे एक-एक वाक्य कहेंगे और आप हमारे बाद इसे दोहर्राइ ए। अब, आप हमसे बात नहीं कर रहे हैं। आप अदृश्य आत्मिक संसार में बात कर रहे हैं और वह ऐसा स्थान है जहाँ आपके शब्दों का प्रभाव है कि आप मापना प्रारंभ भी नहीं कर सकते है। ठीक है? क्या आप अभी तैयार हैं? हमारे बाद वाक्य दर वाक्य, हमारे साथ नहीं।

मेरी देह पवित्र आत्मा के लिये एक मन्दिर है: मसीह के लहू के द्वारा छुटकारा पाया हुआ, शुद्ध किया हुआ, और पवित्र किया हुआ। मेरे अंग, मेरी देह के अंग धार्मिकता के हथियार हैं जो परमेश्वर की सेवा और उसकी महिमा के लिये हैं। दुष्टता मुझमें कोई स्थान नहीं है, मुझ पर कोई अधिकार नहीं है। मेरे विरुद्ध कोई अपूर्ण दावा नहीं है। मैं मेम्ने के लहू के द्वारा और मेरी गवाही के वचन के द्वारा शैतान पर विजय पाता हूँ और मैं अपने जीवन से और मैं मृत्यु पर्यन्त अपने जीवन से प्यार नहीं करता हूँ। मेरी देह प्रभु के लिये है और प्रभु मेरी देह के लिये है। आमीन।

यदि आप सचमुच इस पर विश्वास करते हैं तो आपको परमेश्वर को धन्यवाद चाहिए। उसको धन्यवाद देने के लिये एक-आध क्षण निकालें। यह आपके विश्वास की अभिव्यक्ति है।

अब मैं एक और बात कहना चाह रहा हूँ। एक निश्चित प्रकार के मसीही हैं जो यह कहने के लिये ठहराए गए हैं। यह इन मसीहियों के विषय में बताता है कि उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय नहीं जाना और मृत्यु सह ली। दूसरे शब्दों में वे पूरी तरह समर्पित थे। उनके लिये सबसे महत्वपूर्ण बात जीवित नहीं रहना था परन्तु परमेश्वर की इच्छा पूरी करना है। अतः आपको जाँचना चाहिए। क्या आप समर्पित हैं? शैतान को ऐसे मसीहियों से कोई भय नहीं है जो समर्पित नहीं हैं। वह उन पर हँसता है। परन्तु समर्पित मसीही उसे धमकी देते हैं क्योंकि वह उन्हें पराजित नहीं कर सकता है, देखा?

ठीक है, यह तो केवल परमेश्वर के वचन का एक उदाहरण मात्र है जिसका उपयोग शैतान के विरुद्ध एक हथियार के रूप में किया जाता है। अब हम आगे परमेश्वर के वचन के दूसरे पहलू पर जाएँगे जो कि धोना करना या साफ करना या पवित्र करना है। अलग - अलग शब्दों का उपयोग किया जाता है। आप जानते हैं पवित्रीकरण शब्द का अर्थ पवित्र बनाना होता है। तो परमेश्वर का वचन आपको धोता है, साफ करता है और पवित्र करता है। बाहरी रूप से नहीं परन्तु भीतरी रूप से।

आप जानते हैं कि गन्दा और चिपचिपा रहना और धोने का कोई उपाय न होना कितना भयावह होता है। आप ऐसी स्थिति में होते हैं तो आपको उस स्थिति को सहना पड़ता है। मेरा मतलब है युद्ध के समय में एक सैनिक के रूप में हम अक्सर ऐसी स्थिति में होते थे। परन्तु सोचिए कि भीतर गन्दा होना और धोने का कोई तरीका न होना कितना बुरा होता है। यह जानना कितना अमूल्य अवसर होता है कि हम कैसे स्वयं को साफ कर सकते हैं। आज पृथ्वी पर के उन करोड़ों लोगों के बारे में सोचिए जो नहीं जानते हैं कि कैसे साफ होना है। हमें कैसा सुअवसर प्राप्त हुआ है। आइ ए, इफिसियों 5ः25-27 पढ़ें। पौलुस पति और पत्नी के मध्य संबन्ध की तुलना मसीह और उसकी कलीसिया के बीच संबन्ध से करता है जो कि मसीह की दुल्हन कहलाती है। और इस प्रकार वह यह कहता है:

हे पतियों, अपनी अपनी पत्नियों से प्रेम रखो ....

मुझे यहाँ ठहरने और आपके पतियों से कहने दें कि यह एक सलाह नहीं है, यह एक आज्ञा है। एक पुस्तक है, मुझे नहीं मालूम आपको मिली है या नहीं। इसका एक लम्बा शीर्षक है, स्वयं पर एक अहसान करो, अपनी पत्नी से प्यार करो। और सचमुच अपनी पत्नी से प्यार नहीं करना मूर्खता की बात है। मैं आपको यह बताऊँगा। ठीक है।

जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया। कि उस को वचन (परमेश्वर का वचन) के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।

और यह कहा गया वचन रेमा है, लोगोस नहीं।

और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर अपने मास खड़ी करे, जिस में न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, बरन पवित्र और निर्दोष हो।

यह कलीसिया है जिसे मसीह यीशु अपनी दुल्हन के रूप में लेना चाहता है। परन्तु कलीसिया को उक रूप में होने के लिये उसे परमेश्वर का वचन सिखाए जाने, प्रचार किए जाने और पढ़े जाने के द्वारा जल से धोकर शुद्ध और पवित्र किया जाना है। मैंने दुनिया भर में कई सभाओं में प्रचार किया है और मैंने पाया है कि आज चमत्कारी और पिन्तेकुस्तीय लोगों को स्तुति और आराधना के विषय में कुछ न कुछ मालूम है। हमारे पास अद्भुत गीत हैं जो हमारे पास पहुँचे हैं जिसे हम गा सकते हैं, हम ताली बजा सकते हैं, चिल्ला सकते हैं और उत्तेजित हो सकते हैं। यह अच्छा है परन्तु मैंने पाया है कि जिस सभा में नियमित वचन सिखाया जाता है वहाँ कुछ अन्तर होता है। उनकी आराधना में एक शुद्धता और पवित्रता पाई जाती है जो आपको ऐसी सभा में नहीं दिर्खाइ देगी जो केवल आती है और अपनी भावनाआें को व्यक्त करती है। लेकिन परमेश्वर के वचन द्वारा शुद्धीकरण नहीं पाया जाता है। लोगों के लिये सच्ची पवित्र आराधना का एक तरीका नियमित रूप से परमेश्वर के वचन के द्वारा धोया और पवित्र किया जाना है। और यह सचमुच कलीसिया में सेवा का उत्तरदायित्व है कि यह देखे कि परमेश्वर के लोग नियमित रूप से परमेश्वर के वचन के द्वारा शुद्ध होते हैं।

अवश्य ही, हमारा भी अपना व्यक्तिगत उत्तरदायित्व होता है, हममें से हर एक का। कि अपने हृदयों, मनों और जीवनों को परमेश्वर के वचन के प्रति खोल दें और उसे हमें धोने, शुद्ध करने और हर प्रकार की धूल-मिट्टी को धो डालने और उन बातों को दूर करने दें जो हमारे आत्मिक जीवन को बाधा पहुँचाती हैं।

और तब परमेश्वर के वचन का एक और सचमुच महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह एर्क आइ ना है। हम कुछ समय के लिये याकूब की पत्री 1 अध्याय 23 पद निकालें। याकूब कहता है:

क्योंकि जो कोई वचन (परमेश्वर का वचन) का सुननेवाला हो, और उस पर चलनेवाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है।

यहाँ पर तस्वीर यह है कि परमेश्वर का वचन एर्क आइ ना है। परन्तु यह एक ऐर्सा आइ ना नहीं है जो उस प्रकार दिखाता है जो सामान्र्य आइ ना दिखाता है जो आपके बाहरी प्रगटीकरण को दिखाता है। परन्तु यह एक ऐसा आईना है जो दिखाता है कि आप भीतर कैसा हैं। यह आपको आपकी सच्ची आत्मिक दशा दिखाता है। और याकूब हमें चेतावनी देता है कि केवल उसमें देखें ही नहीं, देखें कि हम कैसे दिखते हैं और फिर चले जाएँ और उसे भूल जाएँ और उस विषय में कुछ न करें। परन्तु वह कहता है कि यदि हम सचमुच एर्क आइ ने के रूप में परमेश्वर के वचन में देखते हैं तो वह हमें हमारी वास्तविक भीतरी स्थिति दिखाएगा।

जब मैं सभाओं में प्रचार करता हूँ तो मैं अक्सर, मैं अपनी बाइबल को ऊपर उठाकर पकड़ता हूँ। मैंने आपके सामने एक आईना पकड़ रखा है, मैं आपके बारे में आपको बताने नहीं जा रहा हूँ परन्तु आईने में देखें और देखें कि वह आपसे क्या कहता है। जब मैं दुष्टात्माओं के छुटकारे पर प्रचार कर रहा हूँ, जिसका प्रचार मैं समय-समय पर करता रहता हूँ तो लोग परेशान हो जाते हैं और मैं कहता हूँ कि परेशान न हों, कोई बात नहीं। मैं मंच से नीचे उतरने नहीं जा रहा हूँ, आपके आँखों के बीच में अपनी उंगुली रखनेवाला नहीं हूँ, और यह कहनेवाला नहीं हूँ कि आपमें दुष्टात्मा है। यह ऐसा नहीं है, मैं इस तरीके से काम नहीं करता हूँ। मैं केवल आईने को पकड़े रहूँगा और आपको उसमें अपने आपको देखने दूँगा। और इसके पश्चात् यह आप पर निर्भर है कि आप निर्णय लें र्कि आइ ना आपको जो कुछ दिखाता है उसके विषय में आप क्या करेंगे।

हमारे आत्मिक बढ़ोत्तरी और भलाई के लिर्ये आइ ने में देखना बहुत महत्वपूर्ण है। 2 कुरिन्थियों 3ः18 में पौलुस कुछ ऐसी बात कहता है जो बहुत ही सुन्दर है। वह कहता है:

परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं।

अब जो कुछ वर्तमान काल में है, जिसे हम अंग्रेजी भाषा में निरन्तर वर्तमान काल कहते हैं। जब हम लगातार्र आइ ने में देखते हैं तब हर्म आइ ने निरन्तर परमेश्वर की महिमा प्रगट होते हुए देखते हैं। और जबकि हम देखते हैं पवित्र आत्मा हमें उस स्वरूप में बदल रहा है जिसे हम महिमा से महिमा में देखते हैं, यह अद्भुत है परन्तु यह केवल तभी काम करता है जब आर्प आइ ने में देख रहे हैं। यदि आप आईने पर से अपनी आँखें हटा लें तो फिर पवित्र आत्मा कार्य नहीं करता है। तो आपको यह देखने के लिये लगातार परमेश्वर के वचनरूपी आईने में देखते रहना है कि परमेश्वर आपको क्या बनाना चाह रहा है। और आप जितना अधिक देखते हैं उतना ही यह महिमामय होता जाता है। यह स्थिर नहीं है। पौलुस कहता है यह महिमा से महिमा की ओर जाता है। आप इस बात की एक झलक पाते हैं कि परमेश्वर आपको मसीह में क्या बनाना चाहता है और आपको लगता है कि यह अद्भुत है। परन्तु बहुत कुछ आना बाकी है। परन्तु कृपया इसे आत्मसात कर लें; पवित्र आत्मा तब तक कार्य नहीं कर सकता है जब तक आप आईने में न देखें। जब आर्प आइ ने पर से अपनी आँखें हटा लेते हैं तब पवित्र आत्मा आपमें काम करना बन्द कर देता है। अतः यदि आप बदलना चाहते हैं र्तो आइ ने में देखने में समय खर्च करें और जब आर्प आइ ने में देखते हैं, तब आपको बदलने में पवित्र आत्मा विश्वासयोग्य होगा।

आज एक बात जो मैंने संसार में पाया वह यह है कि बहुत से लोग अपना एक बहुत ही धुँधला चित्र रखते हैं। वे अच्छे भाव से अपने विषय में नहीं सोचते हैं। और दुर्भाग्यवशः करोड़ों मसीहियों के विषय में यह बात सच भी है। मुझे लगता है कि शायद कि इस बात में कोई समस्या नहीं है कि आज मसीही अपना खराब स्वरूप की तुलना में अधिक संघर्ष करते हैं। मैं मानता हूँ कि वास्तविक बाईबल सम्मत हल आईने में देखते रहना है क्योंकि सबसे पहर्ले आइ ना आपको दिखाएगा आप कैसे हैं - और यह एक झटका है। परन्तु यदि आप देखते रहते हैं र्तो आइ ना आपको दिखाना प्रारंभ करता है कि परमेश्वर आपको क्या बना सकता है। और यह आपको दर्शाता है कि परमेश्वर की नजर में आप कितने मूल्यवान हैं।

आप देखें, यदि हम बाइबल के साथ अधिक समय खर्च करते हैं तो हम अपने विषय में कमतर या मूल्यहीन नहीं सोच सकते हैं। मैंने बहुत सी लोगों की इस प्रकार सहायता की है। एक बात जो मैं लोगों से कहता हूँ वह यह है, ध्यान दें, किसी भी वस्तु का मूल्य वह होता है जो लोग उसके लिये अदा करते हैं। हो सकता है आपके पास एक घर हो और आप उसे बेचना चाहते हों और रियल स्टेट डीलर आपको उसका नाम बताता है। हो सकता है सवा करोड़। परन्तु कोई भी 90 लाख से अधिक नहीं देगा। अतः, उस घर का वास्तविक मूल्य सवा करोड़ नहीं है, यह 90 लाख है। किसी वस्तु का मूल्य वह है जो लोग उसके लिये अदा करते हैं। अब आपका मूल्य क्या है? आप अपना मूल्य कैसे लगाएँगे? यह देखने के द्वारा कि आपके लिये परमेश्वर ने क्या मूल्य चुकाया है। और परमेश्वर ने आपको संसार में सबसे बहुमूल्य वस्तु देकर खरीदा है। अर्थात् यीशु का लहू। तो यह आपका वास्तविक मूल्य है, वह है जो परमेश्वर आपके लिये चुकाना चाह रहा है। आप समझे? लोग आपको कमतरी का भाव दिखाने न पाएँ। दूसरे लोगों के द्वारा अपना मूल्य न आँकें। हर प्रकार की नकारात्मक आक्षेपों पर ध्यान न दें। परन्तु कहें - मैंने बहुत से लोगों को यह कहने के लिये कहा है। मैं परमेश्वर की दृष्टि में असीम रूप से बहुमूल्य हूँ क्योंकि परमेश्वर ने मुझे संसार में सबसे बहुमूल्य वस्तु, यीशु के लहू के द्वारा खरीदा है। क्या आप यह कहना चाहेंगे कम से कम इसका पहला भाग? मैं कहूँगा, आप मेरे बाद कहें।

मैं परमेश्वर की दृष्टि में असीम रूप से बहुमूल्य हूँ क्योंकि परमेश्वर ने मुझे संसार में सबसे बहुमूल्य वस्तु, यीशु के लहू के द्वारा खरीदा है। और मैं इस कारण बहुमूल्य हूँ।

और तब आप शैतान से कह सकते हैं कि अपने सारे आरोपों और आक्षेपों से परेशान न करे क्योंकि मैं स्वयं का मूल्य जानता हूँ। परन्तु आप इसे तब तक नहीं जानते हैं जब तक आप बाइबल के साथ समय व्यतीत नहीं करते हैं। यह तभी होता है जब आप ध्यान देते हैं कि परमेश्वर आपसे आपके विषय में और आपके प्रति उसके प्रेम के विषय में क्या कह रहा है कि आप स्वयं को कमतर जानने की उस समस्या से बच जाएँगे। इसलिर्ये आइ ने के सामने खड़े होने के लिये समय निकालें।

आपमें से जितनी महिलायें यहाँ उपस्थित हैं र्वे आइ ने के सामने प्रतिदिन अपना समय खर्च करती हैं। मैंने नौ पुत्रियों को गोद लेकर पाला है। अतः, जब मैं उस समय के बारे में बता रहा हूँ जो लड़किर्याँ आइ ने के सामने बिताती हैं, तो मैं इसे सिद्धान्त नहीं बना रहा हूँ! परमेश्वर र्के आइ ने के सामने आप कितना समय व्यतीत करते हैं? मैं यह नहीं कहता हूँ कि आपको अपने बाहरी स्वरूप की परवाह नहीं करनी चाहिए। मुझे लगता है कि यह उचित है, परन्तु उन बातों के लिये आप कितना समय खर्च करते हैं जो स्र्थाइ हैं। सारी बाहरी सुन्दरता एक दिन समाप्त होने वाली हैं, परन्तु आप भीतर जो कुछ हैं उसके साथ हमेशा-हमेशा के लिये जीने जा रहे हैं। परमेश्वर की दृष्टि में अपने आपको सुन्दर बनाने के लिये समय निकालना लाभकारी होगा।

श्रेष्ठगीत की पुस्तक में एक सुन्दर कथन है जो कि दुल्हा और दुल्हन के बीच एक बातचती है। यह इस बात की भी एक तस्वीर है कि कैसे दुल्हे के रूप में मसीह अपनी कलीसिया से बात करता है। इसमें से एक पद में दुल्हा कहता है कि मेरी प्रिय तुम सुन्दर हो, तुम पर कोई दाग नहीं। और यीशु के लहू ने जो कुछ हमारे लिये किया और परमेश्वर का वचन जो कुछ हमारे लिये करता है उसके कारण यीशु हमसे इसी प्रकार बात करता है। हम कमतर महसूस कर सकते हैं। हो सकता है हम स्वयं को बहुत योग्य महसूस न करें परन्तु यदि हर्म आइ ने के सामने समय खर्च करें तो हम पाएँगे कि वह हमसे कहता है कि तुम बहुत सुन्दर हो, तुममें कोई धब्बा नहीं है। आइ ने के सामने समय खर्च करना अच्छा होता है।

और तब मैं यूहन्ना 14 अध्याय में से परमेश्वर के वचन के प्रभाव पर एक शिक्षा बताकर समाप्त करना चाहूँगा। यूहन्ना 14 अध्याय 23 पद। मुझे लगता है कि यह बाइबल का सबसे अद्भुत पद है। मैं लोगों से कहता हूँ कि यदि बाइबल जो कुछ कहती है उससे यदि आप आश्चर्यचकित नहीं हुए हैं तो आपने कभी सचमुच नहीं सुना है कि वह क्या कह रहा है। क्योंकि यह बहुत ही चकित करनेवाली पुस्तक है। यीशु अपने शिष्यों से बात कर रहा है और वह कहता है:

यीशु ने उस को उत्तर दिया, यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा...

यीशु को प्रेम करने का चिन्ह क्या है? उसके वचन मानना। यह कलीसिया में जाना नहीं है, यह संप्रदायों का नाम धारण करना नहीं है, यह उसके वचन मानना है। यही हमारे प्रेम का प्रमाण है। और तब वह उस आधार पर कहता है:

... और मेरा पिता उस से प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएंगे, और उसके साथ वास करेंगे।

कैसा अद्भुत कथन है! बाइबल में बहुत कम स्थान ऐसे हैं जहाँ बाइबल परमेश्वर के लिये बहुवचन का इस्तेमाल करता है। कुछ ये हैं। उत्पत्ति की पुस्तक में प्रभु कहता है कि मनुष्य हममें से एक के समान हो गया है। और अन्य भाग भी हैं परन्तु वे बहुत कम हैं। परन्तु यहाँ यीशु स्वयं के लिये मैं नहीं कहता है। वह पिता के लिये वह शब्द का प्रयोग नहीं करता है। वह कहता है हम - पिता और पुत्र - उसके पास आएँगे और उसके साथ वास करेंगे। कैसा आश्चर्यजनक कथन! सर्वशक्तिमान परमेश्वर, संसार का सृष्टिकर्ता, पिता और पुत्र हम अयोग्य अनैतिक मानवजाति के पास आना चाहता है और हमारे पास अपना निवास बनाना चाहता है। क्या यह चकित कर देनेवाली बात नहीं है। परन्तु शर्त क्या है? उसके वचन मानना, उसे सुनना, उसे मानना, उसे लागू करना, उसे जीना। और उस आधार पर हममें से अधिकांश सर्वशक्तिमान परमेश्वर के लिये एक घर बन सकते हैं।

देखें, बाइबल के विषय में आश्चर्यजनक बातों में से एक यह है कि सचमुच सुसमाचार का उद्देश्य हमें स्वर्ग लेकर जाना नहीं है, यह स्वर्ग को हमारे पास लेकर आना है। बाइबल का अन्तिम अध्याय हम सबके स्वर्ग जाने के विषय में नहीं बताता है। यह नया यरूशलेम को पृथ्वी पर आते हुए बताता है। और तब वह कहता है कि परमेश्वर का तम्बू मनुष्यों के साथ है। यह कुछ ऐसी बात है जिसे हमारे मन पूरी तरह नहीं समझ सकते हैं। परमेश्वर हमारे साथ रहना चाहता है। जब मैं इस पर विचार करता हूँ हम किस प्रकार के जीव हैं तो मैं चकित होता हूँ। परन्तु बाइबल का सन्देश तर्कयुक्त है। और परमेश्वर ने कहा, कि यदि तुम मेरे वचनों को मानोगे तो हम आएँगे और तुम्हारे साथ वास करेंगे।

अब मुझे अन्त करते हुए कुछ क्षण लेने दीजिए कि आपको कुछ सलाह दूँ कि परमेश्वर के वचन को कैसे प्राप्त करना है। मैंने बताया है कि यह क्या करेगा, कुछ एक बातें परन्तु और भी हैं। अब मुझे यह बताने के लिये कुछ और समय लेने दीजिए कि आप इसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं। मैं धर्मशास्त्र में से यशायाह 66 अध्याय में से एक भाग के द्वारा प्रारंभ करना चाहता हूँ जो कि आपको चकित कर सकता है, पहले दो पद। यह उस पद के साथ-साथ है जो मैं इस विषय में बता रहा था कि परमेश्वर हमारे साथ अपना घर बनाना चाह रहा है। प्रभु इस प्रकार कहता है:

यहोवा यों कहता है, आकाश मेरा सिंहासन और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है; तुम मेरे लिये कैसा भवन बनाओगे, और मेरे विश्राम का कौन सा स्थान होगा?

तुम मेरे लिये कैसा भवन, कैसा मन्दिर, कैसा कैथेडंल बनाने जा रहे हो? परमेश्वर कहता है कि यह मुझे प्रभावित करने नहीं जा रहा है। वह कहता है:

यहोवा की यह वाणी है, ये सब वस्तुएं मेरे ही हाथ की बनाई हुई हैं, सो ये सब मेरी ही हैं।

अब सन्देश आता है।

... परन्तु मैं उसी की ओर दृष्टि करूंगा जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो।

यहाँ तीन शर्ते हैं। दीन होने की भावना। आप स्मरण करते हैं कि यीशु ने क्या कहा, धन्य हैं जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम डरपोक या कायर हैं। इसका तात्पर्य है, हम देख रहे हैं कि हम स्वयं में कितने दीन हैं। हमें परमेश्वर की कितनी अधिक चाहत है।

और तब वह खेदित कहता है। इसका अर्थ है, जो कुछ हमने कहा और किया जिसने परमेश्वर को दुःखी किया और उसे हमारे जीवनों से बाहर रखा और परमेश्वर के लिये हममें वास करना असंभव बनाया, उन सबके लिये हम खेदित हैं।

और तब वचन कहता है और यह चकित कर देनेवाली बात है - वह जो मेरे वचन से थरथराता है। तो परमेश्वर के वचन को प्राप्त करने की एक शर्त उससे थरथराना है। थरथराना भय को व्यक्त करता है। विस्मय को अभिव्यक्त करता है। मुझे लगता है, ठीक पहले मैंने जो बात कही वही कारण है। यदि हमें बताए जाए कि पिता परमेश्वर और पुत्र परमेश्वर अगले पाँच मिनटों में इस भवन में आनेवाले हैं तो मुझे नहीं मालूम कि आप क्या करेंगे परन्तु मैं तो थरथराऊँगा। मेरे मन में एक विचार होगा कि क्या मैं तैयार हूँ? वे क्या करनेवाले हैं? वे किस बात की अपेक्षा करने जा रहे हैं? कैसे बेचारे मनुष्य परमेश्वर पिता की ओर और परमेश्वर पुत्र की ओर अपना मुँह दिखाएँगे? परन्तु यीशु ने कहा, कि यदि तुम मेरे वचनों को मानोगे तो मेरा पिता और मैं आएँगे और तुम्हारे साथ वास करेंगे। तो मैं समझता हूँ, कि एक प्रकार से परमेश्वर क्यों हमसे उसके वचन पर थरथराने की अपेक्षा करता है। परन्तु यह व्यक्ति के रूप में परमेश्वर है जो हमारे जीवनों में आता है।

मैंने बहुत बार लोगों से कहा है कि यदि आप जान चाहते हैं कि परमेश्वर के प्रति आपका विचार क्या है, तो इस बात को खोजें कि उसके वचन के प्रति आपका विचार क्या है। क्योंकि परमेश्वर के प्रति आपका यही स्वाभाव है। जितना अधिक आप उसके वचन से प्यार करते हैं उससे अधिक आप परमेश्वर से प्यार नहीं करते हैं। जितना अधिक आप परमेश्वर के वचन को मानते हैं उससे अधिक आप परमेश्वर की नहीं मानते हैं। पर आपके जीवन में परमेश्वर के वचन के लिये जितना स्थान है उससे अधिक परमेश्वर के लिये आपके जीवन में स्थान नहीं है। अतः, यदि आप जानना चाहते हैं कि परमेश्वर आपके लिये कितना महत्वपूर्ण है, तो इस बात को देखिए कि परमेश्वर का वचन आपके लिये क्या अर्थ रखता है। यही उत्तर है क्योंकि वचन ही वह मार्ग है जिससे परमेश्वर हमारे जीवनों में आता है।

मैं नहीं मानता कि परमेश्वर हमें डराना चाहता है परन्तु मैं विश्वास करता हूँ कि वह चाहता है कि हम आदर करें। मैं मानता हूँ कि वह एक प्रकार का आदर चाहता है। मैं इसमें नहीं जा सकता परन्तु एक वाक्यांश जो बाइबल में अक्सर उपयोग किया गया है वह ‘‘प्रभु का भय’’ है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम दण्डित किए जाने से भयभीत हैं। इसका तात्पर्य है, हममें बहुत अधिक आदरभाव पाया जाता है। यदि आप विशेषकर नीतिवचन और भजनसंहिता की पुस्तकों में देखें कि बाइबल प्रभु के भय के विषय में क्या कहती है, तो इसमें प्रभु के भय से बढ़कर कोई और आशीष देनेवाली बात का वर्णन नहीं किया गया है। बाइबल कहती है, कि प्रभु का भय जीवन देता है और जिसमें वह पाया जाता है वह सन्तुष्ट रहेगा और बुराई उस पर नहीं आएगी। यदि आपके पास एक अनुक्रमाणिका है या और कोई साधन है तो इस बात को खोजिए कि प्रभु के भय के विषय में बाइबल क्या कहती है।

वास्तव में, हम उस विषय में आ रहे हैं जो मैं अभी सीखाने जा रहा हूँ क्योंकि अगली अपेक्षा जो कि बहुत ही संबन्धित है वह दीन और परमेश्वर का भय माननेवाला होना है। भजन 25 मेरे पसन्दीदा भजनों में से एक है और यह उस प्रकार के व्यक्ति के बारे में बताता है जिन्हें सिखाने के लिये परमेश्वर कष्ट लाता है। आप देखें, आप किसी भी बाइबल काॅलेज में या सेमीनरी नाम लिखाएँ परन्तु यह आवश्यक नहीं कि परमेश्वर आपको एक बच्चे के रूप में स्वीकार करता हो। देखा? परमेश्वर चरित्र देखकर अपने बच्चों का चुनाव करता है, न कि बौद्धिक उपलब्धि देख कर या उनके पास जो उपाधियाँ हैं उन्हें देख कर। और भजन 25 आपको बताता है कि उस व्यक्ति में परमेश्वर किस बात की अपेक्षा करता है जिसे वह अपना शिष्य के रूप में स्वीकार करने की अभिलाषा रखता है। भजन 25ः8-9:

यहोवा भला और सीधा है; इसलिये वह पापियों को अपना मार्ग दिखलाएगा। वह नम्र लोगों को न्याय की शिक्षा देता, हां वह नम्र लोगों को अपना मार्ग दिखलाएगा।

वहाँ पर शर्त क्या है? दीनता, ठीक। पुराना अनुवाद नम्रता शब्द इस्तेमाल करता है जिसे मैं वास्तव में महत्व देता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि नम्रता शब्द अधिक उपयुक्त है।

और तब उसी भजन में 12वाँ पद:

वह कौन है जो यहोवा का भय मानता है? यहोवा उसको उसी मार्ग पर जिस से वह प्रसन्न होता है चलाएगा।

परमेश्वर आपको सिखाए इस बात के लिये क्या शर्त है? मनुष्य जो प्रभु से भय रखता है। हाँ, सही है

और पद 14 में:

यहोवा के भेद को वही जानते हैं जो उस से डरते हैं, और वह अपनी वाचा उन पर प्रगट करेगा।

यहाँ पर शब्द का अर्थ है प्रभु का गुप्त परामर्श। परमेश्वर अपनी अन्तरंग योजनाओं को किस प्रकार के लोगों के साथ बाँटता है? जो उसका भय रखते हैं, सही है। तो हमें इसी प्रकार के स्वभाव को रखने की आवश्यकता है।

और किसी और स्थान पर बाइबल हमें बताती है कि हमें अवश्य ही प्रभु के भय का चुनाव करना चाहिए। यदि हम इसका चुनाव नहीं करेंगे तो हम इसे नहीं पाएँगे। नीतिवचन 1 में वचन कहता है कि विपत्ति उन पर आती है जो प्रभु के भय का चुनाव नहीं करते हैं।

और तब याकूब 1ः21 में हम पुनः ऐसी ही बात को देखते हैं। वास्तविकता यह है कि जब मैं उन्हें सीखा रहा हूँ तो मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि वे सभी कैसे एक ही बात पर जोर दे रहे हैं।

इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके...

यह पहली शर्त है। यह हर अशुद्धता और बुरी बात और परमेश्वर के लिये अस्वीकार्ययोग्य बात के लिये अपना पीठ दिखाते हैं। और मूल रूप से एक शब्द है जिसे इसके लिये उपयोग किया गया है। वह शब्द क्या है? मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। पश्चाताप्, हाँ, सही है। पश्चाताप् का अर्थ है, हर उस बात से वापस मुड़ना जो परमेश्वर को न प्रसन्न करनेवाली और अस्वीकारयोग्य है। उसके प्रति अपना पीठ फेर लें। अतः, याकूब कहता है:

इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके, उस वचन (परमेश्वर का वचन) को नम्रता से ग्रहण कर लो, जो हृदय में बोया गया और जो तुम्हारे प्राणों का उद्धार कर सकता है।

तो हमें यह कैसे प्राप्त करना है? किसके साथ? नम्रता के साथ, हाँ ठीक है। आप देखें, ये सारी बातें वास्तव में समान हैं।

और तब आपको उस बात पर अमल करने के लिये तैयार होने की आवश्यकता है जो कि वचन कहता है। यूहन्ना 7ः17 में यीशु ने कहा:

यदि कोई उस की इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा कि वह परमेश्वर की ओर से है, या मैं अपनी ओर से कहता हूं।

यीशु ने कहा, यदि तुम केवल ज्ञान में रुचि रखते हो तो परमेश्वर तुम से मुलाकात नहीं करता है, परन्तु यदि तुम परमेश्वर की इच्छा पूरी करना चाहते हो, तो परमेश्वर अपना सत्य तुम्हें दिखाएगा।

और अन्ततः आप सबके लिये मैं पुनः भजन 119ः11 निकालना चाहता हूँ। दाऊद ने कहा:

मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूं।

मैं आपको सलाह देता हूँ कि यदि आप सचमुच सच्चे भाव से परमेश्वर की आशीषों और समृद्धि को पाना चाहते हैं तो आपको अपने हृदय में परमेश्वर के वचन को संग्रहित करने की आवश्यकता है। मैं विश्वास करता हूँ कि यह करने का एक व्यवहारिक तरीका धर्मशास्त्र को याद करना है। मैं मानता हूँ कि धर्मशास्त्र को याद करने का अभ्यास करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। बाइबल उन लोगों के बारे में बताती है जो परमेश्वर के वचन पर मनन करते हैं। परन्तु यदि आपमें परमेश्वर का वचन नहीं है, तो आप उस पर मनन नहीं कर सकते हैं। मनन करने के लिये आपमें उसका होना आवश्यक है।

मैं आपको कुछ बात बताना चाहता हूँ जो रूत और मैंने कार्ल द्वारा रचित द चर्च इन चाईना नामक पुस्तक में पढ़ा है। मुझे मालूम नहीं कि क्या आपमें से किसी ने इसे पढ़ा है? मैं आपसे कहता हूँ कि यह एक श्रेष्ठ पुस्तक है। यदि आपने इसे नहीं पढ़ा है विशेषकर आप जो चीनी हैं, तो आप इसे अपने लिये खरीद लें और पढ़ें। आप जानते हैं एक बात जो मुझे सिंहापुर में चीनियों के बारे में प्रभावित करती है, वह यह है कि यदि मैं स्पष्ट रूप से यह कहूँ तो वे चीनी भाषा के विषय में अनावश्यक रूप से चिन्तित नहीं हैं। मुझे आश्चर्य होता है। परन्तु खैर इस मनुष्य ने इस पुस्तक में सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान् कहा - आप जानते हैं सांस्कृतिक क्रान्ति क्या होती? जब कठोरता पूर्वक मसीहियों पर सताव हुआ तो केवल वे ही लोग बच पाए जिन्होंने धर्मशास्त्र को याद किया था। और बाकी लोगों ने या तो आत्महत्या कर लिया या फिर पागल हो गए या अपने साथी विश्वासियों को धोखा दिया। तो परमेश्वर के वचन को याद करने में कुछ बात है। यह आपको भीतरी सामथ्र्य और स्थायित्व प्रदान करता है जिसके लिये कोई विकल्प नहीं है। और आपके लिये मेरी सिफाशि यह है कि याद करने के लिये समर्पित हों। मैं यह देखकर प्रभावित हूँ कि आपमें से अधिकांश बहुत छोटे हैं। आप प्रारंभिक वर्षों में हैं। यदि आप इसका उपयोग करने का चुनाव करते हैं तो आपमें याद करने की क्षमता है। आप इसे कर सकते हैं और यदि आप नहीं करते हैं तो आप किसी ऐसी वस्तु को तुच्छ जान रहे हैं जो बहुत अधिक बहुमूल्य है।

मुझे नहीं मालूम मैंने और रूत ने कितने पदों को याद किया है। मैं सोचता हूँ यह कम से कम दो सौ होगा। हो सकता है अधिक हो। लोगों को प्रभावित करने के लिये हम यह नहीं करते हैं; हम इसलिये यह करते हैं क्योंकि हमें इसकी जरूरत है। हम निरन्तर आत्मिक युद्ध में हैं। हम हमेशा शैतान के दृढ़ गढ़ों पर आक्रमण करते हैं। और यदि हमारे हृदयों में परमेश्वर का वचन छुपा हुआ नहीं है तो हम नहीं बचेंगे। हम इसे याद करते हैं, हम इस पर विश्वास करते हैं, हम इसका अंगीकार करते हैं।

अतः यह उन लोगों के लिये मेरा अन्तिम कथन है जो सचमुच परमेश्वर के वचन में समृद्ध होना चाहते हैं। पवित्र आत्मा से कहें कि आपको दिखाए कि आपको कौन सा पद याद करने की जरूरत है क्योंकि वे उन पदों से बहुत भिन्न होंगे जो हमने याद किए हैं। तो परमेश्वर आपको आशीष दे।

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