आज सुबह हमारी घोषणा 1 इतिहास 28:20 से ली गई है। ये वे निर्देश हैं जो दाऊद ने मन्दिर का निर्माण पूरा करने के लिये सुलैमान को दिए थे। वे मध्यम पुरुष एकवचन में हैं परन्तु हमने उन्हें अपने ऊपर लागू किया है इसलिये हम उन्हें प्रथम पुरुष बहुवचन में कहते हैं। क्या आपने समझा? यह घोषणा के कार्यों में से एक है, यह परमेश्वर के वचन को व्यक्तिगत बनाने के लिये है।

हियाव बांध और दृढ़ होकर इस काम में लग जा। मत डर और तेरा मन कच्चा न हो, क्योंकि यहोवा परमेश्वर जो मेरा परमेश्वर है वह तेरे संग है और जब तक यहोवा के भवन में जितना काम करना हो वह न हो चुके तब तक वह न तो तुझे धोखा देगा और न तुझे त्यागेगा। आमीन।

अब हम इब्रानियों 6:1-2 में दिये गए छः नींव संबन्धी अध्ययन को जारी रखने जा रहे हैं। हमने प्रथम तीन को देख लिया है: मृत कामों से पश्चाताप, परमेश्वर के प्रति विश्वास और बपतिस्मों का सिद्धान्त। बपतिस्मों के सिद्धान्त के संबन्ध में मैंने बताया कि नया नियम हमें तीन विभिन्न बपतिस्मों के बारे में बताता है: यूहन्ना बपतिस्मादाता का बपतिस्मा, मसीही बपतिस्मा और पवित्र आत्मा का बपतिस्मा।

अब इस भाग में इन नींव के सिद्धान्तों में से चौथे का अध्ययन करने जा रहे हैं जो कि हाथ रखना है। इस सन्देश के लिये मैंने एक शीर्षक 'परमेश्वर की सामर्थ्य का संचारण करना' दिया है।

शायद हममें से बहुत से यह देखकर चकित होंगे कि हाथ रखना मुख्य सिद्धान्तों में शामिल है। क्योंकि अधिकांश कलीसियाओं में इसके विषय में बहुत कम बताया जाता है। परन्तु यदि आप ठहरें और विचार करें तो यह अत्यधिक तार्किक है, आवश्यक है क्योंकि हाथ रखना परमेश्वर की सामर्थ्य का संचारण करना ऐसी बात है जो मसीह की देह को निरन्तरता प्रदान करती है। यह वरिष्ठ सेवक और कनिष्ठ सेवक में निरन्तरता स्थापित करती है और यह एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में निरन्तरता स्थापित करती है। इसलिये हाथ रखने की इस सेवा का मुख्य कार्य मसीह की देह को निरन्तरता प्रदान करना है। कुछ परंपराओं में वे दावा करते हैं कि उनकी यह परम्परा प्रेरित पतरस के दिनों से अब तक चली आ रही है। मैं उस दावे पर विचार नहीं कर रहा हूं परन्तु मैं केवल यह बता रहा हूं कि इसके पीछे के कारण तर्कसंगत हैं। हमें पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा दर सेवा बढ़ने के लिये एक मार्ग की जरूरत है और धर्मशास्त्र में इस आज्ञा के द्वारा यह प्रदान किया गया है। मैं इसे हाथ रखना कहूंगा।

यह रोचक है, हम इसे बाइबल के प्रथम पुस्तक में पाते हैं और वास्तव में तब से यह परमेश्वर के लोगों के संपूर्ण इतिहास में चला आ रहा है। परमेश्वर के लोगों के इतिहास में यह एक अनिवार्य तत्व है।

मैं कहूंगा कि इसके कुछ निश्चित आत्मिक उद्देश्य हैं। सबसे पहले, इस तथ्य पर ध्यान दें कि किसी पर अपना हाथ रखना स्वाभाविक, मानवीय प्रतिक्रिया है। एक मां के पास एक बच्चा है जिसे बुखार है, अकारण ही वह बच्चे के माथे पर हाथ रखती है। या दो व्यक्ति लम्बे समय के बाद एक दूसरे से मिलते हैं और वे किसी न किसी प्रकार एक दूसरे के कन्धे पर हाथ रखते हैं या हाथ मिलाते हैं, परन्तु वे अपने हाथों को सम्बन्धित करते ही हैं।

आत्मिक संदर्भ में मैं सलाह देता हूं कि कुछ निश्चित उद्देश्य हैं जो पूरे किये जाते हैं। सबसे पहले, संचारण करना। बाइबल में हम पाते हैं कि हाथ रखने का उपयोग आशीष, अधिकार, बुद्धि, पवित्र आत्मा, एक आत्मिक वरदान या एक सेवा का संचारण करने के लिये किया गया है। मुझे आपको पुनः यह सूची देने दीजिए। इसका उपयोग आशीष, अधिकार, बुद्धि, पवित्र आत्मा, एक आत्मिक वरदान या एक सेवा के संचारण के लिये किया गया है।

और दूसरा, इसका उपयोग आदेश देने के लिये किया गया है। यह मसीह की देह में एक सेवा के स्थान पर एक व्यक्ति को नियुक्त करने का बाइबल संबन्धी तरीका है। और इस प्रकार यह परमेश्वर की नियुक्ति प्रमाणित करता है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि कलीसिया की बातें वोट डालने से नहीं सुलझती हैं। परमेश्वर वोट डालने के अधीन नहीं है। बहुत सी कलीसियाएं डीकन के लिये वोट डालती हैं या पास्टर के लिये वोट डालती हैं या किसी और के लिये वोट डालती हैं, परन्तु यह वास्तव में आत्मिक नहीं होता है। परमेश्वर ही नियुक्तियां करता है। यीशु ने अपने प्रेरितों से कहा, "तुमने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना है।" मैं विश्वास करता हूं कि प्रत्येक वैध कार्य और सेवा और प्रत्येक कलीसिया में नियुक्ति के संबन्ध में यह सच है। चुनाव मनुष्य नहीं करता है परन्तु परमेश्वर करता है क्योंकि यीशु मसीह कलीसिया की सब बातों में सिर है जबकि कलीसिया उसकी देह है। मैं नहीं मानता कि जो नियुक्तियां यीशु के अधिकार के बिना की जाती हैं उनकी सच में कोई वैधता होती है। परन्तु, मैं विश्वास करता हूं कि नियुक्ति किसी व्यक्ति को कुछ बनाने के लिये नहीं है परन्तु इस पहचान के लिये है कि परमेश्वर ने निर्णय लिया है कि उस व्यक्ति को क्या होना चाहिए। मैं विश्वास करता हूं कि यदि आप डीकनों पर विचार विमर्श के लिये कलीसिया की किसी सभा में हैं, तो आपका उद्देश्य यह निर्णय करने का नहीं होना चाहिए कि आप किसे एक डीकन बनाना चाहते हैं, आपका उद्देश्य यह निर्णय करने का होना चाहिए कि परमेश्वर ने एक डीकन के रूप में किसे चुना है। यह एक बहुत ही भिन्न विचार है।

हम बहुत हद तक लोकतन्त्र के भ्रष्टाचार से ग्रसित हैं। जिसका बाइबल में या कलीसिया में बहुत कम स्थान है। मैं इस विषय पर आगे नहीं बढूंगा क्योंकि यह बहुत ही विवादास्पद है और मेरे पास विवाद में उलझने के लिये समय नहीं है।

दूसरी बात, हाथ रखने का उपयोग पहचान स्थापित करने के अलावा किसी निश्चित सेवा या उद्देश्य के लिये अलग करने हेतु भी किया जाता है।

तीसरा, यह समर्थन करने और अधिकार प्रयोग करने के लिये उपयोग किया जाता है।

और चौथा, यह सुसज्जित करने के लिये उपयोग किया जाता है: यह एक व्यक्ति द्वारा परमेश्वर-नियुक्त लक्ष्य को पूरा करने के लिये जो कुछ आत्मिक वरदान या आत्मिक अधिकार या जो कुछ आवश्यक है उसका संचारण करने के लिये किया जाता है।

अतः मुझे पुनः वह सूची देने दीजिए क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। लोगों को आदेशित करने में हाथ रखने के कार्य का उपयोग उनकी पहचान स्थापित करने के लिये किया जाता है, परन्तु परमेश्वर की पसन्द के व्यक्ति को नियुक्त करने के लिये नहीं। इसका उपयोग किसी व्यक्ति को किसी विशेष कार्य या सेवा के लिये अलग करने हेतु किया जाता है। इसका उपयोग एक व्यक्ति के अधिकार का समर्थन करने के लिये किया जाता है। इसका उपयोग उसे सारे आत्मिक अधिकार या वरदानों से सुसज्जित करने के लिये किया जाता है जिसकी उस व्यक्ति को आवश्यकता होगी।

अब आईए, कुछ उदाहरणों को देखें, सबसे पहले पुराने नियम से। हम उत्पत्ति 48 निकालेंगे और पद 8वें पद से 19वें पद तक पढ़ेंगे जो कि बहुत ही रोचक भाग है। इस भाग में यूसुफ अपने दो पुत्रों को अपने पिता याकूब के पास लाता है जो इस्राएल भी कहलाता है, ताकि याकूब अपने पोतों को आशीष दे सके। और मुझे दूसरी बात बताने दीजिए, परमेश्वर की ही आशीष के लिये, मैं सोचता हूं कि सबसे अधिक चाहनीय आशीष पिता या दादा की आशीष होती है। मैं आप सभों से कहूंगा, विशेष करके युवा लोगों से, यदि किसी भी प्रकार संभव हो तो जो कुछ आप करते हैं उस पर आपकी पिता की आशीष मांगिए। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की आशीष मांगना द्वितीय बात है। आप बाइबल में देखेंगे कि पिता की आशीष के साथ बहुत महत्व जुड़ा हुआ था। अतः हम पद देखें:

तब इस्राएल (अर्थात् याकूब) को यूसुफ के पुत्र देख पड़े, और उसने पूछा, ये कौन हैं? यूसुफ ने अपने पिता से कहा, ये मेरे पुत्र हैं, जो परमेश्वर ने मुझे यहां (मिस्र में) दिए हैं: उसने कहा, उनको मेरे पास ले आ कि मैं उन्हें आशीर्वाद दूं। इस्राएल (अर्थात् याकूब) की आंखें बुढ़ापे के कारण धुंधली हो गई थीं, यहां तक कि उसे कम सूझता था। तब यूसुफ उन्हें उनके पास ले गया; और उसने उन्हें चूमकर गले लगा लिया। तब इस्राएल (अर्थात् याकूब) ने यूसुफ से कहा, मुझे आशा न थी कि मैं तेरा मुख फिर देखने पाऊंगा, परन्तु देख, परमेश्वर ने मुझे तेरा वंश भी दिखाया है।

यदि इसमें कोई बात है जो मेरी आंखों में आंसू ला देती है, तो यह परमेश्वर की विश्वासयोग्यता है। यह दुःख नहीं है, यह पीड़ा नहीं है परन्तु प्रत्येक बार जब मैं परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को देखता हूं, तो मैं आंसुओं से भर जाता हूं।

तब यूसुफ ने उन्हें अपने घुटनों के बीच से हटाकर और अपने मुंह के बल भूमि पर गिरकर दण्डवत् की।

उस आदर को देखिए जो बाइबल के लोगों ने अपने माता-पिताओं और बड़े बुढ़ों के लिये दिखाया था।

तब यूसुफ ने उन दोनों को लेकर, अर्थात् एप्रैम को अपने दाहिने हाथ से कि वह इस्राएल के बाएं हाथ पड़े; और मनश्शे को अपने बाएं हाथ से कि वह इस्राएल के दाहिने हाथ पड़े, उन्हें उसके पास ले गया। तब इस्राएल ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर एप्रैम के सिर पर जो छोटा था और अपना बायां हाथ बढ़ाकर मनश्शे के सिर पर रख दिया। उसने तो जान बूझकर ऐसा किया, नहीं तो जेठा मनश्शे ही था।

सामान्यतः, पहिलौठा अधिक आशीष पाता और यह दाहिने हाथ के द्वारा संचालित होता था। और यूसुफ ने विशेष रूप से प्रबन्ध किया कि मनश्शे जो कि बड़ा था वह याकूब के दाएं हाथ पड़े। परन्तु याकूब पवित्र आत्मा से प्रेरणा पाकर अपने हाथों को विपरीत तरफ ले गया और एप्रैम पर अपना दाहिना हाथ रखा और मनश्शे पर अपना बायां हाथ रखा।

तब उसने यूसुफ को आशीर्वाद देकर कहा, परमेश्वर जिसके सम्मुख मेरे बापदादे इब्राहीम और इसहाक (अपने को जानकर) चलते थे, वही परमेश्वर मेरे जन्म से लेकर आज के दिन तक मेरा चरवाहा बना है, और वही दूत मुझे सारी बुराई से छुड़ाता आया है ...।

आप जानते हैं यह कहां हुआ? जब याकूब ने पनीएल में स्वर्गदूत से भेंट किया, वह उसी घटना को बता रहा था।

... और वही दूत मुझे सारी बुराई से छुड़ाता आया है, वही अब इन लड़कों को आशीष दे; और ये मेरे और मेरे बापदादे इब्राहीम और इसहाक के कहलाएं और पृथ्वी में बहुतायत से बढ़ें।

क्या आप यह भी देख सकते हैं कि नाम का संचारण करना कितना महत्वपूर्ण है? ऐसी बहुत सी बातें चलन से बाहर है, परन्तु वे कभी भी परमेश्वर के चलन से बाहर नहीं हुई हैं।

जब यूसुफ ने देखा कि मेरे पिता ने अपना दाहिना हाथ एप्रैम के सिर पर रखा है तो यह बात उसे बुरी लगी। सो उसने अपने पिता का हाथ इस मनसा से पकड़ लिया कि एप्रैम के सिर पर से मनश्शे के सिर पर रख दे। और यूसुफ ने अपने पिता से कहा, हे पिता, ऐसा नहीं क्योंकि जेठा यही है, अपना दाहिना हाथ इसके सिर पर रख। उसके पिता ने कहा, नहीं, सुन हे मेरे पुत्र, मैं इस बात को भली भांति जानता हूं, यद्यपि इससे भी मनुष्यों की एक मण्डली होगी और यह भी महान हो जाएगा, तौभी इसका छोटा भाई इससे अधिक महान हो जाएगा और उसके वंश से बहुत सी जातियां निकलेंगी। फिर उसने उसी दिन यह कहकर उनको आशीर्वाद दिया, कि इस्राएली लोग तेरा नाम ले लेकर ऐसा आशीर्वाद दिया करेंगे कि परमेश्वर तुझे एप्रैम और मनश्शे के समान बना दे; और उसने मनश्शे से पहले एप्रैम का नाम लिया।

यह बहुत सुस्पष्ट दृश्य है न? यह बहुत ही वास्तविक है। यह समझा जाता था कि बड़ी आशीष पिता के दाहिने हाथ से आती है, परन्तु यह इतना वास्तविक होता था कि किसी बात का वास्तविक संचारण होता था, यह एक औपचारिकता मात्र नहीं होती थी। यह केवल संस्कार के लिये ही नहीं होता था, यह दो युवा व्यक्तियों, एप्रैम और मनश्शे के जीवनों में विशुद्ध संचारण था। तब से इस घटना ने वास्तव में उनकी मंजिल का निर्धारण कर दिया था।

अतः जब पवित्र आत्मा के द्वारा हाथ रखा जाता है तो आईए कभी भी इसके महत्व को कम न समझें।

और तब हम गिनती 27 देखेंगे जहां मूसा प्रभु से कहता है कि अब यह नए अगुवे की नियुक्ति का समय है जो उसका अनुकरण करेगा। मूसा जानता था कि वह प्रतिज्ञात देश में नहीं जाएगा लेकिन उसे परमेश्वर के लोग इस्राएल की बहुत चिन्ता थी। अतः मूसा ने गिनती 27:15 में प्रभु से कहा:

मूसा ने यहोवा से कहा, यहोवा जो सारे प्राणियों की आत्माओं का परमेश्वर है, वह इस मण्डली के लोगों के ऊपर किसी पुरुष को नियुक्त कर दे।

मैं सोचता हूं कि यह महत्वपूर्ण है। वह सभी मनुष्यों की आत्माओं का परमेश्वर है। वह ऐसा परमेश्वर है जो प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा को जानता है। वह मनुष्य के चरित्र की भीतरी गहराई में देखता है।

यहोवा जो सारे प्राणियों की आत्मा का परमेश्वर है, वह इस मण्डली के लोगों के ऊपर किसी पुरुष को नियुक्त कर दे जो उसके सामने आया जाया करे और उनका निकालने और पैठानेवाला हो। जिससे यहोवा की मण्डली बिना चरवाहे की भेड़-बकरियों के समान न रहे।

और संपूर्ण बाइबल प्रारंभ से अन्त तक हमें बताता है कि चरवाहे बिन भेड़ें बिखर जाएंगी और शिकार बन जाएंगी। यह एक ऐसा सन्देश है जो संपूर्ण बाइबल में पाया जाता है। मुझे आपको सलाह देने दें। जब तक परिस्थितियां बहुत असाधारण न हों आप सबके एक मानवीय चरवाहा होना चाहिए, जो आपके प्राणों की देखभाल करे और आपको संभाले - यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। हम कुछ देर बाद इस बात पर वापस आएंगे, परन्तु अभी कुछ अन्य बातों को देखें।

अतः परमेश्वर ने कैसी प्रतिक्रिया दी?

परमेश्वर ने मूसा से कहा: तू नून के पुत्र यहोशू को लेकर उस पर हाथ रख, वह तो ऐसा पुरुष है, जिसमें मेरा आत्मा बसा है; और उसको एलीआजर याजक के और उसकी सारी मण्डली के सामने खड़ा करके उनके सामने उसे आज्ञा दे। और अपनी महिमा में से कुछ उसे दे जिससे इस्राएलियों की सारी मण्डली उसकी माने।

मुझे यह पसन्द आता है। सारा अधिकार नहीं देना था क्योंकि मूसा को विशिष्ट अधिकार दिये गए थे। परन्तु उसे अपने अधिकार का एक अच्छा भाग दे क्योंकि उसे इसकी आवश्यकता पड़ेगी।

और अपनी महिमा में से कुछ उसे दे जिससे इस्राएलियों की सारी मण्डली उसकी माने और वह एलीआजर याजक के सामने खड़ा हुआ करे और एलीआजर उसके लिये यहोवा से ऊरीम की आज्ञा पूछा करे। और वह इस्राएलियों की सारी मण्डली समेत उसके (यहोशू) कहने से जाया करे और उसी (यहोशू) के कहने से लौट भी आया करे।

सारी मण्डली।

यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने यहोशू को एलीआजर याजक और सारी मण्डली के सामने खड़ा करके उस पर हाथ रखे और उसको आज्ञा दी जैसे यहोवा ने मूसा के द्वारा कहा था।

आप देखिए, कि संपूर्ण सभा को मूसा से उसके उत्तराधिकारी तक इस अधिकार का हस्तान्तरण देखना था, जिसके पीछे वे चालीस वर्षों तक चले थे। यह परमेश्वर के सभी लोगों की भलाई के लिये एक महत्वपूर्ण लेन-देन था।

इसके अलावा यह एक समारोह मात्र नहीं था, यह सचमुच यहोशू के साथ हुआ था। व्यवस्थाविवरण 34 में हम इस रोचक विवरण को पाते हैं।

और नून का पुत्र यहोशू बुद्धिमानी की आत्मा से परिपूर्ण था क्योंकि मूसा ने अपने हाथ उस पर रखे थे और इस्राएली उस आज्ञा के अनुसार जो यहोवा ने मूसा को दी थी उसको मानते रहे।

अतः आप देखें कि हाथ रखने से उसे क्या मिला। उसे बुद्धि की आत्मा मिली। यह एक औपचारिकता मात्र नहीं थी। एक समारोह मात्र नहीं था, यह एक वास्तविक हस्तान्तरण था।

अब आईए, पुराने नियम में एक और उदाहरण देखें जो 2 राजा 13 अध्याय में है। यह सच में एलीशा की सेवा की समाप्ति का दृश्य है। और यह अब तक एक समाप्ति का दृश्य नहीं था क्योंकि आपको याद होगा कि एलीशा मर गया और दफनाया गया और तब आक्रमणकारियों का एक दल इस्राएल पर आक्रमण करने आया और वे पुरुष जो किसी को दफनाने जा रहे थे, उन्होंने लाश को एलीशा के कब्र पर डाल दिया और भाग गए। जब मृतक व्यक्ति ने एलीशा की हड्डियों को छुआ तो वह जीवित हो गया। यह कुछ महत्वपूर्ण बात है, न? यह कैसी अद्भुत बात है कि परमेश्वर की सामर्थ्य बहुत सी अद्भुत रीतियों से हस्तान्तरित की जा सकती है। आईए, यहां 2 राजा 13:14 पढ़ें:

और एलीशा को वह रोग लग गया जिससे वह मरने पर था।

यह ऐसा ही है, अब मैं क्या कहूं। यह आपकी अपेक्षा से अलग है। वह बिमारी से मरा फिर भी उसकी हड्डियां परमेश्वर की सामर्थ्य से ऐसी भरी हुई थीं कि जब एक मृतक व्यक्ति ने उसकी हड्डियों को छुआ तो वह जी उठा। आप इसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं। कुछ ऐसी बातें होती हैं जिनकी आप व्याख्या नहीं कर सकते हैं।

मुझे आपको संक्षिप्त रूप में कुछ बताने दीजिए जो हुआ था, क्योंकि मैं उन लोगों से बहुत थक गया हूं जो उन बातों का श्रेय लेने का प्रयास करते हैं जो परमेश्वर करता है। कुछ वर्षों पूर्व दक्षिण अफ्रीका में रूथ और मैं असेम्ब्ली ऑफ गॉड कलीसिया में सेवा कर रहे थे और सहायक पास्टर, एक युवा व्यक्ति, जो स्क्वाश खेल रहे थे। वे गिर पड़े और उनकी हड्डियां चार जगहों पर टूट गईं और वह हमारे पास प्रार्थना के लिये आए और मैंने कहा, "मैं जानता हूं कि यह अजीब सा लगेगा, परन्तु मैं आपके पैरों की जांच करने जा रहा हूं क्योंकि परमेश्वर ने मुझसे यही करने के लिये कहा है। यदि आपके पांव बराबर नहीं हैं, तो आपका छोटा पैर बढ़ेगा और आप जानेंगे कि परमेश्वर ने आपको स्पर्श किया है।" तब मैंने कहा, "इस बात के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करना मत भूलना।" अतः आप देखो जब लोग वास्तव में जरूरत में होते हैं तो वे हर प्रकार के अजीब से कार्य करेंगे जिन्हें वे शेष समयों पर नहीं करते। और इस प्रकार उसने इस समारोह में भाग लिया, मैंने उसके पांव को थामा, वह बढ़ गया। मैं जानता था कि परमेश्वर ने उसे स्पर्श किया है। वह डॉक्टर के पास गया और एक्स-रे हुआ। मैं उस बात का वर्णन नहीं कर सकता। उसके हाथों में चार जगह टूटन थी। उनमें से तीन पूरी रीति से ठीक हो गए थे और चौथा अभी भी टूटा हुआ था। वरिष्ठ पास्टर ने मुझसे कहा, "इसे समझाईए।" मैं इसकी व्याख्या नहीं कर सकता, मैं इतना कह सकता हूं कि उसके पास 75 प्रतिशत विश्वास था परन्तु यह स्पष्टीकरण नाकाफी था। अतः मैं ऐसे लोगों से बहुत परेशान हूं जो सब कुछ जानते हैं कि परमेश्वर ने किया है और उन सबका स्पष्टीकरण देने में सक्षम हैं। ऐसी कई बातें हैं जिन्हें परमेश्वर करता है, और मैं उनकी व्याख्या नहीं कर सकता। मैं उन बातों को परमेश्वर पर छोड़ देने से सन्तुष्ट हूं।

अब हम किसी प्रकार इस कहानी में आगे बढ़ते हैं।

तब इस्राएल का राजा योआश उसके पास गया और उसके ऊपर रोकर कहने लगा, हाय मेरे पिता! हाय मेरे पिता! हाय इस्राएल के रथ और सवारों!

यह कुछ ऐसी बात थी जिसे एलीशा ने स्वयं एलिय्याह से कहा था जब कि एलिय्याह रथ के द्वारा उठा लिया गया था और इसमें वास्तव में हम सब के लिये एक सन्देश है। एक व्यक्ति जो सच में परमेश्वर को जानता है वह एक राष्ट्र का बचाव हो सकता है। वह किसी सेना से अधिक सामर्थी हो सकता है और योआश जो एक परमेश्वर भक्त राजा नहीं था, समझ गया कि एलीशा अपने लोगों से क्या कहना चाहता है।

एलीशा ने उससे कहा, धनुष और तीर ले आ, वह उसके पास धनुष और तीर ले आया। तब उसने इस्राएल के राजा से कहा, धनुष पर अपना हाथ लगा, तब उसने अपना हाथ लगाया। तब एलीशा ने अपने हाथ राजा के हाथों पर धर दिए। तब उसने कहा, पूर्व की खिड़की खोल, जब उसने उसे खोल दिया तब एलीशा ने कहा कि तीर छोड़ दे। उसने तीर छोड़ा, और एलीशा ने कहा, यह तीर यहोवा की ओर से छुटकारे अर्थात् अराम से छुटकारे का चिह्न है, इसलिये तू अपेक में अराम को यहां तक मार डालेगा कि उनका अन्त कर डालेगा।

और हम पाते हैं कि उसने तीन बार तीर चलाया और तीन बार योआश ने अरामियों को पराजित किया। एलीशा उससे क्रोधित हुआ क्योंकि उसे अधिक बार मारना चाहिए था। परन्तु जो मैं करनेवाला हूं वह यह है कि राजा के हाथ पर एलीशा का हाथ रखना ही वह कारण था जिसने राजा के तीर को प्रभावशाली बनाया। पुनः यह अलौकिक क्षेत्र में है परन्तु यह दर्शाता है कि जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर हाथ रखता है तो कुछ वास्तविक हो सकता है।

अब आईए, हम नया नियम पर जाएं और मैं हाथ रखने के विषय में नया नियम में दिये गए उद्देश्यों पर विचार करना चाहता हूं। सबसे पहले बीमार को चंगाई देने के लिये। जब यीशु ने अपने चेलों को आदेश दिया तो मरकुस 16:16 और आगे के पदों में उसने कहा:

और विश्वास करनेवालों में ये चिह्न होंगे...।

और पांचवां चिह्न था:

वे बीमारों पर हाथ रखेंगे और वे चंगे हो जाएंगे।

दूसरे शब्दों में बीमार पर हाथ रखना उन तक परमेश्वर की चंगाई पहुंचाने का एक तरीका था।

याकूब 5:14-15 में एक और संस्कार बताया गया है। वचन कहता है:

यदि तुम में से कोई रोगी हो, तो कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए और वे प्रभु के नाम से उस पर तेल मलकर उसके लिये प्रार्थना करें।

अतः यह समान है, उन्हें उसके लिये प्रार्थना करना है, उन्हें उस पर हाथ रखने हैं परन्तु उन्हें उसे तेल अभिषेक भी करना है। और जैसा कि मुझे निश्चय है कि आप जानते हैं, तेल हमेशा ही पवित्र आत्मा का रूपक है। अतः तेल चंगाई नहीं लाता है परन्तु यह बीमार व्यक्ति की देह में पवित्र आत्मा के कार्य का संकेत था।

अब मुझे एक सलाह देनी है। केवल हाथ रखने और तेल के अभिषेक के साथ हाथ रखने में क्या अन्तर है? मैं आपको सलाह देता हूं कि यह लगभग समान है कि तेल के अभिषेक के बिना हाथ रखना उन लोगों के लिये था जो कलीसिया के सदस्य नहीं होते थे। परन्तु कलीसिया के सदस्यों के लिये इस संस्कार में तेल के साथ अभिषेक शामिल था। और पुनः मैं आपको बताना चाहता हूं कि नये नियम की प्रत्येक विश्वासी को सामान्य तौर पर एक कलीसिया का भाग होना चाहिए क्योंकि वह कहता है, "यदि तुम में से कोई रोगी हो, तो कलीसिया के प्राचीनों को बुलाए और वे प्रभु के नाम से उस पर तेल मलकर उसके लिये प्रार्थना करें।" अब यदि आप रविवार की सुबह एक कलीसिया में जाते हैं और रविवार की शाम दूसरी कलीसिया में जाते हैं तो आप किस कलीसिया के प्राचीनों के समूह को बुलाएंगे? और यदि आपके पास बुलाने के लिये प्राचीन नहीं हैं तो बीमार होने पर आप क्या करेंगे? दूसरे शब्दों में, बहुत से अपवादों के साथ नया नियम बताता है कि एक विश्वासी एक सभा का सदस्य होगा, नेतृत्व के लिये परिचित होगा और नेतृत्व को पहचानने वाला होगा और उसके लिये नेतृत्व की सेवा के लिये उपलब्ध होगा।

अब आईए, मुझे कुछ और बताने दीजिए। यह इस विषय से संबन्धित नहीं है परन्तु प्रकाशितवाक्य दो और तीन अध्याय से संबन्धित है, सात सन्देश भेजे गए। वे सात कलीसियाओं को भेजे गए हैं - केवल कलीसियाओं को। कोई जो कलीसिया में शामिल नहीं था, उसे सन्देश नहीं मिला था। मैं महसूस करता हूं कि परमेश्वर चाहता है कि मैं इस पर जोर दूं। मैं महसूस करता हूं कि आप में से कुछ पर्वतीय बकरियों के समान हैं, आप झुण्ड से आगे चल रहे हैं और आपका कोई अगुवा नहीं है। यह एक खतरनाक स्थान है। मानवीय अधिकार के अधीन अपने आपको करना नम्रता होती है परन्तु परमेश्वर दीनों को अनुग्रह देता है और अभिमानियों का सामना करता है, अतः आपको चुनाव करना है।

इसके अपवाद हैं, ऐसी स्थितियां आती हैं जहां यह लागू नहीं होता है। यदि आपको नियम का भाग होना है तो अपवाद मत बनिए।

अब अगला उद्देश्य जिसके लिये हाथ रखना उचित है, वह पवित्र आत्मा का वरदान देने के लिये है। सबसे पहले प्रेरितों 8 में हम पढ़ते हैं, कि किस प्रकार फिलिप्पुस सामरिया शहर में गया और मसीह का प्रचार किया और चिह्नों और चमत्कारों के द्वारा सुसमाचारों को दृढ़ किया और शहर के सभी लोगों ने बपतिस्मा लिया जिन्होंने बपतिस्मा लिया था। अतः उन्होंने उद्धार पाया, "जो कोई विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा।" परन्तु प्रेरित लोग सन्तुष्ट नहीं थे क्योंकि वे जानते थे कि कुछ रह गया है। अतः प्रेरितों 8:14 में वचन कहता है:

जब प्रेरितों ने जो यरूशलेम में थे सुना कि सामरियों ने परमेश्वर का वचन मान लिया है, तो पतरस और यूहन्ना को उनके पास भेजा और उन्होंने जाकर उनके लिये प्रार्थना की कि पवित्र आत्मा पाएं क्योंकि वह अब तक उनमें से किसी पर न उतरा था। क्योंकि उन्होंने तो केवल प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा लिया था।

और जैसा कि मैंने कल बताया था यह पुनः एक स्पष्ट संकेत है कि यह संभव है कि बिना पवित्र आत्मा पाए उद्धार पाएं। वहां पवित्र आत्मा को उन पर उतरते हुए बताया गया है जिसे मैं ऊपर से डुबोना कहता हूं, एक नियाग्रा जलप्रपात जैसा डुबोना।

पद 17 कहता है:

तब उन्होंने उन पर हाथ रखे और उन्होंने पवित्र आत्मा पाया। जब शमौन ने देखा कि प्रेरितों के हाथ रखने से पवित्र आत्मा दिया जाता है तो उनके पास रुपये लाकर कहा, कि यह अधिकार मुझे भी दो।

देखिए, वचन कहता है कि प्रेरितों के हाथ रखने से पवित्र आत्मा दिया गया।

और अगले अध्याय में दमिश्क के मार्ग पर यीशु के साथ शाऊल की मुलाकात के बाद जब वह दमिश्क में एक घर में था, देखने में असमर्थ था, तीन दिन उपवास में था, हनन्याह जो केवल एक शिष्य था, प्रेरित नहीं था, न ही भविष्यद्वक्ता था, केवल एक शिष्य था, प्रभु से निर्देश पाया कि उस घर में जाए जहां शाऊल था, उस पर अपना हाथ रखे और उसके लिये प्रार्थना करे। वचन कहता है, कि उसने उस पर हाथ रखे और उसने पुनः दृष्टि पाई, उसने पवित्र आत्मा पाया और उसने बपतिस्मा लिया। अतः हाथ रखने की सेवा केवल उन लोगों तक सीमित नहीं है, जो विशेष सेवा करते हैं। परमेश्वर की इच्छा के संदर्भ में कोई भी व्यक्ति किसी और पर हाथ रखने के लिये निर्देशित किया जा सकता है।

जब हम कार्यालय में बैठे थे तब रूथ ने मुझे याद दिलाया - यह अपेक्षाकृत एक असाधारण कहानी है। हम हवाई में कोना में थे और मैं बहुत बिमार था। मैं अब भी चंगाई से बहुत दूर था। हम मुख्य सड़क की ओर जा रहे थे और एक व्यक्ति दौड़ता हुआ हमारे पास आया और कहा, "क्या आप मेरे लिये प्रार्थना करेंगे? मैं बिमार हूं।" मैंने कहा, "आपकी समस्या क्या है?" उसने कहा, "मुझे बिजली का झटका लगा है।" आप जानते होंगे कि इसका अर्थ क्या है, मेरा मतलब है, उसे बिजली लगी थी। वह बिजली का काम करनेवाला था। उसके कन्धे लकवा मार गए थे। उन्होंने (इशारा करते हुए) बताया कि वह उसके ऊपर हाथ नहीं उठा पा रहे हैं। अतः, एक प्रकार से, मैं यह करने में हिचक रहा था परन्तु वह दृढ़ था। अतः, हम सड़क के बीच एक रेस्तरां के सामने रुक गए और हमने प्रार्थना किया। रूथ ने उसके कन्धों पर अपने हाथ रखे।

अगले दिन, 'यूथ विथ अ मिशन' के मनन के समय उसने अपने हाथों को अपने सिर के ऊपर उठाया। हाथ रखने के द्वारा उसने एक आश्चर्यकर्म का अनुभव किया था।

बाद में जब हम अरिज़ोना में सेवा कर रहे थे तो वह हमसे मिलने आया और उसने हमें बताया कि वह एक डॉक्टर के पास जांच के लिए गया था। डॉक्टर ने कहा, "मैंने तुम्हारे कन्धों की जांच की है, इस बात की कोई संभावना नहीं थी कि तुम कभी अपने हाथों को ऊपर उठा पाते।" हां, यह इस बात का एक छोटा सा उदाहरण है कि हाथ रखने से क्या हो सकता है।

पुनः इफिसुस में। पूर्व में एक अन्य संदर्भ में हम इसे देख चुके हैं। पौलुस वहां पहुंचा और वहां कुछ शिष्यों को पाया परन्तु वे केवल यूहन्ना बपतिस्मादाता के शिष्य थे। पौलुस ने उन्हें सुसमाचार विस्तार से बताया। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लिया। जब पौलुस ने उन पर अपने हाथ रखे तो उन्होंने अन्यभाषाओं में बात की और भविष्यद्वाणी की। अतः हाथ रखना पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के हस्तान्तरण का बाइबल सम्मत तरीका है।

वास्तव में, नये नियम में पांच मुख्य उदाहरण हैं और यह रोचक हैं। दो मामलों में, पिन्तेकुस्त के दिन और कुरनेलियुस के घर में यह सर्वोच्च रूप से परमेश्वर की ओर से आया। अन्य तीन मामलों में अर्थात् सामरिया में, तरसुस के शाऊल के साथ और इफिसुस में, हाथ रखने के द्वारा यह हस्तान्तरित हुआ। अतः यह बताता है कि परमेश्वर कैसे अगुवाई देता है। मुझे अक्षरशः सैकड़ों लोगों को पवित्र आत्मा के बपतिस्मा के लिये अगुवाई देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मेरी विशेष सामर्थ्य इस बात में है कि यदि लोग प्रभु को खोज रहे हैं तो उन्हें विश्वास तक पहुंचाए और वे प्राप्त करें। मैं लोगों पर हाथ रखता हूं परन्तु प्रायः नहीं और मैं कह सकता हूं कि परमेश्वर के अनुग्रह से मैंने हजारों लोगों को प्रभु से सीधे प्राप्त करते हुए देखा है।

अब हम आगे बढ़ेंगे। हां, हाथ रखने का अगला उद्देश्य कलीसिया के सेवकों को, कभी कभी डीकन भी कहा जाता है, आदेशित करना है। मुझे आश्चर्य है कि कुछ कलीसियाओं को जब यह पता चलेगा कि यूनानी भाषा में 'डीकन' शब्द का अर्थ 'सेवक' होता है। मेरा मतलब है कुछ कलीसियाओं में 'बोर्ड ऑफ डीकन्स' के पास कई सारे अधिकार होते हैं, यदि उन्हें 'बोर्ड ऑफ सर्वेन्ट्स' कहा जाए तो कैसा रहेगा? अब देखिए, हमने अपने कुछ शब्दों में मिलावट कर दी है।

एक बार मैं और रूथ पाकिस्तान जा रहे थे और हमें इमिग्रेशन की जांच से होकर गुजरना था। वह जो पाकिस्तानी व्यक्ति था उसने मुझसे कहा, "तुम क्या करते हो?" वह एक मुस्लिम देश था और मैंने सोचा कि मुझे सावधान होने की आवश्यकता है। मैंने कहा, कि "मैं एक मिनिस्टर हूं।" मैंने सोचा कि यह एक सुरक्षित शब्द है जिसे अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। तब से मैंने सब जगह अच्छी आवभगत पाई। मैं मुख्य अधिकारी तक और उसके आगे तक भी पहुंचा। बाद में मैंने समझा कि उसने सोचा था कि मैं संयुक्त राज्य के शासन का कोई मन्त्री हूं। देखें, हम मिनिस्टर शब्द के वास्तविक अर्थ से कोसों दूर हैं जो कि सेवक है।

भाइयों, बहनों, यदि आप एक मिनिस्टर हैं तो आप सेवक हैं। प्रभु का सेवक और प्रभु के लोगों का सेवक।

प्रेरितों 6 में कलीसिया एक बहुत अच्छी समस्या में जा पड़ी थी। वे इतनी तेजी से बढ़ रहे थे कि वे गरीबों और विधवाओं की देखभाल नहीं कर पा रहे थे जिन्हें देखभाल की आवश्यकता थी।

मुझे नये नियम की कलीसिया के विषय में एक और बात बताने दीजिए। उन्होंने एक मत से अपनी विधवाओं के प्रति जिम्मेदारी को स्वीकार किया, उस पर ध्यान दिया गया। आज की समस्या यह है कि सरकार ने बहुत सारे कार्यों को अपने हाथों में ले लिया है कि कलीसिया वास्तव में अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझती है, परन्तु मैं अब भी विश्वास करता हूं कि गरीबों के प्रति उसकी जिम्मेदारी है, चाहे जिस किसी रीति से उस जिम्मेदारी को पूरा किया जाए।

अतः, प्रेरितों के पास विश्वासी लोग आए और कहा, "सब कुछ सही नहीं चल रहा है, हमारी विधवाओं को अनदेखा किया जा रहा है।" अतः प्रेरितों ने कहा, "ठीक है, हम कदम उठाएंगे।" यह एक निर्णायक स्थिति है।

तब बारहों ने चेलों की मण्डली को अपने पास बुलाकर कहा, यह ठीक नहीं कि हम परमेश्वर का वचन छोड़कर खिलाने-पिलाने की सेवा में रहें। इसलिये हे भाइयों, अपने में से सात सुनाम पुरुषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो, कि हम उन्हें इस काम पर ठहरा दें। परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।

प्रेरितीय सेवा क्या है? प्रार्थना और वचन की सेवा। यह प्रशासन नहीं है। उन्होंने कहा कि हम प्रशासन के काम के लिये अन्य लोगों का चुनाव करेंगे। अतः उन्होंने कहा, "अपने बीच में से सात सुनाम पुरुषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो।" और उन सबको पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होना था, जब तक कोई पवित्र आत्मा से परिपूर्ण नहीं होता था तो प्रारंभिक कलीसिया में एक डीकन को भी नियुक्त नहीं किया जाता था।

यह प्रेरितों की बुद्धि थी क्योंकि वे आर्थिक मामलों की देखरेख करने जा रहे थे। अतः उन्होंने कलीसिया को पुरुषों का चुनाव करने दिया, तब उन्होंने उन पुरुषों को स्वीकार किया और उनका अभिषेक किया और उन्हें उनके पद पर आसीन किया। परन्तु इसके पश्चात् कलीसिया कभी भी इन पुरुषों के विषय में शिकायत नहीं कर सकी क्योंकि वे ही थे जिन्होंने चुनाव किया था। देखें, परमेश्वर कैसा बुद्धिमान है।

अतः वचन कहता है कि उन्होंने इन पुरुषों को लाया और प्रेरितों के सामने खड़ा किया और जब उन्होंने प्रार्थना की, तब उन्होंने उन पर अपने हाथ रखे। वे उनका अभिषेक कर रहे थे। यदि आप डीकन कहना चाहें लेकिन यहां डीकन शब्द का उपयोग नहीं किया गया है। मैं सहायक कहना पसन्द करूंगा। प्रेरितों ने कहा कि हम बहुत व्यस्त हैं, हमें सहायकों की आवश्यकता है।

सहायक की स्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण थी। यह देखना रोचक है कि उन दो पुरुषों के साथ क्या हुआ। स्तिफनुस पहला शहीद हुआ और फिलिप्पुस परमेश्वर द्वारा माना गया सुसमाचारक बना। अतः भाई या बहन, यदि आप एक सेवक की दशा में प्रारंभ करते हैं, तो इस बात को मन में रखें कि यह किसी और बात की ओर कदम बढ़ाना होगा। वास्तव में, यदि आप एक सेवक के रूप में प्रारंभ नहीं करते हैं तो आप कभी भी सचमुच परमेश्वर के द्वारा पदोन्नत नहीं किये जाएंगे, क्योंकि परमेश्वर उन्हीं लोगों को पदोन्नत करता है जो निचली सीढ़ी से प्रारंभ करते हैं।

हाथ रखने का अगला उद्देश्य प्राचीनों को भेजना है। मुझे नहीं मालूम कि आप में से कुछ लोग सोचते होंगे कि नये नियम में केवल 12 प्रेरित ही हैं। यह ऐसा नहीं है। मैंने गिना है लगभग 20 लोग हैं जिन्हें प्रेरित कहा गया है। 12 मूल प्रेरित थे और फिर और भी प्रेरित थे जिनके बारे में नाम लेकर बताया गया है। हम उनमें से कुछ को देखेंगे।

प्रेरितों 13 में वचन अन्ताकिया की कलीसिया के बारे में कहता है, जो बहुत प्रकार से एक आदर्श कलीसिया थी। वास्तव में, कुछेक बातों में यह यरूशलेम की कलीसिया से आगे बढ़ गई थी जो थोड़ा बहुत ठहर गई थी जिसे मैं आन्तरिक ध्यान कहता हूं। देखें, आज यह हमारी कलीसियाओं की बड़ी समस्याओं में से एक है। बहुत सी कलीसियाएं आन्तरिक बातों पर बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित किये हुए हैं कि उन्हें असली काम के लिये बहुत कम समय मिलता है, जो कि उन लोगों को सुसमाचार प्रचार करना है जिन्होंने कभी नहीं सुना है। परन्तु अन्ताकिया के लोगों का एक भिन्न दर्शन था और यह बहुत महत्वपूर्ण है। प्रेरितों 13 पद 1 से:

अन्ताकिया की कलीसिया में कितने भविष्यद्वक्ता और उपदेशक थे, (उनमें से पांच के नाम दिये गए हैं) अर्थात् बरनबास और शमौन जो नीगर कहलाता है, और लूकियुस कुरेनी, और देश की चैथाई के राजा हेरोदेस का दूध भाई मनाहेम और शाऊल।

अब, यदि आप भविष्यद्वक्ताओं और उपदेशकों के लिये विश्वास कर सकते हैं, तो प्रेरितों के लिये भी द्वार खुला है। मैं आपको दिखाऊंगा कि कैसे हैं।

जब वे उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे...।

और मैं सोचता हूं कि एन.आई.वी. अनुवाद कहता है, "जब उन्होंने प्रभु की उपासना की।" यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, मैं इस विषय में बाद में बात करूंगा। बहुत कुछ के लिये आराधना कुंजी है।

जब वे उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे, तो पवित्र आत्मा ने कहा, मेरे निमित्त बरनबास और शाऊल को उस काम के लिये अलग करो जिसके लिये मैंने उन्हें बुलाया।

ध्यान दें कि पवित्र आत्मा ऐसे बात कर रहा है मानो परमेश्वर हो। मेरे निमित्त इन दो पुरुषों को अलग करो। आप क्या सोचते हैं कि पवित्र आत्मा ने यह कैसे कहा? क्या आपको लगता है कि यह एक अशरीरिक आवाज़ थी जो आई या आप सोचते हैं कि उसने उन पांचों पुरुषों में से एक के द्वारा बात किया? आप सोच सकते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से विश्वास करता हूं कि यह संभवतः एक भविष्यद्वाणी की आवाज़ थी।

तब उन्होंने उपवास और प्रार्थना करके...।

और मैं उपवास और प्रार्थना में बहुत अधिक विश्वास करनेवाला व्यक्ति हूं। उस विषय में जाने के लिये मेरे पास समय नहीं है, परन्तु बहुत सी बातें कलीसिया में तब तक नहीं होंगी, जब तक लोग उपवास और प्रार्थना करना न सीख जाएं। यह दूसरा अवसर था जब उन्होंने उपवास किया था। जब उन्होंने सन्देश पाया तो पहले से ही उपवास कर रहे थे।

तब उन्होंने उपवास और प्रार्थना करके और उन पर हाथ रखकर उन्हें विदा किया।

कृपया ध्यान दें कि उन्होंने जूनियर यूथ डायरेक्टर का चुनाव नहीं किया। उन्होंने दो मुख्य पुरुषों का चुनाव किया, उन्होंने अपने सर्वोत्तम को भेजा। सेवकाई को बाहर की ओर बढ़ाना नीचे से नहीं ऊपर से होता है। यहां पुनः एक अद्भुत सबक है जो कलीसिया को सीखना है। लोग, चाहें आप उन्हें मिशनरी कहें या कुछ भी कह लें, वे कमतर सेवा वाले निचली पंक्ति के लोग नहीं हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा चुने गए उच्च स्तर के लोग होने हैं। परन्तु हमने अपनी आन्तरिक ढांचे पर पूरी तरह गलत प्रकार से जोर दिया है और हम अपने आप में इतने अधिक संकुचित हो गए हैं, कि हम में सचमुच प्रभु का दर्शन नहीं पाया जाता है।

मुझे नहीं मालूम कि क्या आप मुझे यह कहने के लिये क्षमा करेंगे? परन्तु मैं कहता हूं, कि कुछ देशों में पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य में लोग टोलेमी के दिनों के नक्षत्र विज्ञानियों के जैसे हैं। यदि आप नक्षत्र विज्ञान के विषय में थोड़ा बहुत जानते हैं और मुझे बहुत अधिक नहीं पता है। परन्तु टोलेमी इस बात का कायल था कि सूर्य पृथ्वी के चारों तरफ घूमता है। तब कॉपरनीकस आया और उसने कहा, "यह सही नहीं है, बल्कि इसके विपरीत सही है।" पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है और अत्यधिक उग्रवादिता के कारण कलीसिया ने यह कहने के लिये उस व्यक्ति को मृत्यु दण्ड देना चाहा। वह अपनी पत्नी के साथ बच निकला। कलीसिया इतनी परेशान क्यों हुई? क्योंकि यह उनकी परम्परा के विपरीत था। मैं कहता हूं कि बहुत से मसीही अब भी टोलेमी के युग में जीते हैं। वे अब भी विश्वास करते हैं कि पुत्र, परमेश्वर हमारे चारों तरफ घूमता है। उन्हें अब तक नहीं मालूम कि उसका उलट होता है। हम पुत्र के चारों ओर घूमते हैं।

यीशु यहां हमारे लाभ के लिये नहीं है। हम उसकी महिमा के लिये हैं। आप देख सकते हैं कि कुछ गीत जो गाये जाते हैं, वे इस बात पर केन्द्रित होते हैं कि यीशु मेरे लिये क्या करेगा। यह अद्भुत है! परन्तु उस बात से कम महत्वपूर्ण है कि हम यीशु के लिये क्या करेंगे। इसी बात पर जोर दिया गया है।

हालांकि, कलीसिया ने दो सबसे श्रेष्ठ व्यक्तियों को भेजा। जब उन्हें भेजा गया तो भविष्यद्वक्ता और शिक्षक थे, परन्तु यदि आप अगला अध्याय 14 पढ़ेंगे, तो इन्हीं दो पुरुषों के विषय वचन एक बात कहता हैः

परन्तु नगर के लोगों में फूट पड़ गई थी, इससे कितने तो यहूदी की ओर और कितने प्रेरितों की ओर हो गए।

और तब पद 14 कहता है:

परन्तु बरनबास और पौलुस प्रेरितों ने जब सुना।

अतः, वे प्रेरित बन गए थे। वे कैसे प्रेरित बने थे? पवित्र आत्मा के निर्देशन में वे कलीसिया से बाहर भेजे जाने के द्वारा। प्रेरित शब्द का अर्थ "भेजा गया" होता है। यदि आप भेजे नहीं गये हैं, तो आप प्रेरित नहीं हैं। तो यहां दो पुरुष हैं जो मूल बारहों में शामिल नहीं हैं। पौलुस और बरनबास अब प्रेरित कहलाते हैं। वे प्रेरित कैसे बने? पवित्र आत्मा की नियुक्ति से। वे प्रार्थना कर रहे थे, उपवास रख रहे थे, और परमेश्वर की आराधना कर रहे थे। और जब कलीसिया ये बातें करती है, तब हम प्रेरितों को निकलते हुये देखेंगे।

ठीक है, अब हम नये नियम में हाथ रखने का अगला उपयोग प्राचीनों को नियुक्त करने के संबन्ध में देखते हैं, जिस अध्याय में हम थे वह कहता हैः

और उन्होंने हर एक कलीसिया में उनके लिये प्राचीन (बरनबास और पौलुस) ठहराए और उपवास सहित प्रार्थना करके उन्हें प्रभु के हाथ सौंपा।

अतः मूल रूप से प्राचीनों की नियुक्ति प्रेरितों की ओर से थी।

और तब तीमुथियुस जो इफिसुस में पौलुस का प्रतिनिधि था, 1 तीमुथियुस 5:17 में और आगे के पदों में वह कहता है, वह कहता है कि एक प्राचीन को कैसा व्यक्ति होना चाहिए:

जो प्राचीन अच्छा प्रबन्ध करते हैं, विशेष करके वे जो वचन सुनाने और सिखाने में परिश्रम करते हैं, दुगुने आदर के योग्य समझे जाएं।

अब, "दुगुना आदर," यदि आप नये नियम का विश्लेषण करें अर्थात् कुछ प्रकार का आर्थिक पारिश्रमिक। नये नियम में 'आदर' शब्द केवल एक खाली पदनाम नहीं है, परन्तु इसका अर्थ है, कि आप ऐसे लोगों की जरूरतों को पूरा करने के द्वारा उनके प्रति आदर दिखाते हैं। मैंने कई बार कहा है, कि यदि आप शून्य को दो बार लिखेंगे, तब भी आपको शून्य मिलेगा। अतः पारिश्रमिक का एक स्तर होता है और वे जो परमेश्वर के वचन के लिये पूरा समय देते हैं, उन्हें उन लोगों के द्वारा पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए जिनकी वे सेवा करते हैं, जितना समय वे खर्च करते हैं उसके अनुसार।

आगे पौलुस कहता है कि प्राचीनों के साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए। पद 19:

कोई दोष किसी प्राचीन पर लगाया जाए, तो बिना दो या तीन गवाहों के उसको न सुनें।

यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। किसी एक व्यक्ति जो प्राचीन के पद पर है, उसके विषय में किसी आरोप को तब तक नहीं सुनो, तब तक कम से कम दो गवाह के द्वारा यह प्रमाणित न हो। मैंने बहुत से मामले देखे हैं, जबकि परमेश्वर के लोगों के विरुद्ध मिथ्या अपवाद फैलाया गया और लोगों ने बिना गवाहों के उसे स्वीकार भी कर लिया। कभी भी ऐसा न करें। क्योंकि सेवा में लोगों पर आक्रमण करने का शैतान का एक तरीका उनके विरुद्ध झूठे आरोप लगाना है। सुरक्षा यहां है। जब तक कम से कम दो गवाहों या तीन प्रत्यक्षदर्शियों के द्वारा समर्थन न किया जाए, तब तक आरोप पर विचार न किया जाए। यदि हम इस नियम पर चलें, तो कलीसिया में बहुत सी बातें बदल जाएंगी।

पद 21 में पौलुस आगे कहता है:

परमेश्वर और मसीह यीशु और चुने हुये स्वर्गदूतों को उपस्थित जानकर मैं तुझे चितावनी देता हूं, कि तू मन खोलकर इन बातों को मान करे, और कोई काम पक्षपात से न कर जिसका परमेश्वर के राज्य में कोई स्थान नहीं है।

तब वह कहता है,

किसी पर शीघ्र हाथ न रखना और दूसरों के पापों में भागी न होना, अपने आपको पवित्र बनाए रख।

अब यह प्राचीनों के साथ व्यवहार करने के संबन्ध में है। अतः जब वह कहता है, कि किसी पर शीघ्रता से हाथ न रखना, तो इसका अर्थ है कि किसी प्राचीन को शीघ्रता से नियुक्त न करना। इस बात में बहुत सावधान हों कि आप परमेश्वर का सामना रखें। बहुत सावधान हों कि उस व्यक्ति में अपेक्षित योग्यताएं हों। क्योंकि मैंने बहुत बार कहा है कि हाथ पीछे खींचने की तुलना में हाथ रखना बहुत आसान होता है। यदि एक बार आपने किसी गलत व्यक्ति को नियुक्त कर दिया, तो उससे पीछे छुड़ाना बहुत मुश्किल समस्या होती है। अतः पौलुस तीमुथियुस से कहता है, कि बहुत-बहुत सावधान हो। जब तक आपको परमेश्वर की नियुक्ति का पूरी तरह निश्चय न हो, तब तक नेतृत्व के लिये किसी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिये हाथ न रखे।

और तब वह कहता है, कि दूसरों के पापों के भागी न बनें। क्योंकि यदि आप या मैं किसी ऐसे व्यक्ति को प्राचीन के रूप में नियुक्त करें जो योग्य न हों, जो कलीसिया और परमेश्वर के लोगों का शोषण करे, तो मुझे उसके पाप में हिस्सा है। अतः, हमें बहुत-बहुत सावधान होना है।

फोर्ट लाउडरडेल की कलीसिया में मैं कहूंगा, जो कि हमेशा एक आदर्श कलीसिया नहीं है। परन्तु जब वे प्राचीनों की नियुक्ति करते हैं, तो मेरा विश्वास कीजिए, वे इसमें से होकर गुजरते हैं। मेरा मतलब है, वे व्यक्ति - अभी हाल ही में उन्होंने तीन की नियुक्ति की है - उन्हें दो दिनों तक प्रश्नों का उत्तर देना होता है। हर बात पर ध्यान रखा जाता है। मैं सोचता हूं कि शीघ्रता से प्राचीनों की नियुक्ति करने से कलीसिया में कई समस्याएं आती हैं।

आप देखो, हाथ रखने के विषय में कितनी सारी बातें सीखने को हैं। देखें, यह छोटी बात नहीं है। अतः उन सारे मामलों में हाथ रखने का क्या उद्देश्य था, चाहे वह सेवक हो या चाहे वह प्रेरित हों या चाहे वे प्राचीन हों? यह अधिकार के स्थानान्तरण और एक व्यक्ति को सेवा के लिये अलग करने, नियुक्त करने और सुसज्जित करने के लिये है।

अब, हाथ रखने का एक और अभिप्राय है। पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा और उसने कहा, "मैं तुम्हारे पास आना और तुम्हें कुछ आत्मिक वरदान देना चाहता हूं।" परन्तु वह उस समय नहीं गया, वह बाद में गया। 2 तीमुथियुस 1:6 में तीमुथियुस को लिखते हुए पौलुस कहता है:

इसी कारण मैं तुझे सुधि दिलाता हूं, कि तू परमेश्वर के उस वरदान को जो मेरे हाथ रखने के द्वारा तुझे मिला है, चमका दे।

अतः, पौलुस के हाथ रखने के द्वारा तीमुथियुस को एक वरदान स्थानान्तरित किया गया। अब वहां जिस यूनानी शब्द का उपयोग हुआ है, वह 'करिस्मा' है, जिससे करिस्मेटिक आया है। मुझे आपको अपना व्यक्तिगत विचार बताने दीजिए और आप मुझसे असहमत होने के लिये स्वतन्त्र हैं, तब भी आप स्वर्ग जा सकते हैं - ताकि आप मुझसे प्रेम करते रहें! मैं विश्वास करता हूं कि करिस्मा जो तीमुथियुस को दिया गया वह प्रेरिताई था, क्योंकि हम पाएंगे कि कुछ अन्य प्रेरित हैं।

अब, आईए तीमुथियुस की प्रेरिताई देखें। तीमुथियुस भी एक प्रेरित था। हो सकता है आप यह नहीं जानते हों, मैं आपको बाइबल में से दिखाऊंगा। 1 थिस्सलुनीकियों 1:1। यह पत्री तीन व्यक्तियों के द्वारा लिखी गई है, जो कि नये नियम में सामान्य बात थी: थिस्सलुनीकियों की कलीसिया को पौलुस, सीलवानुस - जो सीलास कहने का दूसरा तरीका है और तीमुथियुस द्वारा। अतः, ये लोग पत्र के लेखक थे। केवल पौलुस ही नहीं, बल्कि पौलुस, सीलास और तीमुथियुस।

तब उस पत्री के अध्याय 2 पद 6 में यही मनुष्यों ने - पौलुस, सीलास, और तीमुथियुस ने कहा:

और यद्यपि हम मसीह के प्रेरित होने के कारण तुम पर बोझ डाल सकते थे, तौभी हम मनुष्यों से आदर नहीं चाहते थे और न तुमसे और न और किसी से।

अतः, ये सभी तीन व्यक्ति - पौलुस, सीलास और तीमुथियुस प्रेरित थे। आपको समझ में आया, प्रेरितों की सेवा पुरानी नहीं पड़ गई थी क्यों इफिसियों में परमेश्वर कहता है, कि उसने कलीसिया में तब तक प्रेरितों को रखा है, जब तक सभी विश्वास की एकता में न आ जाएं। क्या यह सही है? अतः, प्रेरितों की आवश्यकता है, पास्टरों, प्रचारकों, भविष्यद्वक्ताओं, शिक्षकों सभी की तब तक आवश्यकता है, जब तक काम पूरा न हो।

अतः मैंने अभी अभी आपको बताया है कि अब हमारे पास कितने पुरुष हैं। हमारे पास पौलुस, बरनबास, सीलास, तीमुथियुस हैं। हां, यह ठीक है, तो पिन्तेकुस्त के दिन के पश्चात् चार या पांच प्रेरित नियुक्त किये थे।

मैं तीमुथियुस की प्रेरिताई के सवाल पर कुछ समय खर्च करना चाहता हूं। मैंने आपको बताया है कि तीमुथियुस प्रेरित कहलाया। वह कैसे प्रेरित बना? मुझे लगता है, कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्योंकि मैं विश्वास करता हूं कि हमें कलीसिया में प्रेरितों की बहुत अधिक आवश्यकता है। ध्यान दीजिए, मुझे यह बताना है कि यीशु ने इफिसुस की कलीसिया के बारे में टिप्पणी की क्योंकि उन्होंने उनके विषय में मुकद्दमा किया जिन्होंने कहा था कि वे प्रेरित हैं और नहीं थे और झूठे पाए गये। प्रेरित होने के बारे में प्रत्येक के दावे को स्वीकार मत कीजिए उनकी जांच होनी चाहिए। आप जानते हैं, कि झूठों का अन्त क्या है। क्या आप जानते हैं? क्या आप नहीं जानते हैं कि झूठों का अन्त कहां होगा? उनका अन्त आग की झील है। अतः, यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है। यदि कोई प्रेरित होने का दावा करता है और नहीं है, तो वह आग की झील की ओर जा रहा है।

अब आईए, इस स्थिति को देखो, प्रेरित 16। पौलुस ने सीलास के साथ अपनी दूसरी मिशनरी यात्रा प्रारंभ की है और पद 1 में वचन कहता है:

फिर वह दिरवे और लुस्त्रा में भी गया और देखो वहां तीमुथियुस नाम एक चेला था जो किसी विश्वासी यहूदिनी का पुत्र था, परन्तु उसका पिता यूनानी था और लुस्त्रा और इकुनियुम के भाइयों में सुनाम था।

अब एक बार जो सामान्य तौर पर किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिये आवश्यक है जो कलीसिया में महत्वपूर्ण पद संभालने जा रहे हैं, वह यह है कि उनकी अपनी कलीसिया से उनके विषय में एक अच्छी टिप्पणी मिली थी। यदि उनके अपने लोग उनके विषय में अच्छा नहीं कह सकते हैं, तो इस बात का अधिक महत्व नहीं है कि अन्य लोग उनके बारे में क्या कहेंगे।

वर्षों पूर्व मैं ऐसी स्थिति में था जहां हमारे पास सहकर्मी के रूप में एक स्त्री भेजी गई जब कि हम स्वीडेन से यरूशलेम में थे। मेरी पहली पत्नी लुदिया जो बहुत तेज थी, उसने सभी सिफारिशों को पढ़ा जो बहुत अधिक थे। उसने कहा, इन सब में एक बात की कमी है। इसमें उसकी अपनी कलीसिया की सिफारिश नहीं है। हमने उसे ले लिया और बहुत पछताया। वह बहुत सी समस्याओं का कारण थी। अतः मैं वास्तव में, उस सबक में दक्ष होने का प्रयास करता हूं। जब आप एक व्यक्ति का चुनाव करते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश उन लोगों की होती है, जो उनके साथ रहे हैं, जिन्होंने उनके साथ काम किया है, जो उन्हें जानते हैं। यदि वे उनकी सिफारिश नहीं कर सकते हैं, तो अन्य कोई भी सिफारिश अधिक काम की नहीं है।

परन्तु तीमुथियुस के पास कलीसियाओं के प्राचीनों का अच्छा रिपोर्ट था। अतः, पौलुस ने उसे साथ लिया और कहा, "तू मेरे साथ आ।" और बाद में हम पढ़ते हैं हमें सावधानीपूर्वक इसे पढ़ना है, 1 तीमुथियुस 4:14 में पौलुस ने तीमुथियुस से कहा:

उस वरदान से जो तुझ में है और भविष्यद्वाणी के द्वारा प्राचीनों के हाथ रखते समय जो तुझे मिला था, निश्चिन्त न रह।

अतः, मेरा निष्कर्ष यह है, कि एक भविष्यद्वाणी यह कहते हुए दी गई, कि तीमुथियुस को पौलुस और सीलास के साथ बाहर जाना है। भविष्यद्वाणी की उस वचन के आधार पर और उसके चरित्र के विषय में अपनी जानकारी के कारण स्थानीय प्राचीनों ने तीमुथियुस पर हाथ रखे और उसे भेजा। उसे वरदान मिला, या प्रेरिताई का करिस्मा मिला। मैं इसे इसी प्रकार समझता हूं।

अब हम इसे उस बात के साथ सन्तुलित कर सकते हैं, जो हमने पहले ही 2 तीमुथियुस 1:6 में पढ़ लिया है, जहां पौलुस तीमुथियुस से कहता है:

इसी कारण मैं तुझे सुधि दिलाता हूं, कि तू परमेश्वर के उस वरदान को जो मेरे हाथ रखने के द्वारा मिला है चमका दे।

इसे समझने के कई तरीके हैं। मैं सोचता हूं कि सबसे उचित तरीका लुस्त्रा की इस परिस्थिति में है जब भविष्यद्वाणी की जाती थी और उसे परखा जाता था और भविष्यद्वाणी ने कहा कि तीमुथियुस को पौलुस और सीलास के साथ बाहर जाना है, प्राचीनों ने कहा, "हम उसे भेजते हैं," पौलुस ने कहा, "हम उसे स्वीकार करते हैं," और पौलुस और प्राचीनों ने उस पर हाथ रखे और उसे प्रेरिताई का करिस्मा दिया।

यह ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है कि भविष्यद्वाणी बहुत उल्लेखनीय थी। भविष्यद्वाणी या तो उल्लेखनीय होती है या फिर समय की बरबादी होती है। 1 तीमुथियुस 1:18 में तीमुथियुस को लिखते हुए पौलुस ने कहाः

हे पुत्र तीमुथियुस, उन भविष्यद्वाणियों के अनुसार जो तेरे विषय में की गई थीं, मैं यह आज्ञा सौंपता हूं कि तू उनके अनुसार अच्छी लड़ाई को लड़ता रहे।

तो यह भविष्यद्वाणी का वास्तविक उद्देश्य है। यह ऐसे व्यक्ति को उत्साहित करने के लिये है, जो विरोध सहने जा रहा है और जानता है, कि परमेश्वर ने सचमुच उसे चुना है। मैंने अपनी पुस्तक "हाथ रखना" में इस विषय को शामिल किया है और न्यूजीलैण्ड के बारे में और वहां के एक जाने-पहचाने मसीही अगुवे के बारे में है जिनका नाम मैं यहां नहीं लूंगा, जब वे संयुक्त राज्य में थे तो जिनके विषय में भविष्यद्वाणी की गई थी कि उन्हें एक निश्चित कार्य करना है। वे बहुत ही अधिक निराश हो गए और लगभग पीछे हटने ही वाले थे जब उन्होंने यह पुस्तक पढ़ी और कहा, "मैं भविष्यद्वाणी के अनुसार जाऊंगा।" मैं बताऊंगा कि वह कौन हैं। यह सुबोधगम्य नहीं था। यह सचमुच में उन बातों में से एक था जिसके कारण वे अब इस सेवा में थे, जिसने अब इस देश को और बहुत से अन्य लोगों को प्रभावित किया था।

देखें, कि यदि पवित्र आत्मा में होकर भविष्यद्वाणी की जाती है तो यह कितनी महत्वपूर्ण होती है। मित्रों, मुझे आपको बताना है, कि मैं बहुत सी भविष्यद्वाणियों से परेशान हूं। मैं इसे करिश्माटिक भविष्य बताना कहता हूं। लोग भीतर आते हैं, आप पर हाथ रखते हैं और कहते हैं, आप यह करेंगे और आप वह करेंगे, हो सकता है, परन्तु बहुत से मामलों में ऐसा नहीं होता है। आप जानते हैं? प्रेरितों 16 में एक भावी बतानेवाली स्त्री थी जिसने सबसे पहले पहिचाना कि पौलुस और सीलास कौन थे। फिलिप्पी शहर में किसी और के जानने से पहले ही वह जान गई थी कि वे परमेश्वर परमप्रधान के सेवक हैं जो हमें उद्धार का मार्ग दिखाते हैं, फिर भी वह शैतान की सेविका थी। मैं आपको इस विषय में चेतावनी देना चाहता हूं।

अब मैं संक्षिप्त रूप में कुछ खतरों और बचाव के बारे में बताना चाहता हूं। मेरे पास कुछ ही समय बाकी है। दो खतरे बताए गये हैं, सबसे पहले ऐसे व्यक्ति को शामिल करना जो अयोग्य हो, क्योंकि जब आप ऐसा करते हैं, तो आप गड़बड़ी करते हैं। जो गड़बड़ी वे करते हैं आप भी उसके भागीदार बनते हैं।

दूसरा यह है, जिसे मैं आत्मिक रूप से दूषित होना कहता हूं। आप किसी व्यक्ति पर दुष्टात्मा के छुटकारे के लिये हाथ रख सकते हैं, परन्तु आपको जानना है कि अपना बचाव किस प्रकार से करना है, क्योंकि यह एक गहरा आदान-प्रदान हो सकता है। या तो आप पवित्र आत्मा देंगे, या वह आत्मा (दुष्टात्मा) आपको प्रभावित कर सकता है। मैं एक घटना याद करता हूं, जब कि हममें से एक समूह सेना में रहने के दौरान एक व्यक्ति पर हाथ रखे जो गंभीर अवसाद का शिकार था। हमें परमेश्वर की ओर से वास्तविक अगुवाई नहीं थी, हमने ऐसे ही कर दिया था। आप जानते हैं क्या हुआ? हम सब अवसाद के शिकार हो गए। हमने स्वयं का बचाव नहीं किया था।

अतः, जब आप किसी पर हाथ रखते हैं, तो आपको सुरक्षा की जरूरत है। यह प्रार्थना और नम्रता से होता है। पवित्र आत्मा के निर्देशन में चलिए। जो लोग परमेश्वर की आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं।

यीशु के लहू के द्वारा सुरक्षित होईए। यह जानिए कि यीशु के लहू में अपने आपको सुरक्षित रखना है।

और मन में धारण कर लें कि जो यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम्हें शत्रु की सारी शक्ति पर अधिकार देता हूं, और तुझे कुछ हानि न होगी।" आमीन।

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