यीशु दो वाक्यांशों का उपयोग करता है जो हम सबके लिये प्रोत्साहन है। भजनसंहिता की पुस्तक से उद्धृत करते हुए वह कहता है:

यदि उसने उन्हें ईश्वर कहा जिनके पास परमेश्वर का वचन पहुँचा और पवित्रशास्त्र की बात लोप नहीं हो सकती।

तो उस एक पद में, यूहन्ना 10ः35 में यीशु ने बाइबल के लिये दो नामों का उपयोग करने का चुनाव किया जिसका उपयोग तब से उसके अधिकांश लोग करते आ रहे हैं: परमेश्वर का वचन और धर्मशास्त्र। अब उनका अर्थ बिल्कुल समान नहीं है जब यीशु बाइबल को परमेश्वर का वचन कहता है तो उसका तात्पर्य है कि यह परमेश्वर से आया है, यह एक ऐसा सन्देश है जो सीधे परमेश्वर से आया है। यह कई विभिन्न माध्यमों से होकर आया है, कई विभिन्न लेखकों के द्वारा लिखा गया है। परन्तु बाइबल में जो कुछ है उन सबका श्रोत, अन्तिम श्रोत परमेश्वर है। यह परमेश्वर का वचन है। यह परमेश्वर का सन्देश है।

परन्तु धर्मशास्त्र शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘‘जो कुछ लिखा हुआ है।’’ और यह सीमा है। परमेश्वर ने बहुत से वचन कहे हैं जो बाइबल में नहीं हैं। परन्तु बाइबल में वे ही वचन हैं जिनको परमेश्वर ने हमारे लाभ के लिये लिखित रूप में दर्ज करने के लिये चुना है। और हमें हमेशा इस बात को स्मरण रखने की आवश्यकता है कि बाइबल में जो कुछ है वह मनु‘य के लाभ के लिये है। इसमें वह सब कुछ है जिसकी हमें जीवन में सर्वोत्तम मार्ग पाने के लिये जानने और परमेश्वर के साथ अनन्तता में रहने के लिये इस संसार में होकर सुरक्षित यात्रा करने के लिये आवश्यक है।

तो मैं आज शाम आपके सामने इस बात के विभिन्न पहलुओं को संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करना चाहता हूँ कि परमेश्वर का वचन क्या करेगा। मैं उनमें से किसी पर भी अधिक बात करना नहीं चाहता हूँ क्योंकि यह बहुत लम्बा है। मैं केवल उन सारी बातों को समझने के लिये आपके मनों को खोलने का प्रयास करता हूँ जिसे परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमें उपलब्ध कराया है।

मेरी व्यक्तिगत पृ‘ठभूमि के कारण यह मेरे लिये व्यक्तिगत रूप से बहुत ही वास्तविक है। यह घोषणा की गई कि किंग्स काॅलेज कैम्ब्रिज में मैंने प्राचीन और आधुनिक दर्शनशास्त्र में फेलोशिप प्राप्त किया था और इस प्रकार मैं काम के हिसाब से एक दार्शनिक था। मैं एक दार्शनिक था क्योंकि मैं जीवन की समस्याओं का उत्तर खोज रहा था। मैं सचमुच जीवन का अर्थ और उद्देश्य पाना चाहता था। मुझे ठीक ठीक नहीं मालूम कि क्यों परन्तु मुझे लगता है कि मेरा जन्म ही अपने भीतर इस प्रश्न को लिये हुए हुआ है, ‘‘जीवन का अर्थ क्या है?‘‘ किशोरावस्था में पहुँचने पहले से ही मैं इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ रहा था। खैर मैंने नियमित रूप से दस वर्षों तक ब्रिटेन में कलीसिया में भाग लिया। क्योंकि जिन विद्यालयों में मैंने भाग लिया उन विद्यालयों की माँग थी कि हम चैपल में भी भाग लें। और मैं कई बातों से प्रभावित हुआ जिसे मैंने बाइबल से सुना था। परन्तु मैंने यह महसूस नहीं किया कि जिस प्रकार मैंने मसीहियत को देखा था, कि उसमें कोई उत्तर है। अतः, जब मैं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गया तो मुझे प्रतिदिन चैपल नहीं जाना पड़ता था। मैंने निर्णय लिया कि मुझे जितना कलीसिया में जाना था वह सब मैंने अपने प्रारंभिक वर्षों में कर लिया है और मैं इस बात से आनन्दित था कि अब सब कुछ पूरा हो गया है। जीवन का अर्थ ढूँढ़ने के लिये मैं कहीं और जा रहा था। और मुझे लगता था कि यह खोजने का सबसे स्वाभाविक स्थान दर्शनशास्त्र है। मैं एक शोध छात्र बना और क्रमशः दर्शनशास्त्र का एक प्राध्यापक बन गया।

अपने शैक्षणिक कैरियर में मैं बहुत ही सफल था परन्तु मुझे उत्तर नहीं मिला था। और तब द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ और मैंने जाना कि मुझे ब्रिटिश सेना में बुलाया जानेवाला है और कौन जानता है कि आगे क्या होगा। सेना में आप अपने साथ बहुत सामान लेकर नहीं जा सकते हैं। आपको एक लम्बा सा गोल काले रंग का बैग रखना होता है जिसे किट बैग कहते हैं। तो मेरी बड़ी समस्या, जो अधिकांश लोगों की समस्या नहीं थी परन्तु मेरी समस्या यह थी कि मैं अपने साथ पढ़ने के लिये क्या लेकर जाऊँ। और मैंने क्रमशः निर्णय लिया कि संसार में एक पुस्तक है जो बहुत अधिक पढ़ी जाती है, मानव इतिहास में किसी भी पुस्तक से बढ़कर प्रभावशाली है। और यह एक प्रकार से दर्शनशास्त्र की पुस्तक है और मैंने अपने आप से कहा कि मुझे बहुत कुछ नहीं मालूम कि उस पुस्तक में क्या है। क्या आपको पता है कि मेरे मन में कौन सी पुस्तक थी? बाइबल। और मेरा अनुमान पूरी तरह सही था। निःसन्देह यह पुस्तक मानवजाति के संपूर्ण इतिहास में सबसे अधिका प्रभावशाली है। मैं सवाल करता हूँ कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति अपने आपको शिक्षित कह सकता है जो बाइबल के विषय में कुछ नहीं जानता है।

अतः मैंने स्वयं के लिये एक बढि़या नई काली बाइबल खरीदी है। मैं इस बात पर विश्वार नहीं कर सकता था कि काले रंग के अलावा बाइबल का कोई और रंग हो सकता है। मेरे मन में मूल रूप से धर्म का रंग काला था। मैंने कहा कि आप किस प्रकार बाइबल पढ़ते हैं। मैंने कहा आप प्रारंभ से आरंभ करें और अन्त तक उसे पढ़ें। तो सेना में अपनी पहली रात मैंने उत्पत्ति 1ः1 से पढ़ना शु: किया। खैर, मैंने बैरक कक्ष में अच्छी खासी हलचल मचा दी। वहाँ अन्य चैबीस नए सैनिक थे और जब उन्होंने मुझे बाइबल पढ़ते हुए देखा तो उन सबने फुसफुसाना प्रारंभ किया। मेरा मतलब है वे एक प्रकार से चकित थे।

समस्या यह थी कि जब मैं बाइबल नहीं पढ़ रहा था तो मैं उन लोगों के समान बिल्कुल भी नहीं जी रहा था जो नियमित बाइबल पढ़ते थे। इसके ठीक विपरीत मुझे अपने बहुत से पापों में जाने की जरूरत नहीं है परन्तु वे बहुत ही विशि‘ट थे।

तो मैं बाइबल पढ़ रहा था और एक वास्तविक अभक्ति का जीवन जी रहा था। और बाइबल वह पहली पुस्तक थी जिससे मेरा सामना हुआ जिसके लिये मेरे पास कोई बिकल्प नहीं था। मैं सभी प्रकार के लेखकों . युनानी, लतीनी, रूसी, फ्रान्सीसी . को पढ़ता था और हमेशा मेरे मन में एक विचार होता था कि वे क्या कह रहे हैं, यहीं पर वह सही है और यहाँ पर वह गलत है। परन्तु बाइबल के विषय में मैं नहीं जानता था कि वह किस बारे में है। मुझे नहीं मालूम था कि इसका वर्गीकरण कैसे करना है। क्या वह कविता थी? क्या वह इतिहास था? क्या वह मिथक था? क्या वह दर्शन था? यह किसी भी एक वर्ग में उपयुक्त प्रतीत नहीं हो रहा था।

खैर, नौ महीनों के बाद बाइबल के लेखक ने एक रात सेना के बैरक में मध्यरात्रि के दौरान् अद्भुत रूप से स्वयं को मुझ पर प्रगट किया। प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं को मुझ पर कुछ इस रीति से प्रगट किया कि उस रात्रि से अब तक दो बातें हैं जिन पर मैंने कभी सन्देह नहीं किया। पहला, यह कि यीशु जीवित है और दूसरा, कि बाइबल एक सच्ची, प्रासंगिक और समयानुसार लिखी गई पुस्तक है। जिस क्षण मैंने प्रभु यीशु से मुलाकात किया बाइबल मेरे लिये तुरन्त ही पूर्ण रीति से अर्थपूर्ण हो गया। एक लम्बे समय का संघर्ष नहीं रहा; यह एक दिन से अगले दिन तक था।

तो, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव और पृ‘ठभूमि है। इसलिये मैं बाइबल को बहुत उच्च स्थान देता हूँ। और इन वर्षों में जो मैंने बिता, हैं, उस दिन से लगभग पचास वर्षों से मुझे बाइबल अध्ययन करने और बाइबल को बताने और विभिन्न जाति और धार्मिक पृ‘ठभूमि, विभिन्न संस्कृति वाले हजारो लोगों को बाइबल सिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। और मैंने पाया है कि बाइबल वह एक मात्र पुस्तक है जो हर रा‘टं में, हर संस्कृति में हर एक से बात करती है। अतः मैं बाइबल से शर्मीन्दा नहीं हूँ। मैं कभी भी बाइबल में विश्वास रखने के लिये खेद व्यक्त नहीं करता हूँ। मैं मानता हूँ कि मसीहियों को बाइबल में अपने विश्वास के लिये कभी खेद व्यक्त नहीं करना चाहिए। उन्हें बौद्धिक रूप से कमतर महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। आखिर मैं एक अनुभवी दार्शनिक था। और मैंने मनु‘य की उत्पत्ति और विश्व की उत्पत्ति के विषय में सभी प्रकार के सिद्धान्तों का और सारी बातों का अध्ययन किया था। परन्तु मुझे अपने निर्णय में यह कहना है कि बाइबल सबसे अधिक तार्कि क पुस्तक है जिसका मैंने कभी अध्ययन किया है। इसके तर्क सिद्ध हैं।

यदि आपको सिद्ध तर्क का एक उदाहरण चाहिए तो आपको रोमियों की पत्री पढ़ना चाहिए। मेरे विचार से यह एक अति उत्कृ‘ट कृति है। कभी भी मनु’य की कलम ने कुछ ऐसा नहीं लिखा है जो रोमियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री की सिद्धता और तर्क की बराबरी कर सके। तो यदि आप छात्र हैं या और कुछ हैं तो यह कहने में अपने आपको कमतर महसूस न करें कि आप बाइबल में विश्वास रखते हैं। यह कमतरी का चिन्ह नहीं है, यह भली मनसा का एक चिन्ह है।

अब मुझे इस विषय के साथ प्रारंभ करने दीजिए कि आपके लिये बाइबल क्या करेगा। सबसे पहले, मैं आपको धर्मशास्त्र के बारे में कुछ सामान्य बातें बताना चाहता हूँ। भजनसंहिता 33ः6 यह कहता है:

आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुँह ही श्वास से बने।

जहाँ हमारे पास श्वास शब्द है उसके लिये वास्तविक इब्रानी शब्द आत्मा है, क्योंकि यहाँ पर चित्र परमेश्वर के वचन के साथ उसकी आत्मा के साथ आने का है। जब उसने अपना वचन कहा तो ठीक उस प्रकार से उसके साथ आत्मा भी आया जैसे मेरे बात करने पर मेरा श्वास भी शब्द के साथ बाहर आता है। और यह हमें बताता है कि किस प्रकार से सृजित संसार अस्तित्व में आया। यह जटिल नहीं है। यह प्रभु के वचन और उसकी मुँह की आत्मा के साथ आया। यह परमेश्वर की सारी सृ‘टि के दो तत्व हैं। यदि आप उत्पत्ति की पुस्तक में सृ‘टि का विवरण पढ़ें तो आप देखेंगे कि यह कैसे ठीक.ठीक सहमत होता है। तो यह एक क्रमबद्ध विचार है जिसे मैं आपके ऊपर थोपना चाहता हूँ। और जब हम बाइबल पढ़ते हैं तब वही शब्द, वही आत्मा हमारे लिये उपलब्ध होता है। अतः, कभी भी इस बात के लिये सीमा निर्धारित न करें कि बाइबल आपके जीवन में कर सकती है। बाहर निकलिए, तारों को देखिए, सूरज को देखिए, समुद्रों को देखिए, पर्वतों को देखिए, परमेश्वर की अद्भुत सृ‘टि करनेवाली सामथ्र्य वर्णित है। और तब स्वयं से कहिए, कि जिसने सृ‘टि की रचना की वही मेरे भीतर कार्य कर रहा है जब मैं बाइबल पढ़ता हूँ।

और तब नया नियम में 1 थिस्सलुनीकियों 1ः3 में पौलुस थिस्सलुनीकियों की कलीसिया को लिख रहा है जो एक युवा कलीसिया थी जिसका गठन हाल ही में हुआ था। और वह स्मरण कर रहा है कि वहाँ पर उसकी सेवकाई का प्रभाव कितना शक्तिशाली था। और वह उन मसिहियों के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करता। वह उनसे यह कह रहा है:

और अपने परमेश्वर और पिता के साम्हने तुम्हारे विश्वास के काम, और प्रेम का परिश्रम, और हमारे प्रभु यीशु मसीह में आशा की धीरता को लगातार स्मरण करते हैं।

अतः, पौलुस इस बात पर जोर देता है कि यह मानवीय बुद्धि का उत्पाद नहीं है: यह परमेश्वर का वचन है। यह परमेश्वर द्वारा हमसे बात करना है।

परन्तु यह हममें तब तक अपना पूरा कार्य नहीं कर सकता है जब तक हम इसे विश्वास के साथ ग्रहण नहीं करते हैं। यह उन लोगों में प्रभावशाली रीति से कार्यकारी करता है। अविश्वास परमेश्वर के वचन के प्रभाव को बन्द कर सकता है। परन्तु यदि हम विश्वास में अपने हृदयों को खोलते हैं, तो यह प्रभावशाली रूप से कार्य करता है। और आज शाम मैं जो करने जा रहा हूँ वह वे ऐसे कुछ प्रभाव हैं जो परमेश्वर का वचन आपमें उत्पन्न करेंगे जब कि आप विश्वास के साथ उसे ग्रहण करेंगे।

और तब इब्रानियों की पत्री में इब्रानियों का लेखक कुछ निश्चित बातें भी कहता है। सबसे पहले, वह पुराना नियम में परमेश्वर के लोग इस्राएल के बारे में बात करता है, किस प्रकार से वे मिस्र से सामर्थी चिन्हों और आश्चर्यकर्मों द्वारा अलौकिक रीति से बाहर लाए गए परन्तु अविश्वास के कारण उन्होंने कभी भी उस देश में प्रवेश नहीं किया जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी। और इब्रानियों का लेखक इब्रानियों 4ः2 में इस पर टिप्पणी करता है और वह इस्राएल के विषय में कहता है:

क्योंकि हमें उन्हीं की र्नाइ सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुननेवालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।

तो उन्होंने परमेश्वर के वचन को सुना परन्तु उसने उनमें वह कार्य नहीं किया जो परमेश्वर चाहता था कि हो। यह आशीषों का परिणाम नहीं लाया क्योंकि उसमें विश्वास मिश्रित नहीं था। परन्तु कुछ ही देर में मैं आपको संक्षिप्त रूप में बता रहा होऊँगा कि यदि आपमें विश्वास नहीं है तो आप उसे प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये निराश न हों। यदि आज शाम आप यहाँ हैं और आप कहते हैं कि मैं विश्वास के साथ परमेश्वर के वचन प्राप्त करने योग्य बनना चाहता हूँ परन्तु मुझे नहीं मालूम कि मुझ में सचमुच विश्वास है, परमेश्वर के वचन के विषय में अच्छी बातों में से एक शानदार बात यह है कि यह विश्वास उत्पन्न करता है।

इब्रानियों 4ः12 में परमेश्वर के वचन के विषय में एक और सामान्य बात:

क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गाँठ गाँठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है।

परमेश्वर के वचन के विषय में तथ्यों की एक विस्तृत सूची। यह जीवित है, यह मृत नहीं है, यह सामर्थी है, यह किसी भी दोधारी तलवार से अधिक चोखा है, या आधुनिक भाषा में यह किसी भी चिकित्सक की छुरी से तेज है। यह हर उस जगह प्रवेश कर सकता है जहाँ और कोई छुरी प्रवेश नहीं कर सकता है। यह किसी भी जोड़ को मज्जा से अलग कर सकता है। यह किसी भी मनोचिकित्सक की जाँच से अधिक तेज है। यह हमारे भीतर की हर वस्तुओं, आत्मा और प्राण को अलग.अलग कर सकता है।

और तब लेखक कहता है कि यह विचारों और हृदय की भावनाओं को जाँचनेवाला है। मुझे किसी का यह कहना याद आता है, ‘‘याद रखो, जब आप बाइबल पढ़ रहे हैं, तब आपकी बाइबल भी आपको पढ़ रही है।‘‘ और एक निश्चित प्रकार से हमें बाइबल तक भय के साथ जाना है क्योंकि यह हममें उन बातों को जाँचने जा रहा है जिनके विषय में हम भी नहीं जानते कि वहाँ है। परमेश्वर हमेशा अपनी करुणा में यह करता है। हो सकता है हमें ऐसी समस्याएँ हैं जो हमें जीवन में सचमुच आगे बढ़ने से रोकती हों। हो सकता है हम समस्या के विषय में सतर्क भी न हों। परन्तु यदि आप बाइबल में जाएँ और उसे आपको जाँचने दें तो वह छुरी ठीक वहाँ पहुँचेगी जहाँ किसी भी मनु‘य की छुरी नहीं पहुँचेगी। और यह आपको समस्याओं को बताएगी जिन्हें आप नहीं जानते थे कि आपको है।

उदाहरण के लिये, बेबाकी से कुछ बताने के लिये हममें से अधिकांश को घमण्ड की समस्या होती है। परन्तु हममें से अधिकांश हमारे अपने घमण्ड के विषय में नहीं जानते हैं। परन्तु आप बाइबल के साथ समय व्यतीत कीजिए और जल्द या बाद में आपके जीवन में छुपा हुआ घमझड का जड़ पता चलना प्रारंभ हो जाएगा जिसे हल करना चाहिए इससे पहले कि परमेश्वर आपमें उस कार्य को करे जो वह करना चाहता है।

अब मैं कुछ विशि‘ट परिणामों के विषय में बात करना चाहता हूँ जो बाइबल उत्पन्न करती है। मैं धर्मशास्त्र से बात कर रहा हूँ परन्तु बहुत से मामलों में मैं व्यक्तिगत अनुभव से भी बात कर रहा हूँ। शायद ही कभी मैं सिद्धान्तों पर प्रचार करता हूँ। जो कुछ मैं प्रचार करता हूँ वे ऐसी बातों से उत्पन्न हुई होती हैं जिनका मैंने अनुभव किया है। और जब परमेश्वर चाहता है कि मैं सत्य के एक नए क्षेत्र में आऊँ मैं पाता हूँ कि वह मुझे कुछ अनुभव प्रदान करता है, वह मुझे किसी ऐसी स्थिति की ओर ले चलता है जो मुझे सत्य से सामना कराता है। तो, जब मैं कहता हूँ, यह सिद्धान्त नहीं है जो आज शाम मैं आप तक पहुँचा रहा हूँ।

पहली बात जो बाइबल के विषय में मैं कहना चाहता हूँ, जिसका संकेत अप्रत्यक्ष रूप से मैंने पहले ही दे दिया है यह है कि यदि आपमें विश्वास नहीं है तो आप इसे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यह मेरे पूरे जीवन का एक मुख्य पद है। रोमियों 10ः17:

सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है।

विश्वास कैसे आता है? सुनने से। क्या सुनने से? परमेश्वर का वचन। अब मैंने उस पद को पढ़ लिया है। मुझे आपको बताने दीजिए कि यह मेरे लिये इतना वास्तविक क्यों है। प्रभु से मिलने के पश्चात् और पवित्र आत्मा में बपतिस्मा पाने के पश्चात्, ब्रिटिश सेना में रहते हुए मुझे मध्यपूर्व में भेजा गया। उत्तरी अफ्रीका की मरूभूमि में मैंने तीन वर्ष व्यतीत किया। उस दौरान् मैं बीमार पड़ गया और ऐसी स्थिति हो गई कि चिकित्सक भी ठीक कर पाने में असमर्थ थे। अतः, मैंने एक पूरा वर्ष अस्पताल में बिस्तर पर व्यतीत किया। और जब मैं उस अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा हुआ था मैं परमेश्वर को जानता था, मैंने पवित्र आत्मा में बपतिस्मा पाया था, मैं अपनी बाइबल पढ़ रहा था, परन्तु मैं स्वयं से कहता रहा, ‘‘मुझे मालूम है, कि यदि मुझे परमेश्वर पर विश्वास है तो वह मुझे चंगा कर सकता है।‘‘ और जब मैंने यह बात कही तो मैं ऐसी स्थिति में था जिसे ‘मसीही मुसाफिर’ नामक अपने उपन्यास में जाॅन बनियन ‘‘मायूसी की कैंचुली’’ कहता है। जो कि निराशा की एक लम्बी और गहरी घाटी है और घाटी से बाहर आने का कोई उपाय मेरे पास नहीं था। अतः निराशा और पीड़ा में मैं वहाँ कई हप्तों तक रहा।

तब अन्धकार में रोशनी एक चमक दिखाई पड़ी और यह रोमियों 10ः17 से आई ।

सो विश्वास सुनने सेण्ण्ण्ण्।

और जब ‘‘मैं आता है’’ शब्द पढ़ता हूँ तब यह ऐसा ही है। यदि मुझमें विश्वास नहीं है है तो मैं उसे प्राप्त कर सकता हूँ क्योंकि यह आता है। इसलिये किसी को भी शर्तों को पूरा करने पर बिना विश्वास के जीने की जरूरत नहीं है। शर्तें क्या क्या हैं? विश्वास सुनने से आता है और सुनना मसीह के वचन से होता है।

अब मैं इसमें दो चरण देखता हूँ और मैं सचमुच अनुभव से बात करता हूँ। जब आप परमेश्वर के वचन के सामने आते हैं, जब आप उसे पढ़ते हैं, जब आप उस पर मनन करते हैं, तो यह आपके जीवन में पहला स्थान लेता है, तब सुनना आता है। सुनना एक प्रकार की मनोवृत्ति है जहाँ आप परमेश्वर के साथ बन्द हो जाते हैं। अन्य बातें बाहर रह जाती हैं और यदि आप सुनना जारी रखते हैं तो विश्वास आता है। तो यह एक प्रक्रिया है। यह अचानक नहीं होता है। सबसे पहले परमेश्वर का वचन आता है, आप उसे सुनते हैं, आप उस पर ध्यान लगाते हैं, उसके प्रति आप अपने मन और हृदय को खोलते हैं, आप उसके प्रति स्वयं को खोलते हैं। और सुनने से विश्वास बढ़ता है।

और यदि आप उन लोगों में से एक हैं जो एक दिन में पाँच मिनट बाइबल पढ़ते हैं तो आपके जीवन में शायद ही, बहुत ही कम विश्वास उत्पन्न होगा क्योंकि इसमें समय लगता है, परन्तु यह उपयुक्त है। मैं पश्चिम में मसीहियों से कहता हूँ, और मैं संसार के इस विशेष भाग के बारे में नहीं जानता हूँ। यद्यपि मैं सोचता हूँ कि यह बहुत अधिक अलग नहीं होगा, मैं कहता हूँ कि यदि आप सचमुच एक आत्मिक महान व्यक्ति बनना चाहते हैं तो आपके जीवन में दो बातों को बदलने की जरूरत होगी। उन्हें बदल डालिये। निश्चय ही, यह हर एक के बारे में सही नहीं है। परन्तु दो बातें जिन्हें आपको बदलने की जरूरत है वे समय जो आप बाइबल के साथ खर्च करते हैं, और समय जो आप टीवी के सामने खर्च करते हैं। उसे बदल डालिए और आप उस परिवर्त न पर चकित होंगे जो आपके जीवन में आएगा। अब हो सकता है यह आप सब पर लागू न हो परन्तु इसमें समय लगता है। इसमें ध्यान की जरूरत है।

कुछ समय बाद मैं बताऊँगा कि मैं कैसे विश्वास से चंगाई प्राप्त किया जो सुनने से आया था। क्योंकि जब मैं इस बात का वर्णन करता हूँ कि मैंने कैसे चंगाई र्पाइ तो यह इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि सुनना वास्तव में क्या है।

परन्तु परमेश्वर के वचन का अगला परिणाम जो विश्वास से उत्पन्न होता है वह है जिसे मैं नया मनु‘य कहता हूँ। पिछली रात मैंने उन दो व्यक्तियों के बारे में सिखाया था नया मनु’य और पुराना मनु‘य। नया मनु‘य वह है जो हमारे जीवनों में उत्पन्न होता है जब हम विश्वास के साथ परमेश्वर के वचन को ग्रहण करते हैं और यह हमारे जीवन में प्रभु यीशु मसीह का जीवन उत्पन्न करता है। पुराना मनु‘य वह है जो हम परमेश्वर से अलगाव में थे। तो नया मनु‘य परमेश्वर के वचन का उत्पाद है। यह परमेश्वर के वचन के बीज से उत्पन्न है। आइए, याकूब 1ः18 में इसके विषय में एक पद को पढ़ें। याकूब मसीह यीशु में विश्वासियों के विषय में यह कहता है। याकूब 1ः18, यह परमेश्वर के विषय में बात करता है।

उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उसकी सृ‘टि की र्हुइ वस्तुओं में से एक प्रकार के प्रथम फल हों।

आज जानते हैं नयां जन्म आपसे प्रारंभ नहीं होता है। यह परमेश्वर से प्रारंभ होता है। अपनी इच्छा उसने हमें ले आया है, उसने हमें सत्य के वचन के द्वारा जन्म दिया है जिसे हम अपने हृदयों में ग्रहण करते हैं।

यूहन्ना 1ः13 में यूहन्ना लोगों के बारे में कहता है जो नया जन्म प्राप्त हैं:

वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनु‘य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

नया जन्म परमेश्वर की इच्छा से प्रारंभ होता है न कि हमारी इच्छा से। हमें स्प‘ट रूप से इसे देखने की आवश्यकता है। हम विश्वासी हैं क्योंकि यह परमेश्वर की इच्छा है। तब हमें परमेश्वर की इच्छा पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए परन्तु प्राथमिक उद्देश्य परमेश्वर से है। अपनी स्वयं की इच्छा से उसने हमें सत्य के वचन के द्वारा आगे लाया है।

और तब 1 पतरस 1ः23 में पतरस इस विषय के विकसीत करता है और कहता है:

क्योंकि तुम ने नाशमान नहीं पर अविनाशी बीज से परमेश्वर के जीवते और सदा ठहरनेवाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है।

तो यह बीज जिसने नया जन्म लाया, यह इस नए व्यक्ति को लाया, इस नए मनु‘य को लाया, वह परमेश्वर के वचन का बीज है। और यह एक अविनाशी बीज है। यह न‘ट नहीं होता है। यह परिवर्ति त नहीं होता है। यह बदलता या खराब होता नहीं है जैसा हम स्वाभाविक संसार में देखते हैं। और जैसा कि मैंने पिछली रात कहा पुनः मैं आज रात कहता हूँ, बीज की प्रकृति उस वस्तु की प्रकृति को निर्धारित करती है जिसे वह उत्पन्न करता है। आप एक सेब का पेड़ देखते हैं और उसमें आपको सेब मिलता है और संतरा नहीं मिलता है। और इस प्रकार परमेश्वर के वचन के बीज की प्रकृति उस जीवन को निर्धारित करती है जो उससे आती है। यह एक अविनाशी बीज है। तो यह कैसा जीवन उत्पन्न करता है? अविनाशी जीवन। ऐसा जीवन जो न‘ट नहीं होता है। यह ईश्वरीय जीवन है क्योंकि यह ईश्वरीय बीज है।

और तब नया नियम में थोड़ा और आगे 1 यूहन्ना 3ः9 देखें, जो परमेश्वर के बीज से उत्पन्न नए जन्म के बारे में बात करती है। यूहन्ना कहता है:

जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उस में बना रहता हैः और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है।

अब मैं पिछली रात इसे बताया था और अब मैं उस पर विस्तृत रूप से नहीं जा सकता हूँ, यह नया जन्म प्राप्त मसीही के विषय में नहीं बता रहा है। मुझे एक उदाहरण बताने दीजिए तब मैं किसी और को ठोकर नहीं खिलाऊँगा। 1941 में मेरा नया जन्म हुआ। यह बहुत ही वास्तविक, बहुत ही सामर्थी था और यह आज तक बना हुआ है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि 1941 के बाद से मैंने कभी पाप नहीं किया। मैं चाहता हूँ कि काश कि यह सच होता परन्तु ऐसा नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं पाप नहीं कर सकता। परन्तु मैं बहुत ही सतर्क रहता हूँ कि यदि मैं जागते और प्रार्थना करते रहूँ तो मैं पाप करने से बचा रहूँगा। परन्तु मुझमें एक स्वाभाव उत्पन्न हुआ, एक व्यक्ति एक नया मनु‘य उत्पन्न हुआ जो पाप नहीं कर सकता। क्योंकि वह अविनाशी बीज से उत्पन्न हुआ है, वह एक अविनाशी व्यक्ति है।

एक और स्वभाव है जिसके विषय में मैंने बात किया है जिसे पुराना मनु‘य कहा जाता है, मसीह के आने से पहले मैं जो कुछ था। पुराना मनु‘य पाप से बच नहीं सकता यह उसका स्वभाव है। वह स्वाभाव से ही विद्रोही है। तो एक बार जब हम नया जन्म प्राप्त मसीही बन जाते हैं, तो हम जिस प्रकार का जीवन जीते हैं उसे यह बात निर्धारित करेगा कि किस प्रकार के स्वभाव के द्वारा हमारा नियन्त्रण होता है। जब तक नया मनु‘य के हाथ में नियन्त्रण रहता है तब तक हम एक ऐसा जीवन जीएँगे जो पाप नहीं करता। परन्तु जब कभी पुराना मनु‘य वापस आता है और भीतर आना और नियन्त्रित करना प्रारंभ करता है। तो उसका अपरिहार्य परिणाम पाप होग। परन्तु हमें यह जानने की जरूरत है कि हममें परमेश्वर के वचन के बीज के द्वारा एक अविनाशी स्वभाव, एक ऐसा स्वभाव जो पाप नहीं करता, एक ऐसा स्वाभाव जो शुद्ध और पवित्र है, उत्पन्न हुआ है। यह स्वयं परमेश्वर का स्वभाव है जो परमेश्वर के वचन रूपी बीज के द्वारा हममें लगाया गया है। यह वह स्वभाव है जो हमें परमेश्वर की सन्तान बनाता है। अतः, यह परमेश्वर के वचन से आता है।

आइए, इसे मनु‘य के स्तर पर ले आएँ। मनु’यजाति में जब एक छोटा बच्चा जन्म लेता है तो उसकी पहली जरूरत उचित पोषण होता है। हो सकता है वह एक बहुत ही स्वस्थ छोटा बच्चा है। परन्तु यदि उसे उचित पोषण न मिले तो वह जल्द ही सूखने लगेगा और क्रमशः मर जाएगा। नया जन्म प्राप्त मसीही के विषय में भी यह तुल्य रूप से सत्य है। एक बार जब आप नया जन्म पा लेते हैं तो आपमें एक नया स्वभाव, एक नया व्यक्ति आ जाता है जो पोषण के लिये रोता है। आप जानते हैं जब बच्चों को भोजन नहीं मिलता है तो वे क्या करते हैं? वे रोते हैं। और नया जन्म प्राप्त मसीही के भीतर कुछ ऐसा होता है जो भोजन न मिलने पर रोना प्रारंभ करता है।

परमेश्वर के वचन के विषय में अद्भुत बात केवल यह नहीं है कि वह एक बीज है जो नया जीवन लाता है। परन्तु यह ऐसा भोजन भी है जो नए जीवन को पोषित करता है और यह धर्मशास्त्र में संपूर्ण रूप से बताया भी गया है। 1 पतरस पर वापय जाएँ। पहले अध्याय में वह अविनाशी बीज से नया जन्म प्राप्त करने के विषय में बात करता है। तब दूसरे अध्याय में वह इसी प्रकार बात करते जाता है। और दूसरा अध्याय इसलिये शब्द से प्रारंभ होता है। आपने मुझे कहते हुए सुना होगा . और यदि नहीं सुना है तो आप मुझे अब कहते हुए सुनते हैं। जब आप बाइबल में इसलिये शब्द पढ़ते हैं तो आपको देखने की जरूरत है कि किस लिये। और यह इसलिये नया जन्म के कारण है। देखा? जब आप नया जन्म पाते हैं:

तो इसलिये सब प्रकार का बैरभाव और छल और कपट और डाह और बदनामी को दूर करके।

तो, एक नए जन्में परमेश्वर की सन्तान के लिये पोषण क्या है? यह परमेश्वर के वचन का शुद्ध दूध है। और यदि हम नए जन्में मसीहियों को यह पोषण नहीं उपलब्ध कराते हैं तो सारी संभावना है कि वे उस नए जीवन को खो देंगे जिसे उन्होंने प्राप्त किया है। नया जन्म पाने के पश्चात् नियमित रूप से परमेश्वर के वचन का पोषण प्राप्त करना सीखने से बढ़कर और कुछ अति महत्वपूर्ण नहीं है। और जब आप प्रारंभ करते हैं तो यह दूध होता है। आप एक शिशु को रोटी नहीं दे सकते हैं, न ही मांस दे सकते हैं। उसे कुछ ऐसा चाहिए जो आसानी से पच जाए। और इस प्रकार जब मसीही नया जन्म प्राप्त करते हैं, मूल रूप से आपको उन्हें यहेजकेल नबी की पुस्तक या सभोपदेशक का अध्ययन नहीं कराना चाहिए। अब, हो सकता है कुछ मसीही उन बातों का लाभ ले पाएँ परन्तु मैं मसीहियों से या जिस किसी को प्रभु के पास आने के लिये मैं परामर्श देता हूँ उनसे पहली बात मैं यह कहता हूँ कि उन्हें पोषण, उचित पोषण चाहिए। और सामान्य रूप से कहें तो मैं उन्हें सलाह दूँगा कि वे क्रम से नया नियम की तीन पुस्तकें पढ़ें। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि किस प्रकार की संस्कृति या पृ‘ठभूमि है। परन्तु सामान्यतः मैं कहता हूँ कि आपको यूहन्ना का सुसमाचार, प्रेरितों के काम की पुस्तक और तब रोमियों की पत्री पढ़ने की आवश्यकता है। कुछ लोगों के लिये इसे पचा पाना बहुत कठिन होता है। परन्तु सामान्य रूप से कहें तो मैं सोचता हूँ कि प्रारंभ करने के लिये नया नियम का यूहन्ना रचित सुसमाचार बहुत अच्छा है। और जल्दी या बाद में आपको प्रेरितों के काम की पुस्तक की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। क्योंकि प्रेरितों के काम की पुस्तक इस बात का वर्णन है कि कलीसिया को कैसे कार्य करना चाहिए। हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि बहुत से मामलों में कलीसिया परमेश्वर की रीति से बहुत दूर है। परन्तु परमेश्वर ने अपनी रीति को नहीं बदला है। और तब रोमियों की पत्री, हो सकता है यह विशेष कर मेरी दार्शनिक पृ‘ठभूमि के कारण है। परन्तु मैं सोचता हूँ कि जब ऐसा समय आता है जब मसीहियों को रोमियों की पत्री की व्यवहारिक सत्यों को समझने की जरूरत होती है। बाइबल के अधिकांश टीकाकार इस बात से सहमत होंगे कि यदि आप सुसमाचार समझना चाहते हैं तो रोमियों की पत्री पढ़ना चाहिए। मैं यह नहीं कहता कि यह आसान है, परन्तु आरंभ करने के लिये यह अच्छा है।

मैंने रोमियों की पत्री को बिस्तार से सिखाया है और मुझे कभी नहीं लगा कि मैं थक गया हूँ। प्रत्येक बार जब मैं इसे सिखाना समाप्त करता हूँ तो मैं सोचता हूँ कि काश कि मैं इसे और अच्छी रीति से कहता या बहुत कुछ कहना रह गया है या मुझे अचानक पता चलता है कि मुझे नहीं मालूम था कि मैं उन बातों को जानता हूँ। तो किसी भी दर पर नए जन्मे मसीही शिशुओं को परमेश्वर के वचन की दूध की आवश्यकता है। मैं लोगों से कहता हूँ कि यदि किसी ने नया जन्म पाया है और मैं परामर्श दे रहा हूँ तो मैं कहता हूँ कि पहली बात जो आपको चाहिए वह बाइबल है। इसे नियमित रूप से पढ़िए। इसे केवल को ही नहीं पढ़िए, इसे पढ़िए। मैं कहता हूँ प्रतिदिन सुबह और शाम को पढि़ए। तब आप बढ़ेंगे।

दूसरा, बाइबल पठन के साथ साथ प्रार्थना करना सीखना प्रारंभ कीजिए। मैं लोगों से कहता हूँ कि जब आप बाइबल पढ़ते हैं तो यह परमेश्वर द्वारा आपसे बात करना है। जब आप प्रार्थना करते हैं तो आप परमेश्वर से बात कर रहे हैं। अतः यदि आप बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने में संलग्न होते हैं तो परमेश्वर के साथ आपकी सहभागिता . दो तरफा सहभागिता . है।

तब मैं लोगों से कहता हूँ कि तीसरी बात अपने विश्वास का अंगीकार करना है। लोगों को जानने दीजिए कि आप यीशु में विश्वास करते हैं। आपको गली के मोड़ पर खड़े होना और प्रचार करना नहीं है परन्तु किसी न किसी प्रकार परमेश्वर हमेशा इस पर नजर रखता है कि आपके पास ऐसे अवसर आएँ कि आप लोगों से कहें कि आप यीशु में विश्वास करते हैं। यदि आप अपने विश्वास का इकरार नहीं करते हैं तो यह कुम्हला जाएगा। विश्वास का अंगीकार किया जाना है।

और चौथी बात, दूसरे मसीहियों के साथ सहभागिता है। मसीही अपने आप अच्छा नहीं करते हैं उन्हें एक दूसरे की जरूरत है, उन्हें एक ऐसे स्थान में होने की जरूरत है जहाँ प्रतिदिन परमेश्वर के वचन की घोषणा होती है। उन्हें अन्य मसीहियों के साथ आराधना करने के अवसरों की जरूरत है।

परन्तु यदि मैं इसकी पुनरावृत्ति कर सकता हूँ क्योंकि मुझे निश्चय है कि आपमें से बहुतों को किसी को मसीह के पास लाने का अवसर मिला है या यदि नहीं मिला है तो आपको मिलेगा। मैं आपको सलाह देता हूँ कि वे चार बातें हैं जिन्हें आपको रोपित करने की आवश्यकता है। बाइबल पढ़िए, प्रार्थना कीजिए.यह परमेश्वर से बात करना है, धार्मिक भाषा में नहीं परन्तु सामान्य रीति से, अपने विश्वास का अंगीकार कीजिए और मसीही संगति की खोज कीजिए। परन्तु मैं हमेशा बाइबल पठन को पहला स्थान देता हूँ क्योंकि यदि आप बुद्धिमानी से बाइबल पढ़ेंगे तो यह आपको अन्य बातों की ओर ले चलेगा।

तब अगले प्रकार का भोजन जिसकी जरूरत लोगों को है, या कम से कम मध्यपूर्व में मानवता का सामान्य भोजन रोटी है। और बाइबल भी रोटी प्रदान करती है। अब मैं कहता हूँ कि कम से कम मध्यपूर्व में क्योंकि कुछ संस्कृतियों में हो सकता है यह रोटी न हो, परन्तु यह रोटी के समकक्ष और कुछ हो। और आप स्मरण करते हैं कि जब यीशु ने अपनी सेवा प्रारंभ की तो शैतान ने एक आश्चर्यकर्म करने के लिये उसकी परीक्षा की और उसे पत्थर से रोटी बनाने के लिये कहा। और यीशु ने ऐसा नहीं किया। और मत्ती 4ः4 में यीशु ने जो उत्तर दिया वह यह है। उसने कहा:

उसने उत्तर दिया; कि लिखा है (और यह व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में लिखा हुआ है) कि मनु‘य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।

तो, जो बात वह कह रहा है वह यह है कि स्वाभाविक में रोटी जो कुछ है वही आत्मिक में परमेश्वर का वचन है। यह रोटी की बात करता है; यह मनु‘य के भोजन की बड़ी मूल बात है। संसार के बहुत से भागों में लोग बहुत सी अन्य बातों पर खर्च नहीं कर सकते हैं परन्तु जहाँ रोटी उपलब्ध है तो स्वाभाविक रूप से वही सबसे पहली वस्तु है जिसकी वे खोज करेंगे। यीशु कहता है कि प्रत्येक वचन जो परमेश्वर के मुँह से निकलता है। यह एक प्रकार का जीवित संबन्ध है। आप देखें, यह केवल एक पुस्तक पढ़ना ही नहीं है, परन्तु यह पुस्तक के द्वारा परमेश्वर को आपसे बातें करते सुनना है। और हममें से बहुत से लोग गवाही दे सकते हैं कि परमेश्वर जानता है कि हमें क्या सुनने की जरूरत है। मेरी पत्नी रूत और मैं, हम सामान्यतः प्रतिदिन सुबह किसी और बात में शामिल होने से पहले बाइबल पढ़ते हैं। हम लोगों के साथ व्यस्थ होने से पहले परमेश्वर से सुनना पसन्द करते हैं। और प्रायः हम दिन की समाप्ति भी सात में बाइबल पढ़ने से करते हैं। हम यह गिनती भी नहीं कर सके हैं कि जब हम कोई विशेष भाग पढ़ते हैं तो दिन में कितनी बार वह हमसे कहता है कि हमें उस दिन के लिये क्या जानने की जरूरत है। यह ताजी रोटी के समान होता है। आप जानते हैं यदि आप रोटी को बहुत दिन तक रखते हैं तो वह सूख जाती है। अतः परमेश्वर के वचन को सूखने और बासी होने मत दें। ताजी रोटी खाकर का जीएँ। रोटी जो प्रतिदिन परमेश्वर के मुँह से निकलती है।

और तब आत्मिक पोषण का एक और स्तर है जिसे बाइबल ठोस आहार कहता है। इब्रानियों की पत्री में लेखक इसके विषय में बात करता है। इब्रानियों 5ः12.14। अब आपको यह समझने की जरूरत है कि इब्रानियों की पत्री के पाठक यीशु मसीह में विश्वास करनेवाले यहूदी थे। उन्हें उस समय के अन्य सारे लोगों से बढ़कर अनुकूल परिस्थिति उपलब्ध थी क्योंकि उन्होंने कई कई पीढ़ियों से पुराने नियम की बातों को जाना हुआ था। उस समय उनके पास परमेश्वर का ऐसा ज्ञान था जो किसी और देश के पास नहीं था। और इब्रानियों का लेखक इन यहूदी विश्वासियों को डाँटता है क्योंकि वह उनसे कहता है कि उनके पास बचपन से धर्मशास्त्र को सीखने का यह अमूल्य अवसर रहा है। आपको दूसरे देशों और दूसरे लोगों को सिखाने की स्थिति में होना चाहिए। परन्तु सच्चाई यह है कि वे परमेश्वर के वचन के साथ इतने आलसी रहे हैं कि आप यह नहीं कर सकते। आप नए जन्में हुए बच्चे के समान आपको अपने लिये दूध की जरूरत है। आप कभी भी इस स्तर तक नहीं पहुँचे हैं जहाँ पर आप रोटी खा सकें।

मुझे इन शब्दों को पढ़ने दीजिए और तब उस पर कुछ और टिप्पणी करता हूँ। इब्रानियों 5ः12:

समय के विचार से तो तुम्हें गु: हो जाना चाहिए था, तौभी क्या यह आवश्यक है, कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए? और ऐसे हो गए हो, कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए।

मुझे भय है कि यह लाखों मसीहियों का वर्णन है, कम से कम पश्चिमी दुनिया में, ब्रिटेन या संयुक्त राज्य या स्कैंडेनेविया जहाँ हमारे पास सदियों से बाइबल है। आज हम पहली सदी के यहूदी विश्वासियों की स्थिति में हैं। अब यह यहाँ आज शाम उपस्थित सबके बारे में अनिवार्य रूप से सच नहीं है, परन्तु हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम दूध पर या रोटी पर ही जीवित न रहें। परन्तु हम इस स्थिति तक परिपक्व हो जाएँ कि जहाँ हमें पूर्ण खुराक की आवश्यकता हो। अतः इब्रानियों 5ः13 में लेखक आगे कहता है:

क्योंकि दूध पीनेवाले बच्चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है।

तो, आपके आत्मिक विकास का स्तर इस बात पर निर्भर नहीं है कि आप कितने वर्षों से मसीही हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार का भोजन लेते हैं। हो सकता है आप दस वर्षों से मसीही हों परन्तु यदि आप अब तक दूध ही पी पाते हैं तो आत्मिक रूप से आप एक शिशु हैं। आपकी समस्या बाधित विकास है। आपने कभी विकास नहीं किया है।

और तब इब्रानियों का लेखक वर्णन करता है कि हम कैसे बढ़ सकते हैं। चौदहवें पद में वह कहता हैः

पर अन्न सयानों के लिये है, जिन के ज्ञानेन्द्रिय अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्के हो गए हैं।

तो आप किस प्रकार बढ़ते हैं? आप कैसे परिपक्व होते हैं? यह अभ्यास की बात है, यह नियमित बाइबल पठन और उन स्थितियों पर इसे लागू करने की बात है जिसका सामना आप दिन व दिन करते हैं। क्योंकि बाइबल प्रत्येक स्थिति पर प्रकाश डालती है। तो, यदि आप सचमुच बाइबल में जी रहे हैं, तो जब एक नई स्थिति या एक नई समस्या उत्पन्न होती है तो आपके पास समझ होती है। आप समझ पाते हैं कि वह क्या है। आप जान जाते हैं कि कैसे उसे हल करना है। और जितना अधिक आप जानते हैं कि इसका सामना कैसे करना है, उतना ही अधिक आप अनुभवी बनते जाते हैं।

पुनः, मुझे कहना है . और मैं उन मसीहियों के बारे में बात कर रहा हूँ जिन्हें हम पश्चिमी मसीही कहते हैं . मैं बहुत बार रोता हूँ जब मैं देखता हूँ कि वे कितनी आसानी से मूर्ख बनाए जाते हैं। हमने सेवकाईयों का कुछ बहुत अच्छी तरह प्रचलित उदाहरण देखा है जिसने परमेश्वर के लोगों का शोषण किया है, परमेश्वर के लोगों को धोखा दिया है। परमेश्वर के लोगों को इस प्रकार धोखे का शिकार नहीं होना चाहिए, परन्तु समस्या यह है कि उन्होंने अपनी इन्द्रीयों का अभ्यास भले और बुरे के बीच भेद करने का अभ्यास नहीं किया है। वे सब कुछ निगल लेते हैं। यदि प्रचारक जोर से चिल्लाता है और पर्याप्त शोर होता है तो उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर है। और मैं चिल्लाने के विरुद्ध नहीं हूँ। बहुत से मामलों में परमेश्वर चिल्लाने के लिये कहता है। मैंने पाया है कि पवित्र आत्मा लोगों को मारता नहीं है। यदि आप पर दबाव है, तो रुकिए और जाँचिए। हो सकता है यह पवित्र आत्मा न हो। मुझे नहीं मालूम कि राॅक म्यूजिक के विषय में आपका क्या सोचना है। परन्तु मेरे लिये यह दुःखदायी है। मैं अपने इन्द्रीयों को उस प्रकार से लगातार अवरूद्ध नहीं रख सकता हूँ। मुझे नहीं लगता है कि पवित्र आत्मा हमारे साथ इस प्रकार व्यवहार करता है। आपने समझा मैं क्या कह रहा हूँ? आपको संवेदनशील होना है। पवित्र आत्मा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाईए। जितना अधिक आप परमेश्वर के वचन के द्वारा चलायमान होते हैं और उसमें जीते हैं उतना ही आप परखनेवाले बनते हैं। और तब लोग आपको मूर्ख नहीं बना पाएँगे और आपका शोषण नहीं कर पाएँगे। मसीहियों के लिये बढ़ना बहुत ही अनिवार्य है। और बढ़ने का मार्ग उस स्थिति तक विकसीत होना है जहाँ आपको ठोस आहार अच्छा लगने लगे।

आपको आगे बढ़ते रहना चाहिए। परमेश्वर के वचन का अगला प्रभाव जिसका वर्णन मैं करना चाहता हूँ यह है जिसे मैं मानसिक रोशनी कहता हूँ। हम बहुत से पदों को ले सकते हैं परन्तु मैं भजनसंहिता 19 से केवल एक पद लूँगा। आप जानते हैं यह सबसे लम्बा भजन है और उस भजन के प्रत्येक पद में कुछ ऐसा वाक्यांश पाया जाता है जो परमेश्वर के वचन का वर्णन करता है। इसमें आठ विभिन्न वाक्यांश है परन्तु भजन 119 में एक पद है जिसमें ऐसा वाक्यांश नहीं पाया जाता है। भजन 119ः130 यह कहता है और यह परमेश्वर को संबोधित करता है।

तेरी बातों के खुलने से प्रकाश होता है; उससे भोले लोग समझ प्राप्त करते हैं।

यह बताता है कि हमारे मनों के क्षेत्रों में परमेश्वर का वचन क्या करता है। यह प्रकाश और समझ प्रदान करता है। अब, मैं पाँच वर्षों से केन्या में अफ्रीकी विद्यालयों के लिये शिक्षकों को प्रशिक्षण देनेवाले महाविद्यालय का प्राचार्य था। और मेरा सामना इन सारे मुद्दों से हुआ कि कैसे लोगों को शिक्षित किया जाए। मैंने लगातार अपने छात्रों को बताया कि यह संभव है कि आप शिक्षित हों परन्तु मूर्ख हों। शिक्षा बुद्धि नहीं है। मैं शिक्षा के विरुद्ध नहीं हूँ। यह महत्वपूर्ण है, यह अनिवार्य है। अपने छात्रों के प्रति मेरा कहना यह है कि संसार में अधिकांश समस्याएँ शिक्षित मूर्खों के कारण होती हैं। मुझे लगता है कि जितना अधिक आप इसकी गहराई में जाएँगे उतना ही आप देखेंगे कि यह कितना सच है। यदि वे शिक्षित नहीं होते तो वे अधिक समस्या नहीं कर पाते।

इस देश के प्रारंभ में एक अमेरिकी रा‘टंपति थे जो उन लोगों के बारे में बात करते थे जो सामान चुराते हैं। उसने कहा कि यदि एक व्यक्ति शिक्षित नहीं है तो वह एक रेल रोड कार चुराएगा। रेल रोड कार, रेल्वे से एक कार चुराएगा। परन्तु यदि आप उसी व्यक्ति को शिक्षित करें तो वह पूरा रेल रोड ही चुरा लेगा।

तो, शिक्षा प्रकाश नहीं है। मैं यह जानता हूँ क्योंकि मैं उच्च.शिक्षित था और पूरी तरह अन्धकार में था। मैं नहीं जानता था कि मैं कहाँ से आता हूँ, मुझे मालूम नहीं था कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। मुझे नहीं मालूम था कि जीवन में सही मार्ग कैसे पाना है। परन्तु जब परीक्षा लेने और शोध लिखने की बात आई तो मैं सफल हो सका। मैं शिक्षित था, परन्तु अन्धकार में था। और लाखों लोगों की समस्या यही है। शिक्षित परन्तु मूर्ख। शिक्षित हैं परन्तु उन्हें नहीं मालूम कि जीवन में सही मार्ग कैसे बनाना है। आप पाएँगे कि बहुत से शिक्षित लोग हैं जो नैतिक, मानसिक, और आत्मिक समस्याओं में जा पड़ते हैं, मानो वे अशिक्षित लोग हों। एक फ्रान्सीसी लेखक ने एक बार कहा, ‘‘आप बूढ़े चिकित्सकों से अधिक बूढ़े पियक्कड़ों को देखेंगे।’’ तो, यह तथ्य कि एक व्यक्ति शिक्षित है अपने आप में एक अच्छे जीवन या वास्तविक सफलता की ग्यारन्टी नहीं देता है। परमेश्वर का वचन प्रकाश के समान आता है। यह हमें दिखाता है कि हम कहाँ हैं। यह हमें हमारी वास्तविक समस्या दिखाता है और यह हमें उत्तर दिखाता है।

स्वाभाविक संसार में आप देखते हैं कि प्रकाश का कोई विकल्प नहीं है। जो कुछ प्रकाश करता है वह इस संसार में और कुछ नहीं कर सकता है। पुनः, मैं अफ्रीका में अपने छात्रों के साथ व्यवहार को याद कर रहा हूँ। मैं उन पर इस बात का प्रभाव डालने का प्रयास करता हूँ। अतः, जब हम व्याख्यान कक्ष में होते तो मैं कहता कि यदि यह हाॅल पूरी तरह अन्धकार में होता, तो हम अन्धकार से कैसे छुटकारा पाते। और तब मैं कुछ देर इन्तजार करता और कहता, कि शायद हमें सारे दरबाजों और खिड़कियों को खोलना पड़ता और हमें हवा को बहने और अन्धकार को बाहर जाने देना पड़ता। वे कहते नहीं। हो सकता है मैं आपको कुछ झाड़ू लेने भेजता और झाडू करते और अन्धेरा चला जाता। और वे कहते, कि बिल्कुल भी नहीं। तो, मैं कहता कि फिर अन्धकार जाने के लिये हम क्या करते? और कोई छात्र कहता, कि हम बत्ती जला देते। हाँ, यह सही है। जहाँ ज्योति आती है, वहाँ अन्धकार फिर बना नहीं रह सकता। परमेश्वर के वचन के प्रति अपना हृदय और मन खोलना अपने मन में प्रकाश को आने देना है। यह इस बात को देखना है कि आप कौन हैं। आपकी समस्याओं की वास्तविक प्रकृति क्या है।

देखें, कम से कम पन्द्रह वर्षों तक मैं जीवन के वास्तविक अर्थ के खोज में था। परन्तु जो शिक्षा मेरे पास थी उसने मुझे नहीं दिखाया। जब बाइबल का प्रकाश मेरे भीतर आया तब मैंने यह समझना प्रारंभ किया कि मुझे सचमुच क्या चाहिए था। कौन सी बात जीवन को अर्थपूर्ण और सफल बनाती। और उस पद में वचन बताता है कि यह भोले लोगों को समझ प्रदान करता है। भोला शब्द को आज तुच्छ समझा जाता है। मैं आपसे कहता हूँ कि भोले होने के बारे में बहुत कुछ कहने को है। बहुत अधिक जटिल मत बनिए। यदि आप बहुत जटिल हैं तो आप कभी इस बात को नहीं जान पाएँगे कि क्या आपको हल मिल गया है या नहीं। परन्तु यदि आप ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण् हैं, तो आप कहते हैं मुझे खुशी चाहिए, मुझे प्यार चाहिए। मैं जीने का श्रे‘ठ मार्ग जानना चाहता हूँ। बहुत अधिक गंभीर मत बनिए। मैं उन दार्शनिकों के बारे में सोचता हूँ जिनका मैंने अध्ययन किया है। मैं पूरी तरह कपकपा जाता हूँ जब मैं जर्मन दार्शनिक इम्मानुएल कान्त द्वारा लिखित वाक्यों को देखता हूँ। जब पूर्ण विराम लगाने से पहले उन्होंने जो वाक्या लिखे वह दो पृ‘ठों से अधिक में समाती थी। बाइबल पूरी तरह भिन्न है। क्या आपने इस पर ध्यान दिया है? सबसे बड़ी बात को वह सबसे कम शब्दों में वर्णन करता है।

जब मैं अफ्रीका में था तो मुझे एक सप्ताह के लिये प्रतिदिन सुबह एक कलीसिया में बोलने के लिये बुलाया गया। मुझे कार में जाना पड़ता, तो एक सुबह मैंने 1 पतरस 2ः24 पद पर बोलने का निर्णय लिया। पुराने किंग जेम्स अनुवाद में जिसे मैं पढ़ रहा था वचन यह कहता है:

वह (यीशु के बारे में बोलते हुए) आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया जिससे हम पापों के लिये मर कर के धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँ: उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए।

खैर, मेरे लिये यह सबसे गहन विचार है। यह सुसमाचार का सबसे केन्द्र बिन्दु है। तो, जब मैं वाहन चला रहा था तो मैंने कहना शु: किया कि अधिकांश लोग जिनसे मैं बात करने जा रहा हूँ वे अशिक्षित हैं, वे पढ़ या लिख नहीं सकते हैं। हो सकता है, यह सन्देश उनके लिये बहुत गहरा हो। और पवित्र आत्मा द्वारा प्रभु ने मुझसे बात किया और उसने कहा, उस पद को लो और उस पद के सारे शब्दों को इकाई के रूप में गिन लो। अतः मैंने किया। उस पद में 23 शब्द हैं। एक इकाई में 19 शब्द। दो इकाईयों के तीन शब्द और तीन इर्काइ यों के एक शब्द। और यह सबसे गहन सत्य है जो कभी आपको प्राप्त हो सकता है। आपने देखा? परन्तु सामन्य भाषा में इसे बताया गया है। यदि आप बहुत जटिल होते हैं तो आपको सचमुच पता नहीं चलता है कि आप सत्य के बारे में कह रहे हैं या नहीं, आप स्वयं को मूर्ख बना सकते हैं। परन्तु जब आप सादगी की ओर आते हैं तो आप जान पाते हैं कि आप सचमुच किसके साथ व्यवहार कर रहे हैं।

मैं आपको सलाह देता हूँ कि जब आप परमेश्वर के पास आते हैं तो सरल बनें। ईमान्दार बनिए, अपने हृदय को खाली रखिए, उसे अपनी सच्ची समस्याएँ बताईए। कुछ भी मत ढाँकिए और तब परमेश्वर का वचन आपको समझ प्रदान करे जिसकी आपको जरूरत है।

हम जारी रखनेवाले हैं। अगला परिणाम कुछ इस प्रकार का है जिसमें संभवतः कुछ अधिक समय खर्च करनेवाला हूँ परन्तु हम उस पद को देखेंगे। यह नीतिवचन है। लेकिन पहले हम भजन 107 निकालेंगे। अपने वचन के द्वारा आपकी शारीरिक देह में परमेश्वर यह करता है। भजन 107, पद 17 से प्रारंभ करते हुए पद 20 तक पढ़ें। मैं हमेशा लोगों से कहता हूँ कि जब मैं इस पद को पढ़ता हूँ तो यह अन्य कलीसिया के लोगों के बारे में बात करती है, क्योंकि यह मूर्ख शब्द का इस्तेमाल करती है। तो, निश्चय ही यह यहाँ उपस्थित किसी पर लागू नहीं होती है, परन्तु आप जानते हैं कि अन्य सभाओं के लोगों पर लागू होती है। वचन कहता है:

मूढ़ अपनी कुचाल, और अधर्म के कामों के कारण अति दुःखित होते हैं।

दूसरे शब्दों में, वे जैसा कि हम कहते हैं, मृत्यु के द्वार पर हैं। वे सारी चिकित्सकीय सहायता के अन्तिम छोर पर हैं, उनके लिये और कुछ नहीं किया जा सकता है। तब 19वाँ पद कहता है:

तब वे संकट में यहोवा की दोहाई देते हैं, और व सकेती से उनका उद्धार करता है।

इस पर मेरी टिप्पणी यह है कि कुछ लोग प्रार्थना करने में बहुत देरी करते हैं। वे सड़क के अन्तिम छोर पर पहुँच चुके होते हैं। वे मृत्यु के फाटक पर होते हैं, कुछ भी उनकी सहायता नहीं कर सकता है और तब वे प्रभु को पुकारते हैं, परन्तु परमेश्वर बहुत ही करुणामय है। वह अब भी सुनता है जब लोग इस प्रकार पुकारते हैं। अतः 20 में हम परमेश्वर की प्रतिक्रिया पाते हैं।

वह अपने वचन के द्वारा उनको चंगा करता और जिस गड़हे में वे पड़े हैं, उस से निकालता है।

परमेश्वर ने चंगाई के लिये उनकी पुकार पर किस प्रकार उत्तर दिया? उसने क्या भेजा? अपना वचन। आपने समझा? उनकी शारीरिक देहों के लिये अपने वचन के द्वारा उसने चंर्गाइ का प्रबन्ध किया। यदि आप 19 और 20वाँ पद देखें तो उन दोनों पदों में यह कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें बचाया, उसने उन्हें चंगा किया, उसने उन्हें छुड़ाया। यह परमेश्वर की दया के तीन महान कार्य हैं। वह पाप से बचाता है, वह बीमारी से चंगा करता है और वह शैतान की शक्ति से छुड़ाता है। यह करने के लिये वह क्या करता है, वह क्या भेजता है? वह अपना वचन भेजता है, बचाता है, चंगा करता है और छुड़ाता है।

यहाँ आज शाम आपमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जिनकी कुछ शारीरिक समस्याएँ हैं। हो सकता है आप कह रहे हों, काश कि र्भाइ प्रिन्स ठहर जाते और मेरे लिये प्रार्थना करते। मैं आपसे कहना चाह रहा हूँ कि परमेश्वर अभी आपके पास आ रहा है। वह अपना वचन भेज रहा है। यदि आप इस उपयुक्त बनाते हैं तो आप चंगाई पाकर इस सभा से बाहर जा सकते हैं। क्योंकि परमेश्वर का वचन आपके पास आया है।

अब मुझे शारीरिक चंगाई पर दूसरे भाग को निकालने दीजिए जो कि नीतिवचन 4ः20.22 में पाया जाता है।

हे मेरे पुत्र मेरे वचन ध्यान धरके सुन, और अपना कान मेरी बातों पर लगा। इनको अपनी आँखों की ओट न होने दे; वरन अपने मन में धारण कर।

परमेश्वर अपने शब्दों और अपने कथनों के विषय में कह रहा है और तब वह 22 पद में कहता है:

क्योंकि जिनकों वे (उसकी बातें और उसके वचन) प्राप्त होती हैं, वे उनके जीवित रहने का, और उनके सारे शरीर के चंगे रहने का कारण होती हैं।

सारे शरीर का अर्थ क्या है? इसका अर्थ हमारी संपूर्ण शारीरिक देह है। तो, परमेश्वर कहता है उसकी बातें और उसके वचन को यदि हम पा सकते हैं तो वे हमें जीवन और हमारी संपूर्ण शारीरिक देह को स्वास्थ्य प्रदान करेंगी।

और बहुत से अनुवादों में स्वास्थ्य शब्द के लिये औषधि शब्द आया है। तो, परमेश्वर ने हमारी शारीरिक देह के लिये औषधि या स्वास्थ्य प्रदान किया है। उसने कैसे इसका प्रबन्ध किया है? अपने वचन और अपनी बातों के द्वारा।

यह ऐसा भाग है जिसने मुझे एक वर्ष के पश्चात् अस्पताल से बाहर लाया जब चिकित्सकों ने मुझे चंगाई देने के लिये असमर्थतता जाहिर कर दी थी और मैं स्वयं बाइबल का अध्ययन करता और तक करता रहता था . क्योंकि मैं एक दार्शनिक था, मेरी विशि‘ट समस्याएँ थी। आप देखें, प्रत्येक बार जब मैं चंगाई के विषय में पढ़ता तो मैं कहता, हाँ परन्तु यह केवल मेरे प्राण की चंगाई के लिये है। परमेश्वर सचमुच मेरी देह में रुचि नहीं रखता है। परन्तु जब मुझे नीतिवचन 4ः22 मिला और उसने सारी देह के लिये चंगाई कहा, तो मैंने अपने आप से कहा कि कोई भी दार्शनिक नहीं कह सकता है कि शरीर का अर्थ प्राण या आत्मा है। तो मैंने कहा कि मैं इसे इस प्रकार लेने जा रहा हूँ। तब मैंने इसे अपनी दवाई के रूप में लेने का निर्णय किया। मैं एक चिकित्सकीय परिचारक था अतः मैं लोगों को दर्वाइ देने के बारे में जानता था। मैंने स्वयं से कहा, मैं अपनी दर्वाइ के रूप में परमेश्वर के वचन को लेने जा रहा हूँ। तब मैंने कहा कि लोग कैसे दर्वाइ लेते हैं। स्वाभाविक उत्तर है, भोजन के पश्चात् दिन में तीन बार।

अब, यह सीधा.साधा होने का एक उदाहरण है, आपने समझा? संभव है कि मैं बुद्धिमान बनता और बीमार रहता परन्तु मैं सरल था और मैंने चंगाई पाया। तो मैंने कहा कि मैं परमेश्वर के वचन को भोजन के पश्चात् अपनी दर्वाइ के रूप में तीन बार लेने जा रहा हूँ। अतः प्रत्येक मुख्य भोजन के पश्चात् मैं दूर गया, जान.बूझकर स्वयं को दूर किया, अपनी बाइबल खोला, अपना सिर झुकाया और कहा, ‘‘हे परमेश्वर, आपने कहा कि आपके ये वचन मेरे लिये, मेरे सारी देह के लिये स्वास्थ्य, या औषधि बनेंगे। अब मैं इसे यीशु के नाम में अपनी दवाई के रूप में ले रहा हूँ।‘‘ मैंने कोई आश्चर्यकर्म नहीं पाया। मैं सुडान में, सबसे अधिक बुरे मौसम में था जिसमें मैं हो सकता था। और उस बिमार मौसम में परमेश्वर के वचन ने मुझे पूर्ण और स्थाई स्वास्थ्य दिया।

22
साझा करें