इस सत्र और अगले सत्र का विषय है ‘‘छुटकारे की उद्धार की मूल बातें।’’ उप शीर्षक है ‘‘क्या आप सब कभी शैतान के बारे में पता करना चाहते थे लेकिन पूछने से डरते थे।’’ इन दो सत्रों में मैं एक पूरी तरह असंभव उपलब्धि प्राप्त करने जा रहा हूँ, जिसमें मैं दो घंटे में इस सेवा के हर मुख्य पहलू पर बात करूँगा। बेशक, विस्तार में नहीं, लेकिन रूपरेखा में।

मेरा मानना है कि यह उपयुक्त होगा कि हम यीशु की सेवा में इस पहलू पर विचार करने से प्रारंभ करें। और मैं मरकुस अध्याय 1 निकालना चाहता हूँ। मैंने कई बार कहा है, जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे यीशु की सेवा में सुधार करने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। मुझे लगता है कि, कुछ लोग सोचते हैं कि यह बेहतर आज किया जा सकता है। यह मेरा रवैया नहीं है। जब उसने सार्वजनिक सेवा शुरू की तो लोगों को सबसे अधिक जो बात खटकी वह दुष्टात्माओं के विरुद्ध उसका व्यवहार था। और यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह यीशु का ऐसा आश्चर्यकर्म था जो पुराना नियम में यह पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था। उसके लगभग सभी अन्य चमत्कार-चंगा करना, भोजन खिलाना, प्रकृति पर नियंत्रण पुराना नियम में पहले से ही दर्ज किया गया था। लेकिन पुराना नियम में दुष्टात्माओं को निकालने का कोई वर्णन नहीं है। और जो लोग इस घटना के गवाह बने बहुत शीघ्र उससे प्रभावित हुए और उसके बारे में उत्तेजित हुए।

यहाँ कफरनहूम में एक आराधनालय में हुई पहली घटना का वर्णन है। मर. 1 अध्याय के 23 पद में वचन कहता हैः

‘‘और उसी समय, उन की सभा के घर में एक मनुष्य था, जिस में एक अशुद्ध आत्मा थी।’’

यूनानी कहता है कि ‘‘एक अशुद्ध आत्मा में,’’ जिसे अंग्रेजी भाषा में अनुवाद नहीं किया जा सकता है। मुझे लगता है कि शायद सबसे अच्छा समकालीन अंग्रेजी एक अशुद्ध आत्मा के प्रभाव के अधीन होता।

तीन वाक्य हैं जिनका उपयोग अदल बदल कर कम या ज्यादा बार उपयोग किया गया है; हमें अभी उनके बारे में बताना चाहियेः दुष्टात्मायें, बुरी आत्मायें, और अशुद्ध आत्मायें। यह कुछ अन्य आत्माओं के बारे में भी बात करता है जैसे कि दुर्बलता की आत्मा या भय की आत्मा। ठीक है।

‘‘और उसी समय, उन की सभा के घर में एक अशुद्ध आत्मा के प्रभाव के अधीन मनुष्य था। उस ने चिल्लाकर कहा, हे यीशु नासरी, हमें तुझ से क्या काम? क्या तू हमें नाश करने आया है? मैं तुझे जानता हूँ, तू कौन है? परमेश्वर का पवित्र जन।’’

ध्यान दें कि बुरी आत्मा तुरंत पहचान लेती है कि यीशु कौन था। यीशु के चेलों को यह पहचानना प्रारंभ करने में ही एक वर्ष से भी अधिक का समय लगा कि वह कौन था, वे तुरंत जान गये। उन्होंने उससे भय किया। साथ ही साथ ‘‘हम’’ और मैं का योग देखिये जो कि बहुत ही विशेष है। जब प्रभु ने गदरेनी के व्यक्ति से बात की तो उसने कहा, ‘‘तेरा (एकवचन) नाम क्या है?’’ और उसने कहा, ‘‘मेरा नाम सेना है। क्योंकि हम बहुत हैं। यह ‘‘मैं’’ और ‘‘हम’’ का योग दुष्टात्माओं की विशिष्टता होती है। पद 25ः

‘‘परन्तु यीशु ने उसे डाँटकर कहा, चुप रह और उसमें से निकल जा।’’

यूनानी अक्षरशः कहता है कि उसमें से निकल आ।

‘‘तब अशुद्ध आत्मा उस को मरोड़कर, और बड़े शब्द से चिल्लाकर उस में से निकल गई।’’

ध्यान दें, कि इस घटना में बहुत नाटकीय बातें हुईं। यह उस प्रकार का व्यवहार नहीं था जो आराधनालय में सामान्य था। किसी ने एक बार मुझसे कहा, ‘‘अधिकांश कलीसियाओं में लोग उस व्यक्ति को ही कलीसिया से बाहर कर देते हैं। परन्तु यीशु ने उस व्यक्ति में से दुष्टात्मा को ही निकाल दिया, आप समझे। और उसने उस व्यक्ति को आराधनालय में छोड़ दिया।’’ तब अगला पद पढ़ते हैंः

‘‘इस पर सब लोग आश्चर्य करते हुए, आपस में वाद-विवाद करने लगे कि यह क्या बात है? यह तो कोई नया उपदेश है! वह अधिकार के साथ अशुद्ध आत्माओं को भी आज्ञा देता है, और वे उस की आज्ञा मानती हैं। सो उसका नाम तुरन्त गलील के आस पास के सारे देश में हर जगह फैल गया।’’

यह बहुत ही सत्य है। परिस्थिति नहीं बदली हैं। यदि आप दुष्टात्माओं से छुटकारे की सेवा करने लगेंगे तो बहुत जल्द ख्याति फैल जायेगी। यह एक ऐसी बात है जो आज भी लोगों को बहुत अधिक प्रभावित करती है जब वे उस बात की गवाही देते हैं। जिस बात पर मैं यहाँ जोर देना चाहता हूँ, वह यह है कि यीशु ने उस व्यक्ति से व्यवहार नहीं किया, उसने उस व्यक्ति में विद्यमान आत्मा से व्यवहार किया। उस व्यक्ति में का दूसरा व्यक्ति। परन्तु इस बात का कोई संकेत नहीं है कि वह पहले सामान्य व्यवहार करता था। यह यीशु में उपस्थित पवित्रात्मा का अभिषेक ही था जिसने उस व्यक्ति में अशुद्ध आत्मा की अदृश्य उपस्थिति को प्रगट किया था।

अब, उसी दिन बाद में इस अध्याय में, पद 32-34 में हम उसकी आगे की सेवा देखते हैं।

‘‘सन्ध्या के समय जब सूर्य डूब गया तो लोग सब बीमारों को और उन्हें जिन में दुष्टात्मा थीं उसके पास लाये।’’

मुझे कहने दें कि मुझे ‘‘दुष्टात्मा ग्रसित’’ अनुवाद अच्छा नहीं लगता है। यूनानी शब्द डायमोनिजोमाई है। यदि मुझे यह अंग्रेजी में लिखना होता तो यह कुछ इस प्रकार होता। जहाँ डेइमोन मूल है और संज्ञा डीमन से आता है, आपने समझा? तो, इजोमई ‘‘दुष्टात्मा ग्रसित होना’’ का अक्रिय रूप है। ‘‘दुष्टात्मा ग्रसित’’ यह उचित अनुवाद होगा। ‘‘दुष्टात्मा ग्रसित’’ का अनुवाद दुर्भाग्यवश लाखों लोगों के मुद्दे को छिपा दिया है क्योंकि वे कहते हैं, ‘‘कैसे एक मसीही शैतान के बंधन में हो सकता है?’’ मेरा उत्तर यह है कि एक सच्चा मसीही दुष्टात्मा से ग्रसित नहीं हो सकता है। सच्चा मसीही यीशु से ग्रसित होता है। हालाँकि बहुत से सच्चे मसीहियों में कुछ क्षेत्र होते हैं जहाँ वे दुष्टात्मा ग्रसित हैं, जहाँ वे दुष्टात्मा से ग्रसित और प्रभावित रहते हैं। उनके जीवनों और स्वभाव में ऐसे क्षेत्र जिन पर पूरी तरह उनका नियंत्रण नहीं होते हैं। और वे दुष्टात्मा ग्रस्त होते हैं परन्तु शैतान से ग्रस्त नहीं। यदि हम अनुवाद की उस एक बाधा को दूर कर दें तो हम वास्तविकता को देखने में काफी आगे बढ़ जायेंगे। ठीक है।

‘‘सन्ध्या के समय जब सूर्य डूब गया तो लोग सब बीमारों को और उन्हें जिन में दुष्टात्मा थीं उसके पास लाये।’’

और वास्तव में नया नियम शायद ही कोई भेद करता है। और न ही यीशु ने किया। प्रायः निरपवाद रूप से उसने एक ही प्रकार के व्यवहार से संपूर्ण सेवा में बीमारों और दुष्टात्माग्रस्तों के साथ व्यवहार किया।

‘‘और सारा नगर द्वार पर इकट्ठा हुआ। और उस ने बहुतों को जो नाना प्रकार की बीमारियों से दुखी थे, चंगा किया, और बहुत से दुष्टात्माओं को निकाला, और दुष्टात्माओं को बोलने न दिया, क्योंकि वे उसे पहचानती थीं।’’

किंग जेम्स और यह अनुवाद और बहुत से अन्य अनुवाद ‘‘दुष्टात्माओं को निकालना’’ का उपयोग करते हैं। जो अनुवाद मैं पसंद करता हूँ, वह फिलिप का है जहाँ वह ‘‘निकालना’’ शब्द का उपयोग करता है। क्योंकि इसका बहुत अधिक धार्मिक महत्व नहीं है। यह सरल, व्यावहारिक है। यदि आप अपने फेफड़ों में धुंआ भरते हैं तो उससे छुटकारा पाने के लिये आप क्या करेंगे? आप उसे बाहर निकाल देते हैं। यह इच्छा का एक कार्य होता है, परन्तु इसका एक भौतिक पहलू भी है। और उसी का तो मैं उपयोग करना पसंद करना चाहता हूँ, मैं हमेशा इसका उपयोग नहीं करता हूँ परन्तु मेरे विचार से यह सर्वश्रेष्ठ होगाः ‘‘उसने कई दुष्टात्माओं को निकाला। उसने दुष्टात्माओं को बोलने नहीं दिया, क्योंकि वे उसे जानती थीं।’’ और तब मैं उस अध्याय में से एक और पद पढ़ना चाहता हूँ, पद 39ः

‘‘सो वह सारे गलील में उन की सभाओं में जा जाकर प्रचार करता और दुष्टात्माओं को निकालता रहा।’’

फिलिप का अनुवाद कहता है, ‘‘वह सारे गलील में जा जाकर उनके आराधनालयों में उपदेश देता और दुष्टात्माओं को निकालता रहा।’’ मैं विशेष रूप से इस तथ्य को पसन्द करता हूँ कि वह जारी रहा शब्द का उपयोग करते हैं, जो यूनानी भाषा में एक निश्चित काल का प्रतिनिधित्व करता है। वह इस तथ्य को सामने लाते हैं कि यह एक मात्र नाटकीय घटना नहीं थी जो एक आराधनालय में घटित हुई, परन्तु प्रत्येक आराधनालय में दो बातें करना उसकी नियमित आदतों में शुमार थी; प्रचार करना और दुष्टात्माओं को निकालना। और उसने संपूर्ण गलील में यह किया। गलील में सैकड़ों आराधनालय रहे होंगे, आप देखें बहुत से लोग यही मनोवृत्ति रखते हैं, ‘‘ठीक है, शायद हर बार ऐसा मामला आता है जब दुष्टात्माओं को निकालना अनिवार्य होता है, परन्तु ऐसे मामले विरले ही होते हैं।’’ और प्रायः मनोवृत्ति यह होती है, ‘‘यदि ऐसे लोग हैं भी तो वे या तो जेल में हैं या मनोरोग अस्पतालों में हैं।’’ ठीक है, मुझे केवल आपको यह बताना है कि वह व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसके साथ यीशु व्यवहार कर रहा था, वह कट्टर यहूदी था जो हर सब्त को आराधनालय जाते और शेष सप्ताह भर अपने परिवारों की देखभाल करते, खेतों में काम करते, सागर में मछली पकड़ते, और अन्य अन्य काम करते बिता देते। वे मूल रूप से सामान्य, आदरणीय, धार्मिक लोग होते थे, परन्तु उनमें कुछ ऐसी निश्चित बातें थीं जिन्हें हम आदतें कह सकते हैं। कुछ क्षेत्र, जैसा कि मैं कहता हूँ, जहाँ स्वयं पर उनका नियन्त्रण नहीं रहता है। अतः, यह दृष्टिकोण न अपनायें कि एक व्यक्ति जिसे छुटकारा चाहिए वह अवश्य ही अपराधी होगा या मानसिक रोगी होगा। यह वैसे ही सामान्य लोग हैं जिनके साथ वर्तमान में हम मुख्यतः व्यवहार करते हैं, न कि उसका अपवाद। भले, आदरणीय और धार्मिक लोग जो कलीसिया में आते हैं और सही बातें कहते हैं, परन्तु अपनी जीवनों में किसी न किसी क्षेत्र में वे दुष्टात्मा ग्रसित होते हैं, जहाँ उनका नियन्त्रण नहीं होता है। हो सकता है वह उनकी भौतिक अभिलाषाओं में से हों, हो सकता है उनकी भावनाओं में हों, हो सकता है उनके मन में हों। मैं बाद में विभिन्न क्षेत्रों पर बात करूँगा परन्तु जो कुछ मैंने कहा है यदि आप उसे स्वीकार कर सकते हैं, तो वह हर प्रकार के पूर्वाग्रह को दूर कर देगा जो आपको इस विषय को वृहद रूप में देखने देगा।

यह एक रोचक बात है, परन्तु एक देश के लोग आसानी से इस बात को स्वीकार कर सकते हैं कि दूसरे देश के लोगों को छुटकारे की आवश्यकता है। मैंने डेनमार्क में इस विषय पर बात किया था। डेनमार्क के लोगों को यह मानने में कोई दिक्कत नहीं है कि अमेरिकियों को छुटकारे की आवश्यकता है। और यह विश्वास करने में अमेरिकियों को कोई समस्या नहीं है कि अफ्रीकियों को छुटकारे की आवश्यकता है। हाँ, मैंने अफ्रीका में अपने जीवन के आठ वर्ष बिताये हैं, परन्तु मुझे आपको बताना है कि मैंने कभी भी अफ्रीका में उतने दुष्टात्माओं से नहीं मिला जितना मैं अमेरिका में मिला हूँ। वे तो केवल सांस्कृतिक भिन्नताएँ हैं। वे अपने आपको अपने वातावरण के अनुकूल बना देते हैं।

ठीक है, आइए यीशु की सेवा के एक और चित्र को देखें जो इसी के समान है, वास्तव में लूका 4ः40-41 में वचन ऐसी ही घटना का वर्णन करता है। यह यीशु की सेवा के वर्णन का वही भाग है जिसका वर्णन मरकुस 1 में किया गया है। लूका 4ः40-41ः

‘‘सूरज डूबते समय जिन जिन के यहां लोग नाना प्रकार की बीमारियों में पड़े हुए थे, वे सब उन्हें उसके पास ले आयें, और उस ने एक एक पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया। और दुष्टात्मा चिल्लाती और यह कहती हुई कि तू परमेश्वर का पुत्र है, बहुतों में से निकल गई..।’’

हमें ज्यादा पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। चंगाई और छुटकारे की सेवा दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए थे। वे इसलिये आते थे क्योंकि वे बीमार थे परन्तु कई मामलों में उनके चंगाई के लिये दुष्टात्माओं का निकलना आवश्यक था। और इस बात पर ध्यान दें कि यीशु ने उनमें से हर एक पर अपने हाथ रखे। ऐसी एक पिन्तेकुस्त परम्परा रही है, मुझे नहीं मालूम कि अब है या नहीं कि एक दुष्टात्मा ग्रसित व्यक्ति पर हाथ रखना धर्मशास्त्र सम्मत नहीं है। यदि ऐसा होता तो यीशु धर्मशास्त्र के अनुसार नहीं था और मैं परम्परा के बजाय उसकी रीति का पालन करता हूँ।

अब आइए, लूका में एक और अध्याय, अध्याय 13 देखें। हम लूका 13ः11-16 में एक स्त्री को देखते हैं जो कुबड़ी हो गई थी। बाद में दूसरे आराधनालय की दूसरी घटना।

‘‘और देखो, एक स्त्री थी, जिसे अठारह वर्ष से एक दुर्बल करनेवाली दुष्टात्मा लगी थी, और वह कुबड़ी हो गई थी, और किसी रीति से सीधी नहीं हो सकती थी। यीशु ने उसे देखकर बुलाया, और कहा हे नारी, तू अपनी दुर्बलता से छूट गई। तब उस ने उस पर हाथ रखे, और वह तुरन्त सीधी हो गई, और परमेश्वर की बड़ाई करने लगी। इसलिये कि यीशु ने सब्त के दिन उसे अच्छा किया था, आराधनालय का सरदार रिसियाकर लोगों से कहने लगा, छः दिन हैं, जिन में काम करना चाहिए, सो उन ही दिनों में आकर चंगे होओ, परन्तु सब्त के दिन में नहीं। यह सुन कर प्रभु ने उत्तर देकर कहा, हे कपटियों, क्या सब्त के दिन तुम में से हर एक अपने बैल या गदहे को थान से खोलकर पानी पिलाने नहीं ले जाता? और क्या उचित न था, कि यह स्त्री जो इब्राहीम की बेटी है जिसे शैतान ने अठारह वर्ष से बान्ध रखा था, सब्त के दिन इस बन्धन से छुड़ाई जाती?’’

वह एक विश्वास करनेवाली स्त्री थी। वह एक यहूदिनी थी, वह आराधनालय की एक सदस्या थी, उसे यह भयानक शारीरिक समस्या थी; उसकी पीठ मुड़ गई थी। यह प्राथमिक रूप से शारीरिक समस्या नहीं थी। यह दुर्बलता की आत्मा के कारण थी। और जिस क्षण दुर्बलता की आत्मा ने उसे छोड़ दिया वह सीधी हो गई। अब इसमें परखने की आवश्यकता होती है, परन्तु मैं केवल यह बता रहा हूँ कि कुछ समस्यायें जिन्हें हम शारीरिक के रूप में वर्गीकृत करते हैं, वे वास्तव में दुष्टात्माओं द्वारा उत्पन्न होते हैं। यीशु ने भी गूंगेपन, बहरेपन, और अन्धेपन की समस्या को दूर किया था जो दुष्टात्माओं द्वारा लाई गई थी। और बहुत से मामलों में लोगों को चंगा करने की उसकी सेवा उन्हें आत्माओं से छुटकारा देने की थी, जो उनमें गूंगेपन, बहरेपन, और अन्धापन लाती थी। अब अधिक विस्तार में गए बिना मुझे यह कहना है, कि मैंने ऐसे प्रत्येक क्षेत्रों में अपनी सेवा में ऐसी घटनायें देखी हैं।

तब हम थोड़ा और आगे लूका 13ः31-32 में पढ़ते हैं। यह यीशु की सेवा में हमारी अन्तिम झलक है।

‘‘उसी घड़ी कितने फरीसियों ने आकर उस से कहा, यहां से निकलकर चला जा, क्योंकि हेरोदेस तुझे मार डालना चाहता है। उस ने उन से कहा, जाकर उस लोमड़ी से कह दो, कि देख मैं आज और कल दुष्टात्माओं को निकालता और बीमारों को चंगा करता हूं और तीसरे दिन पूरा करूंगा।’’

यह एक प्रकार का हेब्रैज़म है। आज, कल और तीसरा दिन अर्थात् अब से तब तक जब तक कार्य समाप्त नहीं होता। अतः उसने कहा, ‘‘मैं दो बातें करने जा रहा हूँ; दुष्टात्माओं को निकालने और चंगाई देने।’’ इसी प्रकार उसने प्रारंभ किया, इसी प्रकार वह करता रहा, और इसी प्रकार उसने समाप्त किया। एक मुख्य भाग के रूप में प्रारंभ से अन्त तक उसकी संपूर्ण सेवा इसमें सम्मिलित थी, संभवतः उसके समय की एक-तिहाई बीमारों को चंगा करने में और दुष्टात्माओं को निकालने में। और दोनों तो एक दूसरे में इतने अधिक पिरोए हुए थे कि उनके बीच में भेद करना असंभव था।

अब अगली बात जो मैं कहना चाहता हूँ जिसका मैं बहुत संक्षिप्त में वर्णन करूँगा, वह यह है कि नया नियम में कभी किसी को भी बिना दुष्टात्माओं पर अधिकार दिए सुसमाचार प्रचार के लिये नहीं भेजा गया। नया नियम में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं हैं। ऐसा करना धर्मशास्त्र के विपरीत है।

आइए, प्रथम बारह शिष्यों पर नजर डालें जिन्हें भेजा गया था। मत्ती अध्याय 10 पद 1:

‘‘फिर उस ने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें।’’

ध्यान दें कि पहली बात जो उसने किया वह उन्हें दुष्टात्माओं पर अधिकार देना था। और तब पद 5 में नामों को छोड़ते हुए वचन कहता है:

‘‘इन बारहों को यीशु ने यह आज्ञा देकर भेजा (और तब वचन कहता है, हम प्रासंगिक भाग को खो रहे हैं, पद 6 और 7) परन्तु इस्राएल के घराने ही की खोई हुई भेड़ों के पास जाना। और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है (परन्तु केवल प्रचार मत करो, कुछ करो। क्या?) बीमारों को चंगा करोः मरे हुओं को जिलाओः कोढ़ियों को शुद्ध करोः दुष्टात्माओं को निकालो।’’

उनकी साजसज्जा में यह शामिल था और उनके भेजे जाने में भी यह शामिल था। लूका 10 अध्याय में हम और सत्तर लोगों के बारे में पढ़ते हैं जिन्हें बाहर भेजा गया था। लूका अध्याय 10 पद 1:

‘‘और इन बातों के बाद प्रभु ने सत्तर और मनुष्य नियुक्त किए और जिस जिस नगर और जगह को वह आप जाने पर था, वहां उन्हें दो दो करके अपने आगे भेजा।’’

अब हम केवल पद 17 देखेंगे, वह विवरण जो सत्तर लोग लेकर आए और पद 17 में वचन कहता है:

‘‘वे सत्तर आनन्द से फिर आकर कहने लगे, हे प्रभु, तेरे नाम से दुष्टात्मा भी हमारे वश में है।’’

उन्हें किस बात ने सबसे अधिक प्रभावित किया? उन्हें दुष्टात्माओं पर अधिकार था। वे बारह नहीं थे, वे सत्तर थे।

और तब हम सुसमाचार के अन्त में अन्तिम आज्ञा देखते हैं। सबसे पहले, मरकुस 16ः15 से आगे। मरकुस 16ः15:

‘‘और उस ने उन से कहा, तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो। जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा। (पद 17)। और विश्वास करनेवालों में ये चिन्ह होंगे। (पहला चिन्ह क्या होगा?)। वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे।’’

बिना पहले यह सुनिश्चित किये उसने उन्हें बाहर नहीं भेजा कि उन्हें मालूम है कि दुष्टात्माओं को कैसे निकालना है। और मत्ती 28, और महान आज्ञा के अन्य संदर्भ में, पद 19-20 में वह कहता है:

‘‘इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओः और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।’’

उसने उनसे कहा कि अपने शिष्यों को वह सब कुछ सिखायें जो उसने उन्हें सिखाया है। और मुख्य बातों में से एक जो उसने उन्हें सिखाई वह यह था कि दुष्टात्माओं को कैसे निकालना है। और उसने कहा, ‘‘जब तुम चेले बनाओ, तो उन्हें वह सब सिखाओ जो मैंने तुम्हें सिखाया है। और जब वे शिष्य बनाए तो वे अपने शिष्यों को वह सब सिखायें जो उसने उन्हें सिखाया है।’’ और उसने कहा, ‘‘संसार के अन्त तक मैं तुम्हारे संग रहूँगा।’’ उसने इस प्रक्रिया में परिवर्तन का कोई प्रबन्ध नहीं किया। उसके जाने से लेकर वापस आने तक उसने इसी प्रक्रिया की कल्पना की। यही उसका कार्यक्रम है। त्रासदी यह है कि कलीसिया इस कार्यक्रम से विमुख हो गई है। उन्होंने इसे बढ़ाया नहीं है, वे नहीं कर सकते हैं। उन्होंने तो बस उससे विपत्ति मोल ले ली है।

अब, वहाँ नया नियम में, यीशु के अलावा एक ही व्यक्ति है जो सुसमाचारक कहा जाता है। केवल एक है। मैंने अट्ठाईस व्यक्तियों को गिना है जिन्हें प्रेरित बुलाया गया। क्या यह उल्लेखनीय नहीं है? हम सुसमाचारक के संबोधन अपनाने से संकोच नहीं करते। समकालीन कलीसिया में कोई भी जो एक पादरी नहीं है उसे एक सुसमाचारक होना है। मूल रूप से, केवल दो विकल्प हैं। सुसमाचारक कौन था, कौन मुझे बता सकते हैं? फिलिप्पुस। अब प्रेरितों अध्याय 8 में, उसकी सेवा का विवरण है। प्रेरितों 8ः5ः

‘‘और फिलिप्पुस सामरिया नगर में जाकर लोगों में मसीह का प्रचार करने लगा।’’

फिलिप्पुस का संदेश बहुत ही सरल था। यह एक शब्द का संदेश था। सामरिया में उसने मसीह का प्रचार किया, गाजा के मार्ग पर उसने यीशु का प्रचार किया। ठीक।

‘‘और जो बातें फिलिप्पुस ने कहीं उन्हें लोगों ने सुनकर और जो चिन्ह वह दिखाता था उन्हें देख देखकर, एक चित्त होकर मन लगाया। (क्या इसलिये कि उसके पास एक अच्छी समिति और एक गीत मंडली थी? नहीं।) जो आश्चर्य कर्म वह करता था उन्हें सुनकर और देखकर। क्योंकि (पहली बात क्या थी?) अशुद्ध आत्माएँ बड़े शब्द से चिल्लाती हुई निकल गईं, और बहुत से झोले के मारे और लंगड़े भी अच्छे किये गये।’’

ध्यान दें, कि एक सुसमाचारक के रूप में, उसकी सेवा में पहली बात बुरी आत्माओं को निकालना था। तो मैं आपको सुझाव दे रहा हूँ कि यीशु का तरीका और उसकी आज्ञा दोनों ही सेवकों को यह छूट नहीं देती है कि पहले दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार पाए बिना सुसमाचार प्रचार के लिये जायें। मैं नहीं मानता कि आपको यहाँ ऐसा उदाहरण मिलेगा।

अब मैं आपको दुष्टात्माओं की प्रकृति पर कुछ सामान्य शिक्षा देने जा रहा हूँ, और हम दुष्टात्मा शब्द को देखेंगे, और वे तरीके जिनसे आप जान सकते हैं कि क्या वे आप में या दूसरों में काम पर रहे हैं। बेशक, हमेशा आत्माओं को परखने और ज्ञान के वचन के दो वरदान होते हैं। लेकिन उस के अलावा, अलौकिक दायरे में, बहुत से अन्य संयुक्त संकेत हैं, जो हमें या तो अपने आप में या दूसरों में, दुष्टात्माओं की उपस्थिति के बारे में, सचेत करते हैं। जैसा कि मैंने कहा है, सब से पहले, आपको जानने की जरूरत है, वे बिना देह के व्यक्ति हैं। आप व्यक्तियों के साथ काम कर रहे हैं-बिन शरीर वाले व्यक्तियों के साथ, जिन्हें किसी शरीर में पाने की एक आवेशपूर्ण इच्छा है। आप को यह समझने की जरूरत है। वे शरीर के बाहर पूरी तरह से असंतुष्ट हैं। जो देह उन्हें चाहिये, वह एक मानव शरीर है, लेकिन देह के बाहर न रहकर वे एक सुअर, या किसी कुत्ते या अन्य जानवर में बसेंगे। वे बिन देह के रहना नहीं चाहतीं। यह उनके लिए पीड़ा है।

उन्हें शैतान द्वारा दो काम दिये गये हैं। पहला, उद्धारकर्ता के रूप में मसीह को जानने से आपको वंचित रखना। लेकिन अगर वे उस में असफल हों, तो उनका दूसरा उद्देश्य आपको मसीह की प्रभावशाली सेवा न करने देना, आप इसे देखते हैं? यदि वे पहले में विफल रही हैं तो वे हार नहीं मानते। वे दूसरा तरीका अपनाते हैं।

अब हमें देह और दुष्टात्माओं के बीच भेद करने की जरूरत है। देह पुरानी कामुक प्रकृति, पुराना मनुष्य है। ऐसे व्यक्ति होने के नाते दुष्टात्मायें आपके व्यक्तित्व के क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं और कब्जा कर लेती हैं। मैं इस तरह उनकी तुलना करता हूँ। देह लोथ हैं; दुष्टात्मायें गिद्ध हैं, जो कि शवों पर बैठती हैं। आप समझे? यदि कोई लोथ नहीं होता तो कोई गिद्ध नहीं होता। यह एक बहुत ही ज्वलंत तस्वीर है। यदि आप ऐसे देश में रहे हैं जहाँ गिद्ध हों, तो यदि कोई पशु मरने पर हो तो आसमान में छोटे छोटे धब्बे उभरने लगते हैं और मंडराने लगते हैं। और कुछ देर बाद आप देखते हैं और तीन या चार गिद्धों को देखते हैं और पशु की मृत्यु जितनी नजदीक आती जाती है गिद्ध उतने ही नजदीक आते जाते हैं। यीशु ने कहा, ‘‘जहाँ लोथें होंगी वहाँ गिद्ध मँडराएँगे।’’ जहाँ मनुष्य की नया जन्म न पाया हुआ स्वभाव और उसका पापमय स्वभाव प्रगट होता है वहाँ आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि गिद्ध इकट्ठे होंगे।

अब इलाज पूरी तरह भिन्न है। देह का इलाज क्या है? क्रूस। हाँ, सही। गला. 5ः24ः

‘‘और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उस की लालसाओं और अभिलाषों समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।’’

दुष्टात्माओं के लिए उपाय क्या है? उन्हें निष्कासित करने के लिए, यह ठीक है। अब आप उपचार बदल नहीं सकते। आप देह निष्कासित नहीं कर सकते और आप दुष्टात्माओं को क्रूस पर चढ़ा नहीं सकते। तो यह पता करने के लिए कि कौन सा उपाय लागू करना है, आपका जानना है कि आप किसके साथ व्यवहार कर रहे हैं। ठीक?

अब मैं सामान्य रीति में कहूँगा, यदि आप गंभीर मसीही हैं जो अपना बाइबल पढ़ता है, प्रार्थना करता है, नियमित संगति करता है, और प्रभु की सेवा करने की इच्छा रखता है और आपकी एक विशेष प्रकार की समस्या है - कुछ यातनापूर्ण, कुछ उत्तेजक, कुछ अपमानजनक, कुछ बाध्यकारी, कुछ भद्दा - और आपने हर उपाय करने की कोशिश की है - आपने प्रार्थना की है, आपने उपवास किया है, आपने अपने आप को मृत गिना है और आपने अब भी इसे सुलझाया नहीं - तो आप लगभग सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप दुष्टात्मा की समस्या से जूझ रहे हैं। मैं अनुभव से यह कह सकता हूँ, जिसे आज सुबह संबंधित करना मेरे लिये बहुत लंबा है।

अब, मैं इस सत्र के अगले भाग में जो करना चाहता हूँ वह दुष्टात्माओं की कुछ विशेष गतिविधियों को करना है। मैं लगभग नौ क्रियाओं की सूची दे रहा हूँ जो दुष्टात्माओं की विशेष गतिविधियों का वर्णन करते हैं। यदि ये आपके जीवन में, एक, या एक से भी अधिक, मौजूद हैं या यदि वे बहुत तीव्र हैं, आप को जाँच करना शुरू करना चाहिए, शायद आपको उद्धार की जरूरत है। और मन में जान लें, ये सभी व्यक्तियों की गतिविधि हैं क्योंकि हम बिना देहों वाले व्यक्तियों के साथ व्यवहार कर रहे हैं।

पहली क्रिया, लुभाना है। दुष्टात्मायें लुभाती हैं। वे लोगों को बुराई करने के लिए लुभाते हैं। अगर आप अपने अनुभव का विश्लेषण करें तो आप पाएँगे कि फुसलाना अक्सर मौखिक रूप में आता है। एक सुंदर स्वर्ण पेंसिल फर्श पर गिरा दिया गया है और आप इसे देख खड़े हो जाते हैं और आपसे कुछ कहता है, ‘‘इसे ले लो। किसी को भी पता नहीं चलेगा। अन्य लोग भी यही करते। अगर यह आपकी पेंसिल होती, वे इसे ले लेते।’’ क्या आप जानते हैं कि वह क्या है? कुछ भी जिसकी आवाज होती है, वह एक व्यक्ति है। उस आवाज के पीछे एक दुष्टात्मा है जो आपको मोहित कर रहा है। आप में से किसी ने भी कभी अनुभव नहीं किया है, बस मैं ही!

दुष्टात्मायें परेशान करती हैं, इस बात पर निर्भर करती है, कि आप दुनिया के किस भाग से आते हैं। वे आप का अध्ययन करते हैं, वे आपकी गतिविधि पर नजर रखते हैं, वे आपके कमजोर क्षणों को जानते हैं, वे आपके कमजोर स्थानों को जानते हैं, वे जानते हैं कि कब और कैसे बस वे प्रवेश कर सकते हैं। मैं आमतौर पर जो उदाहरण देता हूँ, वह एक व्यापारी का है जिसे कार्यालय में एक भयानक दिन गुजारना पड़ा। सब कुछ गलत हुआ, उसकी सचिव अकुशल थी, एयर कंडीशनर विफल रहा...। और तब घर के रास्ते पर यातायात जाम था और वह एक घंटे के फ्री वे पर था, और फिर वह घर वापस चला जाता है, विश्वास करें या नहीं, उसकी पत्नी ने रात का खाना बनाने में देर कर दी है, और बच्चे चिल्ला के आसपास दौड़ रहे हैं। और जब वह द्वार से भीतर प्रवेश करते हैं तो वह अपना आपा खो देते हैं, ठीक है? आप जानते हैं, क्या होता है? वह दुष्टात्मा जो दिन भर उसकी पूँछ पर था, वह उछल पड़ता है। और उसके बाद उसकी पत्नी उसमें कुछ परिवर्तन देखती है। वह अब भी एक प्रेमी पिता और पति है परन्तु ऐसे समय आते हैं जब कुछ और हावी हो जाता है। वह उसकी आँखों में एक भिन्न प्रकार की चमक देखती है और यद्यपि वह अपनी पत्नी और बच्चों से प्यार करते हैं, पर जब वह उस पर हावी हो जाता है तो वह कई बार जीवन को दुखदायी बना देता है। और तब वह इतना अधिक शर्मिंदा और ग्लानि से भर जाते हैं कि वह कहते हैं, ‘‘मुझे नहीं मालूम कि मैंने ऐसा कैसे किया।’’ ठीक है, हमें मालूम है, यह क्रोध की दुष्टात्मा थी।

तीसरा, वे पीड़ा देते हैं। अब बाइबल मत्ती 18 में, उत्पीड़कों के बारे में बोलती है। मुझे विश्वास है कि दुष्टात्मायें उत्पीड़क हैं। मत्ती 18 में माफ न करने वाले दास के दृष्टान्त में, दास जो अपने साथी दास का क्षुद्र ऋण, माफ नहीं करता, उसे परमेश्वर द्वारा उत्पीड़कों को सौंप दिया गया। मैंने सैकड़ों मसीहियों को उत्पीड़कों के हाथों में पाया है। आपको पता है, क्यों? क्षमा न करना। यदि आप के हृदय में किसी के प्रति कोई अक्षमा है, तो आप उत्पीड़कों के लिये एक वैध लक्ष्य हैं। और शैतान एक कानूनी विशेषज्ञ है; वह जानता है कि वह कब भीतर आने का हकदार है। यातना के विभिन्न रूप होते हैं।

शारीरिक पीड़ा। जो उदाहरण मैं चुनूँगा, वह गठिया का है। जब आप गठिया को देखते हैं, तो आपने शैतान को काम करते देखा है। सताने, यातना देने, लंगड़ा करने, बाँधने।

मानसिक पीड़ा। असामान्य रूप से आम पीड़ा है पागल हो जाने का डर। तो यह आपकी समस्या नहीं है। आपकी समस्या एक झूठ बोलने, आरोप लगाने वाली, आत्मा है जो आपकी शांति और आपके उद्धार के आश्वासन को ले जा रहा है।

ठीक है, चौथा, वे मजबूर करते हैं। मुझे लगता है कि बाध्यकारी से अधिक विशिष्ट कोई और शब्द नहीं है। लगभग कुछ भी जो बाध्यकारी होता है वह दुष्टात्मा की ओर से होता है। बाध्यकारी धूम्रपान, बाध्यकारी शराब उपभोग, लेकिन वहाँ रुकें नहीं। बाध्यकारी खाना भी उतना ही शैतानी है। पेटूपन शराब के समान ही एक समस्या है। लेकिन देखें, यह सम्मानजनक होता है। आप कलीसिया में एक शराबी नहीं हो सकते हैं, लेकिन आप एक खाऊ हो सकते हैं। मजबूरी के अन्य रूप होते हैं। बाध्यकारी बात करना, वाचालता। जो लोग बात करना बंद नहीं कर सकते, वे समस्याग्रस्त हैं। और वे भी एक समस्या हैं!

पाँच, दुष्टात्मायें वश में करती हैं। बहुत करीब। आप देखें, आइये मान लें कि आपने सेक्स के क्षेत्र में एक पाप किया है। आप पश्चाताप करते हैं, आप यीशु के पास जाते हैं, आप पापक्षमा और शुद्धीकरण पाते हैं। आप धर्मी ठहराये जाते हैं। मानो आपने कभी पाप नहीं किया है। इसके साथ सब समाप्त हो गया है। लेकिन यदि आप में अभी भी उस पाप को पुनः करने की तीव्र इच्छा होती है भले ही आप इसे नफरत करते हैं परन्तु आप दास हैं। एक बहुत ही सामान्य उदाहरण हस्तमैथुन का है। अब कुछ मनोवैज्ञानिक और लोग कहते हैं कि हस्तमैथुन ठीक है, यह स्वस्थ है। मैं उस के बारे में बहस भी नहीं करता हूँ। लेकिन मैं जानता हूँ कि हजारों लोग हैं जो इसे करते हैं और यह करने के लिए खुद से नफरत करते हैं। और हर बार वे कहते हैं, ‘‘फिर कभी नहीं।’’ लेकिन यह कभी काम नहीं करता है। वे दास हैं। और हस्तमैथुन का एक दुष्टात्मा है। यह बहुत ही आम है। सभा में बहुत अधिक आगे बढ़ने से पहले मुझे आपको यह बताने दें कि इसकी निश्चित विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं। होगा यह कि व्यक्ति की उंगलियाँ झुनझुनी महसूस करना शुरू करेंगी। मैंने कई लोगों को कहते पाया है कि ‘‘भाई प्रिंस, मेरे साथ क्या बात है? मेरी उंगलियों में झुनझुनी हैं।’’ और कभी कभी वे कड़ी हो जाती हैं और वे ठीक पीछे की ओर झुक जाती हैं। और मैं सिर्फ उनके कान में फुसफुसाता हूँ। ‘‘आपकी समस्या हस्तमैथुन है। इसे त्याग दें। यीशु के साफ करने वाले रक्त का दावा करें और उससे छुटकारा पा लें।’’ लेकिन यह बहुत जिद्दी है। कई बार लोगों को वास्तव में इस से छुटकारा पाने के लिए, यीशु के नाम में, अपनी उँगलियों को झटकना पड़ता है।

अब आप चार और पाँच को एक साथ रखते हैं, चार धन पाँच बराबर व्यसन होता है। ठीक है, बाध्यकारी, गुलाम बनाने वाली, आप उन्हें एक साथ रखिये, वे व्यसन हैं। हम सब लत के कई रूपों से परिचित हैं। कुछ बहुत ही असामान्य होते हैं। मेरी पहली पत्नी और मैंने एक जवान औरत से बात किया था जो नाखून पॉलिश की आदी थी। वह सिर्फ नाखून पॉलिश को सूँघना चाहती थी। उसने हमसे कहा, ‘‘जब मैं डिपार्टमेंटल स्टोर में सौंदर्य प्रसाधन के किसी दुकान में जाती हूँ मेरे पास दो विकल्प होते हैं। या तो मैं नाखून पॉलिश खरीद लूँ या दुकान के बाहर चली जाऊँ। लेकिन मुझे एक या अन्य करना होता है।’’ जब उसने उससे छुटकारा पाया तो वह चिल्लाते हुए बाहर आयी और उसने उसे झकझोर दिया। आप जानते हैं, अन्य व्यसन होते हैं। आम और नवीनतम टी.वी. है। टी.वी. वैसी ही लत है जैसा कई लोगों के लिये शराब एक लत है। वे कमरे में बिना टी.वी. सेट चालू किये नहीं बैठ सकते हैं। वे सोचते भी नहीं हैं, उन्हें मालूम नहीं रहता कि वे क्या देखने जा रहे हैं, परन्तु उन्हें टी.वी. के लिये उसी प्रकार पहुँचना है जैसे एक शराबी पीने के लिये पहुँचता है। और मुझे लगता है कि यह आगे चलकर शायद शराब से ज्यादा नुकसान करता है।

छह, वे अशुद्ध करते हैं। वे आपको गंदा और अशुद्ध महसूस कराते हैं। खासकर जब आप परमेश्वर की आराधना कर रहे हैं। आप परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करने वाले हैं और आपके मन में यह गंदी छवि या गंदा शब्द उभरकर आता है। जब आप परमेश्वर की आराधना करने वाले हैं तब ऐसी जो भी बात उभर कर आती है वह निश्चित तौर पर दुष्टात्मा की ओर से होता है। या फिर जब आप अपना बाइबल पढ़ना चाहते हैं। एक सामान्य उदाहरण नींद का दुष्टात्मा है। आप जानते हैं कि बाइबल ‘‘नींद की आत्मा’’ के बारे में बताती है। क्या आप ने कभी लोगों को देखा है, यदि वे रात 10 बजे अपनी बाइबल पढ़ना चाहते हैं, तो वे 10ः15 को सो जायेंगे? यदि वे टीवी देखना चाहते हैं, वे आधी रात के बाद भी जागते रह सकते हैं। अब जब कि यह प्राकृतिक नहीं है। एक अलौकिक शक्ति है जो उन्हें टीवी देखते पाकर आनंदित होती है, उनके बाइबल पढ़ने से नफरत करता है। आप समझते हैं?

ठीक है। सात, वे धोखा देते हैं। वे धोखा देने वाले हैं। मैं मानता हूँ कि मूल रूप से आध्यात्मिक धोखे के सभी रूप दुष्टात्मा की ओर से हैं। और आप जानते हैं कि धोखे के लिए दरवाजे कौन खोलता है? घमंड। मुझे शक है कि क्या कोई ऐसा भी धोखा है जो घमंड के माध्यम से नहीं आता। घमंड अनिवार्य रूप से धोखे की ओर ले जाता है।

आठ, वे कमजोर करते, बीमार करते, या थका देते हैं (थकावट का एक दुष्टात्मा होता है।) मुझे याद है एक बार एक स्त्री के साथ काम कर रहा था, उसने कहा, ‘‘मैं इस सत्र को अब और अधिक बर्दाश्त नहीं कर सकती; मैं बहुत थक गयी हूँ।’’ मैं उसके लिये खेद महसूस करने वाला ही था, कि मुझे एहसास हुआ कि वह एक दुष्टात्मा थी। मैंने उसे चुनौती दी और उसने कहा, ‘‘ठीक है। वह हमेशा थक जाती है। जब वह उठती है तो वह थकी होती है, जब वह बिस्तर पर जाती है तो वह थकी हुई होती है। प्रार्थना करने के लिये भी वह थकी होती है, अपना बाइबल पढ़ने के लिए भी वह बहुत थकी होती है।’’ वह कुछ ऐसा है जिसके पीछे बाकी छिपते हैं। या वे मार डालते हैं। शैतान एक कातिल है, याद रखें। वह शारीरिक रूप से लोगों को मारता है। मृत्यु की एक आत्मा है जिसे वह लोगों को मारने के लिए बाहर भेजता है।

ठीक है। अब यदि हम संक्षेप करने के लिए एक शब्द लेने जा रहे हैं, तो यह बेचैन शब्द होगा। दुष्टात्माग्रस्त लोग कुछ क्षेत्रों में बेचैन होते हैं। जो व्यक्ति सही मायने में आराम कर सकता है और शांति पा सकता है, उसे शायद छुटकारे की जरूरत नहीं है।

अब, अगली बात जो हम देखने जा रहे हैं, और मुझे लगता है यह अंतिम होगा, यद्यपि मैं चाहता हूँ, मैं कुछ आगे जाता लेकिन हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है, वह उनके निवास के क्षेत्र हैं। नीतिवचन 25ः28 कहता हैः

‘‘जिसकी आत्मा वश में नहीं वह ऐसे नगर के समान है जिसकी शहरपनाह नाका करके तोड़ दी गई हो।’’

तो यह मानव व्यक्तित्व के आंतरिक स्वभाव की तुलना एक शहर से करती है। और जब व्यक्ति के पास कोई आत्मिक सुरक्षा कवच नहीं होता है, तो वह नगर लगभग सभी दुष्टात्माओं के लिये जो भीतर आना चाहते हैं खुला होता है। आप एक नशेड़ी का उदाहरण लें, यह उसका वर्णन है। उसमें कुछ भी प्रवेश कर सकता है क्योंकि उसकी दीवारें टूटी हुई हैं। परन्तु शहर में बहुत सारे विभिन्न क्षेत्र होते हैं। वहाँ ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ धनी लोग रहते हैं, झुग्गी-झोपड़ियों के क्षेत्र होते हैं, बैंक और व्यापार के क्षेत्र होते हैं, खेल के क्षेत्र होते हैं, बहुत से जातीय क्षेत्र होते हैं। मैं शिकागो में रहा करता था और - आप जानते हैं - यहाँ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पर पोलैण्डवासी, स्वीडेनवासी, यहूदी और अन्य लोग रहते हैं। तो आपके और मेरे भीतर एक नगर है जिसमें बहुत अलग अलग तरह के भिन्न भिन्न विशेषता वाले लोग रहते हैं, आपको समझ में आया? मैं आपको इन क्षेत्रों की एक छोटी सूची देने जा रहा हूँ। मैं एक व्यवसायिक मनोवैज्ञानिक नहीं हूँ; यह तो केवल वर्षों के अनुभव के आधार पर कहता हूँ।

पहला क्षेत्र, मुख्य क्षेत्र भावनायें और मनोवृत्ति हैं। मैं इसे कोष्ठक में ‘‘दल’’ लिखता हूँ। क्योंकि दुष्टात्माओं के दल होते हैं। और प्रत्येक दूसरे के लिये मार्ग खुलता है। अब मेरा विचार है कि प्रत्येक नकारात्मक भावना और मनोवृत्ति के पीछे एक दुष्टात्मा होती है। क्रोध, भय, अकेलापन, दुःख, स्वयं पर तरस खाना, घमण्ड, ईर्ष्या - सूची बहुत लम्बी है। अब यह सच्चाई कि जिस क्रोध का अनुभव आप करते हैं आवश्यक नहीं कि आप में क्रोध की दुष्टात्मा है। परन्तु यदि आपका क्रोध उन क्रियाओं के विभाग में आता है जिनकी हमने चर्चा की है, तो शायद आपमें क्रोध की दुष्टात्मा है। कुछ निश्चित मूल समस्याएँ होती हैं, इनमें से बाकी बढ़ती हैं। मैं मानता हूँ कि सबसे बड़ी मूल समस्या तिरस्कार होता है। और तिरस्कार के कारण बाकी सारी बातें होती हैं। अकेलापन, दुःख, स्वयं पर तरस खाना, निराशा, अवसाद और जब आप इसमें बहुत आगे निकल जाते हैं तो आप एक या दो अन्य मार्गों की ओर बढ़ जाते हैं। यदि यह अक्रिय हो तो मृत्यु, यदि यह सक्रिय हो तो आत्म-हत्या। मैं नहीं मानता कि बिना दुष्टात्मा के प्रेरणा के कभी किसी ने आत्म-हत्या की है। यह मेरा व्यक्तिगत विचार है। मैं इसे प्रमाणित नहीं कर सकता।

एक और बहुत ही प्ररूपी समस्या विद्रोह है जो रोष, घृणा, क्रोध, हिंसा और दल प्रमुख आदि की ओर ले जाता है।

दूसरा, मन है। एक प्रकार से, मन एक रणभूमि होता है। विशिष्ट आत्माएँ जो मन को प्रभावित करती हैं, वे सन्देह, अविश्वास, भ्रम, अनिर्णय, पागलपन हैं। और मैंने पाया है कि लोग जो मनोगत में रहे हैं, उनमें हमेशा भ्रम की समस्या होती है। निराशा, इसे आप भावनात्मक या मानसिक कह सकते हैं, कुछ भी कह लें परन्तु यह होती है।

अगला क्षेत्र जीभ होता है। मुख्य झूठ बोलना है। बाइबल झूठ बोलनेवाली आत्मा के बारे में कहती है। ऐसे लोग होते हैं जो अनिवार्य रूप से झूठ बोलते हैं। उन्हें पता भी नहीं होता है कि वे कब झूठ बोल रहे हैं। मेरा इस प्रकार का एक मित्र था। वह एक शहर में फुल गॉस्पेल व्यापारियों के अध्यक्ष थे, वह स्वभाव से एक सेल्समैन थे। वह एक अच्छे मसीही थे, अच्छे वक्ता थे। वह हमारे बैठक कक्ष में बैठते और उनकी बातचीत अधिक से अधिक रोचक होती जाती थी परन्तु असंभव होती थी। और मेरा सिर घूमने लगता और मैं सोचता। ‘‘क्या वह जो बात कर रहे हैं, उस पर वह विश्वास करते हैं? जो बात वह कर रहे हैं, क्या मैं उस पर विश्वास करता हूँ?’’ परन्तु यह स्वाभाविक से अस्वाभाविक की ओर उठता जाता। आपको पता है मैंने क्या कारण खोज निकाला कि इस आत्मा ने कैसे प्रवेश किया? वह एक धनी माता-पिता का गोद लिया हुआ पुत्र था। उनके पास और सन्तान नहीं थी; उनके सारे अण्डे उस एक टोकरी में ही थे। वह चाहते थे कि सब कुछ हो और उसने पाया कि जब वह विद्यालय से अपनी अंक तालिका लेकर आया तो वे निराश हो गए, क्योंकि उसका परिणाम अच्छा नहीं आया था। और जब उन्होंने अपनी निराशा व्यक्त की तो उसने निर्णय लिया कि यह अच्छा नहीं है, इसलिये उसने अपने परिणाम के बारे में झूठ बोला। आपको समझ में आया। और यहाँ से वह झूठ के क्षेत्र में प्रवेश कर गया। मैं मानता हूँ कि अन्ततः वह छुड़ाया गया, परन्तु यह मेरे लिये एक प्रकाशन था। आप देखें, निरन्तर झूठ बोलनेवाले बहुत धोखेबाज होते हैं क्योंकि उन्हें पता भी नहीं होता है कि वे झूठ बोल रहे हैं। वे झूठ पकड़नेवाली मशीन में भी पास हो जाएँगे।

आराधना में जानेवाली दो दुष्टात्माएँ होती हैं। पहला है आलोचना, दूसरा है गपशप। मैं एक बार एक कलीसियाई सभा में था और एक स्त्री दुष्टात्मा के साथ आई। मैंने कहा, ‘‘आपकी समस्या आलोचना है।’’ मैंने कहा, ‘‘तू आलोचना की आत्मा, उसमें से बाहर निकल आ।’’ और उसी समय हमारे आस पास के चार लोगों ने छुटकारा पाया। अतिशयोक्ति, सुसमाचारीय दुष्टात्मा। ईश्वर निन्दा। जब प्रभु ने मुझे बचाया तब मैं ईश्वर निन्दा का गुलाम था। मैं बिना ईश्वर निन्दा किए बोलने में पूरी तरह असमर्थ था। अशुद्ध बातचीत और न जाने क्या क्या। नकारात्मक बातचीत।

चौथा, वह बात जिसके बारे में कलीसिया में कोई बात नहीं करता है, यौन। चूँकि कलीसिया में इस पर चर्चा नहीं होती, अतः यौन के क्षेत्रों में समस्याओं से ग्रस्त लोग मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं और वह कहते हैं, ‘‘मैडम्, आपमें एक अपराधबोध है और आपकी समस्या का केन्द्र आपका धर्म है। अपना धर्म त्याग दो, फिर आपको अपराधबोध महसूस नहीं होगा।’’ ऐसा नहीं है कि वे सब ऐसा कहते हैं। अब मैं कहता हूँ कि यदि आप कलीसिया में दस साल से बैठे हों और अब भी अपराधबोध से ग्रस्त हों, तो आपकी समस्या आपका धर्म है। सचमुच। यदि अपराधबोध से मुक्त होने के लिये आपको अपना धर्म छोड़ना ही पड़े, तो मैं यह करूँगा। अब हमें यौन के विषय में कुछ बातें करना है। पहला, यौन बुरा नहीं है, यह अच्छा होता है। हमें इस नासमझी को दूर करना है। परमेश्वर ने मनुष्य को लैंगिक रूप में बनाया और अपनी सृष्टि को देखने के बाद उसने कहा कि यह बहुत अच्छा है, जिसमें यौन भी शामिल है। कलीसिया में बड़ी समस्याओं में से एक कि हम यौन के विषय में ईमानदार नहीं हैं, हम इससे शर्मिन्दा हैं। हम पाखण्डी हैं और इस स्वभाव से हम समस्याओं को प्रोत्साहित करते हैं। मैं कहता हूँ कि अनिवार्य यौन पतन का हर एक रूप दुष्टात्मा की ओर से है। इसमें कोई विवाद नहीं है। हस्तमैथुन, व्यभिचार, कुमारीगमन, समलैंगिकता, स्त्री-समलैंगिकता, पौरुषहीनता और हर प्रकार की भयावह बुरी आदतें जिनकी हम चर्चा नहीं करेंगे। मैं कहता हूँ कि उनमें से हर एक शैतानी हैं। अब आपको शर्मिन्दा होने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु आपको अपनी समस्या सुलझाना है।

पाँचवा, वासनाएँ। अब हम यौन को उस शीर्षक के नीचे शामिल कर सकते थे परन्तु यह एक ऐसा भिन्न क्षेत्र है जिसे मैंने अलग रखा है। विकृत अभिलाषायें और वासनायें। मैं मानता हूँ कि प्रारंभ में सभी प्रकार के भूख अच्छे होते हैं, परन्तु पाप और शैतानी शक्ति के कारण वे कलुषित होकर अस्वस्थ और विनाशकारी हो गई हैं। 1 यूहन्ना 2ः16 शरीर की वासना, आँखों की अभिलाषा के बारे में बात करती है। दुष्टात्मा की शक्ति आँखों को नियन्त्रित करती है। कुछ पुरुष स्त्रियों को विशेष दृष्टि से देखते हैं। वे ऐसा न करने में असमर्थ होते हैं। यह एक दुष्टात्मा होती है जो उनकी आँखों में केन्द्रित होती है। जैसा कि मैंने पहले ही कहा, पेटूपन विकृत अभिलाषा का एक स्पष्ट उदाहरण है। मैं एक स्त्री को जानता था जिसने छुटकारा पाने के लिये बर्फीले तूफान में से होकर 70 मील दूर शिकागो तक यात्रा किया। वह एक पेन्टीकोस्टल पास्टर की बेटी थी। उस स्थिति में फँसे बहुत से अन्य लोगों के समान उसने अपने माता-पिता से और उनके धर्म से विद्रोह किया, और एक उद्धार रहित पुरुष से विवाह किया और उसका जीवन दुःखदायी हो गया। उसके तीन बच्चे थे और वह आई और उसने पेटूपन की दुष्टात्मा से छुटकारा पाया। और उसने मुझसे बाद में कहा, ‘‘मिस्टर प्रिन्स, कोई भी मुझसे नहीं कह सकता है कि यह वास्तविक नहीं था। यह सन्तान होने के समान ही वास्तविक है और मेरी तीन सन्तानें हैं।’’ और तब उसने मुझसे कहा, कि वह अपने पेटूपन में इतनी अधिक जकड़ी हुई थी कि वह अपने बच्चों की थाली से भोजन निकालती और खा जाती थी। भले ही उसे पता होता था कि उससे अधिक उन्हें भोजन की जरूरत है।

आप देखें, आइए अब नशा के बारे में बात करते हैं। कुंठा से नशा बढ़ता है। वे एक तने की शाखाएँ हैं। और यदि आप केवल नशे को सुलझाएँगे तो आपने समस्या को नहीं सुलझाया है। शराब और पेटूपन को लीजिए। एक स्त्री एपिस्कोपल कलीसिया की है। उसका पति दूसरी स्त्री के पीछे भागता है, उसकी परवाह नहीं करता है और उसे पर्याप्त धन और अन्य बातें नहीं देता है। वह निराश हो जाती है। वह कुछ मुक्ति पाना चाहती है। वह शराब की अलमारी की ओर बढ़ती है। अन्य स्त्री चर्च ऑफ गॉड की है, उसका पति भी ऐसा ही करता है। परन्तु शराब की अलमारी की ओर जाना उसके लिये लम्बी यात्रा है, तो वह कहाँ जाएगी? वह रसोई में जाएगी और फ्रिज खोलेगी। वह पेटू हो जाती है परन्तु वास्तव में इनमें अन्तर बहुत ही कम है। परन्तु दोनों ही मामलों में इसे सुलझाने के लिये आपको मूल कुंठा को दूर करना होगा जो उनके पतियों के प्रति उनकी मनोवृत्ति है। ठीक है, हम इस सूची में आगे बढ़ते हैं।

छठवाँ, मनोगत का संपूर्ण क्षेत्र। मैं मनोगत लिखने जा रहा हूँ परन्तु यह एक विशाल क्षेत्र है और उसका हर भाग शैतानी है। आदरणीय भाग भी। और मैं आपको योगाभ्यास में शामिल होने के लिये नहीं कहता हूँ। मुझे यह कहने दीजिए। मैं योगा में था। मैं योग करनेवाला योगी था और मैं आपको बताता हूँ कि उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं दस फुट के खम्बे से भी छूना चाहूँ। आपको शारीरिक स्वास्थ्य के लिये योग पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है; प्रभु आपको शारीरिक स्वास्थ्य देगा। मैं आपको बताता हूँ कि मनोगत एक अन्धेरा गहरा गड्ढा है। यह उन गुफाओं में से एक है जिसमें सारी सीढ़ियाँ पदचिह्न भीतर की ओर जाते हैं और कभी बाहर की ओर नहीं आते हैं।

ठीक है, सातवाँ। सारे झूठे धर्म: इस्लाम, मॉर्मन, यहोवा के साक्षी, बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म और कुछ हद तक यहूदी धर्म। कोई भी ऐसा झूठा धर्म नहीं है जिसमें दुष्टात्मा नहीं हैं। धर्म के क्षेत्र में शैतान विशेषज्ञ है। यह मुख्य क्षेत्र है जहाँ वह काम करता है।

आठवाँ। झूठी शिक्षाएँ। और झूठी शिक्षाओं से मेरा तात्पर्य है, मसीही विश्वास से दूर जाना। आइए कुछ समय के लिये, 1 तीमुथियुस 4 अध्याय निकालेंः

पर आत्मा स्पष्टता से कहता है (पवित्र आत्मा).... ‘‘पर आत्मा स्पष्टता से कहता है, कि आनेवाले समयों में (वह समय जिसमें हम रहते हैं) कितने लोग भरमानेवाली आत्माओं और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्वास (विश्वास क्या है? मसीही विश्वास। क्यों?) से बहक जाएँगे।’’

आज यह विशाल रूप में हो रहा है और तब वह आगे कहता है। वह उनकी गलतियों का कुछ उदाहरण देता है।

‘‘यह उन झूठे मनुष्यों के कपट के कारण होगा, जिनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दागा गया हो। जो ब्याह करने से रोकेंगे, और भोजन की कुछ वस्तुओं से परे रहने की आज्ञा देंगे; जिन्हें परमेश्वर ने इसलिये सृजा कि विश्वासी, और सत्य के पहचानने वाले उन्हें धन्यवाद के साथ खाएँ।’’

विशेष रूप से संयुक्त राज्य के पश्चिमी तट पर आप ऐसे सैकड़ों हजारों लोग पाएँगे जिन पर ये लागू होता है। वे बहुत अधिक आत्मिक बनते हैं, वे विवाह न करने का निर्णय लेते हैं और यदि वे विवाह करते भी हैं तो अपने साथियों से संबन्ध नहीं रखते हैं और जो वे खाते हैं उसके द्वारा वे अलौकिक बनने जा रहे हैं। अब मैं बुद्धिमानी पूर्वक खाने में विश्वास करता हूँ, परन्तु मैं इसमें से एक धर्म नहीं बनाता हूँ। आपने समझा? जिस क्षण यह धार्मिक मुद्दा बनता है, उस समय आप दुष्टात्मा के हाथों में होते हैं और आप देखेंगे कि जो लोग भोजन के आदी होते हैं वे किसी और विषय पर बात नहीं कर सकते हैं। यह दुष्टात्मा का एक और चिह्न है। आप भले ही कहीं से भी प्रारंभ करें आप हमेशा भोजन पर ही समाप्त करेंगे। यह मत खाओ, वह मत खाओ। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिन्हें मैं नहीं खाता हूँ, परन्तु मैं उसमें से धर्म नहीं बनाता हूँ। आपने समझा?

ठीक है, नौवाँ। हमारे भौतिक शरीरों का क्षेत्र। और हमने सुसमाचारों में बहुत से उदाहरणों पर बात किया है। मैं नहीं कहता कि हमेशा परन्तु कुछ बातें निश्चय ही सामान्य रूप से दुष्टात्माग्रस्त होती हैं। पहली बात जो मैं सूची में डालता हूँ वह मिर्गी है और मैंने बहुत से लोगों को छुटकारा पाते देखा है। अब से दो वर्ष पूर्व रूत और मैं लेक्सिन्गटन, केन्टुकी में थे और हमें एक आशीष मिली। एक स्त्री हमारे पास आई, वह चालीस साल की थी और उनकी बेटी अठारह साल की थी। और उसने कहा, ‘‘मिस्टर प्रिन्स, दस वर्ष पूर्व आपने मेरे लिये प्रार्थना किया और मैंने मिर्गी की आत्मा से छुटकारा पाया। यह मेरी बेटी है, उसे एक समस्या है, उसके लिये प्रार्थना कीजिए।’’ उस गवाही से मुझे खुशी हुई। हमने उस बेटी के लिये प्रार्थना किया। मुझे सन्देह नहीं है कि उसे छुटकारा मिला। मैंने बहुत सारे मामले देखे थे जब लोगों ने दुष्टात्मा के रूप में मानने पर मिर्गी से छुटकारा पाया था। यदि किसी सभा में कोई व्यक्ति मेरे पास आता है, और मैं कहता हूँ, ‘‘अब मैं विश्वास करता हूँ कि यह एक दुष्टात्मा है। मैं उसे बाहर निकलने की आज्ञा देने के लिये तत्पर हूँ, आप चाहते हैं कि मैं ऐसा करूँ? क्या आप तैयार हैं? क्योंकि लड़ाई हो सकती है। संघर्ष हो सकता है। यदि आप नहीं चाहते हैं तो मैं नहीं करूँगा।’’ कुछ लोग कहते हैं, हाँ, कुछ लोग, ना कहते हैं।

ठीक है, जहाँ तक हम कर सकते हैं, करें। हमने अब तक दुष्टात्मा के नौ कार्यों को देखा और यहाँ प्राथमिक क्षेत्र हैं जिनमें मैंने उनको काम करते हुए देखा है। आप देखते हैं, हो सकता है एक व्यक्ति यौन के क्षेत्र में पूरी तरह साफ हो, परन्तु झूठे धर्म के विषय में न हो। या एक व्यक्ति के मन में कोई आत्मा न हो, परन्तु भावनाओं से व्यथित होता हो। या एक व्यक्ति शायद झूठी शिक्षा में फँसा हो, परन्तु वह पूरी तरह स्वस्थ हो। आपको समझ में आया? तो क्षेत्रों का चुनाव किया जाता है।

ठीक है, यह प्रथम भाग का अन्त है। यदि परमेश्वर सहायता करे, तो हम अगले सत्र में समाप्त करेंगे।

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