अब मेरी बातचीत का विषय - और एक के बाद दूसरा, दोनों एक ही विषय पर - बातचीत के दो विषय होंगे। विषय ‘अभिशाप से मुक्ति है। और इसमें ऐसे सत्य हैं जिन्हें मैं कहूँगा कि परमेष्वर पिछले पाँच में मुझे सिखाता रहा है। ऐसे सत्य जिसने मेरे स्वयं के जीवन में तथा ऐसे असंख्य लोगों के जीवन में क्रांति ला दी है जिन्हें यह सत्य बताने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। कुछ क्षेत्रों में, जहाँ मैं ने सेवा की है, जब मैं ने संदेष के अंत में लोगों से पूछा कि क्या वे उस बात के लिए स्वयं को उपलब्ध कराना चाहते हैं, जो इस सच्चाई के माध्यम से परमेष्वर प्रदान करना चाहता है, मैं कहता हूँ कि पंचानबे प्रतिषत लोगों ने प्रतिक्रिया दी है। और हमने लोगों में सबसे नाटकीय बदलाव देखा है।

मुझे कई वर्षो पूर्व केंद्रीय अफ्रीका में जाम्बिया में बोलना याद है। मैं ने यह विषय पढ़ाया और अंत में एक आदमी मेरे पास आया, और अफ्रीकी मूल रूप से धनी नहीं हैं, लेकिन वह अच्छी तरह से कपड़े पहने, शिक्षित आदमी था। उसने जमीन पर खुद को मेरे पैरों पर गिरा दिया और मैं उसे करने की अनुमति देता तो वह मेरे पैरों को चूमा होता। फिर वह खड़ा हुआ - और वह शायद चालीस साल का था - और उसने कहा, ‘‘मेरे सारे जीवन भर मैं दर्द में रहा और मैं पीड़ा में रहा हॅँू। मैंने एक भी खुशी का दिन नहीं जाना है।’’ लेकिन उसने कहा, ‘‘जबसे मैं ने आप के साथ वह प्रार्थना की है, मुझ में सब कुछ बदल गया है। मैं दर्द से पूरी तरह मुक्त हूँ, मैं एक अलग व्यक्ति हूँ।’’

तो यह एक ऐसा संदेष है जिसमें सामथ्र्य है। इस संदेष के आधार के रूप में गलातियों 3ः13-14 निकालना उचित होगा। गलातियों 3ः13-14ः

‘‘मसीह ने जो हमारे लिये श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया क्योंकि लिखा है, जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित है। यह इसलिये हुआ, कि इब्राहिम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पंहुचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें, जिस की प्रतिज्ञा हुई है।’’

वे पद एक आदान प्रदान प्रकट करते हैं, जो तब हुआ जब यीषु क्रूस पर चढ़ाये गये। पुराना नियम में लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में वचन कहता है कि जो काठ पर लटकाया जाता है वह श्रापित होता है। तो जब यीषु काठ पर लटकाया गया जो कि क्रूस था तो वह श्राप बना। जो हुआ वह एक ईष्वरीय आदान प्रदान था जो इन पदों में स्पष्ट कहा गया है। यीशु ने अपने ऊपर श्राप को, सारे श्राप को उठा लिया, जिससे हम अभिशाप से छुड़ाये जायें और आशीष में प्रवेश कर सकें जिसे परमेष्वर ने अपने लोगों के लिए तैयार किया है। तो यहाँ एक बहुत ही सरल व्यावहारिक विनिमय होता है। यीशु अभिशाप बन गया ताकि हम आशीष पा सकें।

इसे आपके लिए वास्तविक बनाने के लिए मेरे साथ यह कहने मैं आपको आमंत्रित करता हूँ। और मैं चाहता हूँ कि आप अपने हाथों का उपयोग करें; बायाँ हाथ बुरी बातों के लिए, आपका दायाँ हाथ अच्छी बातों के लिए।एक बार मुझे देखिये और फिर हम इसे एक साथ करेंगे। ‘‘यीषु श्राप बना ताकि हम आशीष पायें।’’ ठीक है? अब याद रखिए, आपका बायाँ हाथ मेरे दायें के विपरीत है, तो मेरे द्वारा भ्रमित न हों। और अपने पड़ोसी की नाक पर मत मारिये लेकिन ध्यान से इसे कीजिए! क्या आप तैयार हैं? ‘‘यीषु श्राप बन गया ताकि हम आशीष पायें।’’

अब मैं जो करने जा रहा हूँ वह आप के सामने शाप और आशीष के स्वरूप की व्याख्या करना है। ये धर्मषास्त्र के दो प्रमुख विषय रहे हैं। मुझे लगता है कि आशीष शब्द बाईबल में विभिन्न रूपों में लगभग 600 बार आया है। और श्राप ष्षब्द लगभग इसके आधा बार आया है। लेकिन मैं ने अनुभव से सीखा है कि परमेष्वर के अधिकांष लोग शाप और आशीष की प्रकृति से परिचित नहीं हैं। मुझे लगता है कि यह परमेष्वर का उद्देश्य है कि मसीह में मोचन के माध्यम से हम शाप से मुक्त हों। लेकिन जहाँ भी जाता हूँ, मैं परमेश्वर के कई लोगों को श्राप भोगते देखता हूँ, जबकि उन्हें आशीष का आनंद लेना चाहिए। एक मुख्य कारण यह है कि उन्हें पता नहीं हैं कि कैसे वे पहचानें कि अभिशाप क्या है और वरदान क्या है।

दूसरा कारण यह है कि भले ही वे यह पहचानते हैं पर वे नहीं जानते होंगे कि कैसे श्राप से मुक्त होना है और आशीष में प्रवेष करना है। र्तो आइ ए, आपको आशीषों और श्रापों की एक सामान्य परिभाषा बताने के द्वारा प्रारंभ करने दें। दोनों ही अलौकिकष्षक्ति के वाहन हैं। यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि हम कुछ ऐसा विषय नहीं देख रहे हैं जो पूरी तरह स्वाभाविक है। यह स्वाभाविक से परे जाता है। यदि वे आषीष हैं तो अच्छी बातों के लिए और श्राप हैं तो बुरी बातों के लिए अलौकिक षक्ति के वाहक हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि हम किसी ऐसी बात पर विचार नहीं कर रहे हैं जो पूरी तरह स्वाभाविक है। और उनकी एक विशेषता यह है कि बहुत बार वे पीढ़ी से पीढ़ी तक जारी रहते हैं। अक्सर तब तक जब तक कोई न जाने कि यदि वे शाप हैं तो उन्हें कैसे काटना है। इस का परिणाम यह है कि कई लोग - और आज रात आप में से कुछ जो यहाँ हैं - अपने जीवन में उन बातों को सह रहे हैं जों कई पीढियों पहले घटी हैं। और आपको अपनी समस्या की श्रोत खोजना है और मुक्त होने के लिए उचित कदम उठाना है।

अब, आशीष और शाप के वाहन आम तौर पर शब्द होते हैं। वे बोले गए षब्द हो सकते हैं, या लिखे गए षब्द हो सकते हैं या भीतर कहे गए षब्द हो सकते हैं। हालांकि, शाप और आशी,ष दोनों वस्तुओं से, भौतिक वस्तुओं से, स्थानांतरित या प्रेषित किये जा सकते हैं। तो यह हमेशा सिर्फ शब्दों का सवाल नहीं होता है। एक बहुत ही सरल उदाहरण लेते हैंः पौलुस कहते हैं कि प्रभु भोज में, जो हम मसीहियों के रूप में लेते हैं, वह कटोरा जिस पर हम धन्यवाद देते हैं क्या वह मसीह के शरीर की एकता नहीं हैं? तो, उस दाखरस भरे प्याले के द्वारा जो कि एक भौतिक वस्तु है परमेष्वर हम तक एक आषीष पहुँचाता है।

पुराना नियम में वस्तुओं के द्वारा संचारित श्राप के विभिन्न उदाहरण पाये जाते हैं। लेकिन विषेष कर मूसा की व्यवस्था के अधीन यदि एक स़्त्री पर अपने पति के प्रति अविष्वासयोग्य होने का आरोप लगता तो इसके लिए एक विषेष परीक्षण था। याजक उसे मिलाप वाले तंबू में लेकर जाते, एक श्राप लिखते और तब श्राप के षब्दों, स्याही को एक प्याले के जल में धो देते। और स्त्री को वह पानी पीने के लिए और खुद पर शाप का उच्चारण करने के लिए मजबूर किया जाता। यदि वह निर्दोष होती, तो उसे कुछ नहीं होता। उसका पति उसे फिर से आरोप लगाने के लिए स्वतंत्र नहीं होता। परन्तु यदि वह दोषी होगी तो उसके शरीर में विनाशकारी शारीरिक परिणाम होंगे। मैं यह केवल एक उदाहरण के रूप में बता रहा हूँ कि किसी षारीरिक बात के द्वारा किस प्रकार एक श्राप संचारित होता है। केवल भौतिक बात के द्वारा संचारित श्राप का उदाहरण देने के लिए यह बता रहा हूँ। उस मामले में, एक प्याला पानी।

अब, मैं व्यक्तिगत अनुभव से इस सच्चाई पर आ गया हूँ। मैं शायद ही कभी ऐसी बात पर प्रचार करता हूँ जो मात्र भावात्मक सिद्धांत है। मैं ने जो कुछ भी कभी भी सिखाया है वह किसी न किसी प्रकार उन बातों से संबंधित रहा है जो कभी मेरे जीवन में हुआ है। यह इस संदेश के लिए विशेष रूप से सच है। मैं आपको तीन व्यक्तिगत घटनाओं को देना चाहता हूँ जिसने धीरे-धीरे मुझे सतर्क कर दिया है। मैं तो बस एक पल में इस में नहीं आया था; यह सच का खुलासा करने की एक क्रमिक प्रक्रिया थी। और मैं सोचता हूँ कि मुझे कुछ अनुभव पाने देने और कुछ मामलों से निपटने की अनुमति देने के द्वारा, जिसने इन बातों के प्रति मेरी आँखें खोल दीं, परमेष्वर ने मेरी शिक्षा का निरीक्षण किया है।

1960 के दषक के अन्त में जाते हुए जब मैं लाउडरडेल फोर्ट, फ्लोरिडा में अपनी पहली पत्नी लीडिया के साथ रह रहा था। तो मैंने अपने ममेरे दादा से विभिन्न चीनी कला और संस्कृति की कृतियाँ पाई थी। जिस प्रकार वह मुझे मिला, यह इतिहास की बात है, वह यह है कि मेरे दादा जो कि ब्रितानी सेना में एक अफसर थे, वह अभियान के लिये विषेष रूप से तैयार बल के अफसर थे जिसे ब्रितानी सरकार ने 1904 में उस आन्दोलन को कुचलने के लिये भेजा था जिसे बाॅक्सर राईजिन्ग या बाॅक्सर रिबेलियन के नाम से जाना जाता है। और वह उन विभिन्न वस्तुओं के साथ लौटे जिन्हें उन्होंने चीन में प्राप्त किया था। इस दौरान् मेरी माँ के द्वारा इनमें से कुछ वस्तुओं विरासत के रूप में मुझ तक पहुँची।

इनमें भव्य रीति से कढ़ाई किये हुए डंैगन भी थे, जिनमें से प्रत्येक अलग वस्तु पर कढ़ाई किया हुआ था। मेरा मतलब है उसका रंग भव्य था। मैंने किसी से जाना जो चीनी संस्कृति को थोड़ा बहुत जानता था कि वे षाही डंैगन थे क्योंकि उनके पाँच पंजे थे। सामान्य डंैगनों के चार पंजे होते हैं परन्तु षाही डंैगनों के पाँच पंजे होते हैं। और मैं सचमुच अपने दादा के बहुत निकट था, अतः इन चीजों का मेरे लिये बहुत महत्व था। जब हमने लाउडरडेल फोर्ट में अपना ठिकाना बनाया तो मैंने अपने दीवाल पर इन चार डंैगनों को मढ़कर टांग दिया था। परन्तु कुछ समय पष्चात् पवित्र आत्मा मुझे क्लेष में डालने लगा। क्या आप कभी पवित्र आत्मा के द्वारा क्लेष में पड़े हैं? क्या आप जानते हैं कि हम पहले क्या करते हैं? हम कन्धे उचका देते हैं और कहते हैं, यह मूर्खता है, वह ऐसा नहीं करता। इसके साथ ही पवित्र आत्मा मुझसे कहता, ‘‘अब, बाइबल में डंैगन किस बात का प्रतिनिधित्व करता है?’’ खैर, मैं बाइबल को इतनी अच्छी तरह जानता था कि उसका उत्तर मालूम था। प्रकाषितवाक्य 12ः9 में और आगे के पदों में बहुत स्पष्टता के साथ डंैगन षैतान का प्रतिनिधित्व करता है। खैर, तब वह मुझसे कहता, ‘‘मसीह के सेवक के रूप में क्या तुम्हारे लिये अपनी दीवाल पर कुछ ऐसा टांगना उचित है जो षैतान का प्रदर्षन करता है?’’ खैर, आप जानें, कुछ समय तक मैंने इस बात से संर्घष किया और मैंने कहा, ‘‘ठीक है परमेष्वर, आप जीत गए। मैं डंैगन से छुटकारा पा लूँगा।’’ और मैंने ऐसा किया।

अब मैंने परमेष्वर के प्रति आज्ञाकारिता के अलावा और किसी उद्देष्य से यह नहीं किया। परन्तु परिणाम बहुत ही उल्लेखनीय था। उस समय तक मैं आर्थिक रूप से बस गुजर बसर कर रहा था। मैं यात्रा करता और प्रचार करता और मानदेय प्राप्त करता था और वे हमारी आवष्यकताओं को पूरा करते परन्तु हमारे पास अधिक कुछ नहीं था। इसके साथ साथ मेरे परिवार में भी कुछ अजीब बातें हो रही थीं। अपनी पत्नी से यह सब बताने में मुझे कठिनाई हो रही थी। तब मेरे माता-पिताओं के ओर से मुझे कुछ विरासत देने के लिये ठहराया गया, कुछ सन्तोषजनक मात्रा में धन, और अन्य लोगों के कई जिम्मेदाराना कामों के कारण यह विरासत अनिष्चित समय के लिये रोक दिया गया। मैंने डंैगन से छुटकारा पा लिया था किन्तु मैंने यह महसूस करना प्रारंभ किया कि समृद्धि का मेरा सारा स्तर बदल गया था। मैंने कुछ भी अलग नहीं किया परन्तु अगले वर्ष मेरी आय मेरे द्वारा कोई परिवर्त न किये बिना ही दुगुनी हो गई।

तब मैंने विरासत प्राप्त किया, यह मुक्त हुआ। और मैं और मेरी पहली पत्नी एक घर खरीद सके जो कि हमारे लिये विष्वास का एक बहुत ही बड़ा कदम था। परन्तु हमने बहुत स्पष्टता के साथ महसूस किया कि उस घर को खरीदने के लिये परमेष्वर ने निर्देषित किया था।

अब मैं समृद्धि का प्रचार नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मेरा मतलब है मुझे लगता है इसके लिये बहुत सावधानी पूर्वक अर्हता प्राप्त करना चाहिए। परन्तु एक उद्देष्य के साथ समृद्धि। हम उस घर में चले गए। नौ वर्षों तक हम उस घर में रहे और जितना हमने उसके लिये खर्च किया था उससे तीगुने से अधिक दाम में हमने उसे बेच दिया। जो धन हमें प्राप्त हुआ उससे मेरी दूसरी पत्नी रूत और मैं यरूषलेम में एक घर बना सके - जो कि बहुत ही खर्चीला है। परमेष्वर ने उस घर की बिक्री के द्वारा धन का प्रबन्ध किया। यह कोई ऐसी बात नहीं थी जिसकी हमने योजना बनाई थी। मैंने जान बूझकर ऐसा कोई उद्देष्य नहीं रखा था परन्तु मैंने जाना कि एक अन्धकारमय दुष्ट षक्ति ने उन डंैगनों के द्वारा मेरे घर पर आक्रमण किया था। और जब तक उन षक्तियों को बाहर नहीं किया गया और उसे सुलझाया नहीं गया, तब तक मैं अपने जीवन और सेवा के लिये परमेष्वर की योजना की पूर्णता में आगे नहीं बढ़ सका।

एक रोचक बात यह थी कि मैं जानता भी नहीं था कि मेरे लिये परमेष्वर क्या चाहता है जिससे मैं रोका जा रहा हूँ। मैंने बहुत से लोगों के जीवनों में यह सच है, देखा है। जब लोग श्राप से व्यवहार करते हैं तो वे नहंी जानते हैं कि श्राप से छूटने पर वे कैसे होंगे। वे इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं।

खैर, तब कुछ बाद में मैं संयुक्त राज्य में, एक कलीसिया में, एक प्रिस्ब्रिटेरियन कलीसिया में सेवा कर रहा था जो कि किसी ऐसे स्थान में स्थित था जिसे वे संयुक्त राज्य का मध्य-पष्चिम कहते हैं। मैंने अपना सन्देष समाप्त कर दिया था और मैं पुलपिट के पीछे खड़ा था। मुझे नहीं मालूम था कि मैं अगला क्या करने जा रहा हूँ और मैंने अपनी र्बाइं ओर सामने की सीट पर एक परिवार को बैठे देखा: पिता, माँ और किषोरवय पुत्री। और जब मैंने उनकी ओर देखा तो मैंने पवित्र आत्मा को यह कहते हुए महसूस किया कि उस परिवार पर एक श्राप है। मैंने उस विषय पर प्रचार नहीं किया था। मैं उस विषय में सोच नहीं रहा था और मैं नहीं जानता था कि इस विषय में क्या करना है। तो मैंने इन्तजार किया और यह पुनः स्पष्ट हुआ, ‘‘उस परिवार पर एक श्राप है।’’ तो मैं पिता के पास गया और मैंने कहा, ‘‘श्रीमान, मुझे लगता है कि परमेष्वर ने मुझे दिखाया है कि आपके परिवार पर एक श्राप है। क्या आप चाहते हैं कि मैं यीषु के नाम से आपको उस श्राप से मुक्त करूँ?’’ मेरे पास सच में कोई अनुभव नहीं था। मैं विष्वास में आगे बढ़ रहा था। उसने तुरन्त ही कहा, ‘‘हाँ।’’ बाद में मुझे उससे पता चला कि उसके जीवन में और उसके परिवार में बहुत सी विपत्तियाँ घट रहीं थीं कि उसने इस बात को मान लिया कि इसका कारण श्राप था। तब मैंने उस परिवार को श्राप से मुक्त करते हुए जोर से एक छोटी और साधारण सी प्रार्थना की। जब मैंने कहा यीषु के नाम में तो परिवार के हर सदस्य में एक दृष्य भौतिक प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई, यद्यपि मैं उनमें से किसी को नहीं छू रहा था। तब मैं पीछे हटा और तब मैंने ध्यान दिया कि किषोरवय पुत्री का एक पैर तलवे से लेकर जांघ तक एक साँचे में था। तब मैं वापस गया और कहा, ‘‘क्या आप चाहते हैं कि मैं आपकी पुत्री के पैर की चंगाई के लिये प्रार्थना करूँ?’’ उसने तुरन्त हाँ कहा, परन्तु उसने कहा, ‘‘आपको जानना चाहिए कि उसने 18 महीनों में तीन बार उसी पैर को तोड़ा है। हाँ, और चिकित्सक ने कहा है कि वह चंगा नहीं होगा।’’ यदि आज मैं सुनता कि किसी ने अपने उसी पैर को 18 महीनों में तीन बार तोड़ दिया है तो मैं सचमुच सन्देह नहीं करता कि षल्यक्रिया में एक श्राप था, परन्तु मेरे लिये यह नया था। मैंने कहा, ‘‘मैं इतना कर सकता हूँ कि उसके पैर को अपने हाथों में उठाऊँ और एक साधारण सी प्रार्थना करूँ,’’ मैंने यही किया।

कुछ सप्ताहों के पष्चात् मुझे उस व्यक्ति से मुझे धन्यवाद देनेवाला और विषेष रूप से यह कहनेवाला पत्र प्राप्त हुआ कि जब वे अपनी पुत्री के साथ पैर का एक्स-रे करवाने के लिये क्लिनिक गए, तो एक्स-रे में बताया गया कि पैर ठीक हो गया था। और उसके बाद षीघ्र ही पैर का साँचा निकाल दिया गया।

परन्तु जब मैंने उस पर मनन किया तो मैंने यह जाना: परमेष्वर ने मुझे उस परिवार पर जो श्राप दिखाया था, वह बेटी की पैरे की चंगाई में बाधक था। जब तक बाधा नहीं हर्टाइ गई पैर की चंर्गाइ के लिये की गई प्रार्थना प्रभावी नहीं था। और यह एक सिद्धान्त है जिसे मैंने अब सैकड़ों बार देखा है कि एक परिवार पर या एक व्यक्ति पर श्राप एक अदृष्य बाधा हो सकती है जो कि उन आषीषों को रोकती है जिसे परमेष्वर चाहता है कि उन्हें मिले। मेरे मामले में दुष्टात्माओं के द्वारा यह आर्थिक समृद्धि की आषीष और परमेष्वर की इच्छा को पूरा होने देना था। इस लड़की के मामले में आषीष उसके टूटे हुए पैर की चंर्गाइ थी परन्तु श्राप बाधा थी।

इसके पष्चात् मैंने इस विषय पर सिखाना प्रारंभ किया और मैंने कुछ टैप बनाए जिसमें मेरे तीन सन्देषों की श्रृंखला षामिल है जो ‘‘श्राप: कारण और समाधान’’ है। और ये प्रसारित होने लगे और मैंने उल्लेखनीय गवाहियों को प्राप्त करना प्रारंभ किया कि न केवल व्यक्तियों के साथ बल्कि पूरी कलीसिया के साथ क्या हो रहा था। तीन टैप के एक सेट दक्षिणी अफ्रीका पहुँच गए और कुछ समय पष्चात् मैं और रूत दक्षिण-अफ्रीका में सेवा कर रहे थे, हम कैपटाउन में थे और एक यहूदी स्त्री से हमारी मुलाकात हुई जिसने प्रभु यीषु से भेंट की थी और उसे अपना मसीह और उद्धारकर्ता स्वीकार किया था। उसने अपनी कहानी सीधे हमें सुनाई; हमने सीधे उससे सुना। वह किसी ऐसे पद पर थी जिसे वे एक्ज्यूक्यूटिव सेक्रेटेरी कहते हैं जो उच्च-षिक्षित होते हैं। उसे एक व्यक्ति के साथ अच्छी आयवाली नौकरी मिली थी जो कि स्वयं की संस्थान का अध्यक्ष था। कुछ समय पष्चात् उसने पाया कि संस्थान के अध्यक्ष और सारे एक्ज्यूक्यूटिव एक महिला गुरू के आधीन अजीब सी गलत षिक्षा की अधीन थे। जब इस स्त्री ने उन्हें अंकित करना षुरू किया तो उसने पाया कि वह कुछ और नहीं परन्तु जहाँ तक मसीहियों की बात थी आषीष थी। अतः वह अपने अधिकारी के पास गई और कहा, ‘‘मुझे माफ करें, परन्तु इन आशीषों का टंकन करने में मुझे स्वतन्त्रता महसूस नहीं हो रही है।’’ मेरा अधिकारी अनुग्रहकारी था, उसने कहा, ‘‘मुझे खेद है, यदि मुझे यह पता होता कि यह आपके विवेक के विरुद्ध है तो मैं आपको यह करने के लिये नहीं कहता।’’ यह इस बात का अन्त था।

अब हमें अनुमान से कुछ बातों को देना है परन्तु मुझे निश्चय है कि इस महिला गुरू ने इस सचिव के विषय में सुना था कि वह उसकी आशीषों को अंकित नहीं करेगी और कौन जानता है कि उसने क्या किया। हो सकता है उसने प्रार्थना किया हो या उसने एक श्राप कहा हो। परन्तु उस श्रोत से सचमुच कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछ ही सप्ताहों में यह महिला सचिव, मैं उन्हें मिरियम कहकर बुलाता हूँ - यह उनका नाम नहीं था। मिरियम की उंगुलियाँ कड़क होने लगी और मुड़ने लगी और स्थिर हो गई और कुछ ही समय में वे बहुत ही दर्द देने लगी और वह उन्हें मोड़ नहीं पा रही थी। उसने कहा कि इतना दर्द है कि आपको यकीन नहीं होगा। उन्हें अपने पति से अलग बिस्तर पर सोना पड़ता था क्योंकि जब भी उसके पति करवट बदलते तो पलंग हिलता और उसकी उंगुलियों में असहनीय दर्द होता। वह एक विशेषज्ञ के पास गई जिसने उंगुलियों का एक्स-रे लिया और उसने कहा कि यह संधिशोथ गठिया है। एक प्रकार से वह एक विकलांग व्यक्ति हो गई थी।

एक और स्त्री, एक चमत्कारी स्त्री ने मेरे इन तीनों कैसेटों को प्राप्त किया था और महसूस किया कि इस स्त्री मिरियम को इन्हें सुनना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि मिरियम इनके विषय में सचमुच बहुत उत्साहित थी। वह एक जटिल स्त्री थी और मुझे लगता है कि उसकी नजरों में श्राप का विचार कुछ पुरातन और मध्ययुगीन बात थी। इसके साथ ही यह अन्य स्त्री प्रबल हुई और इसलिये उन्होंने बैठकर तीनों कैसेट को सुना। और तीसरे कैसेट के अन्त में मैंने प्राथना में लोगों की अगुर्वाइ की जिसके द्वारा वे अपने जीवनों पर के किसी भी श्राप से मुक्ति पाते हैं। उस बिन्दु पर जहाँ प्रार्थना प्रारंभ हुआ कैसेट जाम हो गया। वह आगे नहीं बढ़ रहा था। वह पीछे भी नहीं जा रहा था और वह निकल भी नहीं रहा था। यह शुद्ध रूप से स्वाभाविक नहीं था। अतः मिरियम ने कहा, ‘‘खैर, तब मैं प्रार्थना नहीं बोल सकती हूँ।’’ हार न माननेवाली इस स्त्री ने कहा, ‘‘अरे नहीं, मेरे पास प्रार्थना लिखित में है! मैं उसे लाऊँगी।’’ अतः उसने मिरियम की इच्छा के विपरीत, इस प्रार्थना को पढ़ने के लिये उसे सहमत किया। अब आप तीन मिनट के अन्दर प्रार्थना को पढ़ सकते थे, इसमें ज्यादा समय नहीं लगता। तो कर्त व्य निर्वहन के लिये मिरियम ने प्रार्थना को पढ़ा और इस समय के बीच उसने प्रार्थना पढ़ना प्रारंभ किया और जब तक उसने समाप्त किया तो उसकी उंगुलियाँ और हाथ पूरी तरह मुक्त हो चुके थे। सन्धिशोथ का कोई निशान बाकी नहीं रह गया था। वह चिकित्सक के पास गई। चिकित्सकीय रूप से उन्होंने चंगाई को सुनिश्चित किया।

जिस बात पर मैं जोर देना चाहता हूँ वह यह है। वह चंगाई के लिये प्रार्थना नहीं कर रही थी। यह उसके मन में नहीं था। वह अपने आपको बस श्राप से मुक्त कर रही थी। परन्तु जब श्राप टूट गया तो बीमारी के लिये और कोई कारण नहीं रहा। अदृश्य बाधा का एक और उदाहरण।

अब मैं धर्मशास्त्र में से उन रूपों के बारे में बताना चाहता हूँ जो आशीष और श्राप ग्रहण करते हैं। पुराना नियम में एक विशेष अध्याय है जो विशिष्ट रूप से आशीषों और श्रापों के बारे में बात करता है। आप में से कितने लोग जानते हैं कि वह कौन सा है? व्यवस्थाविवरण 28। ठीक। इसमें आशीषों के लिये 14 पद और श्रापों के लिये 54 पद हैं। अब हम समय के कारण उसमें नहीं जा सकते हैं परन्तु यदि आपको सीखना है तो मैं आपको सलाह देता हूँ कि अपनी सुविधानुसार उस अध्याय का अध्ययन करें। मैंने कई बार उसका अध्ययन किया है और मैं अपना सारांश आपको बताने जा रहा हूँ। परन्तु कृपया आप स्वयं निर्णय लें कि क्या आप सोचते हैं कि यह सही है या नहीं।

यहाँ पर मैं मुख्य आशीषों और मुख्या श्रापों का अपना सारांश बता रहा हूँ। एक तथ्य के रूप में सचमुच वे एक दूसरे के बिल्कुल ही विपरीत हैं। यहाँ सात आशीषें हैं। पहला, महिमा का अर्थ है, ऊपर उठाया जाना। आप फिरसे वस्तुओं के अधीन नहीं रहते हैं। दूसरा, एक शब्द जिस पर मुझे दाँव लगाना था, पुनरुत्पादकता। मुझे एक भी सामान्य अंग्रेजी शब्द नहीं मिला। परन्तु एक व्यक्ति जो परमेश्वर की आशीष में है वह अपने जीवन के हर क्षेत्र में फलदायी होता है। तीसरा, स्वास्थ्य। चौथा, समृद्धि या सफलता। पाँचवाँ, विजय। छठवाँ, मूसा ने कहा कि तुम पूँछ नहीं, सिर ही ठहरोगे। और सातवाँ, आप ऊपर होंगे न कि नीचे।

कुछ वर्षों पूर्व जब मैं इसका अध्ययन कर रहा था तब मैंने प्रभु से पूछा, कि सिर और पूँछ में क्या अन्तर है। मुझे लगता है कि उसने मुझे एक सरल उत्तर दिया। सिर निर्णय लेता है और पूँछ पीछे चलता रहता है। तो आप कैसे जी रहे हैं? क्या आप निर्णय लेते हैं? क्या आप परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखते हैं या आप बस यूँ हीं परिस्थितियों और ताकतों के द्वारा पूँछ के समान खींचे जाते हैं जिसे आप नहीं समझते हैं और आप नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं? यदि आप पूँछ हैं, तो यह बहुत संभव है कि आप श्राप के अधीन हैं।

मैं नहीं कहता हूँ कि उनमें से हर एक आशीष इस कारण है, परन्तु यह आपके परखने के लिये है। इस क्षेत्र में केवल एक ही विशेषज्ञ है और उसका नाम डेरेक प्रिन्स नहीं है, वह पवित्र आत्मा है। वही है जिसे आपको व्यक्तिगत रूप से दिखाना है। मैं सामान्य सत्य का प्रचार कर सकता हूँ परन्तु आपको पवित्र आत्मा से विशेष प्रयोग प्राप्त करना है।

अबब आइ ए, श्रापों पर नजर डालते हैं और वे ठीक विपरीत हैं। अपमान, पुनरुत्पादन में पराजय या बाँझपन। मैं कहता हूँ कि मूल रूप से बाँझपन हमेशा किसी न किसी प्रकार श्राप से जुड़ा होता है। तीसरा, हर प्रकार की बीमारी। और यदि आप व्यवस्थाविवरण 28 पढ़ें, मेरा मतलब है, जब आप उस सूची में आते हैं तो कोई भी बीमारी ऐसी नहीं है जो छूटा हुआ हो। चौथा, गरीबी या असफलता। पाँचवाँ, पराजय और छठवाँ, आप सिर नहीं पूँछ हैं। और सातवाँ, आप ऊपर नहीं, नीचे हैं। आपने संभवतः दो मसीहियों के विषय में सुना होगा जो आपस में मिले। उनमें से एक ने कहा, ‘‘और भाई आप कैसे हैं?’’ और उसने उत्तर दिया, ‘‘हाँ, परिस्थितियों के अधीन अच्छा नहीं चल रहा है।’’ और पहले मसीही ने कहा, ‘‘खैर, तुम परिस्थितियों के अधीन क्या कर रहे हो? तुमको नीचे नहीं, ऊपर होना चाहिए।’’

कई वर्षों के दौरान् मैंने इस सूची के बाहर मैंने संकेतों की उक छोटी सूची बर्नाइ है जिसने मुझे चेतावनी दिया कि मैं संभवतः श्राप से व्यवहार कर रहा हूँ। मैं केवल संभवतः कहता हूँ। और मैंने व्यवस्थाविवरण 28 से इसे स्वतन्त्रतापूर्वक बनाया, परन्तु यह अद्भुत है कि यह सचमुच कैसा निकट है। मेरे पास सात की सूची है, मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि यदि आपमें इनमें से एक भी है तो यह पूरी तरह तय है कि आप श्राप के अधीन हैं। आपको संभावना का परीक्षण करना चाहिए और परमेश्वर को खोजना चाहिए। परन्तु यदि आपके पास उनमें से कई हैं तो आपके साथ इस बात की बड़ी संभवना है कि आप श्राप के अधीन हैं।

यहाँ मेरी पहली सूची है। पहला, मानसिक और/या भावनात्मक गिरावट। जब लोग पतित होते हैं तो एक वाक्यांश है जिसे आजकल उपयोग किया जाता है। वे कहते हैं कि वह गिर गया है। मैं इसी विषय में बात कर रहा हूँ, भावनात्मक, या दोनों। दूसरा, बार बार होनेवाली या जटिल बिमारियाँ। विशेषकर यदि वे वंशानुगत हैं, क्योंकि आप देखते हैं श्राप पीढ़ी दर पीढ़ी चलता जाता है। साथ ही साथ ऐसी स्थितियों में जहाँ चिकित्सक कोई सामान्य कारण नहीं पा सकते हैं। तीसरा, स्त्रीजन्य समस्याएँ क्या होती हैं? बाँझपन, गर्भपात की संभावना। मासिक के साथ समस्याएँ। रूत और मैंने इस प्रकार की कई समस्याओं से निपटे हैं कि जहाँ कहीं इस विभाग में प्रार्थना के लिये कोई व्यक्ति आता है, हम इसे श्राप मानकर व्यवहार करते हैं। वास्तव में, हम ऐसे स्थान पर पहुँच गए हैं जहाँ हम सच में अक्सर यह महसूस करते हैं कि बिना पहले यह सिखाए कि श्राप से कैसे छुटकारा पाना है, बीमारों की सेवा करने के द्वारा हम अपना समय बर्बाद कर रहे हैं।

एक बार हमने स्त्रीजन्य समस्याओं से ग्रस्त लोगों को पंक्ति में खड़े होने के लिये कहा और पंक्ति के मध्य एक पुरुष खड़ा था! अतः जब वह आया, तब मैंने कहा, ‘‘आपकी समस्या क्या है? आपको स्त्रीजन्य समस्या कैसे हो सकती है?’’ उसने कहा, ‘‘मेरी समस्या निराशा है और वह स्त्रीजन्य है!’’ हाँलाकि, मैंने उसके कथन को स्वीकार नहीं किया।

विवाह का टूटना और परिवार का विघटन, जहाँ परिवार अलग हो जाते हैं, जहाँ विवाह टूट जाता है, जहाँ बच्चे अपने माता-पिता से अलग हो जाते हैं, र्भाइ -बहन से अलग हो जाते हैं, संभवतः एक श्राप काम करता है। अगला, आर्थिक अपर्याप्तता। मैं सावधान होना चाहता हूँ कि मैं किस प्रकार यह कह रहा हूँ। मैं नहीं सोचता कि थोड़े से समय की गरीबी-हो सकता है यह एक परख हो जो परमेश्वर हम पर डालता है। परन्तु यदि आप हमेशा अभाव में हैं, यदि आपके पास कभी भी पर्याप्त नहीं है, यदि आप हमेशा खुरचन मिलता है, आप सोचते हैं कि आप शायद श्राप के अधीन हैं। तब अगला है जिसे वे दुर्घटना के लिये प्रवृत्त कहते हैं। दूसरे शब्दों में आप उन लोगों में से एक हैं जिसकी हमेशा दुर्घटना होती है। यह एक प्रकार का उद्देश्य है क्योंकि इन्श्योरेन्स कम्पनियाँ आपकी जाँच करेगी और यदि वे आपको दुर्घटना के लिये प्रवृत्त के रूप में वर्गीकृत करते हैं तो आपको बड़ा किश्त देंगे। मेरा मतलब है ऐसा व्यक्ति होना स्वाभाविक नहीं है जो हमेशा सीड़ी उतरने पर अपनी टांगे तुड़वाता हो या आपकी पत्नी आपकी उंगुलियों पर हमेशा कार का दरबाजा दे मारती हो या और कुछ। या हमेशा आपकी ही आँखों में कीड़े गिरते हों। मेरा मतलब है, यदि यह हमेशा होता है तो यह स्वाभाविक नहीं है।

और तब अन्ततः एक परिवार में आत्म-हत्या या अस्वाभाविक मृत्यु का इतिहास। यदि किसी परिवार में इन बातों की बार-बार पुनरावृत्ति होती हो।

मुझे बहुत जल्दी उन बातों को फिर से दोहराने दें। मानसिक और/या भावनात्मक निराशा, बार-बार होनेवाली या जटिल बीमारी - विशेषकर जब कि वे वंशानुगत हों, स्त्री-जन्य समस्याएँ, विवाह का टूटना/पारिवारिक अलगाव, आर्थिक अपर्याप्तता, दुर्घटना का जोखिम बना रहना और एक परिवार में आत्म-हत्या और अस्वाभाविक मृत्यु का इतिहास।

अब यह सब कुछ को नहीं ढाँपता है। अतः मैं उस बात को भी देने का प्रयास करता हूँ जिसे मैं एक सामान्य तस्वीर कहता हूँ क्योंकि कई ऐसी बातें हैं जो श्राप का परिणाम हो सकता है और जो सूची में न हों। और बहुत से लोगों से व्यवहार करने के कारण से मुझे यह परिणाम प्राप्त हुआ है। आप कह सकते हैं कि एक श्राप बीते हुए समय की दुष्टता की एक लम्बी बाँह के समान है और आप नहीं जानते हैं कि कब से है। यह बाहर की ओर आता है और प्रत्येक बार जब आप सफल होने पर होते हैं या वहाँ पहुँचनेवाले होते हैं जहाँ आपको होना है, तो यह दुष्ट बाँह आपको पीछे खींच देता है और आपको पुनः प्रारंभ करना पड़ता है। आप फिर आगे बढते हैं और फिर से आपको गिरा दिया जाता है और सचमुच आपके जीवन की कहानी बन जाती है। आपको यह देखकर आश्चर्य होगा कि कितने ही लोगों ने मुझसे ऐसी ही कहानियाँ कही हैं। और बहुत बार उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, ऐसी ही बात मेरे पिता के साथ या मेरे दादा के साथ हुई है। दूसरे शब्दों में, ऐसा लगता है कि यह हमारे परिवार में चल रहा है।’’

या एक और सामान्य तस्वीर भूतकाल से एक अन्धेरी छाया है, जो परमेश्वर की आशीषों के प्रकाश को बन्द कर देती है। आप अन्य लोगों को सूर्य प्रकाश में चलते हुए देख सकते हैं और आप जानते हैं कि यह है और वास्तविक है। परन्तु आप पर सूरज को पूरी तरह चमकते हुए शायद ही कभी देखा जाता है। तो यदि इनमें से कोई बात लागू होती है तो इस सन्देश में आगे बढ़ते हुए आपको परमेश्वर की ओर देखने की जरूरत है कि पवित्र आत्मा आपको दिखाए कि आपकी विशेष जरूरत या स्थिति या समस्या क्या है।

न्ीतिवचन 26ः2 में नीतिवचन का लेखक एक बहुत ही महत्वपूर्ण कथन कहता है। वह कहता है:

‘‘जैसे गौरैया घुमते-घुमते और सूपाबेनी उड़ते-उड़ते नहीं बैठती, वैसे ही व्यर्थ श्राप नहीं पड़ता।’’

दूसरे शब्दों में, यदि श्राप है तो हमेशा एक कारण होगा। कुछ ऐसी बात होगी जिससे यह हुआ। लोगों की सहायता करने में मुझे इतना अनुभव है कि अक्सर यह बहुत सहायक होता है और कभी कभी श्राप को हल करने से पहले कारण ढूँढ़ने में यह अनिवार्य भी होता है। अब मैं कुछ समय श्राप का बाइबल सम्मत कारण बताने जा रहा हूँ। यह एक लम्बा विषय होगा। यह वर्त मान सत्र से अगले सत्र तक जाएगा।

आइ ये, व्यवस्थाविवरण 28 अध्याय पर चलें जिसे मैं आशीष और श्राप दोनों ही का प्राथमिक कारण कहता हूँ। और सौभाग्यवश वे बहुत आसान हैं। व्यवस्थाविवरण 28 अध्याय के पहले दो पद यह बताते हैं:

यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की सब आज्ञाएँ, जो मैं आज तुझे सुनाता हूँ, चौकसी से पूरी करने का चित्त लगाकर उसकी सुने, तो वह तुझे पृथ्वी की सब जातियों में श्रेष्ठ करेगा। फिर अपने परमेश्वर यहोवा की सुनने के कारण ये सब आर्शीवाद तुझ पर पूरे होंगे।

यह ऐसा अनुवाद है जो मुझे लगता है कि अधिकांश आधुनिक अनुवादों द्वारा स्वीकार किया जाता है। परन्तु पुराना किंग जेम्स अनुवाद कहता है, ‘‘यदि तुम अपने प्रभु परमेश्वर की आवाज को सावधानीपूर्वक सुनोगे।’’ और इब्रानी में यह वाक्यांश ‘‘सुनना’’ शब्द को दोहराने के द्वारा गठित किया गया है। यदि आप प्रभु अपने परमेश्वर की आवाज को सुनने पर ध्यान दें - यह प्रभावी है - और जो कुछ वह कहता है उसे करें, तो बहुत ही सरल सी बात है कि सारी आशीषों का प्राथमिक कारण परमेश्वर की आवाज को सुनना और जो कुछ वह कहता है उसे करना है।

अब सारे श्रापों का प्राथमिक कारण इसके ठीक विपरीत है। इसी अध्याय के 15वें पद में:

परन्तु यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूँ चैकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।

तो श्रापों का कारण क्या है? परमेश्वर की आवाज को न सुनना, जो वह कहता है उसे नहीं करना। तो यहाँ दो मूल कारण हैं। आशीष का कारण: परमेश्वर की आवाज को सुनना, जो वह कहता है उसे करना। श्राप का कारण: परमेश्वर की आवाज का न सुनना, जो वह कहता है उसे न करना। मैं इसी समय आपको बताना चाहता हूँ, यदि हम इस श्रृंखला में बाद में काम करें और आप श्राप से मुक्त होते हैं ताकि आशीष में बनें रहें तो आपको यह शर्त पूरी करनी होगी: आपको परमेश्वर की आवाज सुननी होगी और जो वह कहता है उसे करना होगा। यदि आप न सुनने और न करने की दशा में वापस जाएँगे, तो आप पुनः श्राप के अधीन आने के योग्य होंगे।

बाइबल में श्रापों के लिये कई विभिन्न श्रोत और विशिष्ट कारण बताए गए हैं। हमने सामान्य को देखा है, और अब हम कुछ विशिष्ट को देखेंगे। श्रापों का पहला श्रोत - और यह आपमें से कुछ लोगों को आश्चर्य में डाल सकता है - स्वयं परमेश्वर है। बाइबल में बहुत से श्राप हैं जिन्हें परमेश्वर स्वयं कहता है। संभवतः अनाज्ञाकारी लोगों और राष्टंों पर दण्ड की घोषणा करने का सबसे सामान्य तरीका उन पर श्राप की घोषणा करना है। और जब श्राप अमल में आता है तो यह परमेश्वर के न्याय का परिणाम होता है। क्या आप इस बात को समझते हैं? परमेश्वर आशीष भी देता है और श्राप भी देता है।

तो हम सबसे पहले, ऐसे श्रापों पर विचार करने जा रहे हैं जो स्वयं परमेश्वर से आते हैं। और एक सर्वोच्च कारण है जिसे निर्गमन 20ः3-5 में कहा गया है। यह दस आज्ञाओं का प्रथम भाग है। पढ़ने से पहले मुझे कहने दीजिए कि लोगों के जीवनों में श्रापों का सबसे सामान्य कारण प्रथम दो आज्ञाओं को तोड़ना है। वास्तव में, मैं यह कहने के लिये प्रवृत्त हूँ कि बिना उन आज्ञाओं को तोड़े आप श्राप के अधीन नहीं आ सकते हैं। अब मुझे उन वचनों को पढ़ने दीजिए।

‘‘तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।’’

परन्तु इब्रानी में अर्थ होता है मेरे अलावा कोई भी। सवाल यह नहीं है कि प्रभु को मुख्य परमेश्वर मानें और अन्य देवताओं को भी मानते रहें। वह कहता है, ‘‘मैं ही परमेश्वर और मुझे छोड़ कोई और ईश्वर नहीं है।’’ अतः सच्चे परमेश्वर के अलावा आपको किसी और ईश्वर को नहीं मानना है।

दूसरा वह है जिसे हम मूर्ति पूजा कहते हैं।

‘‘तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है। तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मै तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूँ, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ।’’

श्राप की विशिष्ट खूबियों पर ध्यान दीजिए, यह संभवतः तीन या चार पीढ़ी तक चलता रहता है। पृथ्वी पर उन लाखों करोड़ों के विषय में सोचिए जिनमें से सभी के पूर्वजों ने असंख्य सदियों तक मूर्तियों की उपासना की है। उन श्रापों की गहराइयों के विषय में सोचिए जो इसके कारण पड़ी है। दक्षिण-पूर्वी एशिया में यात्रा कीजिए। मेरे विचार से यदि आप श्राप के विषय को नहीं हल कर सकते हैं तो दक्षिण-पूर्ण एशिया में सेवा करना शायद ही लाभदायक होता है क्योंकि मूल रूप से 95 प्रतिशत लोग श्राप के अधीन हैं। यह ऐसा कहना नहीं है कि वहाँ बुरे लोग हैं, मुझे लगता है कि वे अद्भुत लोग हैं। लेकिन, आप देखें उनमें भूतकाल की कुछ तो बात होती है।

यह देखना बहुत महत्वपूर्ण है कि सच्चे परमेश्वर के अलावा अन्य ईश्वरों के होने में मनोगत अभ्यास के सभी रूप शामिल हैं। आज शाम मैं मनोगत के सभी संभावित रूपों पर बात नहीं कर सकता हूँ क्योंकि वे लगभग असंख्य हैं। परन्तु जब कभी आप उन बातों को प्राप्त करने के लिये सच्चे परमेश्वर के अलावा किसी और श्रोत के पास जाते हैं जिसे आपको केवल सच्चे परमेश्वर से खोजना चाहिए, तो आप चाहे किसी भी श्रोत पर जा रहे हों, वास्तव में आप अपना ईश्वर बना रहे हैं। तो यदि आप किसी भावी कहनेवाले के पास भविष्य के विषय में सूचना पाने के लिये जाते हैं जिसके विषय में परमेश्वर ने कहा है कि आपको उस माध्यम से प्राप्त नहीं करना है, उस भावी कहनेवाले के द्वारा आप उस भावी कहनेवाले में काम करनेवाली शक्ति को अपना ईश्वर बना रहे हैं। आप उईजा बोर्ड के साथ खेलते हैं। यदि आप मनोगत अनुभवों या गलत शिक्षाआें के सभी प्रकारों में शामिल होते हैं जो बाइबल के सत्य का इन्कार करते हैं। उन सारी बातों में आप एक ईश्वर को बना रहे हैं जो सच्चा परमेश्वर नहीं है। तो यह कहना बहुत महत्वपूर्ण है कि प्रथम दो आज्ञाओं को तोड़ने के लिये जिन श्रापों की घोषणा की गई है वह सभी प्रकार के मनोगत को अपने में शामिल करता है।

अब प्रभु कहता है कि चौथी पीढ़ी तक यदि आप थोड़ा सा अंक गणित का उपयोग करें, चार पीढि़यों से पीछे जाएँ। हममें से सबके तीस पुरखे होते हैं। हममें से कितने निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि हममें से किसी की भी तीस पूर्वज मनोगत में कभी शामिल नहीं रहे हैं। शायद हममें से कुछ, मुझे नहीं मालूम। निश्चित ही मैं नहीं कर सकता।

आपको इसका एक सामान्य उदाहरण देता हूँ। बहुत वर्षों पूर्व मैं एक विशिष्ट पारिवारिक प्रार्थना सभा में था जो उन दिनों का चलन था। मैंने स्वयं को एक बीस वर्ष के आस-पास के युवक के पास पाया। मैंने उससे कहा, ‘‘मुझे लगता है कि पवित्र आत्मा ने मुझे उभारा, क्या तुमने पवित्र आत्मा पाया?’’ उसने कहा, ‘‘हाँ, परन्तु....।’’ और जब कभी एक व्यक्ति उस प्रश्न का उत्तर देता ‘हाँ, परन्तु’, आप जानते हैं कि वह परन्तु क्या है। परन्तु मैं अन्य भाषा में बात नहीं करता हूँ। और मुझे लगा कि वह सचमुच अन्यभाषा में बात करना चाहता था। मैं उस पर दबाव बनाने का प्रयास नहीं कर रहा था। मैंने उसके साथ विवाद नहीं किया परन्तु प्रभु ने मुझे उभारा। मैंने कहा, ‘‘क्या आप कभी भावी कहनेवाले के पास गए हैं?’’ उसने सोचा और उसने कहा, ‘‘हाँ, एक बार जब मैं 15 साल का था, परन्तु केवल मैंने मजाक में ऐसा किया था। उससे मेरा कोई तात्पर्य नहीं था।’’ मैंने कहा, ‘‘आप गए’’। उसने कहा, ‘‘हाँ।’’ मैंने कहा, ‘‘आपको मालूम है, परमेश्वर उस प्रकार की बातों के लिये मना करता है।’’ उस बात को मानने के लिये वह थोड़ा अनिच्छुक था परन्तु उसने किया। मैंने कहा, ‘‘क्या मैं एक प्रार्थना में आपकी अगुवाई करूँ जिसमें आप उसे एक पाप के रूप में अंगीकार करें और अपने आपको उसके परिणामों से मुक्त करें?’’ उसने कहा, ‘‘ठीक है।’’ मुझे लगता है कि उसने ऐसा केवल इसलिये कहा क्योंकि वह चाहता था कि मैं उसका पीछा छोड़ दूँ। इसलिये मैंने एक सामान्य प्रार्थना में उसकी अगुर्वाइ की, ‘‘प्रभु, मैं एक पाप के रूप में अंगीकार करता हूँ कि मैं उस भावी कहनेवाले के पास गया।’’ मैंने उससे कोई और शब्द नहीं कहा। अपने हाथों को उसके कन्धे पर रखा और उसके लिये प्रार्थना किया। वह तुरन्त ही एक अनजानी भाषा में अच्छे से बात करने लगा। कुछ ही क्षणों में वह उसमें खो गया। आप देखें, एक अदृश्य बाधा थी जो उसे भाषाओं की स्वतन्त्रता से रोक रहा था। वह क्या था? मनोगत। यह एक सामान्य उदाहरण है।

अब व्यवस्थाविवरण 27ः15-26 में हमारे पास बारह घोषित श्राप हैं और जब इस्राएल प्रतिज्ञात देश में गया उन्हें स्वयं पर इन सभी श्रापों की घोषणा करनी थी। यदि वे व्यवस्था का पालन नहीं करते तो स्वतः ही वे श्रापों की अधीन आ जाते। इसके बिना वे प्रतिज्ञात देश में प्रवेश नहीं कर सके। मुझे लगता है कि जब हम परमेश्वर के साथ संबन्ध में प्रवेश करते हैं तो यह बहुत कुछ ऐसा ही होता है। यदि हम आज्ञाकारी हैं तो हम आशीषों के अधीन आते हैं परन्तु यदि हम अनाज्ञाकारी हैं तो हम श्रापों के अधीन आने के वास्तविक खतरे में हैं।

मैं आपको उन बातों का अपना स्वयं का एक छोटा सा परिणाम दूँगा जिस पर व्यवस्थाविवरण 27ः15 और आगे श्रापों की घोषणा की गई है। पहला, एक बार पुनः, मूर्तिपूजा, झूठे ईश्वर। यह हमेशा सूची में ऊपर है। दूसरा, माता-पिताओं के प्रति अनादर। और नया नियम में इफिसियों 6 अध्याय में इसे दोहराया गया है।

अपनी माता और पिता का आदर कर, यह पहिली आज्ञा है, जिस के साथ प्रतिज्ञा भी है, कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।

मेरा व्यक्तिगत मत है कि यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता का आदर नहीं करता है तो उसके पास ये बातें कभी नहीं होंगे। मैं कई लोगों के उदाहरण के लिये विषय में सोच सकता हूँ। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप बचाए नहीं जा सकते हैं, अन्य भाषाओं में बात नहीं कर सकते हैं और जब आप मरेंगे तो स्वर्ग नहीं जा सकते हैं। परन्तु आपके जीवन की गुणवत्ता में तब तक कुछ कमी रहेगी जब तक अपने माता-पिताओं के साथ आप अपने संबध को सही नहीं करते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आपको हर उस बात में सहमत होना है जो आपके माता-पिता कहते हैं, परन्तु आपको उनका आदर करना है।

मैं एक और युवक के विषय में सोचता हूँ जिसके साथ मैंने बातचीत किया। अपनी पिता के साथ उसका बहुत बुरा संबध था। उसके पिता की मृत्यु हो चुकी थी और जहाँ हम थे वहाँ से हजार मील से अधिक दूरी पर एक कब्रिस्तान पर दफनाये गये थे। जब इस सत्य ने सचमुच उसमें प्रवेश किया तब उसने उस कब्रिस्तान तक हजार मील की यात्रा की जहाँ उसके पिता दफनाए गए थे कब्र पर गया वहाँ झूका और अपने पिता से अपनी गलत मनोवृत्तियों के लिये क्षमा माँगा। दिल से रोया और एक भिन्न व्यक्ति के रूप में उठ खड़ा हुआ और तब से उसका जीवन परिवर्ति त हो गया। मैं जानता हूँ कि कई ऐसे माता-पिता हैं, विशेषकर आज, जिनके विरोध में इन्हीं बातों के लिये आपके पास बहुत सारे कारण हैं। मैं इसे समझता हूँ। मैं कहता हूँ कि अपराधी बच्चे नहीं होते हैं, अपराधी माता-पिता होते हैं। उस पर भी यदि आप चाहते हैं कि आपके साथ भला हो तो अच्छा है कि आप वही करें जो परमेश्वर कहता है। आपके पास नहीं कहने का चुनाव नहीं है।

तब इस सूची में अगला, और हमें जल्दी देखना है, पड़ोसी के विरुद्ध डाह करना है। नीतिवचन की पुस्तक कहता है जो कोई भलाई के बदले बुर्राइ करता है, उसके घर से कभी बुराई दूर नहीं होगी।

और तब कमजोर और असहायों के प्रति अन्याय करना। व्यक्तिगत रूप से एक गर्भस्थ शिशु से बढ़कर किसी कमजोर और असहाय के विषय में मैं नहीं सोच सकता हूँ। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना यह है कि जो भी व्यक्ति जान बूझकर गर्भपात करता या करवाता है वह श्राप के अधीन आता है। मैं बिना श्राप का इलाज किए कभी भी ऐसे व्यक्ति की सेवा नहीं करूँगा। मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप पर हमेशा के लिये श्राप है, कृपया समझिए। मैं आपको समस्या बता रहा हूँ क्योंकि मैं आपको समाधान दिखाने जा रहा हूँ। ?

तब अवैध या अप्राकृतिक यौन संबन्ध विशेष रूप से अनाचार और पुनः मैं नहीं जानता हूँ कि यहाँ पर क्या विशिष्ट चित्रण हैं। परन्तु संयुक्त राज्य में अनुमान लगाया जाता है कि दस वर्ष से कम उम्र की चार लड़कियों में से एक का यौन शोषण होता है और दस वर्ष से कम उम्र के लड़कों में से प्रत्येक पाँच में एक मैं स्वयं नहीं सोच सकता हूँ कि इसके परिणाम के रूप में श्राप आए बिना यह कभी संभव होगा।

हम उत्पत्ति 12 में इस सूची में आगे बढ़ रहे हैं, तो हम अब्राहम के लिये परमेश्वर की बुलाहट देखते हैं। हमें इसे देखने की जरूरत है क्योंकि इसमें कुछ उल्लेखनीय बात है। परमेश्वर अब्राहम को बुलाता है, बहुत सी बातों की प्रतिज्ञा करता है और तीसरे पद में बुलाहट का अन्त है। वह अब्राहम से कहता है:

‘‘और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा।’’

तो यहाँ आशीष और श्राप दोनों ही हैं। मुझे लगता है कि यह अनिवार्य था क्योंकि जब कभी परमेश्वर आशीष पाने के लिये किसी व्यक्ति को एकल करता है तो वह व्यक्ति सभी प्रकार की शैतानी बलों के लिये विषयवस्तु बन जाता है। तो परमेश्वर ने एक सुरक्षा को निगमित किया। उसने अब्राहम से कहा, ‘‘जो कोई तुझे श्राप दे, उसे मैं श्राप दूँगा।’’

अब हम आगे नहीं जाएँगे परन्तु उत्पत्ति 27ः29 में इसहाक के द्वारा याकूब को आशीष देते समय इस सुरक्षा को आगे बढ़ाया गया।

‘‘जो तुझे शाप दें सो आप ही श्रापित हों।’’

तो आप देखेंगे, कि वह वंश अब्राहम, इसहाक और याकूब हैं जो कौन सा राष्टं बना? इस्राएल, हाँ, सही। यहूदी लोगों को श्राप देने या उनके विरुद्ध बात करने या उन्हें गाली देने का सामान्य नाम क्या है? यहूदी विरोधी भावना। मेरे व्यक्तिगत विचार में एक व्यक्ति या एक राष्टं के लिये यहूदी विरोधी भावना लगभग हमेशा श्राप लेकर आता है। और यदि आप अन्तिम 19 सदियों का इतिहास देखें, एक एक राष्टं जो श्राप के अधीन आए क्योंकि उन्होंने यहूदी लोगों को श्राप दिया था। रूत के और मेरे एक बहुत अच्छे मित्र हैं जो कि पलिस्तीनवासी हाईफा में जन्मा एक अरबी है जो कि अमेरिकी नागरिक है जिसका नाटकीय रूप से कुछ वर्षों पूर्व यीशु के साथ मुलाकात हुआ था। मैंने पवित्र आत्मा का बपतिस्मा पाने में उसकी अगुवाई की। उन दिनों वह करोड़पति था। उद्धार पाने के पश्चात्, यहाँ ध्यान दीजिए, वह दीवालिया हो गया। उसमें इतना कहने की समझ थी, ‘‘परमेश्वर, तू मुझे क्या बता रहा है?’’ परमेश्वर ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे घमण्ड को हल कर रहा हूँ।’’ परन्तु परमेश्वर ने मुझे कुछ और भी दिखाया कि उसने और उसकी पूर्वजों ने नियमित रूप से यहूदी लोगों को श्राप दिया था। और मेरा विश्वास कीजिए, मैं पलिस्तीन में अरबियों के बीच में रहा हूँ। यह सामान्य सी बात है। ‘‘कुछ अपवादों को छोड़कर वे सभी मूल रूप से यह करते हैं।’’ परमेश्वर ने उसे दिखाया कि यदि वह अपनी मनोवृत्ति को बदल ले तो वह उसकी आशीष को पुनःस्थापित करेगा। उसने पश्चाताप किया और परमेश्वर से कहा कि उसे यहूदी लोगों के प्रति प्रेम दे। और वह एक पलिश्ती अरबी है जो अधिकांश यहूदियों से बढ़कर अधिक इस्राएल विरोधी है। और अब वह एक अरबपति है। उन कारणों को जानना कितना महत्वपूर्ण है जो आपके जीवनों में कार्यरत है।

और तब यिर्मयाह की पुस्तक में एक और सबसे महत्वपूर्ण श्राप बताया गया है, जो कि थोड़े ही शब्दों में है। और मुझे लगता है कि हम अक्सर उसे बिना उनका महत्व दिए उन्हें योंहीं टाल देते हैं। यिर्मयाह 17ः5-6:

‘‘यहोवा यों कहता है, स्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और उसका सहारा लेता है, जिसका मन यहोवा से भटक जाता है। वह निर्जल देश के अधमूए पेड़ के समान होगा और कभी भलाई न देखेगा। वह निर्ज ल और निर्जन तथा लोनछाई भूमि पर बसेगा।’’

कृपया ध्यान दें कि यह श्राप के अधीन किसी व्यक्ति के विषय में बहुत अच्छा चित्रण है। आशीष सभी जगह पर है लेकिन वह नमकीन स्थान पर रहता है। सभी जगह बारिश होती है पर यह उस पर नहीं गिरता है। उसी श्राप का कारण क्या है? मनुष्य में भरोसा रखना। अपनी बाँह को शारीरिक बनाना परन्तु धर्मशास्त्र कहता है, जिसका हृदय प्रभु से दूर रहता है। दूसरे शब्दों में, यहाँ एक व्यक्ति है जिसने अलौकिक अनुग्रह और परमेश्वर की आशीष को जान लिया है। और तब अपने स्वयं के प्रयासों पर भरोसा रखता है परमेश्वर के अनुग्रह की तरफ पीठ फेर लिया है और यह श्राप ले आता है।

मैं आपसे कहता हूँ कि आप स्वयं का न्याय करें। परन्तु मैं कहता हूँ कि वर्त मान ढोंगी कलीसिया के बड़े हिस्से की स्थिति यही है। आज कलीसिया में अधिकांश बड़े आन्दोलन जिन्हें हम जानते है, और मैं किसी का नाम नहीं लूँगा, का प्रारंभ अलौकिक सर्वोच्च भेंट और पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा हुआ। अन्यथा वे कभी इतिहास में ऐसा नहीं किए होते। परन्तु मैं कहता हूँ कि आज उनमें से अधिकांश अलौकिक अनुग्रह और परमेश्वर की सामथ्र्य से दूर चले गए हैं और अपने प्रयासों पर और उन बातों पर भरोसा करना प्रारंभ कर दिए हैं जो कुछ उनकी स्वयं की सामथ्र्य और योग्यता कर सकती है। और उस गिनती में वे श्राप के अधीन हैं। मुझे लगता है, यह मसीही कलीसिया के साथ अति दारुण समस्या है कि जहाँ कहीं हमें आशीषमय होना चाहिए अनाज्ञाकारिता के कारण (यिर्मयाह 17ः5) हम श्राप के अधीन आ गए हैं।

अब मैं जल्दी से जकर्याह 5ः1-4 में जाऊँगा, जकर्याह ने एक उड़ते हुए पत्र का दृश्य देखा और पत्र के दोनों ओर श्राप लिखा हुआ था। एक ऐसा श्राप था जो प्रत्येक चोरी करनेवाले पर आता और दूसरा किसी भी ऐसे व्यक्ति पर आनेवाला श्राप था जो झूठी साक्षी देता था। और दर्शन में यह पत्र एक व्यक्ति के घर में जाता, वहाँ ठहरता और पूरा घर ढह जाता। देखें, यह श्राप की प्रकृति है। यह केवल उस क्षेत्र को ही प्रभावित नहीं करता परन्तु यह चारों तरफ संक्षारक प्रभाव रखता है। तो हमें इस बात पर विचार करना चाहिए। अगली बार - मुझे निश्चय है कि आप लोग आयकर रिटर्न भरते हैं - इस बात को मन में रखें कि यदि आप ईमानदार नहीं हैं, तो आप अपने आपको श्राप के अधीन कर रहे हैं। क्योंकि मुझे निश्चय है कि आप कहेंगे कि यह सच्ची वापसी है।

आप जानते हैं कि कम से कम संयुक्त राज्य में खुदरा वस्तुओं के मूल्य का 10 प्रतिशत चोरी के विरुद्ध बीमा के कारण होता है। जरा सोचिए कि यदि लोग चोरी नहीं करें तो स्थिति कितनी भिन्न होगी। मूल रूप से यह मुद्रास्फीति के लिये उत्तर होगा। क्या आप देख सकते हैं कि श्राप कैसा वास्तविक होता है कि यह पूरे राष्टं को प्रभावित करता है।

और तब मलाकी 3 में, मुझे लगता है कि हमें इसे देखना चाहिए। मलाकी 3ः8-10:

क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है? देखो, तुम मुझ को धोखा देते हो, और तौभी पूछते हो कि हमने किस बात में तुझे लूटा है? दशमांश और उठाने की भेंटों में। तुम पर भारी शाप पड़ा है, क्योंकि तुम मुझे लूटते हो; वरन सारी जाति ऐसा करती है। सारे दशमांश भण्डार में ले आओ कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे; और सेनाओं का यहोवा यह कहता है, कि ऐसा करके मुझे परखो कि मैं आकाश के झरोखे तुम्हारे लिये खोलकर तुम्हारे ऊपर अपरम्पार आशीष की वर्षा करता हूँ कि नहीं।

अब मैं सारे मसीहियों को यह नहीं सिखा रहा हूँ कि दशमांश देना चाहिए। क्योंकि जैसा कि मैं नया नियम को समझता हूँ यह नियम नहीं है, यह अनुग्रह है। परन्तु मैं आपको सुझाव दूँगा कि अनुग्रह हमें व्यवस्था से बढ़कर उदार बनाना चाहिए। हमसे कहा गया है कि हमें अधिक अच्छी प्रतिज्ञाओं पर अधिक अच्छी वाचा दी गई है। क्या इस आधार पर आप सोचते हैं कि हम इस्राएलियों से कम दे सकते हैं? परन्तु मैं तुम्हें यह एक बात कहूँगा। परमेश्वर के प्रति कृपणता श्राप लाता है। परमेश्वर के साथ कृपणता दिखाना बहुत बुरी अर्थव्यवस्था होती है। और जब भेंट चढ़ाने की बात आती है तो मैं हर कहीं मसीहियों से कहता हूँ कि परमेश्वर को आपके रुपयों को जरूरत नहीं है। सचमुच यदि आप क्षणभर के लिये रुकें और सोचें कि परमेश्वर को एक डाॅलर या आधा डाॅलर या पचास पेनी चढ़ाना, ऐसा मत कीजिए। आपको देने की जरूरत नहीं है परन्तु आप परमेश्वर को दे रहे हैं। वास्तव में, जैसा कि मैंने कहा उसको आपकी बख्शिश की जरूरत नहीं है। कलीसिया में देने के इस विषय में बहुत ही अनादर होता है। हमें इस बात को समझना चाहिए कि देना आराधना का भाग है और इसे आराधना के समान करना चाहिए। मुझे यह कहना है कि मैं मूल रूप से ब्रिटिश हूँ मेरे स्वयं के देश ब्रिटेन के विषय में - मुझे लगता है कि ब्रिटेन एक श्राप के अधीन आ गया क्योंकि मूल रूप से ब्रिटिश मसीही कृपण थे। अब मुझे लगता है कि परमेश्वर इसे बदल रहा है। मुझे लगता है कि देश में एक नया दिन आ रहा है। मैं इसमें से होकर जिया हूँ। मैं इंग्लैण्ड में लगभग नौ वर्ष तक पास्टर रहा हूँ। इंग्लैण्ड में चर्च संगठन का नारा ‘‘आप उसे नम्र बनाए रखो, हम उसे गरीब बनाए रखेंगे’’ है। और वे निश्चय ही अपना मोलभाव करने का अवसर बनाए रखते हैं!

और तब गलातियों 1 अध्याय में एक और बहुत ही महत्वपूर्ण कथन है जो कलीसिया को प्रभावित करता है। पौलुस उस सुसमाचार के विषय में बात करता है जो यीशु के द्वारा अलौकिक रूप से उस पर प्रगट किया गया। और वह गलातियों 1ः8-9 में कहता है:

परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूँ, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुमने ग्रहण किया है, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता है, तो श्रापित हो। अब मैं क्या मनुष्यों को मनाता हूँ या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ?

यहाँ पर एक यूनानी शब्द अनाथेमा है जिसे अंग्रेजी भाषा में लिया गया है। अनाथेमा शब्द का अर्थ कुछ ऐसा जो संपूर्ण रूप से परमेश्वर के लिये घिनौनी है जिससे वह कभी कोई संबध नहीं रखता है। यह उससे पूरी तरह दूर है। श्राप का कारण क्या है? सुसमाचार के नाम के अधीन कुछ भी ऐसा प्रचार करना जिसमें सुसमाचार का सत्य नहीं हैं। जब आप यिमर्याह 17ः5 और गलातियों 1ः8-9 को एक साथ रखते हैं और उन्हें समकालीन कलीसिया में लागू करते हैं तो मुझे लगता है कि यह अदभुत होता है कि कोई आशीष बचा नहीं रहता है। और आप मलाकी 3 को जोड़ें, श्रापित है वह जो परमेश्वर के प्रति कृपण है।

भाइयों और बहनों, क्या आप जानते हैं कि हमें क्या करने की जरूरत है? हमें पश्चाताप् करने की जरूरत है। हमें अपने मार्गों को बदलने की जरूरत है, हमें परमेश्वर को बहुत ही गंभीरता से लेने की जरूरत है। विश्वास के बहुत सारी विभिन्न परिभाषाएँ हैं परन्तु मैं आपको एक बहुत ही सामान्य परिभाषा बताऊँगा। परमेश्वर को गंभीरता से लेना ही विश्वास है। बाइबल को गंभीरता से लेना ही विश्वास है।

हम इस विशेष सत्र के अन्त में आ पहुँचे हैं। यदि मैं संक्षिप्त रूप में बता सका तो मुझे बताने दीजिए, श्रापों के मुख्य कारणों को सारांश में देखें जिस पर हमने विचार किया है। सबसे पहले, झूठे ईश्वर: मूर्तिपूजा और मनोगत और यह सूची में किसी और बात से सबसे ऊपर है। और तब माता-पिताओं के लिये अनादर, पड़ोसी के विरुद्ध विश्वासघात, कमजोर और असहाय के प्रति अन्याय, अवैध या अप्राकृति यौन या अनाचार, यहूदी विरोधी भावना, परमेश्वर के अनुग्रह के बजाय शरीर पर भरोसा रखना, चोरी करना या झूठी गवाही देना, परमेश्वर के प्रति कृपणता और सुसमाचार को बिगाड़ना: ऐसे सन्देश का प्रचार करना जो सुसमाचार होने का दावा करता है परन्तु उसको तोड़ता-मरोड़ता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मैं सेना में साढ़े पाँच वर्षों तक रहा। और मैंने बहुत से उपदेशकों को प्रचार करते सुना। जब मैं सेना में गया तो मैं प्रभु को नहीं जानता था और मैं सुसमाचार नहीं जानता था। सेना में मैंने प्रभु से मुलाकात की। मुझे याद नहीं है कि एक भी उपदेशक ने सुसमाचार का प्रचार किया हो। तो यह एक भयंकर मुद्दा है जिसका सामना हम करते हैं।

अब हमें इस सत्र को समाप्त करना है परन्तु अगले में हम इसे जारी रखेंगे। जहाँ से मैंने छोड़ा है वहाँ से मैं आगे बढ़ूँगा। मैं श्रापों के अन्य कारणों पर विचार कर रहा होऊँगा। तब हम वास्तव में महत्वपूर्ण भाग पर आएँगे जो कि श्राप से कैसे मुक्ति पाना है है। तो क्या मैं कहूँ कि आप प्रार्थना के भाव में रहें। इसका यह मतलब नहीं कि आपको अपने पड़ोसी से बात नहीं करना है परन्तु आपके ऊपर जो अभिषेक है उसे जाने न दें क्योंकि आपके लिये परमेश्वर के पास बहुत कुछ है। आज रात यहाँ बहुत से लोगों के लिये उसके पास बहुत कुछ है। इससे अपने आपको धोखा मत दीजिए। एक ऐसी मनोवृत्ति रखें जो आपको श्राप से मुक्त होने और आशीष प्राप्त करने योग्य बनाती है।

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