अंतिम न्याय

डेरिक प्रिंस हिंदी में
Published: 1970
Last Updated: जुलाई 2026
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जीवन की चुनौतियों को खुद पर हावी न होने दें। डेरेक प्रिंस के प्रवचन 'अंतिम न्याय' के साथ यात्रा करें - "आधारशिला रखना" श्रृंखला का भाग 10, जहाँ वे परमेश्वर के शाश्वत न्याय की वास्तविकता को समझाते हैं। जानें कि कैसे परमेश्वर पीढ़ियों को उनके पूर्वजों की प्रतिक्रियाओं के अनुसार आशीर्वाद या दंड देते हैं, जिससे आपको उनके राज्य और न्याय के बारे में नई समझ मिलती है।
Transcript
ठीक है, हमने पहले से ही अपनी उद्घोषणा कर दिया है तो अब मेरे लिए केवल शिक्षण लाने ही शेष रह जाता है। यह हमारी श्रृंखला ‘‘नींव डालना’’ का दसवाँ और अंतिम सत्र है। पिछले सत्र में हमने इब्रानियों 6ः1-2 में वर्णि त पाँच या छह नींवों को पेश किया है। हमने परमेश्वर के प्रति पश्चाताप, विश्वास, बपतिस्मों का सिद्धांत हाथ रखना और मरे हुओं का पुनरूत्थान को देखाा। इस अंतिम सत्र में अंतिम मूल सिद्धांत, अनन्त न्याय पर विचार करना शेष रह जाता है।
अब जब हम न्याय के बारे में बात करते हैं तो हमें यह समझने की आवश्यकता है कि दो मुख्य तरीके हैं जिसमें परमेश्वर लोगों पर न्याय लाता है। पहला, इतिहास में उसका न्याय; दूसरा, ऐसा न्याय जिसके बारे में हम बात करने जा रहे हैं, उसके शाश्वत न्याय है, वे न्याय जो हमारा सामना करता है जबकि हम समय के पार अनंत काल में कदम रखते है। इन दो प्रकार के न्यायों में भेद करने में सक्षम होना महत्वपूर्ण है, अन्यथा हम परस्पर विरोधी दिखने वाले बयानों से भ्रमित हो सकते हैं।
परमेश्वर का पहला न्याय इतिहास में है और इसमें पहली पीढ़ियों ने जिस प्रकार परमेश्वर को प्रतिक्रिया दिखाई उसके आधार पर परमेश्वर की आशीष या दंड शमिल है। निर्ग मन 20ः4-6 में हम परमेश्वर के ऐतिहासिक न्याय का एक बहुत स्पष्ट उदाहरण पाते हंै। निर्ग मन 20ः4-6 जो इस आज्ञाआें का ही भाग है। परमेश्वर कहता है।
‘‘तू अपने लिये र्कोइ मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृथ्वी पर, वा पृथ्वी के जल में है। तू उनको दंडवत् न करना, और न उनकी उपासना करना, क्योंकि मै तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूँ और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दडं दिया करता हूँ और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाआें को मानते हैं, उन हजारों पर करूणा किया करता हूँ।’’
हम वहाँ देखाते हैं कि मूर्ति पजूा का पाप जो सब पापों में सबसे बड़ा है, अपने साथ ऐसा न्याय लाता है जो आने वाली तीन या चार पीढियों तक को प्रभावित करता है। यह इतिहास में का एक न्याय है और इस बात के असंख्य उदाहरण हैं कि कैसे उस न्याय ने इस्राएल और अन्य देशों के इतिहास में काम किया है जो मूर्तिपूजा में शामिल रहे हैं।
और फिर यिर्मयाह 32 में यिर्मयाह इतिहास में परमेश्वर के न्याय के सवाल पर भी बात करता है। और यिर्मयाह 32ः18 में प्रभु से की गई एक प्रार्थ ना में उसने कहाः
‘‘तू हजारों पर करुणा करता रहता परन्तु पूर्वजों के अधर्म का बदला उनके बाद उनके वंश के लोगों को भी देता है, हे महान और पराक्रमी परमेश्वर, जिसका नाम सेनाआें का यहोवा है,..’’
तो पुनः यिर्मयाह कहता है कि परमेश्वर आने वाली पीढ़ियों को पितरों के पापों का बदला दतेा है। पुनः यह इतिहास का न्याय है।
यह धर्मियों पर परमेश्वर की आशीष पर भी लागू होती है। भजन 103 में दाऊद पद 17-18 में कहता हैः
‘‘परन्तु यहोवा की करूणा उसके डरवैयों पर युग युग, और उसका धर्म उनके नाती-पोतों पर भी प्रगट होता रहता है, अर्था त् उन पर जो उसकी वाचा का पालन करते और उसके उपदेशों को स्मरण करके उन पर चलते हैं।’’
बच्चों से बच्चों तक, पीढ़ियों तक परमश्वर की आशीष और धार्मि कता की प्रतिज्ञा की र्गइ है। तो जिस प्रकार हम आचरण करते हैं और हम परमेश्वर से संबंध रखते हैं वह न केवल हमें प्रभावित करता है परन्तु यह शायद पीढ़ी दर पीढी़ को प्रभावित करता है। यह एक बहुत ही महत्वपणरू्ा और उल्लेखानीय जिसे हमें मन में रखने की आवश्यकता है। हम कुछ हद तक परवर्ती या उत्तरवर्ती पीढियों की आशीष या पीड़ा के लिए जवाबदेह हंै।
मैं सोचता हूँ कि यह अनुभव का एक प्रकट तथ्य है। उदाहरण के लिये, जैसा वे कहते हैं, शराबी माा पिता को उत्पन्न होने वाला बच्चा अपने विरुद्ध दो आधात के साथ प्रारभ्ंा करता है। यह उसकी गलती नहीं है परन्तु उन माता पिताआें पर परमेश्वर का न्याय स्वाभाविक रूप से आने वाली पीढ़ियों पर आयेगी।
अब, हमें वह कहने की जरूरत है, लेकिन हमें यह जोड़ने की आवश्यकता है कि यह भिन्न प्रकार का न्याय भी है जिसे इब्रानियों का लेखक अनंत काल का न्याय कहता है, जो ऐसा न्याय है जो अनंतता में हमारी मंजिल तय करता है। और वहाँ न्याय के सिद्धांत पूरी तरह से अलग हैं। यह यहेजकेल 18ः1-4 में परमेश्वर द्वारा कहा गया है। वह कहता हैः
‘‘फिर यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा, तुम लोग जो इस्राएल के देशा के विषय में यह कहावत कहते हो, कि जंगली अंगूर तो पुरखा लोग खात,े परन्तु दांत खट्टे होते हैं लड़केबालों के। इसका क्या अर्थ है?’’
आप देखें, यह ऐसा कहने के बराबर है कि पिता के पाप के लिये बच्चे दुख उठा रहे हैं। ‘‘प्रभु यहोवा यों कहता है कि मेरे जीवन की शपथ, तुम को इस्राएल में फिर यह कहावत कहने का अवसर न मिलेगा। देखो, सभों के प्राण तो मेरे हैं, जैसा पिता का प्राण, वैसा ही पुत्र का भी प्राण है, दोनों मेरे ही हैं। इसलिये जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा।’’
अब, हम ऐतिहासिक न्याय के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, हम प्रत्येक प्राण के न्याय की बात कर रहे हैं जबकि यह समय से बाहर अनंतता में कदम रखता है। और वहाँ प्रत्येक प्राण उस जीवन के लिये ही उत्तरदायी है जो उसने जिया है। जो प्राण पाप करता है वह मरेगा।
और पद 20 में पुनः यह दुहराया गया है। यहाँ परमेश्वर अब भी अधिक करुणामय है। यहेजकेल 18ः20ः
जो प्राणी पाप करे वही मरेगा, न तो पुत्र पिता के अधर्म का भार उठाएगा और न पिता पुत्र का, धर्मी को अपने ही धर्म का फल, और दुष्ट को अपनी ही दुष्टता का फल मिलेगा। तो जब हम समय से बाहर अनंतता में निकलते हैं तो अपने माता पिताआें, अपने पूर्वजों, के पापों
या आशीषों के लिये हमारा न्याय नहीं किया जता है, हम परमेश्वर केवल इसी बात का लेखा देने जो रहे हैं कि हमने इस जीवन में क्या किया है। धर्मी की धार्मि कता उसी पर रहेगी, दुष्ट की दुष्टता उसी पर रहेगी। और सभोपदेशाक की पुस्तक में वचन कहता है कि ‘‘वृक्ष गिरता है वहीं वह पड़ा रहता है।’’ अनंतता में आपकी स्थिति का निर्णय यह बात करेगी कि मृत्यु के समय आप किस स्थिति में हैं। यह अनंत न्याय है, एक बहुत ही गंभीर विचार।
मैं ने कभी कभी मनोरजं न के साथ अपनी नींव श्रृंखला को याद किया है जो मूल रूप से सातं, अलग-अलग, छोटी वॉल्यूमा के रूप में बाहर आया था। तब यह एक साथ तीन खंडों में लाया गया था, फिर यह एक साथ एक वॉल्यमू में लाया गया। लेकिन उन दिनों में जब हमारे पास सात खंड थे तो अंतिम खंड का शीर्ष क अनन्त न्याय था। हमें इन पुस्तकों को देखते कि ये लोगों के खरीदने के लिए प्रदर्शि त की गई हैं और लोग किसी प्रकार छः पुस्तकें तो खरीद लेते परन्तु वे सातवीं पुस्तक खरीदना नहीं चाहते थे। वे सातवाँ शीर्षक अनंत न्याय खरीदना नहीं चाहते थे। परन्तु पि्रय मित्र, आपको वह पसंद हो या न हो, यह सच है। उन्हें सच में अनंत न्याय की इस सच्चाई का सामना करना है।
अब मैं रोमियों दूसरे अध्याय में वर्णि त परमेश्वर के न्याय के सभी पाँच सद्धांतों पर बात करना चाहता हूँ। रोमियों दूसरा अध्याय परमेश्वर के न्याय के पाँच सिद्धांतों का भेद प्रगट करती है। अब मैं नया नियम पढ़ता हूँ, सबसे पहले यूनानी, नया नियम में, और फिर अलग अलग अनुवाद। मैं एनआईवी सराहना करता हूँ, इसमें बहुत कुछ अच्छा है। लेकिन कभी कभी यह मूल संरचना से दूर चला जाता है और यदि आप मेरी बात सुनें और आपके पास एनआईवी हैं तो आप को वही परिणाम प्राप्त नहीं होगा जो न्यू किंग जेम्स पढ़ने से मिलेगा। मैं नहीं कहता हूँ कि एक दूसरे से बेहतर है। मैं कह रहा हूँ प्रत्येक में सही और गलत दोनों अनुवाद पाया जाता है। कोई भी पूरी तरह सही अनुवाद नहीं है। किसी ने कहा है कि ‘‘एनआईवी मूल रचना के काफी निकट है।’’ मुझे नहीं मालूम कि आपने यह सुना है!
तो यहाँ परमेश्वर के न्याय के पाँच सिद्धांत हैं, सब कुछ रोमियों 2 में प्रगट है। रोमियों 2ः2ः ‘‘और हम जानते हैं, कि ऐसे, ऐसे काम करनेवालों पर परमेश्वर की आेर से ठीक ठीक दंड की आज्ञा होती है।’’
यही पहला सिद्धांत है। परमेश्वर का न्याय वास्तविक तथ्यों पर आधारित होता है, यह अफवाह पर आधारित नहीं होता है। मुझे याद है जब परमेश्वर सदोम और अमोरा की हालत के बारे में सच्चाई का पता लगाना चाहता था, उसने स्वर्गदतूों से और दूसरों से भयानक विवरणों को सुना था, परन्तु आपको याद है, कि उसने अब्राहम से क्या कहा, ‘‘अबाहम, मैं देखने के लिये स्वयं उतर आया हूँ।’’ यह वास्तव में मुझे प्रभावित करता है। परमेश्वर सच्चाई के अनुसार न्याय करता है, अफवाह से न्याय नहीं करता। पद 6 में परमेश्वर के न्याय का दूसरा सिद्धांत हैः
वह हरेक को उसके कामों के अनुसार बदला दगेा।
हमने जो कुछा किया है उसके लिए हमारा न्याय किया जाएगा। यही एक बुनियादी सिद्धांत है जिसपर बाइबल चलता है। और यह विश्वासियों के साथ साथ अविश्वासियों पर भी लागू होता है। 1 पतरस 1ः17, 1 पतरस 1ः17 में, इसे विशेषकर विश्वासियों पर लागू करते हुए पतरस इस सिद्धांत को बताता है। 1 पतरस 1ः17। वह विश्वासियों से बात कर रहा है, और वह कहता हैंः
‘‘और जब कि तुम, हे पिता, कह कर उस से प्रार्थ ना करते हो, जो बिना पक्षपात हर एक के काम के अनुसार न्याय करता है, तो अपने परदेशी होने का समय भय से बिताओ।’’ यह ऐसा कथन है जिसे सार्वजनिक रूप से आज कलीसियाआें में प्रचारित नहीं किया जाता है।
लेकिन इसे मन में रखते हुए पतरस विश्वासियों से कहता है कि जो कुछ आपने किया है उसके अनुसार आपका न्याय किया जायेगा, एक आदरपणरू्ा धर्मी जीवन बिताओ। अविवेकी मत बनो, घमंडी मत हो, अभिमानी मत बनो-क्योंकि जो कुछ आप कहते हैं और करते हैं, एक दिन आप परमेश्वर को जवाब देने
जा रहे हैं। और याद रखिये, यह अविश्वासियों से नहीं, विश्वासियों को संबोधित किया है। और फिर प्रकाशितवाक्य 20ः12 में वचन कहता है कि अंतिम न्याय में जिनका न्याय किया गया है उन सभी लोगों का न्याय पुस्तक में लिखी बातों के अनुसार होगा। तो, परमेश्वर हर जीवन का एक रिकॉर्ड रखता है।
अब, आप जानते है, नए नियम के दिनों में, किताबें इस तरह से नहीं होती थीं, लेकिन वे बहुधा टेप की तरह होते थे। वे घुमावदार स्क्रॉल हुआ करते थे। मुझे लगता है कि यह और अधिक स्पष्ट तस्वीर है। मैं यह सोचने के इच्छुक हैं कि न्याय में -यह एक राय मात्र है - हम में से हरेक का सामा वीडियो टेप जैसी किसी बात से होगा जो हमारे हमारे सामने संपूर्ण जीवन का चित्र खींच कर देता है। मुझे याद है जब मैं चार साल पहले बहुत बीमार था और परमेश्वर मेरे जीवन में काम कर रह था। मैं सच में परमेश्वर से पूछ रहा था कि मैं चंगा क्यों नहीं हो रहा हूँ। एक रात दो बजे परमेश्वर ने मुझे जगाया और यह वही समय था जब वह मुझसे अकसर बात करता था और उसने मेरे जीवन की एक झलक दिखाई जो मैं जी रहा था। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं एक प्रचारक था, जिसे आम तौर पर स्वीकार किया जाता है। मैं उन बहुत से प्रचारकों के समान ही था जो अपेक्षाकृत रूप से जाने माने थे। परमेश्वर ने मुझे दिखाया कि कई मायनों में मैं बेहद सांसारिक था। मैं बहुत बड़े पाप नहीं कर रहा था, मैं कभी भी व्यभिचार, मादकता या धन की हेराफेरी में, लिप्त नहीं रहा था, परमेश्वर का धन्यवाद हो। फिर भी, परमेश्वर ने मुझे दिखाया कि मेरे अतीत में ऐसी बातें थी जिनसे वह अप्रसन्न था। वह मेरे पास मलाकी में से अपना वचन लायाः
‘‘याकूब से मैंने प्रेम किया और एसाव से मैं ने बैर रखा।’’
यही परमेश्वर कहता है। और एसाव सांसारिक आदमी का एक प्रकार है। एसाव की कोई बडे़ पाप का वर्णन नहीे है लेकिन वह सिर्फ एक सांसारिक सोच वाला आदमी था। परमेश्वर ने कहा, ‘‘मैं उस बात से घृणा करता हूँ।’’
परमेश्वर ने मुझे दिखाया, और मुझे सेवा में लगभग पचास साल हो गए थे, मेरे जीवन में एसेी बातंे थी जिनसे उसे घृणा है। उसने मुझे दिखाया कि मैं कुछ बातों में लापरवाह हो गया। कुछेक दृश्य जो उसने मुझे दिखाये वे रेस तरां में थे। मुझे नहीं मालूम कि आप आपको एहसास है कि नहीं कि परमेश्वर रेस्तरां में भी आपका न्याय करता है। किसी ने कहा, ‘‘आप सभी अमेरिकी केवल भोजन के बारे में बात कर सकते हैं।’’ एक अन्य व्यक्ति ने कहा, ‘‘यदि आप पता लगाना चाहते हैं कि सबसे अच्छा रेस तरां कहाँ हैं तो एक एक उपदेशक से पूछिये।’’ अब, इसमें कुछ सच्चाई है, यह पूरी तरह सच नहीं है। मैं केवल मेरे अपने अनुभव से बोल रहा हूँ। मैंने समझना प्रारंभ किया कि यहाँ का हमारा समय भय से बिताने का क्या अर्थ है। दासपन का भय नहीं, परन्तु परमेश्वर के सामने आदर जो हमारी हर बात का न्याय करेगा जो हम कहते हैं और करते हैं। तो यह 1 पतरस का शब्द है।
रोमियों अध्याय 2 पर वापस आते हुए, पद 3 में परमेश्वर के न्याय का अगला सिद्धांत कहा गया है?। क्या मैंने पद 3 कहा? नहीं, मैं ने नहीं कहा। क्योंकि बात यह है कि उस तरह से इसका अनुवाद नहीं हुआ है जैसा मैं चाहता हूँ। हाँ, यह रामियों 2ः11 है। मैं संक्षेप में बताऊँगा कि मेरा क्या मतलब है, एक तरह से क्या संक्षेप में। वचन कहता हैः
‘‘परमेश्वर किसी का पक्ष नहीं करता है.....’’
अब सभी आधुनिक अनुवाद यह कहते हैं क्योंकि यह एक आधुनिक मुहावरा है। मैं कभी कभी सवाल
करता हूँः क्या आप सच में आधुनिक सोच के बिना आधुनिक अंग्रेजी में बाइबल अनुवाद कर सकते हैं? क्योंकि जिस भाषा का आप उपयोग करते हैं, वह बहुत कुछ आपके सोचने के तरीके की अभिव्यक्ति होती है। आप देखें, पुराने किंग जेम्स अनुवाद में कहता है, ‘‘व्यक्तियों का कोई सम्मान नहीं है।’’ यह बहुत अिधाक सटीक है क्योंकि पक्षपात किसी भी व्यक्ति से हो सकता है। आप किसी कमजोर, तुच्छ सा व्यक्ति ले सकते हैं और उसके प्रति पक्षपात दिखा सकते हैं। बहुत कमजोर, मैं वास्तव में उन्हें मदद करना चाहता हूँ, मैं वास्तव में उनके लिए सब कुछ करना चाहता हूँ। लेकिन व्यक्तियों के आदर का अर्थ होता है उनके स्वाभाविक व्यक्तित्व से प्रभावित न होना। एक आदमी एक जनरल, एक अध्यक्ष, एक बिशप हो सकता है, लेकिन वह परमेश्वर से कोई विशेष न्याय नहीं पाता है, वह बाकी सब की तरह व्यवहार पाता है। यहाँ व्यक्तियों के सम्मान न करने का यही अर्थ है- विशेष रूप से उन लोगों के बारे में जो आज दुनिया में शोहरत के पदों पर कब्जा किये हुए हैं।
ठीक है। परमेश्वर के न्याय का अगला, चौथा सिद्धांत, प्रकाश के माप के अनुसार है। और पौलुस रोमियों 2ः12 में कहता हैः
‘‘इसलिये कि जिन्हों ने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे, और जिन्हों ने व्यवस्था पाकर पाप किया, उन का दंड व्यवस्था के अनुसार होगा।’’ यदि आप के पास व्यवस्था है, तो उसके अनुसार आपका न्याय होगा। यदि आपके पास व्यवस्था
नहीं है तो व्यवस्था के अनुसार आपका न्याय नहीं होगा परन्तु फिर भी जो कुछ आपने किया है उसके लिये आपका न्याय किया जायेगा।
और मत्ती 11 में यीशु के वचनों द्वारा इस सिद्धांत का वर्णन किया गया है जब वह अपने समय के कुछ प्रमुख शहरों के बारे में बताता है जिन्होंने उसके उपदेश पर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। मत्ती 11ः20-24ः
‘‘तब वह उन नगरों को उलाहना दनेे लगा, जिन में उस ने बहुतेरे सामर्थ के काम किये थे, क्योंकि उन्हों ने अपना मन नहीं फिराया था। हाय, खुराजीन, हाय, बैतसैदा, जो सामर्थ के काम तुम में किए गये, यदि वे सूर और सैदा में किए जात,े तो टाट ओढ़कर, और राख में बैठकर, वे कब से मन फिरा लेते। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ, कि न्याय के दिन तुम्हारी दशा से सूर और सैदा की दशा अधिक सहने योग्य होगी।’’
क्यों? सूर और सैदा को कम प्रकाश प्राप्त था। बैतसैदा और खुराजी़न को सबसे बड़ा प्रकाश मिला था और उनका न्याय सबसे अधिक गंभीर रूप से किया जाएगा। मेरा और आपका न्याय हमें उपलब्ध प्रकाश के अनुसार न्याय किया जाएगा।
मैं आमतौर पर अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया के लोगों से कहना चाहता हूँ, इतिहास में पिछली किसी भी पीघी की तुलना में आज हमारे पास अधिक प्रकाश उपलब्ध है। हमारे पास कई सारे बाईबल है, हमारे पास अंतहीन किताबें हैं, हमारे पास टेप है, हमारे पास कैसेट हैं, हमारे पास प्रचारकगण हैं, हमारा न्याय उस प्रकाश् के अनुसार होगा जो हमें उपलब्ध कराया गया है। आइ्रये, इस बात को जान लें। इसयुग के लिये परमेश्वर का न्याय सबसे गंभीर होगा क्योंकि हमें सबसे अधिक प्रकाश मिला है।
और तब यीशु अगले पद में आता हैः
‘‘और हे कफरनहूम, क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा किया जायेगा? तू तो अधोलोक तक नीचे जाएगा, जो सामर्थ के काम तुझ में किए गये है, यदि सदोम में किए जाते, तो वह आज तक बना रहता। पर मैं तुम से कहता हूं, कि न्याय के दिन तरेी दशा से सदोम के देश की दशा अिधाक सहने योग्य होगी।’’
आप देखों, न्याय प्रकाश के अनुसार किया जाता है। हमारे पास जितना अधिक प्रकाश होगा उतना ही कठोर हमारा न्याय किया जाएगा। जैसा कि मैंने पहले कहा, मैं स्वयं से और आप सबसे भी कहा कि मसीहियों की एसेी पीढी़ कभी नहीं हुई जिन्हे इतना प्रकाश प्राप्त था जितना आज हमें प्राप्त है। इस बात को जान लें यह हमारे न्याय का मानक होने जा रहा है।
और अंततः रोमियों 2ः16 में परमेश्वर के न्याय का पाँचवाँ सिद्धांत, वचन कहता हैः
जिस दिन परमेश्वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्त बातों का न्याय करेगा।
तो परमेश्वर केवल हमारे खुले कृत्यों का न्याय करने ही नहीं जा रहा है, लेकिन वह हमारी गुप्त अंतरतम विचारों और इरादों और व्यवहार का भी न्याय करने जा रहा है। मैं सोचता हूँ कि यह कहना सही होगा कि परमेश्वर हमारे इरादों के बारे में अधिक गंभीर है। दो लोग एक ही काम कर सकते हैं लेकिन उनकी मंशा पूरी तरह से अलग हो सकती है। और जब परमेश्वर उनका न्याय करता है तो परमेश्वर उनके इरादों का भी हिसाब लेगा।
हम न्याय के न्याय के दृश्य पर आगे जा रहे हैं। और जैसा कि मैं समझता हूँ इसके आगे चार बड़ेन्याय के दृष्य हैं। पहला मसीह के न्याय आसन के सामने होगा।यूनानी शब्द बेमा का अर्थ वह आसन है जिसे रोमी अधिकारी न्याय करने के लिये बैठा करता था। जब यीशु को पुंतियुस पीलातुस को न्याय के लिये लाया गया तो वह अपने बेमा आसन पर बैठा। यह केवल मसीहियों, केवल विश्वासियों का न्याय होगा। हम पुनः 1 पतरस 1ः17 पर जायेंगे। मैं महसूस करता हूँ कि परमेश्वर चाहता है कि मैं यह पद दोबार पढ़ूँ। 1 पमरस 1ः17
‘‘और जब कि तुम, हे पिता, कह कर उस से प्रार्थ ना करते हो, जो बिना पक्षपात हर एक के काम के अनुसार न्याय करता है, तो अपने परदेशी होने का समय भय से बिताओ।’’
यह हमारे लिये लिखा गया है। हम पिता को पुकारते हैं। और तब 1 पतरस 4ः17 में वचन कहता हैः
‘‘क्योंकि वह समय आ पहुंचा है, कि पहिले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए और जब कि
न्याय का आरम्भ हम ही से होगा तो उन का क्या अन्त होगा जो परमेश्वर के सुसमाचार को नहीं मानते? न्याय कहाँ से प्रारंभ होता है? हमेशा परमेश्वर के घर से। हमेशा उन लोगों से जिनके पास सर्वािधाक सत्य होता है। और इस प्रकार, जब न्याय प्रारभ्ंा होता है, तो सबसे पहले जिनका न्याय होगा वे मसीही होंगे। उनको विशेष न्याय होगा। रोमियों 14ः10-12 में वचन यह कहता हैः
‘‘तू अपने भाई पर क्यों दोष लगाता है? या तू फिर क्यों अपने भाई को तुच्छ जानता है? हम सब के सब परमेश्वर के न्याय सिंहासन के साम्हने खड़े होंगे। क्योंकि लिखा है, कि प्रभु कहता है, मेरे जीवन की सौगन्ध कि हर ,क घुटना मेरे साम्हने टिकेगा, और हर एक जीभ परमेश्वर को अंगीकार करेगा। सो
हम में से हर एक परमेश्वर को अपना अपना लेखा दगेा।’’
और याद रखें, आपको केवल एक ही का हिसाब दनेा है, और वह आप हैं। आपको मेरा या पास्टर का हिसाब नहीं देना है, और जबकि आपको स्वयं का न्याय करना है, आप दूसरों का न्याय करने में काफी समय बर्बाद करते हैं। आपको केवल अपना ही हिसाब देना है। और आप यही करने जा रहे हैं।
तो पौलुस कहता है कि हममें से प्रत्येक परमेश्वर को अपना हिसाब दगेा। अर्थात हम सब मसीही। औ तब 2 कुरिन्थियों 5 में वह इसी विषय पर वापस आता है। 2 कुरिन्थियों 5ः10ः ‘‘क्योंकि अवश्य है, कि हम सब का हाल मसीह के न्याय आसन के साम्हने खुल जाए, कि हर एक व्यक्ति अपने अपने भले बुरे कामों का बदला जो उस ने देह के द्वारा किए हों पाए।’’ वचन कहता है, हम सब प्रकट हांेगे। लेकिन यूनानी कहते है कि अवश्य है कि हम सब प्रकट किये जायें। कोई रहस्य नहीं होगा। सब कुछ पूरी तरह से उजागर किया जाएगा, कुछ भी छिपाया नहीं जाएगा। और, हम जिस तरह से हमने शरीर में जिया उस के अनुसार प्रतिफल प्राप्त करने के लिए हम मसीह के न्याय आसन के सामने होंगे। और मैं ने पहले से ही इस श्रृंखला में बताया, लेकिन मैं इसे फिर से कहता हूँ, केवल दो ही श्रेणियाँ हैं, अच्छा या बुरा। बीच में कुछ भी नहीं। जो कुछ भी अच्छा नहीं है वह बुरा है। यीशु ने बहुत स्पष्ट रीति से कहा, ‘‘जो मेरे साथ नहीं है मेरे खिलाफ है।’’ इसमें कोई तटस्थता नहीं है। यीशु ने तटस्थता को बाहर कर दिया है।’’
आज कलीसियाओं में एसेे बहुत से लोग हैं जो बाड़ पर बैठे हैं। क्या आपको पता है कि बाड़ पर बैठने का मतलब क्या है? प्रतिबद्धता बनाने के लिए अनिच्छुक होना। वे एक पक्ष में नहीं हैं, वे दूसरी ओर भी नहीं हैं। वे अच्छा नहीं कर रहे हैं लेकिन वे स्वीकार नहीं करते कि वे बुरा कर रहे हैं। मैं कभी कभी यह टिप्पणी करता हूँ कि जब पवित्र आत्मा एक कलीसिया में आता है तो एक काम जो वह करता है वह है बाड़ का वैद्युतीकरण करना! आप को एक पक्ष या दूसरे पक्ष से कूदना पड़ेगा। यही कारण है कि बहुत पवित्र आत्मा का स्वागत नहीं करते क्योंकि क्योंकि वह उनकी तटस्थता समाप्त कर देता है। पवित्र आत्मा के साथ र्कोइ तटस्थता नहीं है।
अब, हमें क्या कहना है कि इस न्याय की पाँच मुख्य विशेषताएँ हैं। मैं बस बहुत ही संक्षेप में इस पर जाऊँगा।
यह व्यक्तिगत है, प्रत्येक को अपना अपना हिसाब दनेा होगा।
यह शरीर में किये गये कामों के लिये है।
केवल दो श्रेणियाँ हैं, अच्छा या बुरा। 1 यूहन्ना 5ः17 कहता हैः
सब अधर्म पाप है।
जो कुछ भी धर्मी नहीं है वह पाप है। आप देखें, यह तीसरी श्रेणी लोगों की सोच में फिसल गया है और यह र्कइ यों को धोखा देता है। कोई तटस्थता नहीं है।
अगला सिद्धांत यह है कि यह दोषी ठहराने के लिये नहीे है, यह बहुत बहुत महत्वपूर्ण है। हमारा न्याय होने वाला है, लेकिन अगर हम यीशु में सच्चे, ईमानदार विश्वासी हैं तो हम दोषी नहीं ठहराये जाने वाले हैं। न्याय के सिद्धांत के लिए सेवा के आकलन के लिये है।
मुझे आपको बाइबल के तीन पद बताने दीजिये जो शायद आपको इस बिंदु पर सांत्वना दे। मुझे
दिख रहा है कि आप में से कुछ लोग थोड़ा चिंतित दिख रहे है - जो कि बुरा नहीं है, मुझ पर विश्वास कीजिये। यूहन्ना 3ः18, यीशु कहता हैः
‘‘जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहरा चुका,...’’
तो अगर हम वास्तव में यीशु में विश्वासी हैं तो हमारा न्याय किया जाएगा लेकिन हम दोषी नहीं ठहराये जायेंगे।
और तब फिर से यूहन्ना 5ः24 में कहता हैः
‘‘मैं तुमसे सच सच कहता हूँ,....‘‘
और सबसे अधिक जोरदार तरीका है जिसमें यीशु खुद को व्यक्त कर सकता है।
‘‘मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजनेवाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दडं की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।’’
और अंत में, रोमियों 8ः1ः
‘‘सो अब जो मसीह यीशु में हैं उन पर दंड की आज्ञा नहीं...।’’
तो हम दोषी ठहराने वाले न्याय के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, हम न्याय के बारे में बात कर रहे हैं, जो आपकी उस सेवा का मूल्यांकन करेगी जो आपने अपने जीवन के दौरान यीशु को दी है। इसका सबसे अधिक स्पष्ट वर्णन 1 कुरिन्थियों 3ः11 और आगे की गई और वह कहता हैः
‘‘क्योंकि उस नेव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है र्कोइ दूसरी नेव नहीं डाल सकता। और यदि कोई इस नेव पर सोना या चान्दी या बहुमोल पत्थर या काठ या घास या फूस का रद्दा रखता है। तो हर एक का काम प्रगट हो जायेगा, क्योंकि वह दिन उसे बताएगा, इसलिये कि आग के साथ प्रगट होगाः और वह आग हर एक का काम परखगी कि कैसा है? जिस का काम उस पर बना हुआ स्थिर रहेगा, वह मजदूरी पाएगा। और यदि किसी का काम जल जाएगा, तो हानि उठाएगा, पर वह आप बच जाएगा परन्तु जलते जलते।’’
और एन. आई. वी कहता है, ‘‘आग की लपटों से बचने की तरह।’’ तो मसीहियो के न्याय का यह सार है। सबसे पहले, हमें यीशु मसीह की नींव पर बनाया जाना है, कोई अन्य नींव नहीं है। तब हमें निधरा्ा रित करना है कि हमने जो सेवा की है उसका मूल्य क्या है। और जो चीजें प्राप्त करना आसान हैं बड़ी मात्रा की पेशाकश की जा सकती हैः लकड़ी, सूखी घास और खूंटी। लेि कन वे सब जल जायेंगी। मूल्यवान चीजे बड़ी मात्रा में प्राप्त नहीं किया जाताः सोना, चांदी, बहुमूल्य पत्थर। देखें, कुछ लोग सिर्फ अपनी सेवा की मात्रा का आकलन करते हैं लेकिन परमेश्वर इस तरह से मूल्यांकन नहीं करता है।
मैं अपने आप को लगातार जांचता हूँ। मैं क्या उत्पादन कर रहा हूँ? यह सिर्फ लकड़ी, सूखी घास, खूंटी हिै जो कि जला दिया जाएगा? कैसी त्रासदी है जब आपने किसी बात के लिये सारी जिंदगी काम किया, आपने खूब परिश्रम किया, और न्याय के दिन आप देखते हैं कि आग सब कुछ जलाकर खाक कर देता है। कुछ नहीं बचा है, लेि कन आप एक नग्न आत्मा हैं जो आग की लपटों में से होकर निकलने वाले
के समान है। कैसी गंभीर सोच।
अब मैं आपको कुछ सलाह देना चाहता हूँ कि कैसे हम यकीन कर सकते हैं, कि हमारी सेवा आग की कसौटी पर खरी उतरगेी। मंै आपको तान मार्गों का सुझाव देना चाहता हूँ जिससे आप अपनीे स्वयं की सेवा का आकलन कर सकते हैं।
सब से पहले, आपका मकसद क्या है? एकमात्र उद्देश्य जो परमेश्वर को स्वीकार्य है, वह परमेश्वर की महिमा के लिए है। और आज कलीसिया में जो कुछ किया जाता है उसमें से काफी कुछ मनुष्यों के द्वारा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिये की जाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से कहता हूँ कि और यह बस एक व्यक्तिगत टिप्पणी है, मैं सोचता हूँ आज कलीसिया में सबसे बड़ी समस्या सेवकों में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है। सबसे बड़ा चर्च, पतों की सबसे लंबी सूची, बड़े बड़े आश्चर्यकर्म। इन सभी को जला दिया जाएगा क्योंकि उसका मकसद गलत है। 1 कुरिन्थियों 10ः31, पौलुस कहता हैः
‘‘सो तुम चाहे खाआे, चाहे पीआे, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महीमा के लिये करो।’’
हमारी सेवा का केवल एक ही स्वीकार्य उद्देश्य है और वह परमेश्वर की महिमा है।
मैं महसूस करता हूँ कि परमेश व चाहता है कि मैं यहाँ ठहरूँ, केवल आपको यह विचार करने का अवसर दनेा चाहता हूँ कि उसके लिये आपकी सेवा में, उसके लिये आपकी सवा में आपको कौन सी बात प्रेरित करती रही है। आप देखों, रोमियों 12ः1 में पौलुस कहता है कि हमे अपने मनों में नया बनना है। मैं सोचता हूँ कि नया हो चुके मन और नया न होने वाले मन में यह अंतर होता है, नया न होने वाला मन उेसी स्थिति में आता है और कहता है, ‘‘इसमें मेरे लिये क्या है?’’नया हो चुका मन कहता है, ‘‘परमेश्वर को कहाँ महिमा मिलेगी?’’ यह प्रेरणा में पूर्ण परिवर्तन है।
मुझे लगता है, यह विवाह में बहुत ज्यादा लागू होता है। मैं सोचता हूँ कि कई शादियों इसलिये दुखी हैं, क्योंकि लोग एक नया न होने वाले मन के साथ उसे देखते हैं। प्रत्येक का रवैया यह होता है, ‘‘मुझे इससे क्या मिलेगा?’’ क्या यह मुझे खुश करेगा? यह एक अप्रसन्न विवाह का निश्चित नुस्खा है। सही मकसद है, मैं क्या दे सकता हूँ, न कि मुझे क्या मिल सकता है? और जब दो लोग एक दूसरे को देने के उद्देश्य के साथ एक साथ मिलते है तो वे एक प्रसन्न और सफल विवाह निभाते हैं। यह पूरा मुद्दा वास्तव में प्ररे णा का है जो कि बहुत महत्वपूर्ण है।
दूसरा, यदि आपका काम आग की कसौटी पर खरा उतरना है तो उसे परमेश्वर के वचन के प्रति आज्ञाकारिता में किया जाना चाहिए। केवल यही स्वीकार्य आधार है। मत्ती 7 में यीशु ने दो विभिन्न व्यक्तियों के बारे में बात की थी, एक जिसने रेत पर घर बनाया, और दूसरा जिसने चट्टान पर बनाया। अंत में उसने कहा, मत्ती 7, पद 21 से आगे, ये यीशु के शब्द हैंः
‘‘जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर ,क स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करगेा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है।’’
अतः एकमात्र स्वीकार्य उद्देश्य पिता की इच्छा करना है। और तब यीशु आगे कुछ एेसा कहता है जो कुछ लोगों को ठोकर खिलाता है। उसने कहाः
‘‘उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और
तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए?’’ परमेश्वर की कृपा से, मुझे बहुत, बहुत से दुष्टात्माआें को निकालनक का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैं ने बहुत से निश्चित चमत्कारों को होते हुए देखा है। मैं ने बार - बार भविष्यवाणी की है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि स्वग की मेरी आशा का आधार इन में से किसी पर भी नहीं है। और जो कोई यह करता है, वह खतरे में है। स्वर्ग के लिए केवल एक अनिवार्य शर्त है। यह पिता की इच्छा को पूरी करना है जो स्वर्ग में है। यीशु, इन चमत्कार करने वालों से कहता है, ‘‘हे कुकर्म करनवेालों, मेरे पास से चले जाआे।’’ क्या आप जानते हैं कि उनमें से र्कइ खुद के लिए नियम हैं। मूलरूप से वे वही करते है जैसी उनकी मर्जी होती है, वह लेते हैं जो कुछ उन्हे मिल सकता है और परमेश्वर महान केंद्रीय सिद्धांतों की अनदेखी करते हैं। मैं उस बारे में बहुत बात कर सकता हूँ, लेकिन यह शायद ही लाभदायक नहीं है।
लेकिन मुझे लगता है कि मैं अभी हाल ही बिलाम के बारे में एक पत्र लिखा है।। मैं बिलाम की कहानी से बहुत प्रभावित था। यहाँ यह चमत्कारी भविष्यवाणी के वरदानों, ज्ञान के वचन और बुद्धि के वचन, वाला व्यक्ति था। मेरा मतलब है, मैंने इस्राएल के भाग्य के विषय में बाइबल में गिनती में बोला गया भविष्यवाणी कहा है। जाता है कि किसी भी रूप में के रूप में सुंदर संख्या में भविष्यवाणी आगे दे दी है। और फिर भी वह इस्राएल के लोगों द्वारा नाश किया और मार डाला गया। क्या आप जानते हैं, उसकी समस्या क्या थी? नया नियम में तीन बार उसका उल्लेख किया गया है और यह बहुत स्पष्ट रूप से कहता है कि बिलाम की प्रेरणा धन का मोह था।़
रूत और मैं एक पद कहना चाहते हैं, जो इस प्रकार हैः
‘‘हम उन लोगों में से नहीं हैं, जो अपने लाभ के लिये परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं।’’ यह एक चैंकाने वाले बयान है, है ना? यह पौलुस के दिनों की बात थी। पौलुस कहता है कि बहुत से लोग सुसमाचार से लाभ कमा रहे हैं। परमेश्वर खोजता है कि हमारी मंशा क्या है।
और तीसरी आवश्यकता वह सामथ्र्य है जिसमें हमें संचालित होते हैं। रोमियों 15ः18-19 में पौलुस कहता हैः
‘‘क्योंकि उन बातों को छोड़ मुझे और किसी बात के विषय में कहने का हियाव नहीं, जो मसीह ने अन्यजातियों की अधीनता के लिये वचन, और कर्म । और चिन्हों और अद्भुत कामों की सामर्थ से, और पवित्र आत्मा की सामर्थ से मेरे ही द्वारा कियां’’
पौलुस कहता है कि जो कुछ मैंने किया है, उसमें कुछ भी उल्लेखा के लायक नहीं, सिवाय इसके कि जो कुछ भी पवित्र आत्मा ने मेरे माध्यम से किया है। सेवा के लिये यही एकमात्र स्वीकार्य शक्ति है, यह पवित्र आत्मा की सेवा है।
तो मुझे आपको आग की कसौटी पर खरा उतरने के वे तीन शर्त बताने दीजिये। आपका मकसदः परमेश्वर की महिमा के लिए। क्या आप परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता में एेसा कर रहे हैं या आप अपनी स्वयं की बात कर रहे हैं या अपने स्वयं के नियम बना रहे हैं? और तीसरा, क्या आप पवित्र आत्मा की सामथ्र्य में काम कर रहे है या अपने खुद की कामुक क्षमता में कर रहे हैं?
अब हम न्याय के दो तरीकों, दो दृष्टांतों पर आते हैं, जिससे यीशु ने संबंधित किया। और मेरे लिये यह निर्णय करना कठिन था कि इससे कैसे व्यवहार करूँ, लेकिन मुझे लगता है कि मैं थोड़ा समय लेकर
इसे ड़ने जा रहा हूँ। पहला तोड़ों का दृष्टांत था। तोड़ा को अर्थ एक माप है। यह धन का एक माप था। और इस दृष्टान्त लूका 19 में पाया जाता है। अंग्रजी के पुराने संस्करणों में यह पौंड का दृष्टांत कहलाता है। तोड़ा एक काफी छोटी राशि होती थी। हम लूका 19 अध्याय 11 से आगे पढ़ने जा रहे हैंः
‘‘जब वे ये बातंे सुन रहे थे, तो उस ने एक दृष्टान्त कहा, इसलिये कि वह यरूशलेम के निकट था, और वे समझते थे, कि परमेश्वर का राज्य अभी प्रगट हुआ चाहता है। सो उस ने कहा, एक धनी मनुष्य दूर देश को चला ताकि राजपद पाकर फिर आये।’’
दूसरे शब्दों में, मेरे वापस आने से पहले यह लंबा होने जा रहा है।
‘‘और उस ने अपने दासों में से दस को बुलाकर उन्हें दस मुहरें दीं, और उन से कहा, मेरे लौट आने तक लेन-देन करना।’’
दूसरे शब्दों में, लाभ कमाने,
‘‘परन्तु उसके नगर के रहनेवाले उस से बैर रखते थे, और उसके पीछे दतूों के द्वारा कहला भेजा, कि हम नहीं चाहते, कि यह हम पर राज्य करे। जब वह राजपद पाकर लौट आया, तो ऐसा हुआ कि उस ने अपने दासों को जिन्हें रोकड़ दी थी, अपने पास बुलवाया ताकि मालूम करे कि उन्हों ने लेन-देन से क्या क्या कमाया।’’
और परमेश्वर हम में से प्रत्येक से हिसाब लेने वाला है।
‘‘तब पहिले ने आकर कहा, हे स्वामी तेरे मोहर से दस और मोहरें कमाई हैं। उस ने उस से कहा, धन्य हे उत्तम दास, तुझे धन्य है, तू बहुत ही थोड़े में विश्वासी निकला अब दस नगरों का अधिकार रख।’’
तो इस जीवन में सेवा में हमारी विश्वासयोग्यता इस बात को निर्धारित करगी कि अनंतता में हमारा भाग क्या होगा, परमेश्वर के राज्य में हमारी जिम्ेमदारी क्या होगा।
‘‘दूसरे ने आकर कहा, हे स्वामी तेरी मोहर से पाँच और मोहरें कमाई हैं।’’
परंन्तु उसने धन्य और विश्वासयोग्य दास नहीं कहा। सराहना का एक कमतर स्तर था। ‘‘उस ने कहा, कि तू भी पाँच नगरों पर हाकिम हो जा।
‘‘तीसरे ने आकर कहा, हे स्वामी देख, तरेी मोहर यह है, जिसे मैं ने अंगेछे में बान्ध रखी। क्योंकि मैं तुझ से डरता था, इसलिये कि तू कठोर मनुष्य हैः जो तू ने नहीं रखा उसे उठा लेता है, और जो तू ने नहीं बोया, उसे काटता है। उस ने उस से कहा, हे दुष्ट दास, मैं तेरे ही मुंह से तुझे दोषी ठहराता हूंः तू मुझे जानता था कि कठोर मनुष्य हूं, जो मैं ने नहीं रखा उसे उठा लेता, और जो मैं ने नहीं बोया, उसे काटता हूं। तो तू ने मेरे रूपये कोठी में क्यों नहीं रख दिये, कि मैं आकर ब्याज समेत ले लेता? और जो लोग निकट खड़े थे, उस ने उन से कहा, वह मोहर उस से ले लो, और जिस के पास दस मोहरें हैं उसे दे दो। उन्हों ने उस से कहा, हे स्वामी, उसके पास दस मोहरंे तो हैं।’’
उन्होंने सच में नहीं सोचा कि जिसमे पास दस हैं उसे एक और देना सही रहेगा। तब यीशु आगे कहता हैः
‘‘मैं तुम से कहता हूँ कि जिस के पास है, उसे दिया जाएगा, और जिस के पास नहीं, उस से वह भी जो उसके पास है ले लिया जायेगा।’’
अब इस पर विचार करो, क्योंकि हम में से अधिकांश इस प्रकार नहीं सोचते हैं। परन्तु यह दृष्टांत का अंत नहीं है। अभी एक और वाक्य है....
‘‘परन्तु मेरे उन बैरियों को जो नहीं चाहते थे कि मैं उन पर राज्य करूँ उन को यहाँ लाकर मेरे सामने घात करो।’’
यह न्यायी यीशु है। उद्धारकर्ता यीशु नहीं परन्तु के न्यायी यीशु। याद रखें, वही व्यक्ति जो उद्धारकर्ता है वह न्यायी भी है। बचाने में जिस तरह वह संपूर्ण और कुशल है, उसी तरह वह न्याय करने में भी होगा।
क्या यीशु की आपकी तस्वीर में यह शामिल हैं? या क्या आप उनमें से कुछ हैं, जो कहते हैं, ‘‘अच्छे यीशु, नम्र और दीन।’’? परमेश्वर की स्तुति हो, यह सच है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है, यीशु का एक और पहलू भी है। वह आग की ज्वाला आँखों वाला न्यायी है, और दोधारी तलवार, है जो उसके मुँह से निकलता है, और र्कइ पानी की आवाज जैसी आवाज है, पाँव भट्ठी में कांस्य की तरह है। और जब प्रकाशनकर्ता यूहन्ना ने यीशु की पूरी परिपूर्ण ता में उसे देखा तो वह मृतक के रूप में उनके चरणों में गिर गया। यह मुझे प्रभावित करता है। यूहन्ना, जिसका यीशु के साथ सभी शिष्यों से अधिक करीबी रिश्ता था। अंतिम भोज के समय यूहन्ना ही यीशु की छाती की आेर झुका था, वह उनमें से एक था जब यीशु ने गलील की झील पर स्वयं को प्रगट किया था और उनके लिये भोजन तैयार किया था।
आपको मालमू है? मुझे यह पसंद है। मुझे यह तथ्य पसंद आता है कि यीशु ने उनके लिये भोजन तैयार किया।
लेकिन किसी भी तरह, यहाँ यह यूहन्ना है जिसने यीशु को काफी करीब से जाना है, अब उसका सामना न्यायी यीशु से हाता है, और वह मृतक के सामन यीशु के पैरों पर गिर जाता है। आप जानते हैं, मुझे लगता हूँ कुछ एेसा जो कलीसिया के साथ होना चाहिये। मैं सोचता हूँ कि कलीसिया जो यीशु के साथ एक दोस्ताना संबंध रखे हुए है, उसे यीशु का सामना एक न्यायी के रूप में करने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि यदि हम मृतक के समान उसके पाँवों पर गिर जायें तो इससे हमें कोई नुकसान नहीं होगा। यह कुछ ऐसा होगा जिसे हमें सीखने की जरूरत है।
अब हम इस दृष्टान्त पर टिप्पणी करें। सब से पहले, जिसने सबसे अधिक कमाया उसे एक अतिरिक्त मिला। यह एक सिद्धांत है। एक बार परमेश्वर ने मुझे परमेश्वर ने बहुत ही अजीब तरह से मेरे विश्वास का एक अलौकिक उपहार दिया। मैं असमान पैर वाले लोगों के लिए प्रार्थ ना किया करता था, और उनके पैर बढ़ जाते। अक्षरसः यह सैकड़ों लोगों के साथ हुआ और मैं ने उनसे कहा, ‘‘कैसे परमेश्वर ने उन्हें छुआ था। उसकी अलौकिक शक्ति आपके शरीर में काम कर रही है, अपने आप की मदद कीजिये।’’ मैंने बहुत से लोगों को अलौकिक रूप से चंगा होते हुए देखाा।
परन्तु मेरे अच्छे मित्रों, मेरे साथी सेवकों ने कहा, ‘‘डेरेक, आप जानते हैं, एक सम्मानिक बाइबल शिक्षक के रूप में आपकी काफी इज्जत है। यदि आप लोगों के पैर पकड़ते और उनके पैरों को लबंा करते घूमेंगे तो ,यह आपके सम्मान के साथ नहीं जँचता है।’’ तो मैंने सोचा कि शायद आप सच कह रहे हैं। मैं प्रभु के पास गया और मैं सोचता हूँ कि उसने यह कहा। उसने कहा, मैंने तुम्हे्रं एक उपहार दिया है’’
और अचानक मैं ने जाना कि वह एक वरदान था, विश्वास का वरदान। ‘‘दो बातंे हैं जिन्हें आप कर सकते हैं। आप उसका उपयोगा कर और पा सकते हैं या उसका उपयोग न कर उसे गवाँ सकते हैं।’’ मैं ने इस बात पर अपना मन पक्का कर लिया कि मैं इसका उपयोग करूँगा और अधिक पाऊँगा। और मैं परमेश्वर की महिमा के लिये कहता हूँ, मुझे अधिक मिलता है। परन्तु याद रखें। आपके पास चाहे कुछ भी वरदान हों, दो बात हैं जिन्हें आप कर सकते हैं। आप उसका उपयोग कर और पा सकते या उसका उपयोग न करके उसे गवाँ सकते हैं।
और तब मन में जान लें, जैसे कि मैं सोचता हूँ कि मैं ने पहले से ही कह दिया है, इस संसार में आपकी सेवा आपकी स्थिति निर्धारित करेगी। जिसने दस मुहरें थी उसने दस कमाये थे, उसे दस शहरों पर अधिकार मिला, जिसने पाँच कमाया उसे पाँच शहरों पर अधिकार मिला। और ध्यान दें, यीशु ने यह नहीं कहा, ‘‘हे धन्य और सफल दास।’’ उसने कहा, हे अच्छे और विश्वास योग्य दास।’’ और हम में से कुछ सफलता पर बहुत अधिक जोर देते हैं और विश्वासयोगता पर बहुत कम।
आज जिसे हम विदेशी मिशन क्षेत्र कहते हैं वहाँ परमेश्वर की जबरदस्त काम को देखने के लिये सौभाग्य शाली हैं। थोड़ा सा फूलकर हम कहते, ‘‘क्या यह अद्भुत नहीं है! हजारों लोग मेरे सेमिनार के लिए आते हैं।’’ लेकिन परमेश्वर ने मुझे दिखाया है, ‘‘मत भूलो, तुमसे पहले एक पीढ़ी थी, जिसने बहुत कम फल देखा था परन्तु उन्होंने बहुत परिश्रम किया था और तुम ने उनके परिश्रम में प्रवेशा किया था। और क्या तुम खुद अपने आप को बहुत अधिक एक राय नहीं देते।’’ मैं अग्रदूतों का सम्मान करता हूँ, मैं उन लोगों का सम्मान करता हूँ, जिन्होंने कठिन परिश्रम किया और अपना जीवन बलिदान दिया। ज बपहले मिशनरियों ने पूर्वी अफ्रीका के लिए यात्रा की तब वहाँ कई महीने बिताने से पहले हर पांच में से चार की मौत हो गई। उन्होंने कोई फल नहीं देखाा लेकिन पृथ्वी में लगाए गये बीज थे जो बाद में फल लाते।
र्मैं इ मानदारी से आपसे कहता हूँ, सबसे बड़ी और एकलौता खतरा जिसका मैं और आप सामना करते हैं, वह गर्व है। आप उस व्यक्ति को जानते हैं,-मुझे यह कहानी बताना नहीं चाहिए लेकिन आप कलीसिया में उस व्यक्ति को जानते हैं जिसे विनम्रता के लिए बैज दिया गया था? और फिर उन्होंने उसे पहन लिया क्याोंकि उसने इसे पहना था! तो, मेरे इतना सब कहने के बाद यहाँ से विम्रता के बैज पहनकर मत र्जाइ ये।
अब, एक और बात, यीशु ने उस से कहा जिसने कुछ भी नहीं बनाया था। यीशु ने उससे कहा, ‘‘ठीक है, शायद आप में पैसे बनाने की क्षमता नहीं थी, लेकिन आप इसे बैंक में डाल सकते थे और मैं ब्याज के साथ इसे ले लेता।’’ यह मेरे लिए यह साबित करता है कि हमेशा व्याज पाना गलत नहीं होता है। यह कुछ स्थानों पर गलत हो सकता है परन्तु सब स्थानों पर नहीं।
अब मेरे और आप के लिए इसका क्या अर्थ हो सकता है? हम क्या कर सकते थे? हम कहेंगे, ठीक है , मेरे पास एक बड़ी सेवा नहीं है। मैं एक उपदेशक नहीं हूँ, मैं एक प्रशासक नहीं हूँ, मेरे पास बहुत सी योग्यतायें नहीं हैं। मैं क्या कर सकता हँू?’’ बैंक में डाल दो। वह क्या है? यह मेरी समझ है। एक सेवा लीजिये जो कि वास्तव में फल ला रहा है, उसकी जाँच करें, उसका परीक्षण करें, और फिर उस में निवेश करें। यही बैंक में पैसा लगाना है। जब प्रभु आता है तब आप को अपना ब्याज मिल जायेगा। आमीन।
अब अगले दृष्टांत, तोडों का दृष्टांत देखों, जो कि बहुत ही समान है परन्तु कुछ अंतर है। यह मत्ती 25ः14-30 में है। मत्ती 25ः14 से आगेः
‘‘क्योंकि यह उस मनुष्य की सी दशा है जिस ने परदेश को जाते समय अपने दासों को बुलाकर, अपनी संपत्ति उन को सौंप दी। उस ने एक को पाँच तोडे़, दूसरे को दो, और तीसरे को एक, अर्था त् हर एक को उस की सामर्थ के अनुसार दिया, और तब परदेश चला गया। अब, ध्यान दें, मुहरों के दृष्टांत में हर एक को एक मुहर मिलती हंै, परन्तु तोड़ों के दृष्टांत में एक
कोा पाँच, एक को दो और एक को एक मिला। और उसने उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें वितरित की। मैं चाहता हूँ कि आप समझें कि परमेश्वर यह जानकर ही आप को आपको तोड़े देता है कि उनसे क्या कर सकते हैं क्या जानता है के अनुसार आप प्रतिभा दतेा है कि समझना चाहता हूँ। आप पांच प्रतिभा का उपयोग कर सकते हैं, । यदि आप पाँच तोड़ों का उपयोग कर सकते है। तो वह आपको पाँच देगा। यदि आप केवल दो उपयोग ही कर सकते हैं, तो वह दो ही देगा, और अगर आप एक का ही उपयोग कर सकते हैं तो वह एक ही दगेा। लेकिन यह तो आपकी क्षमता के अनुसार होता है जिसे वह मापता है और दतेा है।
तब वचन कहता हैः
‘‘तब जिस को पांच तोड़े मिले थे, उस ने तुरन्त जाकर उन से लेन देन किया, और पांच तोड़े और कमाये। इसी रीति से जिस को दो मिले थे, उस ने भी दो और कमाये। परन्तु जिस को एक मिला था, उस ने जाकर मिट्टी खोदी, और अपने स्वामी के रूपये छिपा दिए। बहुत दिनों के बाद उन दासों का स्वामी आकर उन से लेखाा लेने लगा। ’’
और भाईयों और बहनों, प्रभु आने वाला है, और मुझसे और आपसे लेखा लेगा।
‘‘जिस को पाँच तोड़े मिले थे, उस ने पाँच तोड़े और लाकर कहा, हे स्वामी, तू ने मुझे पांच तोड़े सौंपे थे, देख मैं ने पांच तोड़े और कमाए हैं। उसके स्वामी ने उससे कहा, धन्य है अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुआें का अधिकारी बनाऊँगा अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।’’
वही सिद्धांत देखों, आप अनंतता में क्या करेंगे वह इस बात पर निर्भर होगा कि आप इस संसार में क्या करते हैं।
‘‘और जिस को दो तोड़े मिले थे, उस ने भी आकर कहा, हे स्वामी तू ने मुझे दो तोड़े सौंपें थे, देख, मैं ने दो तोड़े और कमाये। उसके स्वामी ने उस से कहा, धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुआें का अधिकारी बनाऊँगा। अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।’’
अब यहाँ एक भिन्न सिद्धांत है। एक ने पाँच और कमाये और दूसरे ने दो और कमाये परन्तु दोनों से सराहना के शब्द पूरी तरह समान थे। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर प्रतिशत देखता है। यदि आपको पाँच मिला है तो वह सौ प्रतिशत की अपेक्षा करता है। यह ठीक होगा। यदि आपको दो मिला तो वह सौ प्रतिशत की अपेक्षा करता है, अर्था त दो। वह जानता है कि आप सक्षम हैं तथा वह जानता है कि आप कितना कर सकते हैं और उससे अधिक आपसे नहीं माँगेगा।
अब आगे चलेंः
‘‘तब जिस को एक तोड़ा मिला था, उस ने आकर कहा, हे स्वामी, मैं तुझे जानता था, कि
तू कठोर मनुष्य है, और जहाँ नहीं छीटता वहाँ से बटोरता है। सो मैं डर गया और जाकर तेरा तोड़ा मिट्टी में छिपा दिया, देखा, जो तेरा है, वह यह है। उसके स्वामी ने उसे उत्तर दिया, कि हे दुष्ट और आलसी दास।’’
मुझे आपको बताने दीजिये, कि आलस्य दुष्टता है। हमारी अधिकांश कलीसियायें पियक्कडप़ न को स्वीकार नहीं करगंेी, वे कहगंेे कि तमु को कलीसिया में स्थान हीं मिलेगा। हमारी बहुत सी कलीसियायंे आलसी लागेांे को स्वीकार करती ह।ंै लेि कन मैं साचे ता हँू कि परमेश्वर की नजर में आलस बहुत ही बरुा पाप है। यीशु ने कहाः
‘‘हे दुष्ट और आलसी दास, जब यह तू जानता था, कि जहां मैं ने नहीं बोया वहाँ से काटता हूँ, और जहाँ मैं ने नहीं छीटा वहां से बटोरता हूँ। तो तुझे चाहिए था, कि मेरा रूपया सर्रा फों को दे देता, तब मैं आकर अपना धन ब्याज समेत ले लेता।’’
पुनः वही सिद्धांत। यदि आपको स्वयं धन कमाने की योग्यता नहीं मिली है तो उसे सेवा में निवेश करें जो कि फल लाता है।
‘‘इसलिये वह तोड़ा उस से ले लो, और जिस के पास दस तोड़े हैं, उस को दे दो।’’ ध्यान दें, यह वही है जिसने प्राप्त किया है।
‘‘क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा, परन्तु जिस के पास नहीं है, उस से वह भी जो उसके पास है, ले लिया जायेगा। और इस निकम्मे दास को बाहर के अन्धेरे में डाल दो, जहाँ रोना और दांत पीसना होगा।’’ यह एक ऐसा वाक्य है जो नया नियम में र्कइ बार उपयोग किया गया है, ‘‘जहाँ रोना और दांत
पीसना होगा।’’ जहाँ इसका उपयोग किया गया है वहाँ मैं ने अध्ययन किया है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ, कियह केवल उन लोगों के बारे में उपयोग किया गया है जो वास्तविकता के बहुत करीब रहे हैं। मुझे प्रवेशा करने के लिए हर अवसर मिला है। यह लोग नहीं हैं, जो वहाँ रहे और कभी परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानते थे परन्तु लोग ही हैं जो आजीवन वहाँ रहे और परमेश्वर के बारे में सब कुछ पता था, लेकिन कभी प्रवेश नहीं किया है। वहाँ रोना और दाँत पीसना होगा। वहाँ जबरदस्त कड़वाहट की बात होगी, ‘‘मैं इस में हो सकता था लेि कन मेरे पास हमेशा अवसर रहा, लेकिन मैं ने कभी इसका लाभ नहीं उठाया है। अब मैं हमेशा के लिये बाहर अंधेरे में डाल दिया गया हूँ।’’ भयावह।
मुझे एक और बात कहने दें। जो लोग अस्वीकार कर दिये गये ये वे लोग थे जो उनके प्रति कम से कम प्रतिबद्ध था, एक तोड़ा वाला व्यक्ति था। मुझे लगता है कि चर्च में यह सच है। असल में, जिन लोगों को बहुत कुछ मिला है वे इसके साथ कुछ करेंगे। जिन लोगों को बहुत योग्यता मिली है, वे उसके साथ कुछ करेगे। लेकिन एक तोड़े वाले लोग पीछे बैठते और कहते हैं, ‘‘ठीक है, मेरे पास ज्यादा नहीं हैं, मैं अधिक कुछ नहीं कर सकता हूँ, इसलिये मैं कुछ नहीं करूँगा।’’ वे नकार दिये जायेंगे, वे बाहर निकाल दिये जायेंगो।
मैं आपमें से कुछ लोगों से बात करना चाहता हूँ, मैं आपको पहचानना नहीं चाहता हूँ, परन्तु आप एक तोड़ा वाले व्यक्ति हैं। और आपने अपने दायित्वों को कम करके आँका और कहा, ‘‘मेरे पास अधिक नहीं है, मैं बहुत कुछ नहीं कर सकता हूँ। परमेश्वर मुझसे अधिक कुछ नहीं चाहता है।’’ परमेश्वर चाहता है। वह विश्वासयोग्यता की अपेक्षा करता है, चाहे कम हो या अधिक हो।
मैं ने फोर्ट लौडरडेल में अपनी कलीसिया में इसका प्रचार किया और उन लोगों से प्रतिक्रिया दनेे के लिये कहा, जो महसूस करते थे कि वे एक तोड़े वाले हैं और अपने तोड़े को उपयोग नहीं कर रहे थे। प्रतिक्रिया अचंभित करने वाली थी! लगभग आधी कलीसिया खड़ी थी। बहुत से विश्वासियों में मैं इसे एक बड़ी समस्या के रूप में देखता हूँ। ‘‘मेरे पास केवल एक ही योग्यता है तो मैं उससे क्या करूँगा? मैं कुछ नहीं करूँगा।’’ यीशु इस बात को स्वीकार करेगा। उसने कहा, ‘‘तुम उसे बैंक में रख सकते थे। आपका एक तोड़ा जिसे आप सेवा में निवेश करते तो वह सच में फल लाता ।’’ और तब, वह सारा फल आपके खाते में लिखा जाता।
मेरे और रूत की बड़ी समस्याआें में से एक यह है कि हमें अपनी सेवा के लिये कोई चाहिये। हम महत्वाकांक्षी नही हैं, हम इन्हें लोगों पर लादना नहीं चाहते हैं, परन्तु यदि हमें अपना काम करना है तो एक जिसे परमेश्वर ठहराता है, तो हमारे पास लोग होने हैं जो सेवा करेंगे। केवल सेवा करेंगे। और क्या आप जानते हैं कि आज कलीसिया में देखने में सबसे कठिन है वह सेवा करने के इंच्छुक लोग है। हमारे पास कुछ अद्भुत लोग थे, उनमें से दो या तान से हम यहाँ मिले हैं। वास्तव में, हमारे पास दो या तीन विभिन्न लोगों का समूह हैं जिन्होने विभिन्न समयों में हमारी सेवा की है। उनमें से हरके विश्वासयोग्य रहे हैं। परन्तु हमें लोगों से बहुत सी समस्या रही है जो अपनी स्वयं की सेवा चाहते हैं। वे दूसरी सेवा में निवेश करने में संतुष्ट नहीं होते हैं। और वे सब कुछ खो देते हैं। वे अपनीसेवा नहीं पाते हैं, वे उस निवेश का लाभ भी नहीं पाते हैं जो उन्होंने दसू रे की सेवा में किया है।
प्रिय एक तोड़े वाल,े देखो! आप खतरे में हैं। शायद आप शब्द सुनेंगे, ‘‘निकम्मे दास को बाहर अंिधायारे में डाल दो। वहाँ रोना और दाँतों का पीसना होगा।’’
अब मुझे इन दृष्टान्तों से कुछ सिद्धांतों को लेने दं।े
नंबर एक, इस जीवन में हमारी सेवा अगले जीवन में हमारी स्थिति को निर्धारित करता है। नंबर दो, अपने तोड़े का उपयोग न करना उसे खो देना है।
तीन नबं र, जब आप भलाई कर सकते हैं और नहीं करते हैं तो यह पाप है। याकूब 4ः17 ‘‘इसलिये जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये यह पाप है।’’
हम अकसर करने वाले पाप के बारे में बात करते हैं परन्तु चूक जाने वाले पाप भी उतने ही वास्तविक हैं।
और फिर मैं कुछ समय के लिये मत्ती 5 का विश्लेषण करना चाहता हूँ। तीन प्रकार के लोग हैं
जो पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा अस्वीकार कर दिये गये हैं। मूर्ख कुंवारियाँ जिन्होंने कुप्पियों में तले नहीं भरा है, एक तोड़े वाला सेवक जिसने उससे कुछ नहीं किया, बकरी देशा जिसने यीशु के भाई का कुछ सहायता नहीं किया। औरे सब पूरी और अंत में परमेश्वर द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। एक दिन मैंने स्वयं से कहा, ‘‘उन सबमें कौन सी बात समान थी जिससे वे सभी त्याग दिये गये? उन्हे क्या मिलाा? मेरे पास एक सामान्य उत्तर है। ‘‘उन्होंने कुछ नहीं किया।’’ त्यागे जाने के लिए आपको यही करना है,- कुछ नहीं करना। यह एक गंभीर विचार है।
हम बहुत जल्द अन्य न्याय पर जा रहे हैं। हम मुख्य रूप से विश्वासियों के न्याय पर बात कर रहे थे क्योंकि यही वास्तव में हमसे संबंधित है। यदि हम विश्वासी हैं तो वास्तव में हमें यही जानने की जरूरत
है।
अब मै विश्वास करता हूँ कि अगला न्याय इस्राएल का न्याय होगा, परमेश्वर के द्वारा अलग किये गये लोगा। और यद्यपि वे कई सदियों तक अनाज्ञाकारी और अविश्वस्त रहे हैं, परमेश्वर ने कभी भी उन्हे पूरी तरह त्यागा नहीं है। वचन क्या कहता है?
‘‘अपने बड़े नाम के निमित्त परमेश्वर अपने लोगों को त्यागेगा नहीं क्योंकि परमेश्वर इस्राएल को अपने लोग बनाने से प्रसन्न हुआ है।’’
इस्राएल के लिये परमेश्वर जो भी करता है, वह इस्राएल के कारण नही है परन्तु यह परमेश्व्र के नाम के कारण है, कि उसके नाम को महिमा मिले। परमेश्वर विशेष रीति से इस्राएक के साथ काम करने जा रहा है। यहाँ आशीष और न्याय के बारे में एक सिद्धांत है जो मैं आप तक पहुश्चाना चाहता हूँ। परमेश्वर यहूदियों को सीधे आशीष देता है लेकिन वह अन्यजातियों को यहूदियों के द्वारा आशीष देता है। हम जो अन्यजाति हैं, हमें यह स्मरण रखने की आवश्यकता है। जो भी आत्मिक आशीष हमें कभी मिली, उसके लिये हम यहूदियों के कर्जदार हैं। यूहन्ना 4ः22 में यीशु ने कहा,
उद्धार यहूदियों से है।
यह बहुत ही साधारण सा कथन है। जो भी आशीष आपने कभी उद्धार के संबंध में पाई उसके लिये एक जाति के कर्जदार है, यहूदी जाति। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि आप इस बात को पहचानंे और उस अनुसार काम करें।
परन्तु जब न्याय की बात आती है तो परमेश्वर सीधे अन्यजातियों का न्याय करता है, वह यहूदियों का न्याय अन्यजातियों के द्वारा करता है। मुझे यह दोहराने दीजिये। परमेश्वर सीधे यहूदियों को आशीष देता है। वह अन्यजातियों को आशीष देता है। वह अन्यजातियों का न्याय सीधे करता है। वह यहूदियों का न्याय अन्यजातियों के द्वारा करता है। आप यहूदियों के सैकड़ों वर्ष पुराने इतिहास को देखें, वर्तमान समय में परमेश्वर ने उन्हें उनकी अनाज्ञाकारिता का दंड देने के लिये अन्यजातियों का उपयोग किया है।
और इस प्रकार अगला न्याय महाक्लेश के दौरान होने वाला इस्राएल का न्याय है। हम वचन में देखेंगेः यिर्मयाह 30ः3-7ः
क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आते हैं कि मैं अपनी इस्राएली और यहूदी प्रजा को बंधुआई से लौटा लाऊँगा, और जो देश मैं ने उनके पितरों को दिया था उस में उन्हें फेर ले आऊँगा, और वे फिर उसके अधिकारी होंगे। यहोवा का यही वचन है। भले ही र्कोइ सरकार या राजनीतिज्ञ कुछ भी सोचे, वचन कहा है कि वे उसके अधिकारी होंगे। और जो भी बाइबल को जानता है, उसे मालूम है कि वह कैसा देशा है, ऐसा केवल एक ही देश है। मेरे एक प्रचारक मित्र, ने एक बार कहा, ‘‘ठीक है, यदि यहूदियों की वापसी, परमेश्वर की आेर से होती तो वहाँ शांति स्थापित होती।’’ वह बाइबल को नहीं जानते थे क्योंकि यहूदियों की वापसी के बोर में बाइबल यह कहता हैः
जो वचन यहोवा ने इस्राएलियों और यहूदियों के विषय कहे थे, वे ये हैं¢। यहोवा यों कहता है¢ थरथरा देनवेाला शब्द सुनाई दे रहा है, शान्ति नहीं, भय ही का है। पूछो तो भला, और देखो, क्या पुरुष को भी कहीं जनने की पीड़ा उठती है? फिर क्या कारण है कि सब पुरुष
ज़च्चा की नाई अपनी अपनी कमर अपने हाथों से दबाये हुए देख पड़ते हैं? क्यों सब के मुख फीके रंग के हो गये हैं?
इस्राएल के निकट भविष्य में सबसे बड़ा दबाव है जिसका उन्होंने कभी भी उन्होंने अनुभव नहीं किया है, यह उनके देश में वापस आने के बाद की बात है।
हाय, हाय, वह दिन क्या ही भारी होगा! उसके समान और कोई दिन नहीं, वह याकूब के संकट का समय होगा, परन्तु वह उस से भी छुड़ाया जायेगा।
ध्यान दें, उसका छुड़ाना नहीं बल्कि उससे छुड़ाना। और वहाँ परमेश्वर यहूदियों का न्याय करेगा। महाक्लेश के अंत में उनका न्याय होगा। तब परमेश्वर अन्य देशों का न्याय करगेा। योएल 3ः1-2, समय बीत रहा है, मुझे जल्द समाप्त करना है। योएल 3ः1-2ः
‘‘क्योंकि सुनो, जिन दिनों में और जिस समय मैं यहूदा और यरूशलेम वासियों को बंर्धुआइ से लौटा ले आऊँगा।’’
ध्यान दें, यह उसी समय के बारे में बताता है, अपने स्वयं के देश में यहूदियों की वापसी, परमेश्वर कहता हैः
‘‘उस समय मैं सब जातियों को इकट्ठी करके यहोशपात की तराई में ले जाऊँगा, और वहां उनके साथ अपनी प्रजा अर्थात् अपने निज भाग इस्राएल के विषय में जिसे उन्हों ने अन्यजातियों में तितर-बितर करके मेरे देश को बाँट लिया है, उन से मुकद्दमा लडूँगा।’’
तो परमेश्वर कहता है कि जब वह इस्राएलियों के साथ व्यवहार कर चुका होगा तो वह अन्यजातियों का न्याय करेगा। वह एक ही आधार पर उनसे व्यवहार करेगा, कि किस प्रकार उन्होंने इस्राएल के साथ व्यवहार किया है। यह एक उल्लेखानीय तथ्य है लेकिन यह सच है। परमेश्वर के दो आरोप हैं। एक, उन्होंने एक बार यहूदी लोगों को सताया है। दो, उन्होंने देश को विभाजित कर दिया। परमेश्वर कहता है, ‘‘यह मेरा देश है। मैंने इसे इस्राएलियों को दिया है। और किसी मानव अधिकारी या सरकार को र्कोइ अधिकार नहीं है कि देश का विभाजन करे। आज क्या हो रहा है? जो परमेश्वर ने कहा, ठीक वही नहीं होना चाहिये। देश विभाजित किया गया है, विभाजित किया जा रहा है, और शायद विभाजित किया जायेगा। लेकिन जब परमेश्वर न्याय के लिये आता है तो वह उन देशों का न्याय करेगा, जिन्होंने देश का विभाजन किया है।
दुर्भाग्यवश, सबसे ऊपर वह ब्रिटने को रखेगा। क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दिये गये आदेश के लिये ब्रिटेन जिम्मेदार था कि उसने यहूदियों के लिये राष्ट्रीय घर का प्रबध्ंा किया था और 1922 में ब्रिटेन ने विंस्टन चर्चिल के एक निर्णय के द्वारा उस भूमि का 76 प्रतिशत जाॅर्डन नामक एक अरब देश को दे दिया। और वहाँ किसी यहूदी को रहने की अनुमति नहीं है। बचे हुए 24 प्रतिशत को संयुक्त राष्ट्र ने विभाजित करर दिया है। इन सब को यीशु के आगमन पर जवाब देना होगा।
और यदि आप मत्ती 25 को देखें, राष्ट्रों का न्याय-भेड़ देशों का न्याय जो राज्य में आमंत्रित किये जाते हैं, बकरी देशा जो कि राज्य से बाहर कर दिये गये, वे अनंत न्याय में भेज दिये जायेंगे-विभाजन का मूल सिद्धांत यह है कि उन्होंने किस प्रकार यीशु के भाईयों के साथ किया है। मैं यह इसलिये कहता हूँ यह बहुत ही महत्वपणरू्ा है क्योंकि वर्तमान विश्व के मामलों में इस्राएल एक अहम कारक है, और बहुत से देश गलत कतार में शामिल हो रहे हैं। इस्राएल अपना बचाव नहीं कर सकता है, परन्तु जल्द या बाद में जब समय आयेगा तो परमेश्वर हस्तक्षेप करेगा।
तो, यह तीसरा न्याय है, चैथे के बारे में हम केवल थोड़ा ही बात करेंगे। यह श्वेत सिंहासन के बाद होने वाला न्याय है, प्रकाशित. 20ः
फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उस को जो उस पर बैठा हुआ है, देखा, जिस के साम्हने से पृथ्वी और आकाश भाग गये और उन के लिये जगह न मिली। फिर मैं ने छोटे बड़े सब मरे हुओं को सिंहासन के साम्हने खड़े हुए देखा, और पुस्तकें खोली गई, और फिर एक और पुस्तक खोली गईं, और फिर एक और पुस्तक खोली गई, अर्था त् जीवन की पुस्तक, और जैसे उन पुस्तकों में लिखा हुआ था, उन के कामों के अनुसार मरे हुआें का न्याय किया गया।
परन्तु एक और पुस्तक है, उसके लिये परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो कि जीवन की पुस्तक है। और वे जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे गये है, वे परमेश्वर के साथ अनंतता में प्रवेश करेंगे। शेष हमेशा के लिये परमेश्वर के सामने से मिटा दिये जायेंगे।
तो, चार मुख्य न्याय ये हैं।
नंबर एक, मसीह का न्याय आसन, केवल विश्वासियों का न्याय।
नंबर दो, महान क्लेशा में इस्राएल का न्याय।
तीन नंबर, सहस्राब्दी की शुरुआत में मसीह के सिंहासन से पहले सभी अन्य देशों का न्याय। और नंबर चार, महान सफेद सिंहासन के सामने सभी शेष मृतकों का अंतिम न्याय। तो, जितना मैं समझता हूँ, ये परमेश्वर के न्याय के सिद्धांत हैं। अब हममें से प्रत्येक को स्वयं से
पूछना है, ‘‘क्या मैं परमेश्वर के न्याय का सामना करने को तैयार हूँ? क्या मैं उस प्रकार का जीवन जी रहा हूँ जिस प्रकार जिससे मुझे उसके सामने लज्जित होना नहीं नहीं पड़ेगा।’’ भाईयों और बहनों, आईये, परमेश्वर के न्याय के सामने खड़े होने के इस मुख्य मुद्दे के बारे में एक साथ प्रार्थना करें।
‘‘सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तेरा वचन बहुत ही स्पष्ट है। आज रात हम तेरे लोगों के बीच तरेा वचन बाँट रहे थे। अब मैं यहाँ एकत्रित सभी लोगों के लिये प्रार्थना करना चाहता हूँ, मैं ने जो वचन कहा है वह सीधे बाइबल से लिया गया है, कि यह आपके हृदय में प्रवेश करे, और बहुत से एसेे होंगे जो अपने हृदयों को जाँचने के लिये बाध्य होंगे। मैं विशेषकर एक तोड़े वाले लोगों के लिये प्रार्थना करता हूँ। प्रभु, उन्हें उस एक तोड़े को जमीन में गाड़ने मत दे। उसे बैंक में जमा करने में उनही सहायता कीजिये ताकि आपके आने पर वे आपसे लज्जित न हों। प्रभु यीशु, आपने कई बार कहा है कि आप शीघ्र आ रहे हैं। आपने कई बार यहाँ तक कि इस सभा में भी चेतावनी दी है कि हमें आपके आगमन के लिये तैयार रहना है। मैं यहाँ अपने सहित उपस्थित हरेक के लिये प्रार्थना करता हूँ कि हम पर अनुग्रह कीजिये कि हम आपके आगमन पर यीशु के न्यायासन के सामने खड़े होने के लिये तैयार हो सकें और जो जो काम हमने शरीर में किये हैं उनका उत्तर दे सकें। प्रभु, हम आपके नाम से आपकी दया के लिये प्रार्थ ना करते हैं, यीशु के नाम में। आमीन्।’’
परमेश्वर आपको आशीष दे।
कोड: MV-4169-100-HIN









