हम सबसे पहले धन्यवाद देने के विषय में देखेंगे। बहुत से लोगों ने यह सोच रखा है कि प्रार्थना केवल परमेश्वर से माँगना मात्र है; मानो परमेश्वर के पास अपने खरीददारी की सूची लेकर जा रहे हों। यह प्रार्थना के बारें में बहुत ही सीमित और अपर्याप्त विचार हैं। प्रार्थना एक उपकरण बजाना मात्र नहीं है, यह पूरी आॅर्केस्टंा है। इस आॅर्केस्टंा में बहुत सारे वाद्ययंत्र होते हैं। हम उनमें से तीन को देखेंगेः धन्यवाद देना, स्तुति करना और आराधना करना।

ये सभी प्रार्थना के अनिवार्य भाग हैं। यदि आपने विशेषकर बिना यह जाने कि कैसे धन्यवाद देने और प्रार्थना करने को एक साथ रखना है, अपनी खरीददारी की सूची के साथ परमेश्वर के पास आने की आदत बना रखी है तो मुझे भय है कि आप बहुत बार बिना कुछ खरीदे ही वापस चले जायेंगे। क्योंकि परमेश्वर ने उसके पास जाने हेतु हमारे लिए कुछ शर्तें रखी हैं जिनके अनुसार ही हम उसके पास जा सकते हैं। प्रारंभ में ही मुझे कहने दीजिए, बिना धन्यवाद और स्तुति के परमेश्वर तक कोई पहुँच नहीं है।

कुछ वर्षों पूर्व मैं अपनी ही उम्र के, एक बहुत ही वरिष्ठ मसीही व्यक्ति से बात कर रहा था, और वह मुझसे भी पहले से मसीही थे। इस देश में उनका नाम सुपरिचित है। वह बहुत ही सम्मानित व्यक्ति हैं। और उन्होंने मुझे कहते सुना कि आप बिना धन्यवाद और स्तुति के परमेश्वर के पास नहीं पहुँच नहीं सकते हैं। उनने कहा, ‘‘मैं इतने वर्षों से मैं मसीही रहा हूँ, मैं ने कभी यह नहीं सुना।’’ इस बात ने उनके प्रार्थना जीवन को क्रांतिकारी बना दिया।

तो हम आज रात ऐसी बातों को देख रहे हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, बशर्ते कि आप एक फलदायी और सफल प्रार्थना जीवन जीने जा रहे हैं।

मुझे आपको इन तीन बातों के बीच मन ही में अंतर करने के तीन तरीके बताने दीजिएः धन्यवाद देना, स्तुति करना और आराधना करना। उनमें से प्रत्येक परमेश्वर तक पहुँचने और परमेश्वर से संबंध स्थापित करने के तरीके हैं। लेकिन उनमें से प्रत्येक एक भिन्न पहलू में परमेश्वर से संबंध स्थापित करते हैं। यह बहुत ही सामान्य सी बात है, आपको अपवाद मिल सकता है लेकिन उस का मूल्य क्या है उस बात के लिए उसे ग्रहण करें। धन्यवाद देने के द्वारा परमेश्वर की भलाई को स्वीकार करते हैं। स्तुति के द्वारा हम परमेश्वर की महानता को स्वीकार करते हैं। और आराधना के द्वारा हम परमेश्वर की पवित्रता को स्वीकार करते हैं। तो धन्यवाद देना हमें परमेश्वर की भलाई से जोड़ती है। स्तुति हमें परमेश्वर की महानता से जोड़ती है और आराधना, जो कि मानव प्राण की सबसे बडी गतिविधि होती है, हमें परमेश्वर की पवित्रता से जोड़ती है।

अब मुझे इस सत्र विशेष का शेष भाग धन्यवाद देने के विषय पर बात करने दीजिए। मैं इब्रानियों 12ः28 में से एक पद पढ़ना चाहता हूँ। यह रोचक होगा, मैं न्यू किंग जेम्स से पढ रहा हूँ जो कि अधिकृत संस्करण के लिए बहुत सरल है, लेकिन थोड़ा बहुत संशोधित। आप में से कुछेक के पास शायद न्यू इंटरनैशनल वर्शन होगा। यदि है तो आप दो संस्करणों में उल्लेखनीय अंतर देखेंगे। मुझ पहले इसे पढने दें, और तब मैं आपको यह बताऊँगा जिसे मैं स्थापित करना चाहता हूँ।

‘‘इस कारण हम इस राज्य को पाकर जो हिलने का नहीं, उस अनुग्रह को हाथ से न जाने दें, जिस के द्वारा हम भक्ति, और भय सहित, परमेश्वर की ऐसी आराधना कर सकते हैं जिस से वह प्रसन्न होता है।’’

अब जहाँ किंग जेम्स वर्शन कहता है, ‘‘हम अनुग्रहीत हों,’’ वहीं एर्नआइ वी कहता है, ‘‘हम कृतज्ञ हो।’’ मैं आपको बताना चाहता हूँ कि क्यों प्रत्येक सही अनुवाद है। क्योंकि यूनानी में, अनुग्रह पाना-और मुख्य शब्द चरिस है-‘‘आपको धन्यवाद’’ कहना है। मुझे नहीं मालूम कि क्या आप में से किसी को आधुनिक यूनानी का कोई ज्ञान है, परन्तु ‘‘आपको धन्यवाद’’ के लिए उपयुक्त यूनानी शब्द अ-हर-इस्तो है जो सीधे चरिस, अनुग्रह से जुड़ा हुआ है। तो, जो बात मैं आपको बताना चाहता हूँ, वह है कि अनुग्रह और धन्यवाद के बीच एक सीधा संबंध है। एक कृतघ्न व्यक्ति ऐसा व्यक्ति होता है जो परमेश्वर के अनुग्रह से बाहर है। आप कृतघ्न रहकर परमेश्वर के अनुग्रह के अधीन नहीं हो सकते हैं।

तीन आधुनिक भाषायें हैं जो यह बताती है, शायद आप में से कई इससे परिचित हैं। फ्रेंचः अनुग्रह। ग्रेस अडेइयू का अर्थ है, ‘‘परमेश्वर को धन्यवाद।’’ यह ठीक ग्रेस शब्द है। यह अंग्रेजी भाषा के शब्द जैसा ही उच्चारित होता है। इतालवीः ‘आपको धन्यवाद’ ग्रेज़ी है, सीधे अनुग्रह से जुड़ा हुआ। स्पेनीः गे्रसियास। तो आप यह तीन उपन्यास की भाषा है, ऐसी भाषायें जो कि लतीनी पर आधारित है, सभी अनुग्रह और धन्यवादीपन में सीधा संबंध दर्शाता है। जिस बात पर मैं जोर देना चाहता हूँ और वह हम सब के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह यह है कि जब हम कृतघ्न होते हैं तो हम परमेश्वर के अनुग्रह से बाहर होते हैं।

तो हम कह सकते हैं, ‘‘आइए हम धन्यवादी हों’’ या आइए अनुग्रह पायें।’’ और हम एक ही बात कहते हैं। बिना धन्यवादी हुए आप अनुग्रह नहीं पा सकते हैं।

मुझे नहीं मालूम कि क्या आप मेरे साथ यह कहना चाहते हैं? मैं इस पर जोर देना चाहता हूँ। मुझे एक बार यह कहने दीजिए और आप मेरे बाद कहें। ‘‘बिना धन्यवादी हुए हम अनुग्रह नहीं पा सकते हैं। बिना धन्यवादी हुए आप अनुग्रह नहीं पा सकते हैं।’’ परमेश्वर की स्तुति हो!

अब हम जल्दी से कृतज्ञता के बारे में कुछ पद लें, मुख्य रूप से पौलुस की पत्रियों से। वास्तव में, चार अलग अलग पत्रियों से। कुलुस्सियों 3ः 15-17 से प्रारंभ करकेः

‘‘और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।’’

यह एक सलाह नहीं है, यह एक आज्ञा है। धन्यवादी बनो। तब आगे कहता हैः

‘‘मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में (उस शब्द को ध्यान दीजिए) अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।‘‘

इसलिए हमें कभी भी परमेश्वर को धन्यवाद दिए बिना कुछ भी करने की अनुमति नहीं हैं। जो कुछ हम करते हैं उसे करने के दो तरीके हैं, ‘‘यीशु के नाम में’’ और ‘‘उसके द्वारा परमेश्वर को धन्यवाद देना।’’ और वह एक वास्तविक अद्भुत सीमा तय करता है। युवा लोग कभी कभी मेरे पास आते हैं और कहते हैं, किसी मनोरंजन के स्थान पर जाने के लिए ‘‘मेरे लिए ऐसा या वैसा करना ठीक है।’’ मैं ने कहा, ‘‘यदि आप आप वहाँ जाकर प्रभु यीशु के नाम में कर सकते हैं और उसके द्वारा परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं तो ठीक है सकते हैं। और यदि आप नहीं कर सकते हैं, तो यह सब ठीक नहीं है।’’ यह एक सीमा निर्धारित करता है कि हम क्या करने के लिए स्वतंत्र हैं। आप वचन या काम में जो भी करते हैं, वह सब प्रभु यीशु के नाम में करें, वह सब प्रभु यीशु के नाम में, उसे धन्यवाद देते हुए करें। तो धन्यवाद जरूरी है, यह एक विकल्प नहीं है।

और तब इफिसियों 5ः18 में, पौलुस बताता है कि लगातार पवित्र आत्मा से भरने का क्या अर्थ है। और वह कहता हैः

और दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इस से लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।

यह उल्लेखनीय है कि कलीसिया ने कितना अधिक नकारात्मक पर ध्यान केंद्रित किया है और सकारात्मक पर ध्यान नहीं दिया है। क्या ऐसा नहीं है? मेरा मतलब है, हर कोई जानता है कि आपको शराब नहीं पीना चाहिए लेकिन आप में से कितने जानते हैं कि आपको आत्मा से परिपूर्ण होना है? आत्मा से भरे जाने का परिणाम क्या है? अगला पद हमें बताता हैः

और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो (और अन्तिम उमड़ना क्या है)। और सदा सब बातों के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर पिता का धन्यवाद करते रहो।

तो फिर से, आप जब पवित्र आत्मा से भरे हुए हैं तो आप लगातार परमेश्वर को धन्यवाद दे रहे होंगे। आप आंशिक रूप् से इस बात से जाँच सकते है आप में आत्मा की परिपूर्णता कितनी है, कि आप परमेश्वर को धन्यवाद देने में कितना समय खर्च करते हैं। क्योंकि जब आप परमेश्वर को धन्यवाद देने वंचित रहते हैं, तो आप रिसने लगते हैं। यह सिर्फ एक निश्चित संकेत है।

और तब पुनः नया नियम में कुछ छोटे पदों, 1 थिस्सलुनीकियों 5ः16-18 में, परन्तु वे कुछ विस्मयकारी बात कहते हैं। 1 थिस्सलुनीकियों 5ः16-18ः

‘‘सदा आनंदित रहो....।’’

और यह कहना बहुत आसान है, और यह कहना बहुत आसान है, है न? यह करने में और अधिक अनुग्रह की आवश्यकता है।

‘‘निरंतर प्रार्थना करो।’’

कभी भी प्रार्थना के अंत पर मत आईए। दूसरे शब्दों में, आप को हर समय प्रार्थना करते नहीं रहना है, लेकिन कभी नहीं कहें, ‘‘मैं ने प्रार्थना करना समाप्त कर दिया है।’’ मुझे लगता है, कि स्मिथ विग्लसवर्थ के विषय में यह कहा गया है कि उन्होंने कभी भी एक समय में आधे से घंटे से अधिक प्रार्थना नहीं की लेकिन वह कभी बिना प्रार्थना किए आधा घंटा नहीं रहे। यह बिना रुके प्रार्थना करने की एक अच्छी तस्वीर है।

और तब हम इन तीन अर्थपूर्ण अपेक्षाओं में से तीसरे पर आते हैं।

‘‘हर बात में धन्यवाद करोः क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यहीं इच्छा है।’’

मसीह यीशु में परमेश्वर की इच्छा क्या है? हर चीज में धन्यवाद देना। तो यदि आप धन्यवाद नहीं दे रहे हैं तो, आप परमेश्वर की इच्छा से बाहर हैं। क्या आप समझे? मैं ने कई मसीही कार्यकर्ताओं के साथ काम किया है, जो सही जगह में थे, सही काम कर रहे थे, लेकिन वे परमेश्वर की इच्छा के बाहर महसूस करते थे। और यह जगह या नौकरी के कारण नहीं था, उन्होंने लगातार धन्यवादी होना बंद कर दिया था। तो स्मरण रखें, जैसे ही आप धन्यवाद देना बंद कर देते हैं, आप परमेश्वर की इच्छा के बाहर हो जाते हैं। अनिवार्य नहीं कि जो काम आप कर रहे हैं, उस के लिए परन्तु इसलिए कि आप परमेश्वर को जवाब नहीं दे रहे हैं।

और फिर फिलिप्पियों 4ः6 मेंः

‘‘किसी भी बात की चिन्ता मत करोः परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएँ।’’

बिना धन्यवाद दिये कभी भी परमेश्वर के सम्मुख निवेदन लेकर न जायें।

वर्षों पूर्व मैं जाॅन वेस्ली के जर्न ल्स से बहुत प्रभावित था। मैं हमेशा इस पद पर उनकी टिप्पणी को याद करता हूँ। वचन कहता है, ‘‘हर बात में प्रार्थना और निवेदन के द्वारा।’’ और डन्होंने उन तीन शब्दों ‘‘सबकुछ प्रार्थना के द्वारा’’ को लिया और कहा, ‘‘मैं आश्वस्त हूँ कि सबकुछ प्रार्थना के द्वारा होता है और उसके बिना कुछ भी नहीं।’’ मैं मानता हूँ कि यह सच में मूल सत्य है।

परन्तु यहाँ पौलुस कहता है, ‘‘बिना धन्यवाद के परमेश्वर के सामने कोई निवेदन न लाया जाएं। आपके पास चाहे जो भी निवेदन हो, उसे धन्यवाद के साथ लाएँ।‘‘

और तब हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि जिसे मैंने पहले ही परमेश्वर तक पहुँचने के संबन्ध में देखा है। इसके लिये सबसे अच्छा भाग भजन 100 है जो कि एक बहुत ही सुन्दर, परिचित भजन है।

परमेश्वर के भवन में आने और परमेश्वर तक पहुँचने के बारे में बात करते हुए पद 4 में वचन कहता है: ‘‘उसके फाटकों से धन्यवाद और उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो, उसका धन्यवाद करो और उसके नाम को धन्य कहो।’’

परमेश्वर तक पहुँचने के दो स्तर हैं। पहला, फाटकों से होकर। दूसरा, आँगनों से होते हुए। फाटक आपको आँगनों में प्रवेश देता है और आँगन आपको परमेश्वर के वास्तविक भवन में प्रवेश देता है। परन्तु आप उनमें निर्धारित मार्ग के बिना प्रवेश नहीं कर सकते हैं जो कि ‘‘धन्यवाद के साथ उसके फाटक, और स्तुति के साथ उसके आँगन’’ हैं। परमेश्वर तक पहुँचने का पहला कदम धन्यवाद देना है। दूसरा, स्तुति है। मैं पूरी तरह कायल हूँ कि तब तक एक व्यक्ति का परमेश्वर के साथ निकट पहुँच नहीं होता है, जब तक वह धन्यवाद और स्तुति के निर्धारित मार्ग से नहीं आता है। हो सकता है आपमें से कुछ लोग कभी कभी प्रार्थना करते हों और महसूस करते हों कि आप परमेश्वर से दूर हैं। बहुत संभव है कि इसका कारण यह है कि आप निर्धारित मार्ग से नहीं आ रहे हैं। आप आँगनों के बाहर खड़े होकर परमेश्वर को पुकार सकते हैं और वह आपकी सुनेगा और वह आप पर करुणा करेगा। परन्तु तब तक आपकी पहुँच उस तक नहीं होगी जब तक आप धन्यवाद और स्तुति के साथ नहीं आते हैं। उसने इस बात को स्थापित किया है और वह उसे बदलनेवाला नहीं।

तब आप कहते हैं - ‘‘हाँ, आप नहीं कहते परन्तु दूसरे कह सकते हैं -’’ ठीक है, मेरे पास सचमुच में परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिये कुछ भी नहीं है। मैं क्यों उसे धन्यवाद दूँ? कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। मेरा जीवन पूरी तरह विपत्ति में फँसा हुआ है। मैं क्यों परमेश्वर को धन्यवाद दूँ? खैर, पद 5 में भजनकार ने आपको तीन कारण दिया है। वह कहता है:

‘‘उसका धन्यवाद करो और उसके नाम को धन्य कहो, क्योंकि यहोवा भला है। उसकी करुणा सदा के लिये और उसकी सच्चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है।’’

वे तीनों बातें हमेशा सच्ची हैं। आप चाहे कैसा भी महसूस करें, आपकी परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, ये बातें कभी नहीं बदलती। प्रभु हमेशा भला है, उसकी करुणा सदा की है, उसकी सच्र्चाइ पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है। तो आपके पास पमरेश्वर को धन्यवाद देने के लिये तीन स्थायी, अपरिवर्तनीय कारण है। अपनी भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित मत कीजिए, अपनी स्थितियों पर ध्यान केन्द्रित मत कीजिए, हमारे साथ परमेश्वर के स्वभाव की इन अनन्त अपरिवर्त नीय पहलुओं और उसके कार्यों पर ध्यान केन्द्रित कीजिए। और आप बिना रूके परमेश्वर को धन्यवाद दे रहे होंगे। हम सबके पास परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिये बहुत कुछ है, यदि हम नहीं करते हैं तो यह शर्म का कारण है।

अब लूका 17 अध्याय में, मैं नहीं सोचता कि हम उसे निकालेंगे परन्तु वहाँ दस कोढ़ियों की एक कहानी है जिन्होंने यीशु से मुलाकात किया। आपको स्मरण है, कोढ़ी होने के कारण उन्हें किसी के भी पास आने की अनुमति नहीं थी, वे अशुद्ध थे। उन्हें लगातार चिल्लाना पड़ता था, ‘‘अशुद्ध, अशुद्ध, अशुद्ध।’’ हर किसी को चेतावनी देने के लिये कि वे उनके मार्ग से दूर चले जाएँ क्योंकि उनकी बिमारी संक्रामक थी। परन्तु वचन कहता है कि उन्होंने दूर से ही पुकारा और यीशु को देखकर चिल्लाया और कहा, ‘‘यीशु, स्वामी हम पर दया कर।’’ और यीशु ने उन्हें एक बहुत ही साधारण उत्तर दिया, उसने कहा, ‘‘जाओ और अपने आपको याजकों को दिखाओ।’’ अब एक व्यक्ति जो चंगा हो जाता था या कोढ़ से शुद्ध हो जाता था उसे अपने आपको याजकों को दिखाना पड़ता था ताकि एक प्रमाण पत्र हासिल कर सके कि वह अब संक्रामक नहीं है। तो उनसे यह कहने के द्वारा कि वे जाएँ और अपने आपको याजकों को दिखाएं, यीशु कह रहा था, ‘‘मार्ग में तुम चंगे हो जाओगे, जब तक तुम वहाँ पहुँचोगे, याजक यह प्रमाणित करने योग्य होगा कि उसमें अब कोढ़ नहीं है।’’ आप देखें, यह विश्वास है। कभी कभी जाते हुए हम चंगे हो जाते हैं। यदि हम स्थिर खड़े रहें और कुछ न हो तो कभी भी कुछ नहीं होगा।

खैर, उनमें से सबने कोढ़ से शुद्धि र्पाइ परन्तु केवल एक - जो कि एक सामरी था, यहूदी नहीं - यीशु को धन्यवाद देने के लिये लौटा। और वह मुँह के बल गिरा और उसे धन्यवाद दिया। यीशु ने कहा, ‘‘क्या दसों शुद्ध नहीं हुए? तो नौ कहाँ हैं? क्यों धन्यवाद देने के लिये यह विदेशी ही लौटा?’’ तब उसने उस व्यक्ति से कहा, ‘‘तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें बचा लिया है (यूनानी अनुवाद यही है), कुशल से जा।’’ भाषा बहुत महत्वपूर्ण है, अंगे्रजी अनुवाद में यह स्पष्ट नहीं है। वे सभी, दसों शुद्ध हुए थे परन्तु जो धन्यवाद देने के लिये वापस आया वही एक बचाया गया। उन सबने शारीरिक चंर्गाइ पाई, परन्तु केवल एक जो धन्यवाद देने के लिये वापस लौटा, उसी ने उद्धार की अनन्त आत्मिक चंगाई र्पाइ और वह एक मात्र व्यक्ति था जो यीशु के पास आया। तो आप देखें, बिना धन्यवाद दिए परमेश्वर तक हमारी पहुँच नहीं है।

तो धन्यवाद के विषय में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एक ऐसी कुन्जी है जो परमेश्वर की अलौकिक सामथ्र्य को खोलती है। मैं आपको एक बहुत ही सुस्पष्ट उदाहरण दूँगा, यूहन्ना 6 में वर्णित पाँच हजार लोगों को खिलाने की घटना। आपको याद है, यीशु के सामने पाँच हजार लोगों की भीड़ थी, सभी भूखे थे, और एक मात्र श्रोत जो उनके पास था वह एक छोटे लड़के का भोजन था: पाँच रोटी और दो मछलियाँ। परन्तु उसने कहा, ‘‘भीड़ को बैठाओ, हम उन्हें भोजन देने जा रहे हैं।’’ यूहन्ना 6 अध्याय के पद 11 में इसी को बताया गया है:

‘‘तब यीशु ने रोटियां लीं, और धन्यवाद करके बैठनेवालों को बांट दीः और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बांट दिया। जब वे खाकर तृप्त हो गए (उन सबने पर्याप्त खाया और बच भी गया) तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका न जाए।’’

मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि उसने प्रार्थना नहीं किया। उसने कुछ करने के लिये परमेश्वर से नहीं कहा, जो उसने किया वह कुछ उसके हाथ में था उसके लिये परमेश्वर को धन्यवाद देना था। और अवश्य ही यूहन्ना इस बात से बहुत प्रभावित हुआ क्योंकि 23 पद में कुछ नावों का वर्णन है जो उनके पीछे चले। हम इसकी पृष्ठभूमि में नहीं जा रहे हैं परन्तु 23 पद में वह कहता है:

‘‘तौभी छोटी नावें तिबिरियास से उस जगह के निकर्ट आइं जहाँ उन्होंने प्रभु के धन्यवाद करने के बाद रोटी खाई थी।’’

तो यूहन्ना पर यह प्रभाव पड़ा कि लम्बी प्रार्थनाओं के द्वारा आश्चर्यकर्म नहीं हुआ है, परन्तु बस धन्यवाद देने के द्वारा। और मैं सचमुच में मानता हूँ कि बहुत बार हम परमेश्वर की सामथ्र्य से केवल इसलिये चूक जाते हैं क्योंकि हम धन्यवाद देने के द्वारा इसे कार्य करने नहीं देते हैं।

कुछ बाद में यूहन्ना के 11वें अध्याय में आप पाएँगे कि यीशु लाजर की कब्र के सामने खड़ा था जिसे गाड़े हुए चार दिन बीत चुके थे। उसने एक लम्बी प्रार्थना नहीं की, उसने योहीं कहा, ‘‘पिता, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ, आप सदा मेरी सुनते हैं।’’ उसने केवल इतना कहा और तब उसने लाजर से बात किया, और लाजर बाहर आया। मैं सचमुच मानता हूँ कि जब तक हम परमेश्वर को धन्यवाद देने की आदत न विकसित करें, जैसा कि यहाँ वर्णन किया गया है, हम परमेश्वर की अलौकिक सामथ्र्य को बहुत अधिक खो रहे हैं। सामान्य रूप से बात करें तो मुझे नहीं लगता कि लम्बी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की सामथ्र्य लाती है। बाइबल में अधिकांश वास्तविक शक्तिशाली प्रार्थनायें बहुत ही छोटी हैं। मैं मरियम के लिये मूसा की प्रार्थना के विषय में सोचता हूँ जो उसने तब किया जब वह अपने र्भाइ की आलोचना करने के कारण कोढ़ से पीड़ित हो गई थी। उसने कहा, ‘‘प्रभु उसे चंगा कर।’’ उसने केवल इतना ही कहा। मुझे लगता है कि यदि हम अपनी प्रार्थनाओं में अधिक धन्यवाद मिलाएँ तो हमारे निवेदन छोटे होंगे परन्तु अधिक प्रभावशाली होंगे।

अब हमें इस सत्य के अन्धेरे पक्ष को देखना चाहिए जो कि धन्यवादी होने के विपरीत है, उसके विषय में बाइबल क्या कहती है? और इसे कृतघ्न होने के विषय में बहुत कुछ कहना है। मैं आपको केवल वे बातें ही बताऊँगा जो धर्मशास्त्र में मेरे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण कथन है। रोमियों 1 अध्याय में पौलुस बहुत ही उत्तम तरीके से परमेश्वर के ज्ञान से सबसे अधिक दुष्टता और पाप में मानवजाति के पतन की रूपरेखा खींचता है। रोमियों 1 अध्याय मानव पतन दुःख और दुष्टता की सबसे भयावह सूचियों में से एक के साथ समाप्त होता है। हम अपने आप से पूछ सकते हैं कि मानवजाति कैसे इसमें गिरी और उत्तर रोमियों 1 अध्याय पद 21 में दिया गया है। यहाँ वचन कहता है:

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